Thursday, 14 October 2021

पल्लवन

बाड़ छाया की

आँगन से वापसी

गुल अब्बास

सूर्य की छाया

स्तुति जल में दृश्य

आँखों में आँसू

>><<

'"दादा ने मुझसे कहा था कि जब मैं मेडिकल में नामांकन करवाने जाऊँगी तो वे मेरे साथ जाएंगे।"

"तो क्या हुआ, वे नहीं गए तुम्हारे साथ?"

"परिणाम आने के पहले वे मोक्ष पा गए।"

"ओह्ह!"

"बाबा के श्राद्धकर्म के बाद उनका बक्सा खोला गया तो उसमें लगभग चार लाख रुपया था और दादा की लिखी चिट्ठी। जिसमें लिखा था मुनिया की शिक्षा के लिए।"

"वाह! यह तो अच्छी बात है। तुम्हारी पढ़ाई में आर्थिक बाधा नहीं आएगी।"

"बाधा नहीं आएगी, मेरी माँ ने वादा किया है। उस रुपया को मेरी फुफेरी बहन की पढ़ाई के लिए देते समय।"

"क्या तुम चिन्तित हो?"

"नहीं! बिलकुल भी नहीं।"

"फिर?"

"आप इस बार हमारे घर में स्थापित नहीं होंगी। इसलिए तो मैं आपसे अपनी बात कहने कुम्हार काका के घर आयी हूँ। आप जगत जननी हैं। मेरी जननी का साथ दीजियेगा।"

"कर भला...,"


Saturday, 9 October 2021

पितृपक्ष

"हम एक ही प्रजाति के थे। तुम बौना रह जाते थे तब भी महंगे दामों में खरीद लिए जाते। हम विस्तार पाए रहते थे तब भी सस्ते दामों से बामुश्किल किसी चौके के छौंक तक पहुँच पाते थे,"

"भले हम कद में बौने होते, स्वास्थ्य के लिए हानिकारक नहीं होते थे।"

"हम अपना दर्द दिखाएं किसे और छुपा लें किनसे..!"

"बछड़े या पड़वा को दूध पिलाया जाए तो भी हमारा दूध नहीं उतरता था। ऑक्सिटोसिन के स्थान पर डिस्टिल वाटर का इंजेक्शन भी दूध उतारने में सहायक हो गया।"

"यम महाराज हमारी विनती पर गौर करें, इन मानवों को ऑक्सिटोसिन का इंजेक्शन ही दिया जाए।"

 " मैं तो आया हूँ- देवि बता दो

जीवन का क्या सहज मोल

भव के भविष्य का द्वार खोल

इस विश्वकुहर में इंद्रजाल

अचकचाकर उसकी आँख खुल गयी। सपने से मानों विलीनता के कगार से लौटी हो का शरीर पसीने से गीला था। वह तो कामायनी पढ़ते हुए सो गयी थी।

>><<

हाँ!

किस्सा

भू लिप्सा

द्यौ का दित्सा

मेघ का कुत्सा

आँखें प्यासी रही

सिन्धु ना दे स्व हिस्सा। {01.}

>><<

ज्जा!

सम

असम

मेघ नम

भू का दम है

व्योम को गम है

राहत व आफत। {02.}

Tuesday, 5 October 2021

पचहत्तर वीं जयन्ती के महोत्सव के अवसर पर



बदबू'

डॉ. सतीशराज पुष्करणा

"क्या बात है? ... आजकल दिखाई नहीं देते हो?"

"क्या बताऊँ यार! बहन के लिए लड़का ढूँढ़ने में ही आजकल परेशान कभी यहाँ तो कभी वहाँ। बस! दौड़-धूप में ही समय को नाप रहा हूँ।"

"भई ! लड़कों की ऐसी क्या कमी है?"

"कमी तो नहीं किन्तु सुरसा की तरह बढ़ता दान-दहेज... बस, यही चिंता खाये जा रही है।"

"अगर यह बात है तो तुम अपने को परेशानियों से आजाद ही समझो।"

"क्या!... क्या मतलब?"

