निखिल का पैतृक शहर विनाशकारी बाढ़ की चपेट में आ गया। बस्तियाँ डूब गईं, हाहाकार मच गया। राहत कार्य में जुटे थके-हारे निखिल ने जब पुस्तकालय का दरवाज़ा खोला, तो वह दंग रह गया।
पुस्तकालय की मेज़ें हट चुकी थीं। अलमारियों में किताबों की ओट से दवाइयाँ झाँक रही थीं। हॉल में बेघर परिवार आश्रय लिए हुए थे और शहर के युवा वहाँ सहमे बच्चों को सँभाल रहे थे।
वृद्ध पुस्तकाध्यक्ष ने आगे बढ़कर निखिल के कन्धे पर हाथ रखा और बोले, "बेटा! किताबें सिर्फ़ कागज़ का पुलिन्दा नहीं होतीं, वे समाज को संकट में एक-दूसरे के लिए खड़ा होना सिखलाती हैं।"
निखिल की आँखें शर्म से झुक गईं। उसने अपनी डायरी में लिखा, “पिछड़ा वह स्थान नहीं जहाँ आधुनिक सुविधाएँ कम हों, बल्कि वह है जहाँ मानवीय संवेदनाएँ और आपसी जुड़ाव ख़त्म हो जाए। यह शहर तो बहुत ही आगे है। जब मैं कुछ महीनों पहले यहाँ आया था तो इस जर्जर पुस्तकालय को देखकर महानगर से आए युवा अधिकारी के रूप में मैंने उपहास उड़ाया था, “आज के डिजिटल युग में भी यह कबाड़खाना चल रहा है! सचमुच, यह शहर कितना पिछड़ा है। वृद्ध पुस्तकाध्यक्ष ने सुना था पर अपनी सौम्य मुस्कान के साथ मौन रहे थे!”
ग़ज़ल
हर घड़ी अक्स को चमकाने की चाहत ही नहीं,
खुरदरा रहने की छूटेगी ये आदत ही नहीं
दाग़ से ही तो है इस चाँद में ऐसी रौनक़,
इस जहाँ में कहीं बेदाग़ फ़ज़ीलत ही नहीं।
हद से ज़्यादा जो सफ़ाई में लगे रहते हैं,
उनके चेहरों पे कोई सच्ची सी रंगत ही नहीं
कुछ खुरदरे से भी कोने हों ज़रूरी घर में,
हर तरफ़ सिर्फ़ नफ़ासत की ज़रूरत ही नहीं।
ये जो ठोकर है संभलने का सलीक़ा देती,
चिकने रोड़ों की मुझे कोई इबादत ही नहीं।
रास्ते का मुड़ा ही मोड़ हो हारा तो नहीं
इस सफ़र में मुझे राहों से शिकायत ही नहीं
अपनी अनगढ़ सी कला पर ही यक़ीं काफ़ी, 'विभा'
हर तरफ़ काँच के महलों की हिफ़ाज़त ही नहीं।





