Saturday 22 June 2024

लड्डू : फूटना मन का!

जॉर्ज बर्नाड शॉ ने कहा है, “दुनिया में दो ही तरह के दु:ख हैं —एक तुम जो चाहो वह न मिले और दूसरा तुम जो चाहो वह मिल जाए!”

हमलोग कामख्या मन्दिर बहुत बार गये हैं : बहुत पहले जब गये तो गोहाटी मेरे पति अपने सरकारी दौरे पर थे तो वहाँ के लोगों ने आराम से दर्शन की व्यवस्था करवा दी। : दूसरी-तीसरी बार गये तो भी पंक्ति में लगकर बहुत परेशानी नहीं उठानी पड़ी। पिछले साल (सन् २०२३) गये तो भीड़ देखकर भाग चलने की इच्छा हुई, लेकिन हमारे साथ जो लोग थे उनकी पहली यात्रा थी बिना दर्शन मायूस हो रहे थे : एक पण्डित जी मिले बोले पाँच सौ लेंगे चार व्यक्ति का : सौदा बुरा नहीं लगा एक बार और चित्र उतारने का मौका मिल रहा था। मन में लड्डू फूटना स्वाभाविक था। मन्दिर में प्रवेश के कई दरवाज़े बन गये हैं : दो दरवाजे के पहले ही पण्डित जी बोले कि हो गया दर्शन, अब बाहर निकल लेते हैं और आपलोग मेरी तय राशि दे दीजिए।

“अरे। वाह! हमलोग गोहाटी रेलवे स्टेशन या हवाई अड्डा से ही नहीं मान लेते कि दर्शन हो गये? बिना दर्शन के राशि तो नहीं देने वाले।”

कुछ देर बकझक के बाद पण्डित जी बिना राशि लिए ग़ायब हो गए…। पता नहीं उनके मन के लड्डू का क्या हुआ होगा…! लड्डू यानी चूड़ा, मूढ़ी (मुरमुरा), गोंद, तिल, तीसी, बेसन इत्यादि के लड्डू : आमतौर पर सर्दियों के मौसम में लड्डू बनाये जाते हैं। लोहड़ी और संक्रांति के त्योहार के मौके पर भी तिल के लड्डू बनाएं जाते हैं। भूने तिल, गुड़ और केसर के साथ आप भी इन्हें आसानी से घर पर बना सकते हैं। तिल के लड्डू बनाने के लिए सामग्री: आप चाहे तो इन्हें अन्य किसी मौके पर भी बना सकते हैं। इन्हें बनाने के लिए आपको तिल, गुड़, केसर और फुल क्रीम दूध की जरूरत होती है।

चार लोगों के लिए : मध्यम आकार : तिल के लड्डू की सामग्री :- एक कप सफेद तिल

आधा कप खोया

आधा कप गुड़

एक चुटकी केसर

दो बड़ा चम्मच फुल क्रीम दूध

तिल के लड्डू बनाने की वि​धि

एक पैन लें उसमें थोड़ा घी डालें फिर इसमें तिल डालें।इसे लगातर चलाते रहे जब तक तिल हल्के गोल्डन ब्राउन न हो जाएं। पैन को आंच से हटा लें और भूने हुए तिल को एक प्लेट में निकाल लें।

केसर को गर्म दूध में भिगों दें। जिस पैन में तिल भूनें थे उसमें गुड़ को डालकर पिघला लें इसे लगातर तब तक चलाते रहे जब तक वह आधा न रह जाए। इसे आंच से हटा लें।

इसके सख्त होने से पहले इसमें केसर वाला दूध डालें और मिलाएं। फिर इसमें मुलायम खोया और तिल डालकर चम्मच की मदद से अच्छी तरह मिला लें।

अब अपने हाथ में थोड़ा सा घी/पानी लगाएं और तैयार किए गए मिश्रण से मध्यम आकार के लडूड बनाएं।इसे सर्व करें और घर पर होने वाली पार्टी के दौरान आप इसे स्वीट स्नैक के रूप में भी सर्व कर सकते हैं।

आप चाहें तो इसमें सूखे मेवा जैसे बादाम काजू और अखरोट पिस्ता भी डाल सकते हैं। लेकिन इन्हें हल्का भून लें और बारीक करके मिश्रण में डालें। इसके बाद आप लड्डू बना सकते हैं।

चूड़ा का लड्डू (बिहारी लाई) बनाने में ठंढ के मौसम में भी पसीना छूट जाता है। पड़ोसन चाची रात में सभी के सो जाने के बाद में बनाती थीं। देर रात बाहर से किसी के आने की उम्मीद भी नहीं रहती थी। उनका कहना था कि “नज़र लग जाने पर बिखरता है। उनका मानें तो नज़र लगाने से गुँथें रिश्ते भी बिखर जाते हैं…! सबसे आसान है तिल का लड्डू बनाना! टूटता-फूटता नहीं है…! वैसे भी टूटना-फूटना तो विश्वास और मन का होता है! ना जाने किस पदार्थ से गढ़ा गया तथा कच्चा-पक्का पकाया गया…! उस ज़माने की बात है मॉल संस्कृति अपना पैर अंगद सा जमायी नहीं थी! लड़कियाँ चौके में समय बिता लिया करती थीं। उनमें यह स्पर्द्धा करने का साहस नहीं था कि मैं भी बाहर से आयी हूँ, मैं ही चौके में क्यों जाऊँ! मेरी ननद को भी पाक-कला में निपुण होने का शौक़ था। नया व्यंजन आज़माती रहती थीं। उन्हें अपनी सहेली के घर से गोंद का लड्डू चखने का मौक़ा मिल गया था। 

गोंद! माना जाता है कि इसमें औषधीय गुण होते हैं।गोंद हिन्दी में ‘खाद्य गोंद’ के लिए इस्तेमाल किया जाने वाला शब्द है, जो एक पौधे का गोंद है जो विभिन्न पेड़ों के रस से प्राप्त होता है। एशियाई खाद्य पदार्थों में इस्तेमाल होने वाले सबसे आम खाद्य गोंद बबूल गोंद (अरबी गोंद) और ट्रैगैकैंथ गोंद हैं। इन दोनों के गुण और पोषक तत्व अलग-अलग होते हैं, इसलिए ये व्यंजनों में और यहाँ तक ​​कि सेवन के बाद शरीर पर भी अलग-अलग तरीके से काम करते हैं। बबूल का कीकर इस पेड़ का हिन्दी नाम है।गोंद के लड्डू बनाने में बबूल/कीकर के पेड़ का सूखा हुआ रस इस्तेमाल किया जाता है। इसका इस्तेमाल गोंद पंजीरी बनाने में भी किया जाता है। ऐसा माना जाता है कि बबूल का गोंद शरीर को गर्म रखता है, इसलिए इसका प्रयोग सर्दियों के दौरान व्यापक रूप से किया जाता है तथा गर्मियों के दौरान इसका प्रयोग नहीं किया जाता, क्योंकि इसकी प्रकृति गर्म होती है। दूसरे प्रकार का खाद्य गोंद है ट्रागाकैंथ गोंद। इसे भारतीय भाषा में ‘गोंद कतीरा’ या ‘बादाम पिसिन’ के नाम से जाना जाता है। यह मूल रूप से बेस्वाद होता है और पानी में डालने पर फूल जाता है और जेली की तरह नरम हो जाता है। गोंद कतीरा का व्यावसायिक रूप से खाद्य पदार्थों को गाढ़ा करने, स्थिर करने और पायसीकारी बनाने के लिए उपयोग किया जाता है। इसे जिगरथंडा, फालूदा जैसे पेय पदार्थों और यहाँ तक ​​कि शेक, स्मूदी और शर्बत में भी मिलाया जाता है। ट्रागाकैंथ गम की प्रकृति बेहद ठंडी होती है और इसे गर्मियों के दौरान इस्तेमाल करना फायदेमंद माना जाता है।

मेरी ननद में अब उतावलापन था ख़ुद से गोंद का लड्डू बनाकर निपुणता हासिल करने का। सहेली को सिखलाने के लिए कहा गया तो पता चला उनकी माँ बनाती हैं। उनसे सामग्री लिखवाकर ला दी :- 

(कप = 240 मिलीलीटर)

▢1¼ कप गेहूं का आटा

▢¾ से 1 कप गुड़ पाउडर (मैंने ¾ का इस्तेमाल किया) या पाउडर चीनी

▢½ कप घी (गोंद के लिए 5 बड़े चम्मच + आटे के लिए 3 बड़े चम्मच) (आवश्यकतानुसार अधिक)

▢⅓ कप गोंद लगभग 65 ग्राम खाने योग्य गोंद/अंटू

▢2 बड़े चम्मच सूखा नारियल (खोपरा - वैकल्पिक)

▢¼ कप बादाम और काजू (कटे हुए या मिक्सर ग्राइंडर में पिसे हुए)

▢1 बड़ा चम्मच चिरौंजी (वैकल्पिक या सफेद खसखस)

▢¼ से ½ चम्मच इलायची पाउडर या इलायची

गोंद के लड्डू स्वादिष्ट, पौष्टिक और समृद्ध पारंपरिक मीठे गोले हैं जो खाने योग्य गोंद, गुड़, पूरे गेहूं के आटे, मेवे, बीज और घी से बनाए जाते हैं। ये पारंपरिक मेवेदार गोंद के लड्डू स्वाद से भरपूर होते हैं, इनकी बनावट बहुत अच्छी होती है और माना जाता है कि ये तुरंत ऊर्जा बढ़ाते हैं। प्रतिरक्षा बढ़ाने और शरीर को गर्म रखने वाले गुणों के लिए प्रसिद्ध, ये गोंद के लड्डू और पिन्नी पारंपरिक रूप से भारत में सर्दियों के दौरान बनाए और खाए जाते हैं।