"हाँ! तुम मेरे अनुज पर विचार कर सकते हो। वह पढ़ा-लिखा, सुन्दर स्वस्थ और होनहार युवक है। फिर नौकरी भी अच्छी है। तुम्हें दहेज वगैरा कुछ भी नहीं देना पड़ेगा। और हमारी दोस्ती भी रिश्ते में बदल जाएगी।"

"क्या बकते हो तुम!... अरे कभी यह तो सोचा होता... कहाँ हम उच्च जाति के और कहाँ तुम!... दोस्ती का हरगिज यह अर्थ तो नहीं कि तुम हमारी इज्जत से ही खेलने लगो।"

"तुम तो बुरा मान गए। मैं तो तुम्हारे विचारों के अनुरूप ही बात कर रहा था जिन्हें तुम अपने साहित्य के माध्यम से व्यक्त करते रहे हो।"

अचानक उसका चेहरा फक्क हो गया और जल्दी ही वह फिर सम्भल भी गया।

>><<

समीक्षा

विभा रानी श्रीवास्तव, पटना

यार कहने कहलाने में कोई परेशानी नहीं! गहरी मित्रता तो है लेकिन रिश्तेदारी में नाक का सवाल आ जाता है..। मानवीय मूल्य और मनःस्थिति दोनों में ही मानव के व्यवहार को प्रेरित करने की क्षमता होती है। यों तो सामान्यतया मूल्य मनःस्थिति को उत्पन्न करती है। परन्तु कभी-कभी विशिष्ट परिस्थिति में मनःस्थिति मूल्य का निर्धारण करती है। जिस मानव के हृदय में ईश्वरीय गुण (ह्यूमैनीटी, वैल्यूज़) है, वो ही बड़े होने का सम्मान भी पाने लगता है। लेखक के लेखन में वो झलकता है जो

दरिया हो या पहाड़ हो टकराना चाहिए 

जब तक न साँस टूटे जिए जाना चाहिए 

~निदा फ़ाज़ली

के शेर से हमें जानने को मिला।

  समाज में फैला कोढ़ का दाग बना दहेज प्रथा, जीव-सम्पदा को नष्ट करता प्रदूषण का विषैला जहर सा जाति भेद... कर्म के आधार पर बंटा, मानव को मानव से बड़ा-छोटा के वर्ग में बाँटता और सबसे ज्यादा खतरनाक साहित्यकार का लेखन और व्यवहार में दिखलाई देता उसका दो-चित्तापन। 

       लेखक के द्वारा बूँद में सिंधु को समो दिया गया है .. प्रयोगशीलता के रूप सफल तीन-तीन मुद्दों को जो आज पूरे भुवन में सड़ान्ध फैलाये हुए है, बिना किसी भूमिका के सहारे सिर्फ कथोपकथन शैली में चुस्तदुरुस्त नपे तुले शब्दों में सांचे में ढली मूर्ति सृजन में से ना तो एक शब्द भी अलग किया जा सकता था और ना एक शब्द अतिरिक्त जोड़े जाने की गुंजाइश दिखलाई पड़ी। सुष्ठु तथा कालोचित लेखन का सटीक उदाहरण।

   –जी हाँ मैं बात कर रही हूँ डॉ. सतीशराज पुष्करणा द्वारा लिखित बदबू सटीक शीर्षक वाली लघुकथा की। जब हमारी आत्मा मर जाती है तो हमें किसी बदबू का अनुभव नहीं होता है। वरना हम एक बदबूदार काल में हिस्सेदार बन मरे पड़े नहीं होते।

 नेता भ्रष्ट, बदबूदार हैं । अभिनेता अंडरवर्ल्ड से मिलकर बदबूदार हैं। ऊँच पदाधिकारी से लेकर जो भी रिश्वतखोरी करते, बदबूदार हैं। दुकानदार मिलावट कर बदबूदार हैं। हम और आप झूठ बोलते हैं , दूसरों का हक़ मारते हैं , अनैतिक काम करते हैं -- क्या हम सभी बदबूदार नहीं  हैं? जब यह सारा काल बदबूदार है, यह समाज बदबूदार है ,  ऐसे में यदि हमको-आपको अब भी बदबू नहीं आ रही है तो क्या यह स्वाभाविक है?

