Wednesday, 17 February 2021

कील गहरा धँसा


 पार्थक्याश्रय–
आईना की किरचें
एड़ी में चुभे

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"क्क्या आंटी! इतनी जल्दी क्यों जा रही हैं? सुनिए आपलोग आपसे भी कह रहा हूँ अंकल,  होली के बाद जाइये। होली में हम सब साथ रहेंगे तो अच्छा लगेगा।" दिनेश ने कहा।

रवि माथुर पत्नी के संग अपने बेटे के पास विदेश आये हुए थे।  हालांकि वो लोग छः महीने के लिए ही आये थे लेकिन आकस्मिक वैश्विक जंग छिड़ने के कारण लगभग पन्द्रह महीने के लिए रुक गए थे। आज वापसी थी तो बेटे के कुछ दोस्त उनसे मिलने आये और साग्रहानुरोध कर रहे थे कि कुछ दिनों के लिए और ठहर कर जाएँ।

"जाना जरूरी नहीं होता तो जरूर रुक जाता बेटा जी। पेंशन सुचारू रूप से चल सके उसके लिए लाइव सार्टिफिकेट के लिए सशरीर उपस्थिति होगी तथा एक जरुरी मीटिंग है उसमें शामिल होना है और सबसे महत्त्वपूर्ण बात कि टिकट कट गया है।"

"टिकट का क्या है उसे बदला जा सकता है। वर्त्तमान काल में सबकुछ ऑन लाइन हो रहा है। आप हमसे बहाना नहीं बनाइये। प्लीज़ रुक जाइये।" दिनेश के स्वर में बेहद दर्द नज़र आ रहा था, मानों कुछ है जो उसे बेहद सता रहा है।

"जानती है आंटी आपलोग यहाँ हैं तो हमलोगों को भी अच्छा लगता है!" दिनेश की पत्नी ने कहा।

"हाँ आंटी! बड़ों के साथ रहने से ही तो घर, घर लगता है। वरना हमें देखिए दो जन हर पल का साथ फिर भी यहाँ यहाँ दिल में ऐसा दर्द है कि आप दिखला नहीं सकता।" दिनेश ने पुनः कहा।

"जानती हैं आंटी हमारी सासु माँ के यहाँ नहीं आ पाने का बेहद दुःख है।" दिनेश की पत्नी ने कहा।

"हाँ! मेरी माँ का बीजा बार-बार रिजेक्ट हो जा रहा है। कैंसिल करने के पीछे उन्हें लगता होगा कि अकेली औरत बेटे पर ही निर्भर होगी जाएगी तो लौट पाने का कोई आधार नहीं होगा। रुक ही जाएंगी। इसलिए बीजा नहीं दे रहा है।" दिनेश ने कहा!"

"तुमलोग ही क्यों नहीं अपने देश वापस चले जाते हो?" रवि माथुर का हर्षित स्वर में सवाल था।

"यह तो पक्का तय है अंकल कि मैं अपने देश लौट जाऊँगा। दो साल में लौट जाऊँ या चार साल में लौट जाऊँ। एकलौता पुत्र होने के नाते इतना ख्याति कमा लेना चाहता हूँ कि समाज को गर्व हो सके मुझपर। पिता का देखा सपना पूरा करना चाहता हूँ। जिस देश में मेरी माँ नहीं आ सकती है उस देश में तो मुझे रहना ही नहीं है।" दिनेश ने कहा।

"एक दिन भी ऐसा नहीं जाता कि ये अपनी माँ से फोन पर बात ना करते हों। इनकी सुबह माँ से बात करने के बाद ही होती है। मुझे भी लगता है कि हमें माँ के पास ही रहना चाहिए।" दिनेश की पत्नी ने कहा।

"और नहीं तो क्या जिसके खून से मैं बना हूँ उसके लिए कुछ ना कर पाना.. ओह्ह! मैं समझा नहीं सकता अपनी बैचेनी।" दिनेश बिन जल मीन की स्थिति में दिखलाई दे रहा थ।

"तुम जो अर्जन करना चाहते हो वह तो तुम अपने देश में भी कर सकते हो..!" अंकल ने कहा।