गोंद के लड्डू बनाने की सारी सामग्री तो तुरन्त ख़रीद कर बाज़ार से आ गयी। सहेली के द्वारा उनकी माँ तक सूचना भेज दी गयी। उनकी माँ हमारे घर पर ही आकर महाविद्यालय के किसी छुट्टी वाले दिन बताने और बनवाने की सहमति भी भेजवा दीं। किसी रविवार को भी आ सकती थीं लेकिन वो लोग मारवाड़ी थीं और रविवार उन लोगों के लिए ज़्यादा व्यस्तता वाला दिन होता था। जिस दिन ननद की सहेली की माँ गोंद का लड्डू बताने-बनवाने हमारे घर पधारीं उस दिन मेरी ननद और सास घर में अनुपस्थित थीं। मेरे सामने दुविधा थी कि मैं क्या करूँ? सीखना तो ननद को था। सहेली की माँ के सामने मुझे जाना भी है कि नहीं! आज का ज़माना होता तो मोबाइल खटखटा दिया जाता। आज कितनी आसान ज़िन्दगी है! ख़ैर! घूँघट हटा ली उन्हें सादर चरण-स्पर्श कर बैठने के लिए कहा और उनके ज़िद पर कि उनके अगली बार आने तक गोंद ख़राब ना हो जाये तथा ननद सीखे भी तो बनाना भाभी को ही होगा सदा। बनाने की विधि शुरू हुई

नट्स तलें

1. एक भारी तले वाले पैन में। बड़ा चम्मच घी गरम करें। इस काम के लिए नॉन-स्टिक पैन का इस्तेमाल न करें क्योंकि मेवे और गोंद आसानी से पैन को खरोंच सकते हैं।

2. गरम घी में ¼ कप कटे हुए बादाम और काजू डालें। उन्हें हल्का सुनहरा होने तक तलें। वैकल्पिक रूप से आप तलने से पहले नट्स को ग्राइंडर में पीस सकते हैं या पूरे नट्स को तलकर ठंडा कर लें और ब्लेंडर में दरदरा पीस लें। ये सभी तरी

3. जब मेवे हल्के सुनहरे हो जाएं, तो 2 बड़े चम्मच सूखा नारियल (वैकल्पिक) डालें और हल्का सा भूनें। आप और भी डाल सकते हैं या इसे छोड़ भी सकते हैं। सूखा नारियल कैल्शियम का एक समृद्ध स्रोत है। ताज़ा नारियल का उपयोग न करें क्योंकि इससे शेल्फ़ लाइफ़ कम हो जाती है। खुशबू आने तक एक मिनट तक भूनें।

यदि आप भोजन के शौकीन हैं और भारतीय भोजन के प्रति नए हैं, तो मुझे यकीन है कि आप गोंद के बारे में अधिक जानने के लिए उत्सुक होंगे।

गोंद क्या है?


गोंद एक प्रकार का पौधा है जो खाने योग्य गोंद है, जिसका पारंपरिक भारतीय भोजन में उपयोग किया जाता है, क्योंकि ऐसा माना जाता है कि इसमें औषधीय गुण होते हैं।


गोंद हिंदी में ‘खाद्य गोंद’ के लिए इस्तेमाल किया जाने वाला शब्द है, जो एक पौधे का गोंद है जो विभिन्न पेड़ों के रस से प्राप्त होता है। एशियाई खाद्य पदार्थों में इस्तेमाल होने वाले 2 सबसे आम खाद्य गोंद बबूल गोंद (अरबी गोंद) और ट्रैगैकैंथ गोंद हैं।

गोंद के लड्डू बनाने में बबूल/कीकर के पेड़ का सूखा हुआ रस इस्तेमाल किया जाता है। इसका इस्तेमाल गोंद पंजीरी बनाने में भी किया जाता है।

गोंद के लड्डू का मतलब है खाने योग्य गोंद की मीठी गेंदें। इन लड्डू को बनाने के कई तरीके हैं। गोंद के लड्डू मूल रूप से उत्तर भारतीय संस्करण हैं और इन्हें ज़्यादातर गेहूं के आटे, गोंद, चीनी, सूखे अदरक, मेवे और घी से बनाया जाता है।

इसका एक अन्य प्रकार कर्नाटक के व्यंजन अंतिना उंडे है, जिसमें आटे का उपयोग नहीं किया जाता, बल्कि इसकी जगह बड़ी मात्रा में सूखे नारियल (खोपरा) का उपयोग किया जाता है।

डिंक लड्डू के नाम से जाना जाने वाला एक प्रकार का लड्डू महाराष्ट्रीयन भोजन में बनाया जाता है और इसमें सूखे खजूर (खारिक/खजूर पाउडर) मिलाया जाता है।

गोंद के लड्डू अक्सर प्रसव पीड़ा से उबरने वाली महिलाओं को दिए जाते हैं। हालाँकि गोंद के लड्डू सभी आयु वर्ग के लोगों के लिए अच्छे होते हैं, जिनमें बच्चे और शिशु भी शामिल हैं। गोंद के लड्डू आयरन, प्रोटीन और कैल्शियम से भरपूर होते हैं।

कहा जाता है कि कई सप्ताह तक गोंद के लड्डू का नियमित सेवन करने से हड्डियाँ मजबूत होती हैं, प्रतिरक्षा और पाचन में सुधार होता है, जिससे पूरे शरीर में स्फूर्ति आती है।

गेहूं का आटा, गोंद और मेवे शरीर को गर्म रखने वाले तत्व हैं। इसलिए ये गठिया के कारण होने वाले जोड़ों के दर्द से राहत दिला सकते हैं और न केवल बच्चों में बल्कि बड़ों में भी मौसमी सर्दी से बचाव कर सकते हैं।

आप इन लड्डुओं में खसखस, खजूर, सूखे छुहारे, तिल, मखाना आदि डालकर कई प्रकार के बदलाव कर सकते हैं।

इस कथा में मैंने केवल उन सामग्रियों का इस्तेमाल किया है जो बुनियादी हैं और जिन्हें महिलाएं प्रसव के बाद खा सकती हैं। बहुत से लोग इसमें सूखी पिसी हुई अदरक (सौंत) और सौंफ के बीज जैसी सामग्री भी मिलाते हैं।

गोंद के लड्डू कैसे बनाएं 

1. एक भारी तले वाले पैन में 1 बड़ा चम्मच घी गरम करें। इस काम के लिए नॉन-स्टिक पैन का इस्तेमाल न करें क्योंकि मेवे और गोंद आसानी से पैन को खरोंच सकते हैं।

2. गरम घी में ¼ कप कटे हुए बादाम और काजू डालें। उन्हें हल्का सुनहरा होने तक तलें। वैकल्पिक रूप से आप तलने से पहले नट्स को ग्राइंडर में पीस सकते हैं या पूरे नट्स को तलकर ठंडा कर लें और ब्लेंडर में दरदरा पीस लें। ये सभी तरीके कारगर हैं, जो आपके लिए आसान हो, वही करें।

3. जब मेवे हल्के सुनहरे हो जाएं, तो 2 बड़े चम्मच सूखा नारियल (वैकल्पिक) डालें और हल्का सा भूनें। आप और भी डाल सकते हैं या इसे छोड़ भी सकते हैं। सूखा नारियल कैल्शियम का एक समृद्ध स्रोत है। ताज़ा नारियल का उपयोग न करें क्योंकि इससे शेल्फ़ लाइफ़ कम हो जाती है। खुशबू आने तक एक मिनट तक भूनें।

5. इन सभी को एक प्लेट में निकाल लें। अगर आप खसखस ​​का इस्तेमाल कर रहे हैं तो उन्हें भी डाल दें और सुनहरा और कुरकुरा होने तक तल लें।

तलें गोंद

6. गोंद को एक प्लेट में डालें और अगर वह साफ न हो तो उसे साफ कर लें। आपको गोंद में छाल या पत्थर के छोटे-छोटे टुकड़े चिपके हुए मिल सकते हैं, बस उन्हें हटा दें।

7. गोंद तलने के लिए एक पैन में ¼ कप घी डालें। अगर अच्छी मात्रा में घी डाला जाए और मध्यम तेज़ आंच पर अच्छी तरह से तला जाए तो गोंद अच्छे से फूलेगा। बिना फूला हुआ गोंद पेट की समस्या पैदा कर सकता है और खाते समय दांतों से चिपक सकता है।

8. जब घी गरम हो जाए तो उसमें 1 छोटा टुकड़ा गोंद डालकर चेक करें कि वह ठीक से गरम हुआ है या नहीं। उसे अच्छे से फूलना चाहिए। फिर उसमें 1/3 कप (65 ग्राम) गोंद डालें। गोंद को घी में पूरी तरह से डूबा होना चाहिए, नहीं तो वह फूलेगा नहीं। बहुत ज़्यादा गरम घी में तलने से उसका स्वाद कड़वा हो सकता है।

9. इसे तब तक चलाते रहें जब तक कि यह अच्छी तरह से फूल न जाए। सारा घी गोंद में समा जाएगा।

गोंद सारा घी सोख लेगा। इसे कप के तले से अच्छी तरह से पीस लें या मिक्सर ग्राइंडर में पीस लें या बेलन का इस्तेमाल करें। मैं ग्राइंडर में पीसना ज़्यादा पसंद करता हूँ।

आटा तलें

11. अगर आपको लगता है कि आपका गोंद बहुत साफ नहीं है, तो पैन को टिशू से साफ करें। आपको पैन में छाल के छोटे-छोटे टुकड़े जैसे कुछ गंदे कण मिल सकते हैं। 3 बड़े चम्मच और घी डालें और गर्म करें। 1¼ कप आटा/गेहूं का आटा डालें।

12. मध्यम से धीमी आंच पर तब तक भूनें जब तक कि यह गहरा सुनहरा और खुशबूदार न हो जाए। आटे में कोई कच्चा स्वाद नहीं होना चाहिए। चखकर देखें कि यह कच्चा नहीं है और इसका स्वाद कड़वा भी नहीं है।

13. स्टोव बंद कर दें। आप इसमें पिसा हुआ गोंद भी डाल सकते हैं या फिर इसे मिक्सर में पीस सकते हैं। मैंने इसमें कुछ मेवे भी मिलाए क्योंकि मेरे बच्चों को पिसा हुआ गोंद पसंद नहीं है।