   लेखक जैसा सभी को नाक मिल जाए तो बड़ी आसानी हो जाती! सबकी नज़रिया बदल जाती और हमारे आसपास की दुनिया अपने आप बदलने लगती वरना बखिया उधेड़ कर रखा जाता।

वैसे सामान्यतया मानव स्वभाव है कि वो वैसा ही व्यवहार करेगा कि लोगो की नज़रों में उसे बड़प्पन का सम्मान मिलता रहे चाहे हाथी का दाँत ही सही।

कथानक शिल्प में शीर्षक का उल्लेख ना होना और शीर्षक से लेखन को शीर्ष स्थान मिलता देखकर मैं बेहद रोमांचित हो जाती हूँ।

Saturday, 2 October 2021

संस्कार


"क्या ग्रैंम स्क्वायर से बात हो गयी तुम्हारी?" शाम को कार्यालय से लौटा मधुर ने अपनी पत्नी मिन्नी से पूछा।"

"अभी तो भारत में पौ फटा होगा और वो शायद जगी हों। आप कपड़े बदलकर आ जाएं। वीडियो कॉल करती हूँ।" मिन्नी ने कहा।

"किनसे क्या बात करनी है?" मिन्नी की माँ ने पूछा।

"महामारी काल में मधुर के दादा अनाथ हो गए थे, उनको सहारा मिला। मधुर के पिता, चाचा तथा बुआ को दादी की ममता उनसे भरपूर मिला। मधुर के दादा के समकालीन अनेकोनेक बच्चों को उनसे माँ के आँचल की छाँव मिली।"

"महामारी काल को बीते लगभग साठ साल हो गए। तीसरी पीढ़ी इस बात को याद रखे। मैं स्तब्ध हूँ।" मिन्नी की माँ ने कहा

"याद ही नहीं रखे माँ। किसी को किसी परेशानी का हल ढूँढ़ना हो, किसी की शादी हो, किसी बच्चे का अन्नप्राशन हो, किसी का गृहप्रवेश हो , किसी का नया काम शुरू.. मुहूर्त उनसे ही पूछा... मधुर आ गए मैं उन्हें वीडियो कॉल लगाती हूँ.., हमें भी कुछ...,"

"सुप्रभात! ग्रैंम स्क्वायर! आप कैसी हैं?" मधुर और मिन्नी ने संग-संग कहा।

"सस्नेहाशीष संग शुभ सन्ध्या मेरे बच्चों!" वीडियो कॉल पर दमकता चेहरा उभरा।

"मैंने कहीं पढ़ा है कि महामारी काल में रोबोट में इमोशन्स भरने की बात चल रही थी...," मिन्नी की माँ की बुदबुदाहट किसी के कानों तक नहीं पहुँच पायी।

Thursday, 30 September 2021

'त्रासदी'

01. मैं बक संग

अनिर्णीत दौड़ में

सन्धिप्रकाश

02. स्त्री के हाथों में

हारिल की लकड़ी

फौजी की चिट्ठी

03. खेमा में आये

शरणार्थी का रेला

श्वान का रोना

>><<


ठाढ़ा सिंह चरावै गाई का

ना ऐसा हाल था

चींटी मुख में हाथी

समा जाए का काल था

गार्गी सूर्या मैत्रयी सुलभा के बाद आयी

सावित्री बाई अरुणा सुचेता दुर्गा बाई

उत्‍तमोत्‍तम ओजोन थीं

ओजोन में छेद होते ही

खूँटे के बल पर उछलने वाली

व्यथा व्यक्त करने में हो गयी असमर्थ

पल लहरों के संग ही तो बहा है सपना

योजन में कद बढ़ न सका है अपना

मीन वाले जाल में टूटे पँख कैसे मिले

उड़ने की चाह में समझौते के कैसे गिले

>><<

कल किसी से मेरी बात हो रही थी कि उसकी स्थिति उसे बेटी होने से दोयम दर्जे की है तो उसकी सहेली को बेटी हुई तो उसके तथाकथित अपने उससे मिलने अस्पताल नहीं आये

