मैं रेत हूँ—
हर बार
आँखों में किरकिरी
पैरों के नीचे ही क्यों आती हूँ?
कभी किसी ने
मेरे कणों में छिपी
टूटी हुई सदियों को पढ़ा है?
सबने मुझ पर
अपने-अपने महल बनाए,
फिर एक दिन
मुझे ही बिखरा हुआ
कहकर चले गए।
समन्दर रोज़
मुझसे मिलने आता है,
पर मेरी प्यास
कभी क्यों नहीं पूछता!
हवाएँ
अपनी मनमानी से
मुझे उड़ाती रहती हैं,
और लोग कहते हैं—
“रेत का कोई घर नहीं होता!”
मैंने तो
हर कदम के निशान सँभाले,
पर किसी ने
मेरी हथेली पर
अपना नाम स्थायी नहीं लिखा।
तपती धूप में
मैं जलती रही चुपचाप,
फिर भी
मरुभूमि का दोष
मेरे हिस्से ही आया।
मुट्ठी से फिसलती रेत की अजब कहानी
मुट्ठियों में कैद हुई,
तो फिसल जाने का इल्ज़ाम मिला,
बिखरी रही धरती पर,
तो बेवफ़ा कहलायी।
मैं रेत हूँ—
समय की सबसे पुरानी गवाह,
फिर भी
हर लहर
मुझे मिटा देने का दावा करती है।
मुझसे ही
(Hourglass) रेत घड़ी का आविष्कार हुआ था, जो सीधे तौर पर समय के बीतने को दर्शाती है।
रेत का गिला/रेत की शिकायतें क्या-क्या नहीं हो सकती हैं?
मैं मरुभूमि बनूँ तो अभिशाप, और तट बनूँ तो सौंदर्य— यह भेदभाव क्यों है?
कविताओं और शेरो-शायरी में मेरा उपयोग अक्सर 'बेबसी' और 'उदासी' को दर्शाने के लिए ही क्यों किया जाता है-
ग़ज़ल
हौसलों का नया एक थल देखिए,
मुश्किलें हो रहीं कैसे हल देखिए।
ठोकरों ने तराशा है इंसाँ को यूँ,
पत्थरों से निकलता महल देखिए।
वक्त चुपचाप चेहरों को पढ़ता रहा,
कौन अपना रहा, कौन छल देखिए।
आँखों में ख़्वाब कितने सजाए मगर,
जो हक़ीक़त में बदला वो पल देखिए।
आँधियों ने उड़ाने की कोशिश तो की,
है चमन का मगर आत्मबल देखिए।
रास्ते ही सिखाते हैं चलना यहाँ,
हमसफ़र बन के ही साथ चल देखिए।
अब 'विभा' को दिखाते हैं तारा यहाँ,
आसमानों में कोई भी दल देखिए।