गोंद के लड्डू बनाएं

14. पैन को स्टोव से उतार लें। इसमें तले हुए मेवे, ¼ चम्मच इलायची पाउडर और पिसी हुई गोंद डालें। सभी चीजों को अच्छे से मिला लें।

15. ¾ से 1 कप पिसा हुआ गुड़ या पिसी चीनी डालें। अगर कद्दूकस किया हुआ गुड़ इस्तेमाल कर रहे हैं, तो उसे बारीक़ कद्दूकस करें। ¾ कप से शुरू करें।

16. गोंद में मौजूद घी को बाकी मिश्रण के साथ अच्छी तरह मिलाने के लिए अपने हाथ या स्पैटुला से अच्छी तरह मिलाएँ। स्वाद के लिए थोड़ा गुड़ पाउडर या इलायची मिलाएँ।

17. इस अवस्था में सुनिश्चित करें कि आपका मिश्रण हल्का गरम हो। इस मिश्रण के छोटे-छोटे हिस्से अपने हाथ में लें और मिश्रण को मुट्ठी में दबाते हुए बॉल्स बनाएं। अगर आपको उन्हें बांधने में परेशानी हो रही है तो ज़रूरत पड़ने पर थोड़ा गरम घी डालें। मैंने कोई अतिरिक्त घी नहीं डाला।

गोंद के लड्डू को एयर टाइट जार में भरकर रख लें और एक महीने में इस्तेमाल कर लें। सर्दियों/ठंडे तापमान में घी जमने के कारण इनका थोड़ा सख्त हो जाना सामान्य बात है। इन्हें कुकर या स्टीमर में भाप में पका लें। लड्डू को एक छोटे कंटेनर में रखें और ढक्कन से बंद कर दें ताकि पानी कटोरे में न जाए। इस कटोरे को कुकर या स्टीमर में रैक/ट्राईवेट पर रखें। लड्डू के गर्म होने तक भाप में पकाएँ।

ननद की सहेली की माँ मुझे तो गुणवती बनाकर चली गयीं! मैं सपने संजोने लगी जब मायके जाऊँगी तो अपनों को कैसे-कैसे बताऊँगी! अनजान थी ननद-सास के वापस आने के बाद के परिणाम से। ननद के मन के लड्डू की हत्यारी मैं-

किस-दर्जा दिलशिकन थे मुहब्बत के हादिसे 

हम जिंदगी में फिर कोई अरमां न कर सके।-साहिर

Thursday 20 June 2024

धोखा : चोखा : नज़रिए का फेर

“आस्तीन का साँप कह देना कुछ ज़रूरत से ज़्यादा नहीं हो गया?”

“कार्यक्रम के दो दिन पहले बीस दिन के मेहनत पर पानी फिर जाता है…! संदेश आता है बहुत बीमार हैं। अस्पताल में हैं। दवा पानी चढ़ रहा है।अपने सहयोग के लिए दूसरे को तैयार कर लीजिए! ठीक कार्यक्रम के दूसरे दिन अन्य दूसरे कार्यक्रम में शामिल की तस्वीरों से जलाने का प्रयास किया जाता है। तस्वीरों को देखकर लगता ही नहीं कि यही व्यक्ति दो दिन पहले अस्पताल में भर्ती होगा। जितना संसाधन (प्राकृतिक और सांस्कृतिक) उपलब्ध है और बूते से बाहर अत्यधिक समय, श्रम, साधना लगाकर कोई योजना बनाया जाता है उसको नेस्तनाबूत कर देने का प्रयास कर लेना, हालाँकि मेरे रहते ऐसा कर पाना असंभव नहीं तो कठिन तो है ही।”

“नेस्तनाबूत कैसे कोई करेगा? आप कहती हैं मन संचालक को समय नहीं खाने को! ऐसा मंच संचालन तो आकस्मिक भी किसी पर आए तो कोई भी कर लेगा!”

“अत्यधिक खाने के लिए मना करते हैं, भूखे रहने के लिए तो थोड़े न कहते हैं, ह न त! काव्य-पाठ, मुशायरा में मंच संचालक प्रतिभागी को बुलाने के पहले चार पंक्ति और पाठ का बाद विदा करने में चार पंक्ति, कुछ अपनी, कुछ भानुमति के पिटारे से यानी आयोजन सत्र का आधा नहीं तो दो तिहाई समय अपने को प्रदर्शित करने में खाते रहते हैं-खाते-खाते मंच पर छाये रहने का प्रयास करते हैं…! लेकिन किसी परिसंवाद, परिचर्चा, पुस्तक पर चर्चा में समय खाने के लिए मंच संचालक को विषय का ज्ञाता, पुस्तक पढ़ा होना होगा जो आकस्मिक नहीं किया जा सकता।”

“स्वास्थ्यप्रद है अधिक ग़म खाना -कम खाना खाना। लेकिन फिर भी…, हो सकता है वो किसी अन्य के बहकावे में हो?”

“अच्छा! दूध पीता बच्चा है! फिर भी क्या! इसी से न कहे आस्तीन का साँप—नियत समझने में देरी कैसी! बिना प्रमाण कुछ नहीं कहा जाता।”

“हाँ! एक-दो बार ऐसा हो तो शक नहीं होता है। अनेक बार हो जाता है तो शक कर लेना स्वाभाविक है।”

“ऐसे धोखा करने वाले का कीमा बना देने का जी करता है। कूट-कूट कर बुकनी बना दिया जाये। भूसा भरके किसी कोने में खड़ा कर दिया जाये, बतौर उदाहरण!”

“कीमा कि चोखा? चोखा खा के धोखा मत करिह कहा जाता है! बिहारी चोखा बनाने में माहिर भी होते हैं। खिचड़ी के संग चोखा, लिट्टी के संग चोखा।”

“बिहारियों का क्या हुनर चोखा बनाने में। आलू उबाल लो टमाटर, बैंगन भून लो। जी भर मसल-मसल कर उसमें कच्चा प्याज, हरी मिर्च-लहसुन (बैंगन के पेट में घुसाकर पकाया सोंधा-सोंधा स्वाद लगता है) थोड़ा सा सरसों का तेल स्वादानुसार नमक मिला लो।”

“छौंक-बघार कर सभी चीज को भून-भानकर भी तो चोखा बनाया जाता है।”

“बिलकुल! लेकिन जो जीभ को रुचता है वह पेट को नहीं जँचता है। रूचना, पचना, जुड़ना-एक साथ नहीं होता है! जानते हो मेरे एक परिचित हैं। बैंगन की सब्ज़ी को चलाये छोलनी से अगर चावल या अन्य दूसरी सब्जी चला दिया जाये तो वे उस चावल या अन्य दूसरी सब्जी नहीं खा सकते हैं…! बैंगन की सब्जी तो नहीं ही खाते हैं। किसी भी सब्जी में टमाटर पड़ जाये तो सब्जी नहीं खाते हैं। आज के दौर में किसी होटल की किसी तरह की सब्जी उनके घर के लोगों का साथ नहीं दे सकते हैं। शायद स्वाद अच्छे नहीं लगते हों या स्वास्थ्य के दृष्टिकोण से…! लेकिन-लेकिन सिर्फ बैंगन का चोखा, बैंगन-आलू-टमाटर का मिश्रित चोखा, टमाटर की मीठी चटनी बड़े शौक़ से चाट-चाट /चाट-पोंछकर खाते हैं…! 

गुड़ खाए गुलगुले से परहेज करें!

गुलगुले की सामग्री

2 1/2 कप आटा

1 1/4 कप गुड़1”

1 बड़ा चम्मच सौंफ

3 बड़ा चम्मच घी 

स्वादानुसार नमक

आधा छोटा चम्मच बेकिंग सोडा

तलने के लिए घी

गुलगुले बनाने की वि​धि

1.गर्म पानी में गुड़ डाले और उसे पूरी तरह घुल तक हिलाएं।

2.एक दूसरे बाउल में आटा, घी, नमक और बेकिंग पाउडर डालें।

3.तैयार किए गए मिश्रण में अब गुड़ वाला पानी डालें और एक बैटर तैयार कर लें।4.इसमें सौंफ डालें।

5.एक पैन में तेल गर्म करें और एक बड़े चम्मच से बराबर मात्रा में बैटर डालें, आंच को तेज रखें।

6.आंच को धीमा कर दें और गुलगुले को मीडियम आंच पर पकाएं।

7.छलनी वाले चम्मच से जले हुए टुकड़े निकाल लें।

8.फिर से आंच तेज करें और इसमें बैटर डालें इससे सभी गुलगले एक-दूसरे चिपकेंगे नहीं।

9.आंच धीमी करें और पकाएं, गुलगुलों को एक-दो बार पलटें ताकि वे ब्राउन हो जाए।

10.बचें हुए बैटर से इसी तरह गुलगुले बना लें।“

“इसे क्या कहेंगी? विरोध में कशीदे कढ़े जाते हैं। लम्बे-लम्बे लेख लिखे जाते हैं और ऐसा क्या मिलने वाला होता है कि विरोध का स्वर फेंके गये आकर्षक दाने चुगने लगता है?”

“खुलकर स्पष्ट कहो तो बात समझकर उचित उत्तर देने का प्रयास कर सकूँ!”

“बाबा गुरु लघुकथा दिवस सितम्बर में मनाने की बात करते थे और उनके सामने उनके कहे को मानने वाले जून में ही अलग राग में शामिल हो जा रहे हैं?”

“चलो! छल-धोखा-चोखा पर पहले ही बहुत बात हो चुकी है आगे मटन-करी पर बात करते हैं!