हम इकीसवीं सदी में पहुँच गए और आज भी बेटी बचाने बेटी पढ़ाने के लिए गुहार लगा रहे हैं 

मन मछलता है तो हम लेखन कर सन्तुष्टि पा लेते हैं... समाज की दशा बदलने हेतु एक दिशा देने का प्रयास करते हैं लेकिन सुधार कितना दिखलाई दे रहा है

जब मैं सारे प्रान्त से आयी महिलाओं से मिलती हूँ और व्यथा की कथा सुनती हूँ कि आज भी बेटी जन्म लेने पर परिवार वाले कैसा व्यवहार करते हैं तो विश्वास करने का जी नहीं करता है क्योंकि हम बदली दुनिया में जी रहे हैं..

 शादी के एक महीना बीतने के बाद ही या तो बहू जला दी जाती है या कन्या तलाक की मांग कर लेती है

और दहेज लाने के लिए प्रताड़ित की जाती है या वर पक्ष को प्रताड़ित करने के लिए झूठा आरोप लगाया जाता है

बार-बार बयान बदलने वाले समाज में हम जी रहे हैं किसका पक्ष लें... आज का जब इतिहास लिखा जाएगा तो लिखने वाले का भूगोल बदल जायेगा

Friday, 24 September 2021

'हाथी के दाँत'


"सावन माह में रिमझिम व तेज बरसात होती है। मगर इस बार सावन में सूखा पड़ जाने से गर्मी व उमस में निकल रहा है।"नूतन जैन ने कहा।

"खरीफ की फसल को जलता देख बारिश की कामना को लेकर जगह-जगह पर सामूहिक सहयोग से 24 घंटे की अखण्ड रामधुनी का, रात जागरण का आयोजन किया जाता, बालाजी की भव्य झांकी सजाई जाती है।"मीरा सिंह ने कहा।

"बरसात के लिए पेड़ों की अहम भूमिका होती है..सागौन,  देवदार, आम, नीम, वट वृक्ष, पीपल शीशम के पौधे हम लगा.., अरे आपकी छतरी वाली टोपी तो बहुत ही सुन्दर लग रही है आपदोनों पर जँच भी रही है। कहाँ से और कितने में लीं?" नूतन जैन ने पूछा

संगनी क्लब की ओर से आयोजित पौधा रोपण कार्यक्रम में शामिल सँगनियों चरमोत्कर्ष पर हर्षोल्लासित नूतन जैन, सीमा अग्रवाल, मीरा सिंह , सुषमा माथुर, रंजना सिन्हा इत्यादि का ध्यान बदले विषय की ओर चला गया।

"बिग बाजार से तीन सौ में।" मीरा सिंह ने कहा।

पौधा रोपण आयोजन समाप्ति के बाद घर वापसी पर मीरा सिंह को सीमा अग्रवाल ने अपने सवालों के घेरे में लिया,"इसलिए आप बिग बाजार में सदृश टोपी देखकर उछल पड़ी थीं। वो तो लेख्य मंजूषा की ओर से पुस्तक लोकार्पण में हम नालन्दा भग्नावशेष देखने गए थे, नसीम अख्तर जी के मोल भाव के बाद दुकानदार ने मछलकर सौ-सौ रुपये में हमें टोपी दिया था । उस दिन आप दुकानदार को टोपी पहना देने पर व्यंग्य कर रही थीं.. आज नूतन जैन जी को भी टोपी...,"


Wednesday, 22 September 2021

अंधेर नगरी...,

                         "शनिवार रात्रि 12 बजे तक ही प्रतियोगिता हेतु रचना पोस्ट करने की अनुमति थी... रचना रविवार को पोस्ट हुई... और विजेता के लिए चयन कर ली गयी... क्या आप चकित नहीं हो गयी..?"