"मुझे इस देश की एक बात बहुत व्यवहारिकता पूर्ण लगी। एक-दो महीने के बच्चे को अलग कमरे में सुलाना। वयस्क होने पर अलग कर लेना।" आंटी का स्वर कहीं दूर गए व्यक्ति सा गूँज रहा था।

सभी एक दूसरे को स्तब्धता से देख रहे थे।


Wednesday, 10 February 2021

बस यूँ

01.हिमस्खलन–

कोने से फटी चिट्ठी

डाकिया बाँटे

02.चैता के संग

ध्वनित जंतसार-

चौका चौपाल

03.खण्डों में बँटे

ओस में गीले पत्ते 

मध्याह्न तम

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छोटी सी ही थी

तो किसी ने कहा

'अरे! बड़ी चुलबुली है

सोती कब है?

जरा नहीं थकती है!"

थोड़ी ही बड़ी हुई

तो किसी ने कहा

'अरे! इतनी चहकती परी

रेगिस्तान में जल की बूँदें सी'

और थोड़ी बड़ी हुई

तो 'सायरा बानो' सी लगती हो

चुहलबाजी में जी डरता है 

उससे आगे थोड़ी और बड़ी हुई

तो घमंडी, हिटलर, खड़ूस कहने लगे

जानते हो क्यों ?

मनमानी नहीं चलने लगी थी

खुद से प्यार होना खटकने लगी थी  ...


अपने अंगों की सुरक्षा

हर जीव करता है

तभी तो हिमपात के पहले

पेड़ों से पत्ता झरता है।

शाखाओं पर जो टिक जाता हिम

गलन पैदा करता हानिकारक

अंबरारंभ सा नजरों का भरम

जलन पैदा करता हानिकारक

Monday, 8 February 2021

निदान

भारत और वेस्टइंडीज के मध्य क्रिकेट का मैच चल रहा था और ऋत्विक जो कि क्रिकेट का ना मात्र शौकीन था अपितु अपने महाविद्यालय की क्रिकेट टीम का एक खिलाड़ी भी की आँखें टी.वी. स्क्रीन पर गड़ी हुई थी। वह भारत की वॉलिंग एवं वेस्टइंडीज की बैटिंग बड़े गौर से देख रहा था...। भारत की बॉलिंग और फील्डिंग पर वह बार-बार मोहित हुआ जा रहा था। उसे टीम के प्रत्येक सदस्य का तालमेल लुभा रहा था तो वेस्टइंडीज की बिखरी–बिखरी बैटिंग पर वह भीतर ही भीतर क्रोधित हो रहा था...।

वेस्टइंडीज के लगातार चार खिलाड़ियों के आउट होते ही उसके मुँह से अकस्मात् निकला,-"इस टीम का हार तो निश्चित है।"

बगल में बैठे उसके छोटे भाई ने कहा,-"अभी तो बैटिंग हेतु उनके खिलाड़ी बाकी हैं..। अभी से ही भैया आप ऐसा कैसे कह सकते हैं..?"

"छोटे! तू नहीं समझेगा... जहाँ बिखराव हो वहाँ हार निश्चित है... भारत ने बॉलिंग एवं फील्डिंग की तरह ही यदि आपसी तालमेल से बैटिंग की तो उनकी जीत निश्चित है।"

"हूँह.. ये.. तो है भैया!"

अपनी बात के साथ ही ऋत्विक के मन–मस्तिष्क में अंकित होने लगे नित्य प्रतिदिन के आपसी लड़ाई-झगड़े... अभी वह इन मानसिक उलझनों में उलझ सुलझ ही रह था कि बाहर से सबसे छोटा भाई रोते हुए दाखिल हुआ,-"भैया! मोहल्ले के हातिम और उसके भाई ने मिलकर मुझे पीटा है...।" इतना कहते हुए वह अपने कमरे में चला गया।

उसके मुँह से अकस्मात् निकला,-"अब मेरा कोई भाई या किसी और का भी भाई ऐसे रोता नहीं आएगा.. हम सब भाई आपस में प्यार-मोहब्बत से मिलकर उदाहरण बनकर रहेंगे और किसी भी समस्या का समाधान मिलकर करेंगे।"

Saturday, 6 February 2021

जागृत समाज

पुस्तक मेला में लघुकथा-काव्य पाठ समाप्त होते ही वे बुदबुदाये-"ईश्वर तूने आज सबकी प्रतिष्ठा रख ली।"

बगल में बैठे मुख्य अतिथि उनके मित्र के कानों में जैसे ये शब्द पड़े उन्होंने पूछा,-"क्यों क्या हुआ?"