चंपारण मटन करी की सामग्री

 एक किलो मीट

पौन किलो प्याज,

कटा हुआ2 लहसुन

छ बड़ा चम्मच अदरक-लहसुन का पेस्ट

एक बड़ा चम्मच धनिया पाउडर

एक बड़ा चम्मच हल्दी पाउडर

दो बड़ा चम्मच देगी मिर्च

दो बड़ा चम्मच कश्मीरी मिर्च

दो बड़ा चम्मच नींबू का रस150 gms दही

आधा कप सरसों का तेल

एक छोटा चम्मच सौंफ पाउडर

एक छोटा चम्मच गरम मसाला पाउडर10 लौंग8 काली मिर्च2 इंच की दालचीनी छड़ें1 तेज पत्ता4 छोटा चम्मच जीरा1 छोटा चम्मच जीरा पाउडर, साना हुआ गेहूँ का आटा (बर्तन को सील करने के लिए) स्वादानुसार नमक

चंपारण मटन करी बनाने की वि​धि

1.तीन या चौथाई कप सरसों के तेल और बाकी बची सामग्री के साथ मिलाएं मटन को मैरिनेट करें. इसे 20 मिनट के लिए एक तरफ रख दें।

2.एक बड़े मिट्टी के बर्तन या एक भारी तली वाला सॉस पैन लें, बचा हुआ तेल और मैरीनेट किया हुआ मटन डालें। ढक्कन रखें, और किनारों को आटे से सील करें।

3.धीमी आंच पर पकाएं। फिर धीरे-धीरे आंच को मध्यम तक बढ़ाएं और मटन को 45-50 मिनट तक पकने दें।

4.सील को 45 मिनट के बाद बाहर निकालें, देखें कि तेल ऊपर आ गया है या नहीं।

5.धनिया पत्ती से गार्निश करें और गर्मागर्म सर्व करें।

और कम्बल ओढ़ के घी पीने वालों को उनके हाल पर छोड़ देते हैं…!”

“लगे हाथ बिहार में बनने वाले ‘मीट का ताश’ को बनाने की भी सामग्री और विधा बता देतीं।”

“ज़िन्दगी बस आज भर नहीं न है!”

Monday 17 June 2024

भरवा करेला

 करैला ज़्यादा कडुवा या स्त्रियों पर लगी पाबन्दी

कारण पर इल्ज़ाम लगाया जाता है कुंदन को बेकार ही तपाया जाता है परेशानी का कोई आकार नहीं होता.. यानी परेशानी छोटी/बड़ी/मंझली/सझली नहीं होती। परेशानी सिर्फ और सिर्फ परेशानी होती है! 

भतीजे के बारात में भतीजी को नाचते (डान्स करते) देख ; मैं सोच रही थी, समय कितना बदल गया या भैया कितने बदल गए…! मेरी शादी के पहले मेरी कोई सहेली ; हमारे घर मिलने आ जाती थी तो मैं उसके जाते समय, दरवाजे तक छोड़ने नहीं जा पाती थी क्योंकि भैया की नजरें टेढ़ी हो जाती थी….। अभी कुछ साल पहले तक उनका किसी लड़की/औरत का बरात में जाना पसन्द नहीं था क्यों कि लड़की वालों ने अगर इंतजाम बढ़िया नहीं किया हो तो फजीहत हो जायेगी…। बरात में हुड़दंग होता ही है।

 एक तो रूढ़िवादिता का युग और दूसरे भैया की सोच : एक तो करेला दूजे नीम चढ़ा : करेला से याद आया, जब मेरी माँ-पापा की शादी हुई थी तो माँ को करेला बिलकुल ही पसन्द नहीं था और मेरे पापा को करेला बेहद पसन्द था। मेरी माँ का करेला खाना शुरू करना स्त्री विमर्श का मुद्दा हो सकता था? काश! हम तब स्त्री विमर्श समझने का मादा रखते। मेरा बेटा जब छोटा था तब उसे भी करेला खाना पसंद नहीं था। अरे! उसे तो भिंडी छोड़कर कुछ भी खाना पसंद नहीं था! संयुक्त परिवार था, मीठी से ज़्यादा कड़वी बातें पचानी पड़ती थी! मेरा बेटा थोड़ा बड़ा हुआ तो भरवा करेला खाने लगा…

 सामग्री : मध्यम आकार का गोल-मटोल (गुलाबी शिशु सा जिसे चिकुटी काटने को जी चाहे) करेला -४ बड़ा प्याज -२ बारीक छोटे-छोटे काटा हुआ लहसुन अदरक पीसा हुआ -२ छोटे चम्मच धनिया, काली मिर्च, जीरा बारीक पीसा हुआ -दो छोटा चम्मच हल्दी पाउडर -एक चौथाई छोटी चम्मच धनियाँ पाउडर -एकछोटी चम्मच सोंफ पाउडर — 2 छोटी चम्मच अमचूर पाउडर — 1 छोटी चम्मच (लाल मिर्च पाउडर -आधा छोटी चम्मच या हरी मिर्च एक-दो -स्वादानुसार : मेरे घर में तीखा स्वाद में नहीं पसन्द तो मैं प्रयोग नहीं करती हूँ!) नमक -स्वादानुसार तलने-भूनने के लिए सरसों का तेल

करेलों को अच्छी तरह धो लीजिये। चाकू की सहायता से हल्का खुरच कर छील लीजिये तब करेले में कुछ ज़्यादा मात्रा में नमक डालकर आधा घण्टे के लिये रख दीजिये। आधा घण्टे के बाद पुनः करेले को अच्छे से धोकर उबाल लेना है। थोड़ा ठंढा होने पर करेले को एक तरफ से काटें लेकिन उसका दूसरा साइड जुड़ा रहे। अब चाकू की सहायता से करेले के अन्दर से बीज और गूदा प्लेट में निकाल लें। बीज को हटा देना है (करेले का बीज हो, नीबू का बीज हो पेट के लिए हानिकारक होता है) गूदा को भूनते मसाले में मिला लेना है।

 तेज गरम कढ़ाई में तलने लायक तेल डाल कर गरम करिये और उसने बीज-गूदा निकाला करेला तलकर निकाल लेना है।बचे गरम तेल में हींग (मुझे नहीं पचता) और जीरा डालिये, जीरा भुनने के बाद ,हल्दी पाउडर, धनियाँ पाउडर सोंफ पाउडर इत्यादि संग सभी सामग्री डालिये. 2 - 3 बार चमचे से चलाकर भूनिये, इस मसाले में करेले से निकला हुआ गूदा, अमचूर पाउडर (चाहें तो अमचूर के बदले नींबू का रस प्रयोग किया जा सकता है। मुझे खटापन से परहेज़ है तो मैं नीबू का भी प्रयोग कम करती हूँ) नमक डाल दीजिये। मसाले को चमचे से चलाकर 6-7 मिनिट तक भूनिये। यह भुना हुआ मसाला करेलों में भरने के लिये तैयार है। तले करेले में भरिए और ख़ुद स्वाद लीजिए पहले : अचानक की परिस्थिति में ना मिले तो : खिलखिलाकर रहिए! —चूँकि कुछ तलने के लिए एक बार तेल को गरम कर लिया जाये तो उसे पुनः दोबारा अन्य कुछ तलने के लिए के प्रयोग करना वर्जित है स्वास्थ्य के लिए हानिकारक हो जाता है। यूँ भी करेला तले वाले तेल में दोबारा करेला भी नहीं तला जा सकता है। 

सन् 1980 की बात है : बात का रुख़ नहीं बदलने के लिए मुख्य कहानी…

हमारे घर में दूध देने वाले की बेटी की शादी थी। भाभी का मन था जब बरात लगेगा तो हम दूल्हे को देख आयेंगे । पड़ोस की चाची, उनकी बेटी कुमुद, मैं और भाभी दिनभर तैयारी में समय गुजारे। शाम में तैयार होने जा ही रहे थे कि भैया आ गए ; भैया अकेले नौकरी पर रक्सौल रहते थे , माँ की मृत्यु हो जाने से भाभी मेरे साथ पापा की नौकरी पर सीवान में रहती थीं। हमारी तैयारी दूल्हे को देखने की नष्ट होती नजर आई लेकिन मेरी भी जिद हो गई कि हम कोई गलत काम नहीं कर रहे हैं , हम दूल्हे को देखने जाएंगे ही तो जाएंगे। सही होने का एहसास विरोधी तो बना दिया लेकिन मुझे मुखर कौन बनाता। शाम में पड़ोस की चाची हमारे घर थर्मामीटर मांगने आईं कि कुमुद को बुख़ार हो गया है ; कुमुद को देखने के लिए मैं और भाभी चाची के घर गए। बारात से दूल्हे को देख कर लौटते समय जैसे मुड़े भैया सामने खड़े थे और हमारी योजना पकड़ी गई कि कुमुद को झूठा बुखार था क्यों कि कुमुद हमारे साथ थी ।हमें जो डांट पड़ी उसका बयान क्या करना…! लेकिन भैया को समय के साथ बदलते देख अच्छा लगा.. : सुखद! –बस! समय समझ-समझ का फेर होता है... कर्म, श्रम, शर्म पर आधारित! करेले अपने कड़वेपन के कारण कुछ लोगों को पसन्द नहीं आते, लेकिन भरवा करेले बहुत ही स्वादिष्ट होते हैं। मेरे बड़े भैया हमलोगों के लिये हमेशा हमारे पिता के समान रहे! समाज मजबूर करता रहा कि स्त्रियों पर पाबन्दी लगायी जाये।

