Wednesday, 25 February 2026

थाती का व्यास

पटना -२० फरवरी २०२६

भाई राजेन्द्र,

सस्नेहाशीष!

आशा करती हूँ, सपरिवार तुम सानन्द होगे। तुम जब पिछली बार पटना आए थे तब भी रामदीन को लेकर चिन्ताग्रस्त थे। रामदीन की झुर्रियों में धूप के धब्बे स्पष्ट दिख रहे थे लेकिन उसके आँखों में कोई पुराना उजाला अटका हुआ था। उसके एक हाथ में कपड़ों की पोटली थी—रंगहीन, थकी हुई, जैसे उसके लिए रोज़ी-रोटी की मजबूरी हो। दूसरे हाथ में वह एक अजीब-सा, बहुत बड़ा चित्तीदार गुब्बारा थामे था। गुब्बारा बहुत विशाल था। लग रहा था कि, वह रामदीन को सहारा दे रहा है, रामदीन उसे नहीं सहारा दे रहा है। गली से गुजरते लड़के ठिठककर हँस पड़े थे- “काका! बुढ़ापे में मेला लगाओगे क्या?”

रामदीन ने मुस्कुराकर सिर झुका लिया था। तुमने कहा था, “देखो न दीदी। उसकी मुस्कान में जवाब नहीं, बस धैर्य है! बच्चों को कौन समझा सकता है कि ऐसा ही यह गुब्बारा उसके बीमार पोते की जिद है,”

“हाँ, उसका पोता, जिसकी खाँसी रातों को दीवारों से टकराती रहती है। चिकित्सक ने दवाइयाँ दी है। पर बच्चे ने दादा से कहा था, -‘दादा, बड़ा वाला गुब्बारा लाना, आसमान जितना।’ मैंने कहा था और 

रामदीन बुदबुदा रहा था—“क्या आसमान खरीदा जा सकता है?”

तुम्हारा दुःख और बढ़ जाएगा यह जानकर कि उस समय रामदीन ने अपनी दो वक्त की रोटी में से भी कुछ कौर कम कर दिया था और उस त्याग की कीमत पर खरीदा जाता था ऐसा गुब्बारा—हवा से भरा, पर उसके लिए उम्मीद से भरी। तब रामदीन के हाथ में एक खुला आसमान का अवसर था। वह जानता था—गुब्बारा फूटेगा। हवा निकल जाएगी। शायद पोते की हँसी भी कुछ दिनों की मेहमान हो। पर उस क्षण, उसे विश्वास था जब वह छोटा-सा बच्चा इस बड़े गुब्बारे को देखकर खिल उठेगा, तब उसके कमरे में बीमारी नहीं, रंग भर जाएँगे। और वही सच हुआ-

जैसे आज परदेश से लौटे उसी पोते ने ठीक वैसा ही गुब्बारा रामदीन को थमाया था-

“कभी-कभी जिन्दगी में रोटी से भी ज्यादा जरूरी एक मुट्ठी हवा हो जाती है—जो किसी के फेफड़ों में नहीं, उसके दिल में भर दी जाए!” बुदबुदाता हुआ रामदीन ने गुब्बारे को थोड़ा कसकर थाम लिया।

जीजी सा को चरण स्पर्श और बिटिया सी भाभी अनीता से मेरी ओर से स्नेह और बच्चों को शुभाशीष कह देना!

पत्रोत्तर की प्रतीक्षा में

तुम्हारी दीदी माँ (नारियल)

सुझाव मिला

थाती का व्यास

                                                    जोधपुर 

                                                   २१-०२-२०२६

प्रिय मित्र सुनील,                                         

सप्रेम नमस्कार 

मैं यहाँ सपरिवार सकुशल हूँ। आशा है तुम भी सकुशल होगे। 

पिछले पत्र में तुमने मुझसे एक साहित्यिक पहेली पूछी थी, “हवा की क़ीमत क्या है?” मैंने बहुत सोचा कि क्या उत्तर दूँ। तभी कल ऐसा कुछ घटा कि पहेली का उत्तर स्वतः हो प्राप्त हो गया। मेरे घर के पीछे कच्ची बस्ती में एक रामदीन नामक निर्धन व्यक्ति रहता है। अक्सर मिलता है, तो राम-राम करता है। कल मैं घर लौट रहा था, तभी कड़ी धूप में रामदीन को देख कर चौंक उठा। 