"अरे! तुम नहीं जानते... मैं आयोज में अध्यक्षता तो जरूर कर रहा था परंतु मन में एक अजीब सा डर भी समाया हुआ था.. बकरे की अम्मा सी.. कहीं यहाँ कोई घमासान हुआ तो...!"

"क्यों?"

"ओह्ह! आज सुबह तुमने सुना नहीं क्या अयोध्या राम मंदिर के विषय में, उच्च न्यायालय का क्या निर्णय आया है..?"

"हाँ! सुना तो है... पर ऐसा आपने क्यों सोचा...?"

"तुम समझ तो सब रहे हो फिर भी पूछ रहे हो...!"

"भाई जान! आज समय काफी बदल गया है... ख़ुदा का शुक्र है। सभी समुदाय के लोग पूर्व की अपेक्षा साक्षर ही नहीं अब सुशिक्षित भी हो रहे हैं... वे जानते हैं... सम्प्रदायों की क्षति किसमें है और लाभ किसे है। फूट डालो राज करो अब सफल नहीं होने वाला।"

संध्या हो चुकी थी... एकाएक पूरा मैदान बत्तियों से जगमगा उठा।

Wednesday, 3 February 2021

वसन्तोत्सव

कुहू का शोर–

दराज में अटके

चिट-पुरजे

मेघ गर्जन–

पन्ने की नाव पर

चींटी सवार

हिमावृत्ताद्रि–

मालकौंस टंकार

तम्बू में गूँजें


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–"सुनो ना ! मुझे जानना है आज के समय में अकेले का साथ कौन देता है? यानी जैसे "बिना शादी किये जीवन व्यतीत करना..?"

-"अपने शर्तों पर जीवन व्यतीत करने वालों को दूसरे का अपने दिनचर्या में प्रवेश स्वीकार ही नहीं तो उन्हें क्या फर्क पड़ता है कि उनका कोई साथ दे रहा है या नहीं दे रहा है..।"

–"विवाहित जोड़ी में से किसी एक का ही जीवित रह जाना?"

-पास में धन नहीं है तो कोई साथ देने वाला नहीं होता है। अगर धन है तो साथ देने वाले अनेक आस-पास में होते हैं...। शहद पर मक्खियों की तरह। निःस्वार्थ सहायता करने वाले विरले होते हैं। परन्तु अपवाद तो प्रत्येक जगह मिल जाता है।"

–"यह तो अकाट्य सत्य है कि तकनीकी समृद्धि ने कहीं ना कहीं अकेले रहना सीखला दिया है..?"

-"वैसे पूरी तरह यह भी सत्य नहीं है..। अपने विचारों के अनुरूप भीड़ सभी जगहों पर एकत्रित कर लिया जाता है। लगभग चालीस-पैंतालीस परिवारों का एक संगठन है 'जीवन की दूसरी पारी' । इसमें सभी लोग लगभग साठ-सत्तर वय के होंगे। एक बार इस संगठन में तय हुआ कि प्रीतिभोज किया जाए। लगभग डेढ़-दो सौ व्यक्तियों का भोजन बनना था। ऐसा केटर्टर ढूँढ़ना था जिसका भोजन लज़ीज हो। अब मस्ती करने हेतु बेवक्त की शहनाई बजाने का मौका ढूँढ़ लिया गया था। कुछ महिलाओं की मण्डली बनी कि वे लोग कुछ कैटरर्स के भोजन का स्वाद लेंगी और तब एक केटर्टर तय किया जाएगा ताकि उस सुुुनहले अवसर पर मिट्टी पलीद ना हो। स्वाद लेने वालीी मण्डली किसी दिन मध्याह्न भोजन तो किसी दिन रात्रि भोजन का स्वाद लेतीं और बिना निर्णय वापिस हो जातीं.. उस 'मुंडे मुंडे स्वादेर्भिन्ना' मण्डली का कुछ वैसा हाल था कि 

एक बादशाह के आगे पाँच आदमी बैठे थे –अन्धा, -भिखारी, -प्रेमी , -इस्लाम धर्मगुरु , -सत्य ज्ञानी