 "तभी मुझे लगा कि शनिवार को मैं सब रचनाएँ पढ़ी थी। पर यह मुझसे छूट कैसे गयी..! आप उन्हें लिखें दी। सर भी तो उस समूह में एडमिन है।"
 "जब रविवार को रचना दिखलायी दी तभी मुझे तो परिणाम का अंदाज़ा हो गया था..। आपके सर जी भले विधा के ज्ञाता हों लेकिन ईमान के पक्के नहीं लगते...। शनिवार की देर रात्रि की प्रस्तुति का कह देगा लोग..,"

"कितनी बार मैं शनिवार रात 11:30 के समय अपनी रचना पोस्ट की हूँ तो वह शामिल नहीं की गई है।"

"आप उनके कुनबे (लॉबी) की नहीं हैं...। ऊँची दूकान...,"



Sunday, 19 September 2021

पिण्डदान


"सितम्बर की उमस भरी दोपहरी में नालन्दा के खंडहरों में पुस्तक लोकार्पण करने का निर्णय करना क्या बुद्धिमत्ता है?" सम्पादक की ओर पत्रकार का प्रश्न उछलकर आया।

"क्या करूँ..! पितृपक्ष लगभग सितम्बर में ही आता है। वैसे भी जब मन अवकाश में होता है.. शीतलता उष्णता का अनुभव कर लेता है। अगर मजबूरी में आना होता तो शायद बुद्धिमानी नहीं होती.. लेकिन हमारे पास वातानुकूलित स्थल होने बाद भी हम यहाँ आये। संस्थापक कुमारगुप्त प्रथम को विश्वास दिलाना था... स्वर्ण काल का इतिहास दोहराया तिहराया जा सकता है।"

"आपकी हैसियत एक बूँद की है और ऐसी बात...,"

"क्या बिना बूँद के... झरना, नदी या समुन्दर की कल्पना...,"


'अवमानना'


चिलचिलाती धूप और भादो की उमस भरी दोपहरी में घर-घर जाकर वैक्सीन ले लेने के लिए अनुरोध कर रहे अध्यापक अध्यापिकाएं। बहुत देर तक दरवाजा थपथपाने पर दरवाजा खोलती महिला के चेहरे पर क्रोध झुँझलाहट स्पष्टरूप से दृष्टिगोचर हो रहा था,"आप! आज क्या काम है? कुछ दिनों पहले ही तो जनगणना हुआ है..,"

"जी! मैं तो सन्देशवाहक हूँ...। आज राष्ट्रनायक का जन्मदिन है। जनमोत्स्व पर सौ फी सदी वैक्सिनेशन करवाना है..,

"अच्छा तो अब आपलोगों को इस कार्य में भी लगा दिया गया। राष्ट्रसेवक को राष्ट्रनायक कहकर ही तो अनुरोध को आदेश में परिवर्त्तित कर दिया जा रहा है..।"

"हम तो मजबूर हैं , 'नौकरी करी तो ना ना करी' के अधीन। आप अपनों के साथ वैक्सीन लेने स्थल पर जरूर जाएं..,"

"आज विश्वकर्मा पूजा है.. सौ फी सदी क्या पच्चीस फी सदी भी वैक्सिनेशन नहीं हो पायेगा।"

"हमारा वेतन कट जाएगा..."

"क्या फर्क पड़ता है...? यूँ भी सरकारी विभाग में आपके मजदूरी के बहुत भागीदार हैं...,"