रामदीन की झुर्रियों में धूप के धब्बे स्पष्ट दिख रहे थे लेकिन उसके आँखों में कोई पुराना उजाला अटका हुआ था। एक हाथ में कपड़ों की पोटली थी—रंगहीन, थकी हुई, जैसे रोज़ी-रोटी की मजबूरी हो। दूसरे हाथ में वह एक अजीब-सा, बहुत बड़ा चित्तीदार गुब्बारा थामे था। गुब्बारा बहुत विशाल था। लग रहा था कि, वह रामदीन को सहारा दे रहा है, रामदीन उसे नहीं सहारा दे रहा है। गली से गुजरते लड़के ठिठककर हँस पड़े—

“काका! बुढ़ापे में मेला लगाओगे क्या?”

मैंने भी मुस्कुराकर उसे प्रश्नवाचक दृष्टि से देखा। 

रामदीन ने मुस्कुराकर सिर झुका लिया। उसकी मुस्कान में जवाब नहीं, बस धैर्य था। उसने क्लांत स्वर में कहा, “अब क्या बताऊँ साहब? ऐसा ही गुब्बारा मेरे बीमार पोते की जिद है। मेरा पोता महकू जिसकी खाँसी रातों को दीवारों से टकराती रहती है। चिकित्सक ने दवाइयाँ दी, पर बच्चे ने कहा था—“दादा, बड़ा वाला गुब्बारा लाना, आसमान जितना! अब आप ही बताइये,क्या आसमान खरीदा जा सकता है?”

मेरी आँखें भर आईं। 

रामदीन बोलता रहा, “मैंने  अपनी दो वक्त की रोटी में से भी कुछ कौर कम कर दिए। उसी  त्याग की कीमत पर आज खरीदा है यह  गुब्बारा—हवा से भरा, लेकिन मेरे  लिए उम्मीद से भरपूर। मेरे हाथ में सारा आसमान है न साहब?”

मैं मुस्कुरा दिया, “लेकिन रामदीन गुब्बारा फूटेगा। हवा निकल जाएगी। फिर क्या होगा?” 

रामदीन की आँखों से गंगा-जमुना बह निकली, “साहब, बीमारी-हारी का तो क्या भरोसा? लेकिन  उस क्षण, जब मेरा छोटा-सा महकू इस बड़े गुब्बारे को देखकर खिल उठेगा, तब उसके कमरे में बीमारी नहीं, रंग भर जाएँगे।

कभी-कभी जिन्दगी में रोटी से भी ज्यादा जरूरी एक मुट्ठी हवा हो जाती है—जो किसी के फेफड़ों में नहीं, उसके दिल में भर दी जाए!” कहते हुए  रामदीन ने गुब्बारे को थोड़ा कसकर थाम लिया।

क्या बताऊँ सुनील,मेरी क्या हालत हुई। जितने पैसे जेब में थे, रामदीन को महकू के इलाज के लिए दे कर बड़ी मुश्किल से अपने आँसू रोकता, मैं घर चला आया। घर पहुँचते ही तेरी पहेली याद आई। आशा है, उत्तर मिल गया होगा। 

घर में सभी का ध्यान रखना। उर्मिला भाभी को मेरा नमस्कार कहना। सौम्य और सुयश को मेरा आशीर्वाद। 

पत्रोत्तर की प्रतीक्षा में, 

तुम्हारा मित्र, 

राजेन्द्र

Monday, 23 February 2026

संवाद का व्यास

“महोदया! पिछले पाँच वर्षों से इस कम्पनी में कार्यरत हूँ। एक बाहरवाले की शिकायत आई और आपने बिना पूछे मुझे निलम्बित कर दिया?” अमित की आवाज़ भारी थी।

“मुझे भी अफ़सोस है, लेकिन क्लाइंट बड़ा था अमित! आरोप गम्भीर लगाया था। कम्पनी की साख दाँव पर लग गई थी।” सीईओ रीमा मुखर्जी ने कहा।

“और मेरा नाम? क्या आपकी नज़रों में वह साख का हिस्सा नहीं था? क्या पेशेवर दुनिया में साधारण कर्मचारी के सम्मान की कोई देहरी नहीं होती है?” अमित की आवाज़ तल्ख़ भरी थी।

कुछ क्षण के लिए मौन का साम्राज्य छा गया।

“तुम जानते हो, समझ सकते हो! वह समय बतौर निजी लेने का नहीं था,” रीमा ने संयत स्वर में कहा।

“पर असर तो निजी तौर ही हुआ, न! जब तक जाँच पूरी हुई, मुझे ‘गुनहगार’ की तरह देखा गया। टीम की मीटिंग्स से बाहर रखा गया। किसी ने पूछा तक नहीं कि सच क्या है!”