Thursday 13 June 2024

खाजा — दूरदर्शिता

 6×1=6, 6×2=12, 6×4=24 / १२ : ०६ : २४ —एक दर्जन : आधा दर्जन : दो दर्जन


 “आप नहीं न मानीं! सभी के मना करने के बाद भी आप अपनी बात कह ही डालीं! क्या फ़ायदा हुआ? कोई कुछ भी पहने उससे आपको क्या? क्या वो आपकी बातों का मान रखीं?”
 “चलो ठीक है! कोई कुछ भी पहने! लेकिन वो कोई अपरिचित न…! वो कोई अपने परिचित में हो तो? दायित्व पहले टोक देने का होगा ही! परिणाम भुगतने के बाद अफ़सोस नहीं होता कि टोकना चाहिए था! वैसे भी वो टोकना ख़ुद के लिए था : मेरी माँ कहा करती थीं ‘भला संग रहिए : खहिये बीड़ा पान, बुरा संग रहिए : कटाहिये दुनू कान’ पिछली शाम पथप्रदर्शक/गाइड(guide) बताया था कि मन्दिर में जाने के लिए पोशाक सही होनी चाहिए। विदेशी धरती का मन्दिर था! ‘जैसा देश, वैसा वेश।’ कोई बात हो जाती तो क्या हम किनारा कर सकते थे! पहचानने से इंकार किया जा सकता था क्या…! दूसरों की उठती नज़रों के सामने ख़ुद की नज़रों को झुकानी क्यों…!” 
“मन्दिर जाना और धूप स्नान का अन्तर नहीं पता हो किसी को तो?”
  “कटी पतंग का हश्र तो पता होगा। कैसे अन्य राज्य के गाँव और गोवा में का भेद ना पता हो!” 
“ऐसे कुछ लोग दूसरों को टोपी पहनाने में माहिर होते हैं…”
“जवाहरलाल वाली टोपी न! टोपी की चर्चा क्या चली मुझे टोपी जैसी मिठाई की चाह जग गई” 
“मिठाई और टोपी का क्या सम्बन्ध?” 
“एक किवदंती के अनुसार तत्कालीन नालंदा विश्वविद्यालय के प्राचार्य शीलभद्र ने सिलाव को खाजा (दूकान में खाजा सुनते ही जी भर खा जाओ-खाते जाओ बिना रोकड़ा दिए) नगरी के रूप में विकसित किया था। इस स्थल पर ही भगवान बुद्ध, महापंडित राहुल सांस्कृत्यायन और प्राचार्य शीलभद्र की प्रथम भेंट हुई थी। उस समय शीलभद्र ने भगवान बुद्ध का स्वागत खाजा खिलाकर किया था। तब भगवान बुद्ध ने पुछा था यह क्या है ? इसके जबाव में शीलभद्र ने कहा था कि खा-जा, भगवान बुद्ध ने खाने के बाद काफी प्रशंसा की। उसी समय से इस मिठाई का नाम खाजा प्रचलित हो गया। देश के अलावे विदेशों में भी हुआ था खाजे का प्रदर्शन सिलाव मे बनाये गये खाजा का प्रदर्शन सबसे पहले वर्ष 1986 में अपना महोत्सव नई दिल्ली में हुआ था। कालीसाह के वंशज संजय कुमार को वर्ष 1987 मे मारीशस जाने का मौका मिला। मारीशस में आयोजित सांग महोत्सव में मिठाई में खाजा को सर्वश्रेष्ठ मिठाई का दर्जा मिला। 1990 में दूरदर्शन के लोकप्रिय सांस्कृतिक सीरियल सुरभि, वर्ष 2002 में अंतरराष्ट्रीय पर्यटन व व्यापार मेला नई दिल्ली के अलावे अन्य कई मौके पर खाजे ने धूम मचाई।
जिसको बनाने के लिए सामग्री :- 200 ग्राम मैदा, 100 ग्राम चीनी, 50 ग्राम पिसी हुई चीनी, 2 हरी इलायची आवश्यकतानुसार घी (मोयन के लिए) आवश्यकतानुसार घी तलने के लिए आवश्यकतानुसार पानी
 पकाने की विधि (कुकिंग निर्देश) 1 सबसे पहले मैदा में मोयन का घी इतना डालें कि मुठ्ठी बन जाए। फिर आवश्यकतानुसार गुनगुने पानी से गूंथ लें। 15 मिनट तक ढक कर रख दें।
2. 1 बड़े चम्मच मैदा में थोड़ा सा पिघला घी मिलाकर पतला सा घोल बना लें।
3. अब गूंथे हुए मैदा को एक बार अच्छे से मसलकर बड़ी सी एकदम पतली-लम्बी रोटी बनाकर मैदा का घोल पूरी रोटी पर फैला दें।
4. अब रोटी को मोड़ें (रोल/फोल्ड) करें और एक आकार के कट करें 
5. चीनी में 1/2 कप पानी और इलायची डालकर 7-8 मिनट उबाल लें। जब चिपचिपी चाशनी बन जाए तब गैस बन्द करें। 
6. अब तेल गरम करें। एक एक लोई को हल्का सा बेलें और मध्यम आंच पर सुनहरा तल लें।
7. अब कुछ खाजा चाशनी में लपेट-लपेट कर 2-3 मिनट बाद निकाल लें और कुछ पिसी हुई चीनी में लपेट कर निकाल लें।
8. बहुत ही स्वादिष्ट खाजा मिठाई तैयार है।
“आपकी इन्हीं अदाओं पर मर मिटने का जी करता है! आपसे मोह बढ़ता जाता है! सुनिए न मुझे आपसे और कुछ पूछना है…!”
“हाँ! हाँ! सुन रहे हैं! बिहार की एक परतदार, त्यौहारी मिठाई है सिलाव का खाजा! 
जिसकी सामग्री : 4 कप मैदा और अतिरिक्त आटा छिड़कने के लिए 
2 बड़े चम्मच घी और 2 बड़े चम्मच पिघला हुआ घी
 2 चम्मच इलायची पाउडर
 2 चम्मच काली मिर्च पाउडर
 1 चम्मच दालचीनी पाउडर (वैकल्पिक) 
तलने के लिए घी
 ठंडा पानी
चीनी चाशनी (सिरप) के लिए 2 कप चीनी
1 कप पानी
बनाने की विधि : आटा और पिघला हुआ घी डालें और अच्छी तरह मिलाएँ। चिकना लेकिन सख्त आटा गूंथने के लिए ठंडा पानी डालें। आटे को ढककर कम से कम 15 से 20 मिनिट के लिये रख दीजिये. आटे का पेस्ट बनाने के लिए 2 बड़े चम्मच घी और 2 बड़े चम्मच मैदा मिलाकर पेस्ट बना लीजिए. आटे को आठ बराबर भागों में बाँट लें।
एक गेंद लें और इसे एक आयताकार आकार की शीट में रोल करें। इसी तरह एक और बेल लें. - तैयार आटे के पेस्ट को एक शीट पर फैलाएं और उसके ऊपर दूसरी शीट रखें. दूसरी शीट के ऊपर आटे का पेस्ट फैलाएं और दोनों शीटों को एक साथ कसकर एक लट्ठे की तरह रोल करें। इस आटे की लोई को 1-1 इंच के बराबर आकार के टुकड़ों में काट लीजिये. प्रत्येक टुकड़े को लंबवत रोल करें। एक गहरे फ्राइंग पैन में पर्याप्त तेल गरम करें और उन्हें बैचों में मध्यम आंच पर दोनों तरफ से सुनहरा भूरा होने तक तलें। इन्हें पूरी तरह ठंडा कर लें. 
- इसी बीच एक सॉस पैन में 1 कप पानी में 2 कप चीनी डालकर चाशनी तैयार कर लें. उबाल आने दें और चिपचिपा होने तक पकाएं। - इसमें इलायची पाउडर, काली मिर्च और दालचीनी पाउडर मिलाएं. (मसालों का यह मिश्रण वैकल्पिक है।) एक बड़ी प्लेट में थोड़ा सा मक्खन या घी लगाकर चिकना कर लीजिये. तले हुए खाजा को गर्म होने पर ही तैयार चाशनी में डुबोएं और तुरंत एक चिकनी प्लेट में निकाल लें। तुरंत परोसें या ज़रूरत पड़ने तक किसी एयरटाइट डिब्बे में रखें!”
 “ठीक है! ठीक है! मिठाई बनेगी भी और एयरटाइट डिब्बे में रखी भी जायेगी आगे एक जिज्ञासा है मन में! उसका निदान करें! क्या आपको ऐसी पोशाक पहनने का मन नहीं करता है?”
“पहले का ज़माना था कि बदलते ऋतु-मौसम की तरह पोशाक बदलते थे। जैसे कि कुछ-कुछ दिनों-महीनों के लिए एक पोशाक अनारकली, बैलवॉटम, चूड़ीदार, खालता सलवार, स्लैक्स, सरारा-गरारा इत्यादि चलते थे। मैंने भी जलवा बिखेरे हैं! लेकिन तन उघाड़ू पोशाक कभी पसन्द नहीं आये!

Monday 3 June 2024

दूध पिट्ठी : कीमियागिरी


“तहरआ रफू करे आवेला काआ?” सास के पूछे जाने का जवाब चार दिन की आई बहू दे ही पाती कि उसके पहले

