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बरगद के विशाल वृक्ष का तना लाल-सुनहरे धागों से भरता जा रहा था। पूजा की थालियों में दीपक टिमटिमा रहे थे और मंत्रों की धीमी ध्वनि हवा में घुल रही थी। नंदिनी भी महिलाओं की भीड़ में थी। उसके हाथ में पाँच रंगों वाला मौली था, परन्तु वह कभी बरगद को देखती कभी अपने हाथों में पकड़े मौली को निहारती। तीन महीने पहले ही उसकी शादी हुई थी।
“वट-सावित्री का व्रत पति की लम्बी उम्र और अटूट दाम्पत्य के लिए होता है।” दादी-नानी, मामी-मौसी, बुआ-चाची, माँ को कहते सुना था। सासू माँ ने भी तो वही दोहराया था।
“क्या सिर्फ पति की उम्र लम्बी होना ही शादी का रिश्ता बचा लेता है? फिर मेरे दादा और दादा ससुर जी ने दूसरी शादी कर परदेश-विदेश क्यों जाकर बस गए! दादी और दादी सासू माँ के किए व्रत से ससुर जी की लम्बी आयु है या उनकी दूसरी पत्नी के किए व्रत से?” नन्दनी बुदबुदाते हुए, चुपके से सामने बैठे आरव को देखा। वह मुस्कुरा रहा था, उसकी पूजा की टोकरी सम्भाल रहा था ताकि धागा उलझे नहीं।
“इतनी कसकर क्यों बाँध रही हो?” आरव ने हल्के से पूछा।
“ताकि रिश्ता कभी ढीला न पड़े।” नन्दनी ने मुस्कुराते हुए कहा।
“धागे से नहीं, साथ निभाने से रिश्ते बन्धे रहते हैं।” आरव ने धीरे से उसका हाथ थाम लिया!
“यह धागा सिर्फ पति की लम्बी उम्र का नहीं, बल्कि हमारे विश्वास, हमारा सम्मान और हमारे साथ के उस वचन का प्रतीक है, जिसे हर दिन निभाने का प्रयास हमें करना होगा।” बरगद के चारों ओर घूमते हुए नन्दनी बुदबुदा रही थी।
“हे वटवृक्ष, हमारे रिश्ते की जड़ें भी इतनी ही गहरी होने में साक्षी रहना कि समय की आँधियाँ भी इन्हें हिला न सकें।” आरव ने पेड़ को प्रणाम करते हुए कहा।
अवहित्था
सम्मान समारोह के लिए मंच सज चुका था। मंच पर पुरस्कार की घोषणा होने ही वाली थी। इस साल के 'सर्वश्रेष्ठ लेखक' के रूप में मीरा का नाम लगभग तय माना जा रहा था। मंच से लेकर सभागार में बैठे सभी लोग मीरा की तरफ देख रहे थे, और राघव की नजरें भी लगातार सामने की पंक्ति में बैठी अपनी पूर्व मित्र और सह-लेखिका मीरा पर टिकी थीं। कुछ साल पहले दोनों के रास्ते एक कड़वाहट के साथ अलग हो गए थे।
अचानक उद्घोषक ने माइक संभाला, "और इस वर्ष के सर्वश्रेष्ठ लेखक हैं... राघव!"
पूरा हॉल तालियों की गड़गड़ाहट से गूँज उठा। राघव मंच की ओर बढ़ने लगा। उसने अनजाने में ही मीरा की तरफ देख लिया, मीरा के चेहरे पर एक पल के लिए घोर निराशा और दुःख का भाव आया, उसकी आँखें नम हुईं—शायद वह अपनी हार या पुराने दिनों को याद कर बैठी थी।
लेकिन अगले ही पल, जैसे ही बगल में बैठी सहेली ने मीरा की तरफ देखा, मीरा ने अपनी आँखें मूंद लीं। उसने एक गहरी साँस ली, चेहरे पर दुनिया भर की कृत्रिम सहजता और एक बड़ी सी मुस्कान ओढ़ ली। वह खड़े होकर सबसे ज्यादा उत्साह से तालियाँ बजाने लगी, जैसे राघव की इस जीत से ज्यादा खुशी उसे जीवन में कभी मिली ही न हो।
राघव मंच पर था, पर उसकी नजरें मीरा के उन हाथों पर थीं जो ताली बजा रहे थे,। थोड़ी देर के बाद वह मंच से उतर गया और “मैं समझ रहा हूँ कि इन कंगन की खनक के पीछे तुमने अपने भीतर कितने बड़े तूफ़ान को दबाए बैठी हो! लेखन में तो अव्वल थी ही, अभिनय भी बाकमाल कर लेती हो!” मीरा के पास से गुजरते हुए राघव ने कहा।