बादशाह ने पाँचों के आगे एक शे’र की अन्तिम पङ्क्ति (मिस्रा) 

“इस लिये तस्वीरे-जानान् हमने बनवाई नहीं।”

 बोल कर कहा कि, इसमें पहली पङ्क्ति को जोड़कर इसे पूरा करो।

अन्धे ने इस पद्यांश (शे’र) में पहली पङ्क्ति जोड़ते हुए कहा –

इसमें गूयाई नहीं और मुझमें बीनाई नहीं। इस लिये तस्वीरे-जानान् हमने बनवाई नहीं

भिखारी ने कहा –माँगते थे ज़र्रे-मुस्वर जेब में पाई नहीं। इस लिये तस्वीरे-जानान् हमने बनवाई नहीं।

प्रेमी ने कहा –एक से जब दो हुए फिर लुत्फ़ यक्ताई नहीं। इस लिये तस्वीरे-जानान् हमने बनवाई नहीं।

इस्लाम धर्मगुरु ने कहा –बुत परस्ती दीने-अह्मद में कभी आई नहीं। इस लिये तस्वीरे-जानान् हमने बनवाई नहीं

सत्य ज्ञानी ने कहा –हमने जिस को हक़ है मान, हक़ वो दानाई नहीं। इस लिये तस्वीरे-जानान् हमने बनवाई नहीं।

हर किसी की सोच भिन्न-भिन् होती है। संस्कृत (वायुपुराण) में एक कथन है –

मुंडे मुंडे मतिर्भिन्ना कुंडे कुंडे नवं पयः।

जातौ जातौ नवाचाराः नवा वाणी मुखे मुखे।।

जितने मनुष्य हैं, उतने विचार हैं; एक ही गाँव के अंदर अलग-अलग कुऐं के पानी का स्वाद अलग-अलग होता है, एक ही संस्कार के लिए अलग-अलग जातियों में अलग-अलग रिवाज होता है तथा एक ही घटना का बयान हर व्यक्ति अपने-अपने तरीके से करता है । 

मण्डली में सबका स्वाद अलग-अलग था... इसमें आश्चर्य कर लेने या बुरा मान लेने की आवश्यकता नहीं पड़ी। और सभी ने एक संग मिलकर स्वयं ही बनाने कानिश्चय किया और महीनों व्यस्त रहने का अवसर भी प्राप्त हुआ। 

जहाँ दीवाली के अवसर पर सबके ड्योढ़ी पर मिठाई का पैकेट रखा गया और दरवाजे को खटखटाकर दूर से ही शुभकामनाओं के संग बधाई का आदान-प्रदान हुआ था वहाँ वसन्तोत्सव के प्रीतिभोज में सामाजिक तन से तन की दूरी भी मिटी और किसी के मन में अवसाद रहा होगा तो वह भी मिटा दिया गया।"


Sunday, 24 January 2021

बालिका दिवस

 राष्ट्रीय बालिका दिवस 24 जनवरी को मनाया जाता है। इस दिन भारत की पहली महिला प्रधानमंत्री इन्दिरा गाँधी को नारी शक्ति के रूप में याद किया जाता है। इस दिन ही इन्दिरा गाँधी को भारत की पहली महिला प्रधानमंत्री बनने का अवसर मिला था।

 
पार्वती -अनसुइया माता का प्रतीक
दुर्गा शक्ति का प्रतीक
सरस्वती , ज्ञान का प्रतीक
लक्ष्मी , धन का प्रतीक
सीता , मंदोदरी, रुकमणी भार्या का प्रतीक
मीरा , राधा प्रेम का प्रतीक
गंगा  , पवित्रता का प्रतीक

 प्रतीक चिह्नों के अनुसरण का
सीख देते-देते बालिकाओं को
पत्थर बनना सिखला देते हैं
तुम कठपुतली हो
तुम्हारा एक दायरा है
लक्ष्मण रेखा खींच जतला देते हैं।

कन्या पक्ष वर पक्ष से अनुरोध करे
बेटी का पिता खड़ा कर जोड़े
बारात बराती का सेवा सत्कार
वर ढ़ाई दिन का बादशाह 
भ्रूण हत्या मिटाना नहीं चाहते
दान दहेज मिटाना नहीं मानते
बहू को बेटी बस
कह देने के लिए कह देते हैं।