रीमा की निगाहें झुक गईं। “जाँच में तुम निर्दोष पाए गए हो, क्लाइंट ने लिखित माफ़ी भेजी है।” उसने धीमी स्वर से कहा।

अमित हल्के से मुस्कुराया— “निर्दोष साबित होना और निर्दोष माना जाना—दो अलग बातें हैं, महोदया!” अमित की भौं टेढ़ी और नथुने फड़क रहे थे।

“तो क्या तुम जा रहे हो?” रीमा ने पूछा।

अमित ने गहरी साँस ली। “मैं भाग नहीं रहा। बस यह याद दिला रहा हूँ कि भरोसा भी कॉन्ट्रैक्ट का हिस्सा होना चाहिए। अगर कम्पनी अपने कर्मचारी पर पहला विश्वास नहीं रखेगी, तो बाहर की दुनिया क्यों रखेगी?” अमित ने कहा।

“यक़ीनन हमने जल्दबाज़ी की! कम्पनी की साख बचाने के चक्कर में हमने तुम्हारी साख पर सवाल लगा दिया।” रीमा ने लज्जित होते हुए कहा!

“अगर तुम रहो… तो मैं पूरी टीम के सामने अपनी गलती स्वीकार करूँगी। सार्वजनिक रूप से। विश्वास वापस लेने का अधिकार तुम्हारा है—पर उसे लौटाने की कोशिश मेरा कर्तव्य।” कुछ पल की खामोशी के बाद रीमा ने अनुरोध भरे स्वर में कहा!

अमित ने अपने सूटकेस को धीरे से सीधा कर दिया—पर बाहर की ओर खींचा नहीं, “मैं रहूँगा,” उसने कहा।

Sunday, 22 February 2026

भरोसे की रणरीति

भरोसे की रणभूमि


प्राणा  कम्पनी का सबसे बड़ा प्रोजेक्ट लॉन्च हो गया, लेकिन प्रतिस्पर्धी कंपनी ने अंतिम क्षणों में कानूनी दाँव खेल दिया। मीडिया, निवेशक, सबकी निगाहें विभा पर टिक गईं।अंदरूनी जानकारी बाहर जाने की आशंका थी। उसी समय समीर आगे आया। उसने वह ईमेल ट्रेल, वह गोपनीय प्रस्ताव और प्रतिस्पर्धी कम्पनी की चालों के सबूत बोर्ड के सामने रख दिया, जिन्हें उसने समय रहते रिकॉर्ड कर लिया था।

“सर,” उसकी आवाज़ काँपी, “एक बार मैंने गलती की थी। इस बार खुद को खोना नहीं चाहता था।”

कानूनी टीम सक्रिय हुई। मामला पलट गया। प्रोजेक्ट बच गया।

“शायद… इस बार साँप ने डसा नहीं।” मीटिंग खत्म होने के बाद विभा ने धीरे से चांद्री के पास आकर कहा।

चांद्री ने मेज़ पर रखे पत्थर को देखा और कहा—

“साँप को पालना जोखिम है। पर हर जोखिम मूर्खता नहीं होता। कुछ जोखिम नेतृत्व की परीक्षा होते हैं।”

खिड़की के बाहर शहर की रोशनियाँ चमक रही थीं, विभा उन रौशनियों में कंपनी की आपात बैठक को देख रही थी। उसके नज़रों में माहौल में व्याप्त तनाव की महीन परत तैर रही थी।

ऑपरेशंस हेड चांद्री ने फाइल टेबल पर पटक दी—

“सर, आप सच में समीर को प्रोजेक्ट हेड बना रहे हैं? वही समीर, जिसने पिछले साल गोपनीय डेटा लीक किया था? वह कंपनी छोड़कर प्रतिस्पर्धी फर्म से मिला हुआ था। यह सीधा जोखिम है।”