“अरे! अइसन काअ रफू करे के हो गइल?” ससुर की सीली आवाज निकली।
“मेरा पतलून! छोटा सा कट लग गया है।” बड़ा देवर भी आजमाइश करने की पंक्ति में अपनी माँ के संग खड़ा था।
“जी लाइए पतलून प्रयास करती हूँ रफ़ू कर देने की।” बहू के लिए परीक्षा की घड़ी, उसके घबराहट का पसीना रीढ़ पर, पिंडली में स्केटिंग कर रहा था।
“अरे वाह! बहुत ही सुन्दर। पता ही नहीं चल रहा है कि पतलून पर कट भी था। इतनी सुगढ़ता!” लेकिन ससुर जी की वाणी का असर सासु जी पर नहीं दिखलायी पड़ रहा था। वे एक साड़ी बहू को थमाते हुए बोलीं कि “एकेरा के सुधार त जानीं (इसे सुधार दो तो जानें!)” चुनौती इस कदर दीं कि बहू की हार सुनिश्चित!
“ई त ज़ुलूम बा! एकेरा त कोई महारथ भी ना सुधार सके!” अब ससुर जी तपना शुरू कर दिए थे।
“ईहे त इनकर परीक्षा के घड़ी बा! बड़ बहू के राउर पसंद पिट्ठी गढ़े में धीरज के ज़रूरत पड़ी नु?”
“रफ़ू और अउरी पिट्ठी के काअ कनेक्शन? ई हमरा त बुझाते नइखे!”
बहू के सास-ससुर दूध पीठी की बात कर रहे थे
इस मीठी, मलाईदार मिठाई का एक चम्मच आपको पुरानी यादों की गलियों में ले जाएगा, आपके लापरवाह बचपन के दिनों में। स्वतंत्रता-पूर्व काल में दूध पिठी एक लोकप्रिय मिठाई थी। माताओं के लिए अपने विस्तारित परिवारों को खिलाने के लिए बड़ी मात्रा में दूध आधारित व्यंजन पकाना आम बात थी, जहाँ अकेले बच्चे आसानी से पूरी फुटबॉल टीम पर भारी पड़ सकते थे।
समय के साथ, इलायची और बादाम जैसे स्वादों को शामिल करके इस व्यंजन में सुधार किया गया, लेकिन आज भी, इसका सार छोटे हाथ से बने आटे के गोले ही हैं, जिन्हें बाद में गाढ़े दूध /दूध के मिश्रण में पकाया जाता है। कुछ लोग कह सकते हैं कि दूध पीठी, दाल पीठा का एक मीठा संस्करण है, जो मॉरीशस का एक प्रसिद्ध मुख्य व्यंजन है, जहाँ आटे के आकार को काटा जाता है और दाल और मसालों की गाढ़ी ग्रेवी में भिगोया जाता है। दोनों इस नीरस सर्दी के मौसम में पुरानी यादों की एक चुटकी के साथ आरामदायक भोजन विकल्प प्रदान करते हैं। लेकिन बिहार की दूध पीठी में महीन गढ़ने की कुशलता शामिल है...
सामग्री :-

1 कप मैदा

5-6 बड़े चम्मच ठंडा पानी

(पसन्द होने पर : 1/4 कप साबूदाना)

1/3 कप कैस्टर शुगर

4 कप फुल क्रीम दूध

5 इलायची की फली

1/4 कप सूखा नारियल

2 बड़े चम्मच किशमिश, भीगी हुई

2 बड़े चम्मच बादाम के टुकड़े

1 चम्मच वेनिला अर्क

एक मिक्सिंग बाउल में आटा छान लें.. धीरे-धीरे ठंडा पानी मिलाएं और मुलायम गूँथना है।

आटे के मटर के आकार के हिस्से को चुटकी में लें और उन्हें उंगलियों के बीच रोल करके छोटी बारीक अंडाकार आकार की बना लें।

आकार को एक साथ चिपकने से रोकने के लिए हल्के आटे या ग्रीसप्रूफ सतह पर रखें।

एक बड़े सॉस पैन में, दूध को धीमी आंच पर तब तक उबालें जब तक कि यह अपनी मूल मात्रा के 2/3 तक कम न हो जाए।

गर्म तरल मिश्रण को फैलने से रोकने का ध्यान रखते हुए धीरे-धीरे आटे की गोलियां और साबूदाना (अगर पसंद हो) डालें।

किशमिश, बादाम के टुकड़े, सूखा नारियल और वेनिला अर्क डालने से पहले लगभग 15 मिनट तक धीमी आंच पर पकाएं।

मिश्रण के गाढ़ा होने तक 5 मिनट और पकाएं। चम्मच से कटोरे में डालें और ऊपर से अतिरिक्त नारियल डालें। अब आगे बढ़ाते हुए परोसना है।

“पीठी गढ़े अउरी रफ़ू इ दुनु के अपने आप में कवनों कनेक्शन नइखे! लेकिन दुनु काम में जवन धीरज चाहीं उ ई साड़ी सुधर जाए के बाद तय हो जाई!”
“ई ज़बरदस्ती के ही ज़िद बा तहार मालिकाइन!”
“चलीं राउवा ई बुझात बा त इहे सही!”
शादी में एक रस्म होती है इमली घोटाना लेकिन इमली का प्रयोग नहीं होता है। आम के पल्लव का प्रयोग होता है। उस रस्म में मामा माँ को साड़ी देते हैं। रस्म में मिली साड़ी को सासु जी ऐसी जगह रख देती हैं जहाँ चूहा का भोजन बन जाती है साड़ी। नयी साड़ी और भाई का मान। शुभ-अशुभ मानने की विवशता अलग से परेशान किए हुए। ना रखने योग्य रह गयी थी और ना फेकना बन रहा था सासु जी से। बहू को हराने का एक मौक़ा अलग से हाथ लग गया था! बिहार की सास भी महारथ हासिल किए होती हैं।
बहू के लिए ग़नीमत यह था कि पूरी साड़ी में एक लकीर में छेद मिला था। बहू आँचल के विपरीत हिस्से से साड़ी का टुकड़ा काट लेती है और सारे छेद पर बेहद खूबसूरत से पैच वर्क कर देती है।
तैयार साड़ी देखकर ससुर के चेहरे पर अपने जीत की ख़ुशी दिखलायी पड़ती है तो सास के चेहरे पर हार की रंगत देखने की उम्मीद भी नहीं थी, जो देखकर सीली आवाज़ तपी आवाज़ में बदल जाती है!
“जिओ बहुरिया जिओ! कइसन लागल हे मलकाइन! कइसन!”
“हम त ई जाँचत रहनी हा कि बहुरिया केतना रिश्ता रफ़ू कईके चले में निपुण बाड़ी! रउवा भी त इ कहावत सुनले होखेम “आवते बहुरिया जनमते लईकवा जवन लौ लगावे तवन लौ लागे!”
कालांतर में बहू दूध पीठी के लिये जीरे के समान आटे की पीठी गढ़ती है और दूध पीठी बनाती है तो सभी बेहद खुश होते हैं और सास भी खुले दिल से प्रशंसा करती है। इसी बढ़ते क्रम की ख़ुशी में एक दिन बहू कहती है “चलिए आप मेरी कुशलता ही जाँच रही थीं तो एक और मीठा व्यंजन बनाने का प्रयास करती हूँ! वो बनाती है:-
चावल की बुजबुजी
चावल के आटे का घोल (ना बहुत गाढ़ा और ना बहुत पतला)
चूल्हा के मध्यम आँच पर मिट्टी के गरम बर्तन में छोटी रोटी के आकार का पकाकर (एकतरफा सेंका जाता है रोटी में चलनी सा बड़ा-बड़ा छेद-छेद बन जाता है) 
 गाढ़े दूध में चीनी इलायची मिलाकर रखा रहता है, उसी में एक-एक कर डालते जाना है.. 
 रफ़ूगिरी से सारे रिश्ते निभाते-निभाते ननद की शादी तय हो जाती है! शादी का सारा खर्च बड़े बेटे पर डालकर पितृऋण उतारने का मौक़ा दिया जाता है… एक ही स्टेशन पर खड़ी रह जाने वाली गाड़ी जीवन नहीं होता है..।