मेरे बुजुर्ग मांसाहार नहीं खाते
तुम मांसाहार मत पकाओ
उसे आदेश सुना देते हैं।
बिना आँगन ड्योढ़ी का छत दिया
सहमे सिकुड़े रहने में मत किया
अधिकार की तुलना कर्त्तव्य
कई गुणा देते हैं।





Saturday, 23 January 2021

अक्षम्य

"सुनो! तुम जबाब क्यों नहीं दे रही हो? मैं तुमसे कई बार पूछ चुका हूँ, क्या ऐसा हो सकता है कि किसी भारतीय को गोबर का पता नहीं हो ?"

"क्या जबाब दूँ मेरे घर में ही ऐसा हो सकेगा.. मैं कभी सोच भी नहीं सकती थी..!"

"आप दोनों आपस में ही बात कर रहे हैं और मुझे मेरे ही कमरे में कैद कर तथा मुझे ही कुछ बता नहीं रहे हैं। क्या मुझे कोई कुछ बतायेंगे?"

"क्या तुम कुछ ऑर्डर पर मंगवाए थे?"अंततः पिता ने पुत्र से ही पूछा।

"हाँ! मैं अमेजन से 'काऊ डंग केक' मंगवाया था। 50% डिस्काउंट पर दो सौ में लगभग पाँच इंच के गोलाकार 12 पीस आया था। परन्तु उसका स्वाद बहुत अजीब था और मेरा पेट भी खराब हो गया। मैं अमेजन के फीड बैक में बताते हुए लिखा भी है कि अगली बार थोड़ा करारा भी बनाकर बेचे।"बेटे की आवाज सुन पिता को अपनी माँ की याद बहुत आने लगी।

"जब से तुम पिता बने हो मेरे पास अकेले आते हो.. इच्छा होती है मेरा पोता गाय का ताजा दूध पीता। तुम जिस तरह गाय को दुहते समय ही फौव्वारे से पी लेते थे। बछड़े से खेलता।"

अपनी माँ के कहने पर हर बार वह कहता," यह हाइजेनिक नहीं है।"

"आप कहाँ खो गए? मैं अपनी गलती स्वीकार तो करती हूँ। लेकिन उन एक सौ पैतालीस लोगों को क्या कहूँ जिन्होंने एमोजन को दिए इसके फीडबैक को पसन्द किया और इसे सही ठहराते हुए शाबासी दिया..।




Thursday, 21 January 2021

खुश हैं

*Enjoy the* हमारा सौभाग्य हम साँस ले रहे हैं धन्यवाद वक्त का उस परम शक्ति का

इक्कीस वाँ दिन *21st day of* 
इक्कीसवें साल *21st year of* 
इक्कीसवीं सदी *21st century.* 

21-01-2021

जिसने स्वेद का स्वाद नहीं चखा उसके लिए सफलता सपना ही होगा। समय पर संयम रखे और -साधना का श्रमी हो तो सपना पूरा करने का शिद्दत स्वयं संग जुट जाता है।
लालबहादुर शास्त्री जी ने एक बार कहा था कि "मेहनत तो प्रार्थना करने के समान है।"
निरुद्योगी अपना भाग्य कैसे बदल सकता है, चाहे कितना भी समय व्यतीत होता जाए। 
छाँव का स्वाद तब पता चलता है जब स्वेद बहता चले।
अब उद्योग को सफल होने में और स्वेद की नदी बनने में कुछ समय तो जरूर लग जाता है उतने समय के लिए जो धैर्य चाहिए और परिणामस्वरूप पाए फल को भाग्य से पाया मान लिया जाए या श्रमी होने का फल ।
लेकिन हाँ साँसों की डोर, जन्म-मृत्यु, आकस्मिक दुर्घटना के लिए कोई तो एक शक्ति है जो भाग्य रचता है।
अविष्कार से गूंगे-बहरे-अंधे का भी भाग्य बदल दिया गया है । अलग-अलग कर्म पर अलग-अलग भाग्य को आजमाया जा सकता है। प्रयोग होते रहे हैं.. प्रयोग होते रहेंगे।
हमारा वादा झूठा कब निकलता है, जब हम असक्षम होते हैं।
जब हममें असक्षमता है यह हमें विदित है कि हम पूरा नहीं कर सकते तो क्यों वादा करना!
उस स्थिति में विनम्रतापूर्वक किया गया इन्कार झूठे वादे से बहुत अधिक अच्छा होता है।
हमारे इन्कार करने से समय का बचत होने पर आसानी से दूसरा मार्ग ढूँढ़ लिया जा सकता है। और आपस के सम्बन्ध को बिगड़ने से भी बचाया जा सकता है।