सीईओ विभा ने कुर्सी पर पीछे सिर टिका लिया। उसके सामने मेज़ पर एक छोटा-सा पेपरवेट रखा था—काला, साधारण-सा पत्थर। वह उसे उँगलियों से घुमाने लगी, “हाँ, वही समीर,” उसने विवेकपूर्ण शान्त स्वर में कहा।

“महोदया! यह व्यापार है, आश्रम नहीं। साँप को आस्तीन में रखेंगी तो डसेगा ही।” खिसियानी चांद्री ने कहा।

विभा हल्के से मुस्कुरा रही थी—

“हो सकता है। लेकिन हर गलती स्थायी चरित्र नहीं होती, कुछ लोग परिस्थितियों से हारते हैं, कुछ अवसर मिलने पर बदलते भी हैं। अगर हम किसी को सुधार का अवसर ही न दें, तो फिर नेतृत्व का अर्थ क्या रह जाएगा?” कमरे में सन्नाटा छा गया। निर्णय हो चुका था। और भीतर, विश्वास ने एक बार फिर अपना व्यास बढ़ा लिया था।

Wednesday, 28 January 2026

वनवास की विरासत

मयंक की शादी का भव्य भोज कल रात में समाप्त हुआ था।रिसॉर्ट से मेहमानों की गाड़ियों की कतार धीरे-धीरे सड़क में विलीन हो रही थी। रिसॉर्ट के एक कोने में उसके पिता ज़मीन से टिके बैठे थे—फूट-फूटकर रोते हुए। अंशु, मयंक के ताऊ का बेटा—यह दृश्य देख रहा था। उसकी आँखें भी नम थीं, परन्तु उसके सीने में दबी कड़वाहट आँसुओं से भारी पड़ रही थी।

“मयंक जी, अपनी पत्नी के साथ कहाँ चले गए? चाचा जी, इतना क्यों रो रहे हैं?” अंशु की पत्नी ने बेहद संकोच से पूछा।

अंशु ने ठंडी साँस छोड़ी, “ये आँसू आज बेमानी हैं, इन दिनों बात-बात पर चाचा जी आजकल की बहुओं पर तीखा कटाक्ष कर रहे थे।”

“तो क्या हो गया? यह तो सामान्य सी बात है। पुरानी पीढ़ी नई पीढ़ी की!” अंशु की पत्नी ने कहा।

“तुम इनका इतिहास नहीं जानती हो! हर थोड़े दिनों के बाद यही चाचा जी मेरे ननिहाल चले जाया करते थे—मेरे नाना और बड़े मामा को बुला लाने के लिए। घर में ज़रा-सी तकरार होती और घर इजलास बन जाता। मेरी माँ को ऐसे निकल जाने का आदेश जारी किया जाता, जैसे वह उस घर का हिस्सा ही न हों।”

“अंशु भैया, आप उन्हें ही क्यों दोष दे रहे हैं? दादी भेजती थीं। मेरे पिता जी क्या करते? उनकी बात न मानकर क्या वे उस घर में रह सकते थे?” पास खड़ी मयंक की बड़ी बहन बोल पड़ी।

अंशु की आँखों में बरसों पुरानी टीस दामिनी बन उतर आई, “फर्ज़ और साज़िश के बीच एक बहुत बारीक रेखा होती है,” वह बोला। “दादी की आज्ञा के नाम पर मेरी माँ को बार-बार अपमानित किया गया। आज जब मयंक सक्षम है, अपना घर बसा सकता है, तो ये रो रहे हैं—क्योंकि अब किसी को बाहर भेजने का अधिकार नहीं बचा। काश! मेरे पिता भी मयंक जैसे होते।” चाचा का रोना और तेज़ हो गया। अंशु ने अपनी पत्नी की ओर देखा। उसकी आँखों में सवाल था, उत्तर की प्रतीक्षा थी। अंशु ने चुपचाप गाड़ी का दरवाज़ा खोला और धीमे, पर दृढ़ स्वर में कहा— “जिस घर में अपनों को बार-बार बाहर भेजने की परम्परा हो, वहाँ नया गृह-प्रवेश नहीं होता!”