Wednesday 29 May 2024

.. —वर्जनाएँ

भाँति-भाँति के सूरमा : भाँति-भाँति का खुरमा…
 बड़े और मझले दो भाईयों की शादी छः महीने के अंतराल पर हुई थी। बड़ी बहू को सजने-सँवरने का कोई शौक़ नहीं था। विद्यालय-महाविद्यालय में लिपस्टिक लगाकर जाने का चलन नहीं मिला था और घर में उसके पिता को नापसंद था बेटी-बहू का लिपस्टिक लगाना। लेकिन मझली बहू का साथ मिलने के कारण सजना शुरू की थी। बड़ी बहू छ महीने की पुरानी दुल्हन और मझली बहू दस-पंद्रह दिनों की दुल्हन। एक शाम पूरे परिवार को कहीं जाना था जिसमें दोनों बहुओं को घर पर ही रहना था। शाम के नाश्ते के लिए खुरमा बनाकर रखने का आदेश मिला। ०१. खुरमा बनाने की सामग्री :- 2 कप मैदा 2 चम्मच घी 250 ग्राम चीनी 1/2 नींबू का रस 1/2 चम्मच इलायची पाउडर 200 ग्राम तलने के लिए घी
पकाने का निर्देश :- 1 सबसे पहले एक बड़े बाउल में मैदा डालें और इसमें घी डालकर और अच्छी तरह हथेलियों के बीच में आटे को अच्छी तरह रगड़-रगड़ कर मिलाए.. इससे खुरमा खास्ता बनेगा… 2 फिर इसमें थोड़ा-थोड़ा करके पानी डाल कर मैदा को सान लें गुँथा मैदा न तो ज्यादा सख्त होना चाहिए और नहीं ज्यादा मुलायम… मैदा गूंदने के बाद इसे ढककर 10-15 मिनट के रख दें। 15 मिनट के बाद मैदा को फिर से अच्छे से गूंद लें और दो लोइयों में बांट लें. 3 फिर एक लोई को बेलन से मोटी रोटी के आकार में बेल लीजिए… इस रोटी को चाकू के सहारे मनचाहे शेप के टुकड़े काट लीजिए. (सबसे पहले रोटी पर सीधे-सीधे चाकू चला लें फिर इस पर तिरछा चाकू चला लें… ऐसा करने से आटे के डायमंड शेप के टुकड़े काटे जा सकते हैं.) इसी तरह दूसरी लोई से छोटे-छोटे टुकड़े काट लें… 4 कड़ाही में घी डालकर मध्यम आँच में गरम होने के लिए रख दें… घी गरम हो जाये तो थोड़ा-थोड़ा कर मैदे के टुकड़े डालकर चलाते हुए तलें. ध्यान रखें इस दौरान आँच धीमी रखें और हल्के आँच पर खुरमा को लाल-लाल तल लें। 5 अब पैन में चीनी और 1/4 कप पानी डालकर मध्यम आँच पर चाशनी बनाने के लिए रख दें। चाशनी को बीच-बीच में चलाते रहें. इसमें इलायची पाउडर और नींबू डालें। 8-10मिनट बाद चाशनी की एक बूँदएक चम्मच में लेकर उंगली अंगूठे के बीच रखकर देखें. अगर यह इसमें मोटी तार बन रही है तो समझिए चाशनी तैयार है…। 6 अब चाशनी में खुरमा डाल कर अच्छे से मिलाते जाइए। 1-2 मिनट बाद आँच बंद कर दें और खुरमा और चाशनी को चलाते रहें…। पैन को चूल्हे से हटा लें और इसे अच्छी तरह से चलाते हुए ठंडा कर लें। आप पाएंगे कि एक समय के बाद चाशनी ठंडी हो जाएगी खुरमा पर चीनी की कोटिंग चढ़ जायेगा। खुरमा तैयार हैं, ठंडा होने के बाद खाएं और खिलाएं…
 दोनों बहुओं को बेहद ख़ुशी हुई यह तो बेहद आसान नाश्ता है दोनों मिलकर बना लेंगी। सभी के जाने के बाद आज़ादी से ड्योढ़ी के बाहर निकलने का मौका मिला। (तभी बेहद पर्दे का काल था। खिड़की के पर्दे में काँटी ठोकी जाती थी कि पलंग पर बैठी कमरे में चलती बहू को बाहर के लोग देख ना लें।) सहायक की सहायता से बाहर मेज-कुर्सी लगवाकर, फूल-फल सजवाया गया। लोहे वाले झूला को समीप लाया गया। शीतल पेय (उपलब्ध नहीं था सुरा) के बोतल-गिलास सजे। दोनों बहुएँ जितना सज सकती थी उससे थोड़ा अधिक ही सज लीं। वैसे भी दोनों को हर पल सजे ही रहने का हुक्म था। दिनभर में तीन-चार बार साड़ी बदलना और परत-दर-परत पाउडर-क्रीम-लिपस्टिक चढ़ाते रहना हो रहा था। थोड़ी देर मस्ती करने के बाद ध्यान आया दोनों बहुओं को कि उन्हें खुरमा बनाना है। 
बिहार की यह मिठाई नहीं खाई तो कुछ नहीं खाया यूँ तो बिहार में क्षेत्र अनुसार अनेकों मिठाई बनते रहे हैं काफी वर्षों से। जैसे बालूशाही , लाई , अनरसा , खाजा , तिलकुट आदि। जो अपने स्वाद से सबको लुभाते रहे हैं और लोग भी उन्हें बड़े चाव से खाते रहे हैं। मगर उन में से एक मिठाई धीरे धीरे ही सही मगर अपनी पहचान अब देश पटल पर बना लिया और लोग खाए तो काफी पसंद भी करने लगे इस मिठाई को। जी हाँ! हम बात कर रहे हैं उस मिठाई की इसको बिहार में ही कई नामों से पुकारा जाता है। कोई इसे छेना का टिकिया ( बिहार में पनीर को छेना भी कहा जाता है ) तो कोई बेलग्रामी और ०२-खुरमा भी कहता है। मूलतः भोजपुर के उदवंतनगर को इस मिठाई का जन्म स्थल माना जाता है। वहीं से यह मिठाई बनना शुरू हुआ था और फिर देखते ही देखते , जगह , जिला और फिर अब प्रदेश पार कर गया। इसे बनाने में सिर्फ पनीर ही इस्तेमाल किया जाता है जिसके वजह से लोग इसे उपवास के दौरान फलाहार के रूप में भी इस्तेमाल करते हैं। पनीर की टिकिया को शक्कर की चाशनी में एक बराबर मध्यम आंच पर खौलाया जाता है और पनीर टिकिया इस चाशनी में धीरे धीरे ऊपर से लेकर अंदर तक सिंझ कर एक रंग ( हल्का लाल , भूरा ) का हो जाता है। इतना ही नही अंदर के भाग में जाला जैसा बन जाता है ( जिसे आप जब तोड़ कर खाते हैं तब देख सकते हैं )। तब इसे आंच से नीचे उतार कर रख दिया जाता है ठंडा होने के लिए और जब ठंडा हो जाता है तो उसे निकाल कर बाहर रख दिया जाता है। इस मिठाई को आप बिना फ्रिज में रखे हुए भी कई दिनों तक इस्तेमाल कर सकते हैं क्योंकि ये जल्दी खराब नही होती है और सूखा जैसा होता है जिसकी वजह से ज्यादा दिनों तक चलता है। अपनी अनोखी स्वाद और शुद्धता ( मिलावट रहित रहने की वजह से ) की वजह से अब इस मिठाई की मांग सालों रहने लगी है। इतना ही नही , जो बिहार से जुड़े लोगों के मित्र गण बाहर रहते हैं वे अपने बिहारी दोस्तों से कहना नही बुलते , बिहार से वापस आना तो मिठाई जरूर लाना भाई क्योंकि उस स्वाद , सोनाहपन को जीभ भूल नही पाती है। बड़ी बहू को खुरमा तो बनाना आता था लेकिन जो अलग तरीक़े का खुरमा उसके ससुराल में बनाया जाता था उसे बनाते कभी देखी नहीं थी! मझली बहू को किसी प्रकार का खुरमा बनाना नहीं आता था। मैदा में मोयन और खाने वाला सोडा और चीनी के घोल से सानकर, मोटा गोल बड़ी रोटी बेलकर खुरमे के आकार में काटकर घी में तल लिया जाता है। सुनी तो कई बार थी। अति आत्मविश्वास था कि बना लेगी और बड़े भैया का कहा शब्द (लड़की वाला एको गुण नईखे, दूसरा के घरे जाये के बा, बसीहें कईसे!) आँचल के खूँटे में बाँधकर आयी थी कि कभी असफल नहीं होना है ताकि बसने-ना-बसने पर प्रश्न उठे! लगभग पंद्रह लोगों के ०३-खुरमा नाश्ते कर लेने के अनुपात में मैदा लिया गया, मोयन में घी डालकर मेहँदी लगे युवा हाथों से मसल-मसल कर खुरमा कुरकुरा बनने योग्य तैयार कर खाने वाला सोडा मिला लिया गया। चीनी को पानी में घोलकर मैदा सानकर तैयार किया गया! पहने गहने और परतदार मेकअप से ज़्यादा चमकीली उनदोनों बहुओं की मुस्कान थी। तभी के अपने क्रियाओं पर अपनी सफलता और शाबासी पाने का अति विश्वास से उपजी। मध्यम आँच पर कड़ाही में घी गरम हो गया। और यह क्या घी में डाले मैदा के टुकड़े जिन्हें कुरकुरे खुरमा के रूप में उपर तैरने से वे तो घी में घुलकर हलुआ बनने के लिए मचल रहे थे! मानों ज़िद्दी बच्चा! घी बदला गया दूसरा खेप डाला गया। फिर से खुरमा घुल गया। दोनों बहुओं के पसीने छूट गए! हाथ-पाँव फूल गए। सहायक को सहायता के लिए पुकारीं। सहायक खुरमा बनाया क्योंकि हमेशा तो वही बनाता था! बहुओं को तब नहीं पता चल पाया था कि उनसे ऐसी कारस्तानी क्यों हुई? और उस दिन किसी रिश्तेदार को पता नहीं चल पाया कि बहुओं द्वारा खुरमा नहीं बनाया गया! मीठा पसंद करने वाले मीठा ही बोलें या व्यंग्य मीठा ही लगे स्वाभाविक तो नहीं! अति का भला न बोलना, अति की भली न चूप, अति का भला न बरसना, अति की भली न धूप : मैदा में अत्यधिक खाने वाले सोडा का करिश्मा रहा हो शायद…!

Monday 27 May 2024

पड़किया रासाधिक्य


 “आपके संग आपकी बेटी रह रही है कि आपकी बहू?” शारदा देवी का निरीक्षण कर रही महिला चिकित्सक ने पूछा।

“क्यों? आप ऐसा क्यों पूछ रही हैं?” शारदा देवी का गर्भाशय निकाला गया था जिसके कारण वो अस्पताल में भर्ती थीं।

“आप, अस्पताल से मिलने वाला भोजन नहीं ले रही हैं। आपके कपड़े नर्स नहीं धो रही है। आपका कमरा हमेशा व्यवस्थित रह रहा है।”

“मेरा बड़ा बेटा मेरे साथ रह रहा है। मेरी बेटी तथा मेरे और दो बेटे अपने पिता के साथ रह रहे हैं। हम अभी जिस शहर में रह रहे हैं वहाँ शल्य चिकित्सा की सुविधा नहीं होने से हम यहाँ आ गए। उसने यहाँ के किसी रिश्तेदारी में भी सूचित करने नहीं दिया।”

“आपका बेटा यह सारा काम कर लेता है?” महिला चिकित्सक की आँखों की पुतलियाँ तितली बन उड़ जाने को बैचेन दिखने लगीं थी तो भौंहें, प्रत्यंचा चढ़े धनुष सी हो रही थी।

यह वह दौर-बीसवीं सदी का काल था जब अधिकतर परिवारों में बेटे युवराज की तरह पलते और बेटियाँ ग़ुलामी के लिए तैयार की जाती थीं! या भ्रूण हत्या के लिए माँ भी तैयार कर दी जाती थीं! महिला शिक्षा पर ज़ोर बहुत था लेकिन माँ स्वाधीन नहीं होती थीं… जिसके परिणाम स्वरूप विदेशी चलन ‘वृद्धाश्रम’ भारत में भी पाँव पसारने लगे थे! कई दिनों में शारदा देवी के निरीक्षण-परीक्षण के दौरान महिला चिकित्सक अनेक बार स्तब्ध-विस्फारित चेहरे, भींगी-भींगी पलकें को सम्भालती रहीं! बाद में पता चला कि महिला चिकित्सक के बच्चे रईस कूल के बिगड़े दीपक थे..!