01.
माँ गौर करे
ग्वाले का ठिठकना–
पुष्ट सरसों 
02.
प्रेम की पाती
माझे कोर से बाँधे–
संक्रांति काल
03.
ज्योत्स्ना के घेरे
सजनी पत्र लिखे–
आम का कल्ला


Monday, 18 January 2021

चिन्तन

  जो सदैव

नीम का दातुन

उपयोग करते हैं

उनपर विष का

असर नहीं होता है

–फिर क्यों स्वभाव विषैला हो गया

अक्सर सोचती गुम रहती हूँ..

गाँव के हमारे घरों में जेठ-जेठानी, ननद-देवर , जेठ तथा ननद के बच्चों यहाँ तक जो बुजुर्ग सेवक होते थे उनको भी आप कहने की प्रथा थी । बच्चे भी संस्कार में आप-तुम कहने का भेद पाते थे... ।

समय के साथ बदलाव होता गया...। गाँव से शहर , शहर से महानगर की ओर बढ़ते गए कदम..! बुजुर्ग को गाँव में धरोहर छोड़ आये तो संग संस्कार भी तो छूट गया। पलट कर जबाब दे देना ज्यादा आसान होता गया। 

नाकारात्मक विचार वालों के लिए सामान्य बातों पर भी क्रोध ही प्रतिक्रिया होती है। प्रत्येक घटना के साथ उनका रोष असन्तोष और बढ़ता ही चलता है। 

नकारात्मक विचार वालों के क्रोध की रेखा पत्थरों पर पड़ी गहरी एवं मोटी रेखा सी उत्कीर्ण होती जाती है

–अक्षमता है। अगर क्षमा करने में विफल हैं उन्हें जिनसे गलत व्यवहार मिला हो। ऐसे लोग उद्विग्न और चिड़चिड़े भी रहते हैं।

–अक्सर सबने देखा होगा रेत के घरौंदे और रेत पर लिखे नाम तथा पैरों के उकेरे निशान..., सकारात्मक विचार वाले अपने मन में निराशा व क्रोध को वैसे ही टिकने देते हैं। बदलते पल में अच्छे समय की एक लहर, क्षमा की एक पहल, पश्चाताप की एक झलक जब दोषी की तरफ से दिखने लगती है। वे शीघ्रताशीघ्र ही सबकुछ भूलाकर अपने सामान्य प्रसन्नता की स्थिति में लौट आने में प्रयत्नशील दिखलाई देते हैं। अतः मन का सन्तोष सबसे बड़ा सकारात्मक पहलू है।

–:–

01. बहू चुन्नी से

गुड़ की गन्ध मिले–

उत्तरायण

02. पक्षी बच्चों को 

नीड़ से पेड़ कोचे -

स्निग्ध शिरीष

03. स्मित के संग

मित्र हाथ दबाये–

या

एक दूजे को

मित्र केहुनियाएँ–

कुंद की वेणी


Tuesday, 12 January 2021

केला की सब्जी

 


"कआ ईया आज बनी?"

"हाँ ! बाबू बनी.. ! काहे ना बनी... जरूरए बनी।"

ईया यानी मेरी दादी।

बाबू में उनका कोई पोता हो सकता था। पोतियों के लिए कोई गुंजाइश-सम्भावना दूर-दूर नहीं दिखलाई देता था क्यों कि वे पैदाइशी कर्मचारी समझी जाती थी। यह अलग बात थी कि उस ज़माने में भी मैं अपने को पोते से कम नहीं समझती थी। इसलिए दादी से मेरी बनी नहीं कभी। लेकिन दादी की कर्मठता को आज भी नमन/सलाम करते हुए अनुकरण करने की कोशिश करती हूँ।