Tuesday, 6 January 2026

स्वाद की मर्यादा

 शान्त, सजग और आत्मसम्मान से भरी मृदुला एक बड़ी विज्ञापन एजेंसी में क्रिएटिव हेड थी। नाम की तरह ही उसका स्वभाव भी बेहद मृदु था। —न उसकी आवाज ऊँची होती थी, न उसको चालाक राजनीति आती थी और न ही उसमें दूसरों को नीचा दिखलाकर आगे बढ़ने की आकांक्षाएँ ही थीं।इसलिए वह अपनी जगह पर सदैव स्थिर रहा करती थी—

“बेटी, जिस कॉर्पोरेट दुनिया में तुम कार्यरत हो, वहाँ के लोग एक-दूसरे को काट खाने को हमेशा तैयार रहते हैं। वह तेज बत्तीस दाँतों वालों की दुनिया है—और तुम उनके बीच एक अकेली जीभ जैसी हो। इतनी सिधाई से वहाँ कैसे टिक पाओगी?” उसके पिता अक्सर वीडियो कॉल पर उससे पूछ लेते थे।और मृदुला हर बार बस! एक विश्वास के साथ मुस्कुराकर गुनगुनाने लगती थी।

कुछ समय गुजरने के बाद एक दिन उसके कार्यालय में एक भारी संकट आ खड़ा हुआ। एजेंसी का एक बड़ा क्लाइंट मुकदमे की धमकी देने लगा। कारण था—एक पुराने सीनियर मैनेजर का अहंकार और बदतमीज़ी वाला व्यवहार, जिसके कारण वर्षों की मेहनत पर पानी फिरता नज़र आ रहा था। मीटिंग रूम में बैठे और अन्य सारे कड़क आवाज़ वाले अधिकारी—कभी धमकी देने लगते, कभी दबाव बनाने की कोशिश करने लगते। लेकिन जितना वेलोग बोलते जाते मामला उतना ही बिगड़ता जा रहा था। अंततः सभी की निगाहें मृदुला पर आकर टिक गईं।

बड़े धैर्य के साथ मृदुला आगे बढ़ी। उसने न तो अपनी ऊँची आवाज़ की, न तर्कों की तलवार चलाई। उसने बड़े धैर्य और ध्यान से क्लाइंट की पूरी बात सुनी—बिना टोके, बिना एजेंसी के बचाव के लिए। फिर बड़ी विनम्रता से एजेंसी की ही चूक को स्वीकार की, और उतनी ही विनम्रता और शान्ति से समाधान रखा। उसकी भाषा में न पछतावे की बनावट थी, न सफ़ाई का दिखावा—सिर्फ़ ईमानदारी और बस! ईमानदारी थी।उसकी कोमल वाणी ने वह कर दिखाया, जो कठोर अहंकार नहीं कर पा रहा था। क्लाइंट का क्रोध बहुत हद तक शान्त हो गया, और आहिस्ता-आहिस्ता बातचीत पटरी पर लौटने लगा  —और कुछ ही देर के बाद में पुनः अनुबंध (कॉन्ट्रैक्ट रिन्यू) तैयार हो गया।

उस शाम मृदुला ने अपने पिता को फोन किया और मुस्कराते हुए कहा,

“पापा, आज उन ‘दाँतों’ को समझ में आ गया कि चबाने का काम दाँत करते हैं, लेकिन स्वाद तो हमेशा जीभ ही बताती है। दाँत आपस में टकराकर टूट सकते हैं, पर जीभ सबको साथ लेकर चलती है। मैंने निभाना सीख लिया है—बिना कठोर बने।”

फोन के उस पार पिता कुछ क्षण चुप रहे। मानों उनकी चिन्ता अब गर्व में बदल चुकी हो!

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Wednesday, 31 December 2025

लौटती राह

बरसात के बाद भीगी सड़क पर पेड़ों की परछाइयाँ काँप रही थीं, और अत्यधिक ठंड के एहसास से शाम सोने ही जा रही थी। आसमान से झरती कालिमा लिए नीली उदासी ज़मीन पर फैल रही थी, ठीक वैसी ही, जैसे राघव बाबू के मन की परछाई हो। वे बालकनी में अकेले बैठे थे। सामने खाली बेंच, बगल में ठंडी हो चुकी चाय और उनके भीतर कहीं जमता हुआ उनके घर का ही सन्नाटा। 

बाहर बहुत तेज हवा चल रही थी, और उनके भीतर—यादों की धूल, जो हर रात, थोड़ी-सी और जमती जा रही है। कभी यह उनका घर आवाज़ों से भरा रहता था—विमर्श-हँसी, चुहल-बहस, जल्दी-जल्दी फटते तकिया बिखरते बर्फ से रूई!