Saturday, 18 September 2021

दासता है

 हम 

मातृ, कन्या, बालिका, महिला, बेटी,

वृद्ध के संग हिन्दी दिवस भी मनाते हैं।

विलोपित को याद करते हैं या

सतत विलोपित में सहायक होने का त्योहार मनाते हैं

जिन शब्दों का हिन्दी तथाकथित क्लिष्ट नहीं है

उसका भी आंग्ल प्रयोग करते हैं और 

सामयिक मांग गर्व से कहते हैं।

अधिकांशतः

उपहास उड़ाने वालों को

दर्पण भेंट देना भूल जाते हैं।


हिन्दी के वासी हिन्दी की बधाई देते हैं

इक दिवस की नहीं प्यासी हिन्दी 

आंग्ल की है नहीं न्यासी हिन्दी 

हँसते, रोते हैं कभी हम उदास होते हैं

सांस हिन्दी है, सदा इसके पास होते हैं।


आंचलिक शब्द हमें रास नहीं आते हैं

हम इन्हें हिन्दी का दुश्मन तलक बताते हैं।

और अंग्रेजी हेतु सूरदास होते हैं

सांस हिन्दी है, सदा इसके पास होते हैं।


कौन कितना गलत नहीं हमें बहस करनी है।

राष्ट्रभाषा हेतु प्रवाहित समर करनी है।

निर्णीत अपने धर्म का पालन सहर्ष करते हैं,

सांस हिन्दी है, सदा इसके पास होते हैं।

Friday, 10 September 2021

कृतघ्न

01. मेघ के स्पर्धा

अभिनय की मुद्रा

हवाई यात्रा

02. हौले से चढ़े

एक-एक सीढ़ियाँ

गुरु का ज्ञान

>><<

"ओ! मिट्टी के लोदा। जितना साल वनवास भोगा गया था न उससे कुछ साल ज्यादा ही लगा था तुम्हें गढ़ने में... वनवास खत्म होते-होते दशहरा दीवाली मनी थी.. तुम से गढ़ने वाले कुम्हार पर कितने आरोप लगाए गए... शिशुपाल की सी हरकत..."

"जिसने गढ़ा था उसने मिटाने की कोशिश भी किया..,"

"धत्त! जिसकी आत्मा मर चुकी हो उसको और कोई क्या मिटा सकेगा...।"

Sunday, 5 September 2021

शिक्षक दिवस की बधाई


#शिक्षक नहीं बनी... अपनी शिक्षा के लिए ऋणी हूँ...
अवसर है बाँटने का

'ज्ञान"

"पिता जी के श्राद्ध के दिवस के लिए मैं इक्कीस पण्डित को न्योता दे आया हूँ.."
"इक्कीस पण्डित से क्या होगा भैया कम से कम इक्यावन पण्डित को बुलाया जाएगा..,"
"यह तो सही नहीं है बुआ...। ग्यारह पण्डित को बुलाना सही होता..., जब एक पण्डित तीन-तीन थाली भोजन लेते हैं तो इक्यावन पण्डित के लिए कितने थाली... "
"यह हमें निर्णय करने दो। बड़ों के बीच में तुम नहीं बोलो। तुमने दुनिया देखी ही कितनी है?"
"हमें दुनिया दिखलाने वाले ने ही बतलाया है कि महाभारत के दौरान, कर्ण की मृत्यु हो जाने के बाद जब उनकी आत्मा स्वर्ग में पहुँची तो उन्हें बहुत सारा सोना और गहने दिए गए। कर्ण की आत्मा को कुछ समझ में  नहीं आ रहा था , उसे आहार की आवश्यकता थी।

उन्होंने देवता इंद्र से पूछा कि उन्हें भोजन की जगह सोना क्यों दिया जा रहा है। तब देवता इंद्र ने कर्ण को बतलाया कि उसने अपने जीवित रहते हुए पूरा जीवन सोना दान किया लेकिन अपने पूर्वजों को कभी भी खाना दान नहीं किया। तब कर्ण ने इंद्र से कहा उन्हें यह ज्ञात नहीं था कि उनके पूर्वज कौन थे और इसी वजह से वह कभी उन्हें कुछ दान नहीं कर सका।

इस सबके बाद कर्ण को उनकी गलती सुधारने का मौका दिया गया और उसे सोलह दिन के लिए पृथ्वी पर वापस भेजा गया, जिससे वह अपने पूर्वजों को याद करते हुए उनका श्राद्ध कर उन्हें आहार दान किया।"
"तुम्हें सत्य बतलाया गया है। इसलिए तो मैं कह रही हूँ कि ज्यादा से ज्यादा पंडितों को बुलाया जाए..,"
"इसमें दादा को क्या मिलेगा.. दादा को तो वही मिलेगा जो उन्होंने अपने जीवन में...,"

पल्लवन

बाड़ छाया की आँगन से वापसी गुल अब्बास सूर्य की छाया स्तुति जल में दृश्य आँखों में आँसू >><< '"दादा ने मुझसे कहा था कि जब...