 जब मैं ग्यारवीं की परीक्षा दी तो अनेक भैया-दीदी की शादी हो गयी थी। तब वो ज़माना था कि सास-माँ बहू-बेटी की प्रसव वेदना संग-संग चला करती थी। एक साल में जन्म लिए पाँच-सात बच्चों की टोली होती थी.. उसमें चचरे ममेरे फुफेरे भाई-बहनों के संग चाचा मामा भी होते थे।

 दादी के हाथ की बनी कोई सब्जी हो या मछली हो बेहद चटक होती थी यानी हाथ चाटते रह जाओ। 

मैं जबतक बड़ी हुई मेरी दादी काफी वृद्ध हो गयी थीं ठीक से उठना-बैठना-चलना नहीं हो सकता था । लेकिन पोता के लिए  साग सब्जी मछली बनानी हो तो सिलवट पर खुद मसाला पीसने से छौंकने पकाने का सारा काम वे स्वयं करती थीं। बस धोने काटने चलाने में जो थोड़ा बहुत मदद ले लेतीं।

आज उनकी और पापा(ससुर जी) की याद चटक तीखे खाने पर आ गयी। चर्चा चली।

"प्रसाद जी! अपने घर किसी दिन पुनः बुलाइये मछली खाने।"

"जी सर। जरूर।"

प्रसाद जी यानी श्री पारस प्रसाद जी मेरे ससुर और सर उनके बॉस।

मेरी शादी के कुछ महीनों के बाद ही एक दिन अचानक पापा के बॉस उनके कार्यालय में आ गए। पापा घर में हड़बड़ाए से आये और बोले कि "तहरा मछली बनावे आवेला कआ?"

"जी बना लूँगी।"मैँ बोली

"निमन बन जाई नु?" पापा पूछे।

अब बढ़िया बनेगा कि नहीं बनेगा यह कैसे सुनिश्चित कर पाते। परीक्षा में तो ऐसे ही अनुत्तीर्ण होने की पूरी सम्भावना रहती थी। जब तक परिणाम ना आ जाता हाथ पाँव फूले ही रहते। भैया और दादा के आँखों की किरकिरी थी बबूआ की तरह पलती विभा। माँ की मौत के बाद तीन साल चौका पूरी तरह सम्भालने के बाद शादी हुई थी मेरी। लेकिन शादी के बाद मांसाहार सास ही बनाती थीं या शायद कभी ननद। उस दिन वे दोनों घर में नहीं थीं । किसी रिश्तेदारी में गयी हुई थीं। 

पापा मछली ला दिए। मैं पका दी। पापा के बॉस खाना खाने में मछली सधा दिए। और हर कुछ दिनों के बाद पापा से कहते अपनी बहू को कहिए मछली बनाये। हमें भोजन पर बुलाइये भई... ।

रविवार को बेटा ह्यूस्टन गया तो आज दिन के भोजन में चटक सब्जी बनी। माया का कहना कि बिहारी खाने में मुझे सरसों में बनी सब्जी-मछली बेहद पसन्द आती है। पहली बार जब खाई तब से ही फैन हूँ उसकी। सदैव मुझमें युवावस्था बने रहने का कारण कुछ यह यादें हैं। 

आज जो बनी सब्जी

6 कच्चा केला

छील कर टुकड़े कर लेते हैं।

बेसन में नमक हल्दी मिलाकर घोल तैयार कर उसमें केला को मिलाकर पकौड़े की तरह तल लेते हैं।

तीन चम्मच सरसों

आधा चम्मच जीरा

आधा चम्मच गोल काली मिर्च

तीखी हरी मिर्च 9

लहसुन एक बड़ा

एक टमाटर

एक संग पीसकर और पंच फोरन के छौंक में भूनने के बाद एक चम्मच किचनकिंग मसाला मिलाकर ग्रेवी के अनुसार तला केले की पकौड़ा मिला लिए और केले को अच्छी तरह गला लिए क्योंकि सब्जी ठंढी होने पर कोई-कोई केला थोड़ा कड़ा हो जाता है.