आज सब कुछ स्थिर था, जैसे समय ने ही उनकी साँस रोक ली हो। उनके तीन बच्चे दो बेटी और एक बेटा! लेकिन बेटा मानव आधुनिकता का शिकार! एक दिन वह विदेशी-परदेशी भीड़ में खो गया था—कहकर गया था कि “जल्दी लौटूँगा।”

पर कुछ विदाइयाँ लौटने के लिए नहीं होतीं, वे बस स्मृतियों में टिक जाती हैं—काँच की तरह, चुभती हुई। राघव बाबू को उसका जाना नहीं तोड़ सका, पर उसका बदल जाना भीतर ही भीतर उनके अन्दर कहीं दरार छोड़ रहा था! कभी जो बेटा उँगली पकड़कर चलना सीखता था, वही आज उँगलियाँ मोबाइल पर दौड़ती हैं—लेकिन जहाँ पिता का नाम ‘मिस्ड कॉल’ बनकर रह गया है।

“चाय ठंडी हो रही है, बाबूजी…” पड़ोसी लड़के की आवाज़ ने उन्हें वर्तमान में लौटाया।

उन्होंने हल्की मुस्कान ओढ़ ली—

“ठंडी चाय नहीं बेटा…। कुछ रिश्ते ठंडे पड़ जाते हैं, वही पी रहा हूँ। बिना गलती किए भी गलती ढूँढकर अच्छाई भूल जाना आसान है!”

रात गहराई। खिड़की से झाँकता आधा चाँद जैसे अधूरी बात कहकर रुक गया हो। माधव बाबू ने डायरी खोली और एक पंक्ति लिखी—

“घर इंसान के जाने से नहीं, उसके बदल जाने से सूना होता है।”

लेकिन उनकी डायरी बन्द होने के पहले उनका मोबाइल बजा-

“हैलो”

क्य्ययाऽ? सच में? मानव तुम लौट रहे हो…,” राघव बाबू की विस्फारित आँखें रक्तरंजित हो रही थीं।


Thursday, 18 December 2025

सीमांत के पहले

रात के बारह बज रहे थे। मोबाइल की नीली रोशनी में अदिति का चेहरा और भी चौकन्ना हुआ लग रहा था। स्क्रीन पर एक वीडियो चल रहा था—किसी लड़की का, आधा सच, आधी अफ़वाह। नीचे हज़ारों लाइक और सैकड़ों टिप्पणियाँ सैलाब लाने के प्रयास में भीड़ को उकसाती उमड़ रही थीं।

व्हाट्सएप्प ग्रुप में संदेश चमका—“सभी साझा करो, ट्रेंड में है। आपके भी फ़ॉलोअर्स बढ़ जाएँगे।”

अदिति की भी उँगली शेयर बटन पर ठिठक गई। वह बुदबुदा रही थी “यही तो सुनहला मौका है –पहचान बनने का, प्रमुखता से दिखने का। उसने वीडियो दोबारा चलाया। कटे-फटे दृश्य, भड़काऊ कैप्शन, और सच के नाम पर सिर्फ़ सनसनी दिख रहा था-

तभी पीछे से उसकी माँ की आवाज़ आई, “तुम! सोई नहीं अभी तक?”

“बस! एक पोस्ट डालकर सोने ही जा रही हूँ,” अदिति ने कहा।

माँ पास आकर खड़ी हो गईं। स्क्रीन पर नज़र पड़ी तो उन्होंने कुछ नहीं पूछा, बस इतना कहा—“हर रेखा ज़मीन पर नहीं खींची जाती, बेटी। कुछ उँगलियों के अधीन होती हैं।”

अदिति ने चौंककर माँ को देखा। “मतलब?”