Thursday, 7 January 2021

आज की चर्चा

खुश होना दुःखी होना मन की स्थिति है..  । मानसिक सुख से बड़ा कोई सुख हो ही नहीं सकता है। मेरे एक रिश्तेदार के पास इतना रुपया था कि वो तकिया तोशक में रखते थे और उनकी पत्नी पहरा देती रहती थीं.. ना दिन को चैन ना रात को नींद।

राजेन्द्र पुरोहित भाई ने बताया कि मारवाड़ी में जैन स्थानक को उपासरा (उपाश्रय) कहते हैं। वहाँ सभी भिक्षुक केशविहीन होते हैं। तो, कोई वस्तु जब किसी स्थान विशेष पर मिलने की संभावना ही न हो, तो कहते हैं "अरे यार, उस पढ़ाकू के पास क्रिकेट का बैट कहाँ ढूंढ रहे हो, उपासरे में कंघी का क्या काम?"

और हम चाहते हैं कि गंजे को कंघी बेच लें।

और अपने लिए सुख प्राप्ति का साधन का ढ़ेर लगा लें।

साथ में दुनिया बदल डालने की मृगतृष्णा में जीते हैं।

मन बैचैन है तो सुख की अनुभूति हो ही नहीं सकती।

जब तक जीवन सर्वकल्याण नहीं करने लगेगा तब तक स्थायी सुख की प्राप्ति ही नहीं हो सकती।

जब स्थायी सुख की प्राप्ति होने लगती है तो वो असली सुख मानसिक होता है । मन का सुख तो बैचेन रखे हुए रहता है।

हर किसी में समस्या खोजना मनोविकृति है। इंसान होने का ही अर्थ है गुण-अवगुणों का मिश्रण समाहित होना। मनुष्य और मनुष्यता की हमने अपने-अपने धर्मों का आधार बना कर हत्या कर दी है। पाठ पढ़ रहे हैं कि हमारा धर्म ही दुनिया का सर्वश्रेष्ठ धर्म है, जबकि हम अपने-अपने धर्म को जानना ही नहीं चाहते हैं। हमारे कान मुल्लाओं और पंडितों की कही बातों से भर रखा है और उसे ही सच मान रहे हैं।

 सब मुसलमान हिन्दू धर्म को गहराई से नहीं जानते और सब हिन्दू भी इस्लाम को नहीं जानते। इसी तरह किसी ईसाई या बौद्ध ने हिन्दू धर्म का कभी अध्ययन नहीं किया और वह भी उसी तरह व्यवहार करता है जिस तरह की नफरत करने/फैलाने वाले लोग करते हैं। 

जैसे कुछ ईसाई यह समझते होंगे कि ईसाई बने बगैर स्वर्ग नहीं मिल सकता। उसीतरह कुछ मुसलमान भी सोचते होंगे कि सभी गैर मुस्लिम-गफलत और भ्रम की जिन्दगी जी रहे हैं अर्थात वे सभी गुमराह हैं। आम हिन्दू की सोच भी यही है। सभी दूसरे के धर्म को सतही तौर पर जानकर ही यह तय कर लेते हैं कि यह धर्म ऐसा है। अधिकतर लोग जिस तरह धर्म की बुराइयों पर ज्यादा ध्यान केंद्रित करते हैं उसी तरह अपने आस-पास के लोगों में भी केवल समस्याओं को ढूँढते रहते हैं।

हम वो मक्खी हैं जो या तो मल पर बैठती है या शरीर के घाव पर बैठकर गहरा करती है और उसे दूसरों तक फैलाकर हानिकारक बनाती है।

अतः दूसरों में हम केवल समस्या खोजते हैं तो हमसे ज्यादा समस्या फैलाने वाला दूसरा कोई नहीं हो सकता है।

>>><<<

सघन वन–

उल्लू और बादुर

ज्योत्स्ना में भिड़े।

>>≥>><<≤<<

जसाला वर्ण पिरामिड

गी

अंगी

ना रोना

शीत संगी

जोड़े रहना

एक से सौ होना

मूंगफली दोपल्ली

>>≥>><<≤<<

ली

गरु

ना तरु

दीन मेवा

रोगों का शत्रु

फली मूंगफली

भू को जकड़े वल्ली{20.}

>>≥>><<≤<<

कील गहरा धँसा

  पार्थक्याश्रय– आईना की किरचें एड़ी में चुभे >>><<< "क्क्या आंटी! इतनी जल्दी क्यों जा रही हैं? सुनिए आपलोग आपसे भी कह...