“पोस्ट करने से पहले एक सीमा को परख लेना,” माँ ने पुनः कहा कि “इससे किसी की इज़्ज़त, सच या ज़िन्दगी आहत तो नहीं होगी? वरना भीड़ के साथ चलते-चलते हम वही बन जाते हैं, जिससे डरना चाहिए।”

उँगली काँपी। शेयर के बजाय उसने डिलीट दबा दिया। मोबाइल की स्क्रीन काली हो गई।

Tuesday, 9 December 2025

हठीला भँवर

हठीला भँवर  


थप्पड़ का सन्नाटा

रंगमंच के पीछे बने छोटे-से ‘तैयारी कक्ष’ में  बैठे आदित्य ने उत्तेजनापूर्ण स्वर में कहा, “हद हो गई यह तो। अंतराल के दौरान कार्यक्रम ठहर-सा गया था और उसी ठहराव को तोड़ने के लिए इन हम लोगों ने आधे घंटे में इतना बढ़िया पौराणिक प्रसंग तैयार कर मंच पर प्रस्तुत कर दिया, लेकिन जैसी आशा थी, वैसा तो कुछ हुआ नहीं। न तालियों की गड़गड़ाहट और न दर्शकों का उत्साह!”

विक्रम ने निराश स्वर में कहा, “हमने तो जैसे सूने में प्राण फूँक दिए! इतनी मुश्किल से तैयारी की, और मजाल है कि कोई एक बार भी बोले कि अच्छा किया! और तो और, अध्यक्ष महोदया तो कुछ बोलतीं कम से कम।”

आदित्य ने होंठों पर हल्की व्यंग्य-रेखा खिंची, “आदरणीया नीरा वाजपेयी को तुम जानते ही हो। तुझे पता है न वजह? आदरणीया को देवी-देवता, धर्म-वर्म पर प्रस्तुति पसंद नहीं। एक तो करेला, उस पर नीम चढ़ा सा है!  हम इतने आधुनिक हो गए हैं तथा साथ में विदेशी भी हो गए हैं! बस! यहीं उनके समझ से गड़बड़ हो गई।”

तभी दरवाज़े की कुंडी खड़की। कमरे में नीरा बाजपेयी कदम रख चुकी थीं— चेहरा कठोर, आँखें तपती हुई, और चाल में अनुशासन की तीखी गूँज। विक्रम के भीतर कहीं आशा थी कि अब जाकर सराहना सुनने को मिलेगी। पर उनकी आवाज़ तो मानो बर्फ पर पड़ी चोट-सी थी।

“यह क्या किया तुम लोगों ने?” उनके शब्द धारदार थे,

“संस्था की मर्यादा भी कोई चीज़ होती है। मंच पर जो प्रस्तुत किया गया है, वह हमारी संस्था के नियमों के पूर्णतः विपरीत है। मुझे पूर्व सूचना होती, तो मैं कभी अनुमति नहीं देती!”

विक्रम हतप्रभ रह गया! “आदरणीया हमने तो बस खाली समय भरने के लिए- भक्ति-भाव से—”

“बस!” नीरा ने फाइल मेज पर पटक दी। वह आवाज़ कमरे की हवा को चीरती चली गई।

“यह मेरा व्यक्तिगत मत नहीं है,” वे बोलीं, “संस्था की नीति है—कला को निष्पक्ष रखना। यहाँ न धर्म चलेगा, न राजनीति। तुम लोगों ने अच्छी नीयत से किया होगा, पर नीयत कभी नियम से बड़ी नहीं होती। मंच एक पवित्र स्थान है, और उसकी शालीनता उसकी सबसे पहली शर्त।”

कमरा अचानक बहुत छोटा लगने लगा था। पसीने की गंध के बीच अब खामोशी और अपराधबोध की परतें भी घुल चुकी थीं। विक्रम बुदबुदा रहा था- “कला का काम केवल प्रस्तुति देना नहीं, बल्कि उसके सीमित दायरे को समझना भी है। मंच की गरिमा, उसके नियम, उसकी तटस्थता— अगर इनसे बाहर कदम उठा लिया जाए, तो प्रस्तुति कला नहीं, अराजकता बन जाती है।”

Saturday, 4 October 2025

कंकड़ की फिरकी/सड़ांध की सफ़ाई


“कचरे का मीनार सज गया।” सहायक ने गोदाम की सफ़ाई के बाद चारों ओर नज़र दौड़ाते हुए कहा।

“सबके घरों से थोड़ा-थोड़ा निकलता है,”महिला ने ठंडी साँस ली,

“इसी तरह तो सागर भरता चला जाता है।बरस भर पर तो आप सफ़ाई करवाती ही हैं,” वह बोला।
महिला अचानक चिड़चिड़ा उठी, “तुम हर महीने क्यों नहीं कर देते? साल भर में भी तुम्हें टोकना पड़ता है तब होती है यह सफ़ाई! मैं अकेली क्या-क्या करूँ? बेटी-बहू होती तो बीच-बीच में हाथ बँट जाता।”

सहायक ने दिलासा देने वाले लहजे में कहा, “आप जैसी भी हैं, बहुत अच्छे से हैं। एक और घर में काम करता हूँ—वहाँ बहू की आँखों में ज़रा भी पानी नहीं है। सिर्फ़ अपने लिए खाना बनाती है। सास, पति और उसकी बेटी के लिए मैं बनाता हूँ। आपके यहाँ बेटी-बहू नहीं है, एक दुख तो है। पर जिन घरों में हैं—वहाँ भाँति-भाँति की समस्याएँ हैं!”

महिला कुछ देर चुप रही। फिर अचानक फुसफुसाई— “सुन… किसी दिन मौक़ा देखकर बहू को बता देना, उसका पति और सास मकान को ठिकाने लगाने वाले हैं…”
सहायक ठिठक गया। झाड़ू उसके हाथ से धीरे-से फिसल पड़ी। वह बुदबुदा उठा—यह सिर्फ़ कचरे की सफ़ाई नहीं थी, यहाँ घर के भीतर सड़ते रिश्तों का इलाज करने का अस्पताल है। और उससे अपेक्षा की जा रही थी, कि वह निदान बाहर भी पहुँचा दे। उसने बिना कुछ कहे झाड़ू उठाई, दरवाज़े की ओर बढ़ गया। साथ में वह बुदबुदा भी रहा था— मुखबिरों को भी टाँके लगते हैं, और कई बार सच बोलने की सज़ा चुप रहने से ज़्यादा गहरी होती है।”

—विभा रानी श्रीवास्तव, पटना

डॉ. सतीशराज पुष्करणा की ७९ वीं जयन्ती के महोत्सव में उन्हें शब्दांजलि




Wednesday, 2 July 2025

अन्तर्कथा

अन्तर्कथा


“ख़ुद से ख़ुद को पुनः क़ैद कर लेना कैसा लग रहा है?”

“माँ! क्या आप भी जले पर नमक छिड़कने आई हैं?”

“तो और क्या करूँ? दोषी होते हुए भी दुराचारी ने माफी नहीं माँगी और तुम पीड़िता होकर भी एफ.आई.आर. करने से बच रही हो…! जब मामला विश्वव्यापी हो रहा हो तो एफ.आई.आर. नहीं करना, कहीं न कहीं तुम्हारी विश्वसनीयता पर ही  प्रश्नचिन्ह लगाता रहेगा!”

“कैसे करूँ एफ.आई.आर.?”

“तो आगे भी सैदव अँधेरे में रहने के लिए तैयार रहो- जाल में फँसी हजारों गौरैया-मैना की आजादी का फ़रमान जारी हो सकता था…! तुम उदाहरण बन सकती थी। लेकिन तुमने ही स्वतंत्रता और स्वच्छंदता की बारीक अन्तर को नहीं समझा।”

“माँ!”

“तुम क़ानून-अनुशासन समझती नहीं हो या तोड़ना स्वतंत्रता लगता है?”

“माँ!”

“जब तुम पंजाब अपने घर में नहीं थी। तुम पटना/बिहार में थी, जब बिहार में शराबबंदी है तो तुमने मस्ती के नाम पर उसका उपयोग क्यों की?”


किसी-किसी दुर्घटना में अपनी भी नासमझी रहती है- जिसके कारण अपनी ही आवाज धीमी पड़ जाती है—-


थाती का व्यास

पटना -२० फरवरी २०२६ भाई राजेन्द्र, सस्नेहाशीष! आशा करती हूँ, सपरिवार तुम सानन्द होगे। तुम जब पिछली बार पटना आए थे तब भी रामदीन को लेकर चिन्त...