ख़ैर! उसी स्त्रैण-गुणों वाले बड़े बेटे से पुरुषों वाले गुणों से भरी मेरी (मेरे दादा और बड़े भैया ‘बबुआ’ व्यंग्य से मुझे कहा करते थे : मैं सभी वक्त का भोजन पापा के लिए परोसी थाली में कर लेने वाली : एक भी तिनका नहीं तोड़ने वाली : ज़िद और ग़ुस्से से भरी पड़ी : क्रिकेट, शतरंज, गुल्ली डंडा पसंद करने वाली : उस ज़माने की बिगड़ैल औलाद : समर्थन पाती, पापा की परी और मझले भैया की दुलारी होने के कारण : वे हमेशा समर्थन में पीठ पर हाथ रखे रहते : उनका कहना था कि यहाँ तो सुख-शान्ति से रहने दिया जाए : आज़ादी से उड़ने दिया जाए : दादा और बड़े भैया कहते “बबुआ प्प्प्पल्ल्लात बाड़ी! ई बबुआ के दूसरा के घरे जाये के बा, उहाँ *’बसहिएयें’* कईसे!”) शादी हो गयी। बड़े बेटे की माँ को गुमान था ही, बड़े बेटे में भी अहम् था कि वो सब कुछ कर सकता है बिना स्त्री के सहायता के! माँ अक्सर कहा करती कि मैंने अपने बच्चों को सब कुछ सिखला रखा है! मेरा बेटा कोई व्यंजन बना सकता है साथ ही दूसरे के बनाए व्यंजन में बता सकता है कि किस वजह से बिगड़ गया है! बात-चीत के क्रम में एक दिन मुझसे पूछा गया कि “एक किलो मैदा, एक किलो सूजी में केतना चीनी लागी अउरी क गो पड़किया तईयार जोखी?”

पड़किया : अनेक प्रांतों में गुझिया नाम से जाने जानी वाली मीठी-मीठी मैदा में सूजी/खोआ-चीनी सूखे मेवे सौंफ भर कर विभिन्न आकारों में होली के अवसर पर तथा बिहार में हरतालिका तीज में अवश्य बनायी जाने वाली स्वादिष्ट पकवान है! अच्छी बन गयी तो हरियाली ख़राब बनी तो दाँतों से जंग ठान मन को कसैला करती है।

मैदा में मोयन को (इतना अन्दाज से डाला जाता है कि तलने के बाद कड़ी भी रहे और बिखरे भी नहीं.. ) डालकर (मुट्ठी में मैदा गोला बनने लगे) थोड़ा-थोड़ा पानी डालकर कड़ा साना जाता है। इतना कड़ा कि पूरी बेलने में परथन का प्रयोग नहीं करना पड़े लेकिन बेलने में किनारे में फटे नहीं : तलने में बिखरे नहीं!

जैसा कि प्रश्न था “एक किलो मैदा और एक किलो सूजी में कितना चीनी लगेगा?” तो उत्तर है एक किलो ही चीनी। जी! तीनों सामग्री बराबर रहती है। उसके अनुपात में घी कम लगता है..!

बिहार का एक शहर गोपालगंज के पास थावे, जहाँ एक तरफ़ माँ दुर्गा की कथा-कहानी-प्रभाव-महिमा के लिए प्रसिद्ध है तो दूसरी तरफ़ चाशनी में डूबी खोये वाली पड़किया/गुझिया सदाबहार तो पर्व-त्योहार के मौके पर अपनों को उपहार में देने का अंदाज ही अलग है। गिफ्ट पैक में थावे की पड़किया की चर्चा न हो तो बात कुछ बेमानी सी लगती है। सूबे की कौन कहे, दूसरे प्रदेशों में भी थावे की मशहूर पड़किया की कुछ अलग शान है। यहाँ दीपावली के मौके पर भी लोग एक दूसरे को यह मिठाई उपहार में देकर खुशियाँ बाँटते हैं। ऐसे में हर बार थावे का पड़किया पहला मीठा उपहार बन रहा है। वैसे तो अन्य शहरों में भी अन्य मिठाइयों की तुलना में पड़किया की माँग लगभग दस गुना होगी ही।

जी तो! सूजी की जगह अब मावे की गुझिया अधिकतर लोग पसंद करते हैं!

सामग्री :— ९-१० पड़किया/गुझिया के लिए गूंथने के लिए

3/4 कप मैदा

1 1/2 बड़े चम्मच देशी घी

3-4 बड़े चम्मच दूध

भरावन बनाने के लिए

2 बड़े चम्मच देशी घी

1/2 कप रवा

1/4 कप सूखे नारियल का बुरादा

1/3 कप पिसी हुई शक्कर

1/4 बड़े चम्मच इलायची पाउडर

2 बड़े चम्मच बारीक कटे हुए बादाम,काजू

1 बड़े चम्मच किशमिश

थोड़ा सौंफ

तलने के लिए घी

पकाने का निर्देश :—

1

मैदे में घी डालकर अच्छे से मिलाए।मुठ्ठी में आटे को बांधकर देखे अगर बंध रहा है तो मोयन बराबर है।फिर जरूरत के हिसाब से थोड़ा-थोड़ा दूध डालकर हल्का मुलायम मैदा गूंथ लें। ढँककर थोड़ी देर के लिए रख दें

2

एक कड़ाई में घी गरम करे।उसमे रवा डाले। गैस की आंच को धीमा/मध्यम रखकर,चलाते हुए, हलका सुनहला होने तक भून लें।

3

फिर उसमे नारियल का बुरादा, इलायची पाउडर, सूखा मेवा और चीनी मिलाकर धीमी आंच पर १ मिनट पकाए।गैस बंध करके भरावन को एकदम ठंडा होने दे।

4

अब तैयार गूँथे मैदे में भरावन को भरकर पड़किया तैयार की जा सके कर उसकी पूरी बेल सके उतनी की एक समान आकार की लोई बनाए।

5

एक लोई से पूरी जितना बेल कर एक से डेढ़ बड़े चम्मच भरावन भरे।फिर किनारों पे दूध लगाकर आधे चाँद के आकार का चिपका दें।  और किनारे पर उंगलियों की सहायता से समोसे के आकार काटें या रस्सी के आकार में मोड़कर बना ले।एैसे ही सारी पेडकिया तैयार कर लें।

6

एक कड़ाई में घी को गरम करके धीमी आंच पर हलके हाथों से पलटाते हुए हलका सुनहरा होने तक पड़किया/गुझिया को तल कर तैयार कर लें

अर्द्धचंद्राकार , चंद्रकला , बटलोई विभिन्न आकार में बनाई जा सकने वाली है।

किनारे पर समोसे आकार देने के लिए पैने नाखून होने चाहिए। स्त्रियों के नाखून बाघ जैसे होने भी चाहिए!

दूसरा प्रश्न था “एक किलो मैदा, एक किलो सूजी और एक किलो चीनी में कितने पड़किया बनेंगे तो उत्तर होगा :- सौ(१००) । विश्वास नहीं हो तो बनाकर देख लीजिए!

बड़े बेटे की माँ मुझसे प्रश्न कर रहीं थी तो पिता ध्यान से कान लगाए हुए थे! मेरे उत्तर देने पर उनका प्रश्न पत्नी से हुआ “का हो! बड़को! पास भईली कि ना?”

“एक दम सही उत्तर बा! देखीं ना इनके बनावल पड़किया के किनारा, केतना नीमन बा! समोसा खानी!”

“हाँ हो! अइसन त पहले कबहो देखे के मिलन ना रहल हा!”

कर्मठ माँ की बेटी थी! बब्बुआ थी तो क्या हुआ! आँख-कान खुले ही रहते थे! बसने की ज़िद भी थी! पेडुकिया तलने के पहले उसे तैयार होने का समय देना चाहिए! जैसे किसी रिश्ते को मज़बूत होने में वक्त की माँग रखता है…! तुरन्त भर कर तुरन्त तल देने पर कुरकुरा नहीं होते हैं! पिलपिला-मायूस मसुआया हुआ रिश्ता किस काम के…!

Friday 24 May 2024

पनीर-दो-प्याजा-तृप्ति

 बुचिया— “बहुते परेशान नज़र आ रही हैं अम्मू, का बात हो गयी?”

अम्मू— “एक बेटी को कुम्हार से और एक बेटी को किसान से शादी कर पिता..,”

बुचिया— यह कहानी बहुते बार की पढ़ी-सुनी पुरानी है इससे आपकी आज की परेशानी का क्या सम्बन्ध?”

अम्मू— जिसकी दोनों आँखों से दो बेटों में से एक लेखक और एक प्रकाशक हो जाए… किसके लिये माँगे दुआ -किसके लिए माँगे ख़ैर…!”

बुचिया— “ ठहरिए! ठहरिए! आप विस्तार से पूरी कहानी सुनाइए उसके पहले मुझे पनीर-दो-प्याजा बनाना विस्तार से समझा दीजिए! मैं पनीर दो-प्याजा बनाने के क्रम में आपके आँखों से बेटों की कहानी और आपकी परेशानी समझने का प्रयास करूँगी…! एक पंथ दो काज़!”

अम्मू—“यह भी अच्छा है! हमदोनों के मुँह से, पनीर का नाम सुनते ही पानी टपकने ही वाला है, टपक जाये उसके पहले, चलो पहले कॉपी-कलम निकालो और सामग्री दर्ज कर लो। जैसा कि इसके नाम से ही साफ हो जाता है कि यह भोज्य व्यंजन पनीर और प्याज का संयोजन (कॉम्बिनेशन) होती है। शाकाहारियों को पनीर दो प्याजा की सब्जी बहुत पसन्द आती है।

पनीर दो प्याजा बनाने के लिए सामग्री :पनीर – 250 ग्राम, प्याज – 2

यहाँ दो (2) प्याज, पनीर के अनुपात में है तुम्हें एक बात बताऊँ! लगभग पाँच वर्ष पहले तक मेरी उलझन थी कि मुर्ग -दो-प्याजा, आलू -दो-प्याजा, पनीर-दो-प्याजा, मांस-दो-प्याजा जब बड़े परिवार में बनता होगा, जहाँ अधिक संख्या में लोग रहते होंगे तो उनके लिए अधिक मात्रा में बनायी सब्जी, मुर्ग में दो प्याज से कैसे काम चलता होगा!

गाढ़ा दही – 2 बड़े चम्मच, बेसन/कोर्नफ्लोर/मैदा (जो रुचिकर उपलब्ध हो), – 1 बड़े चम्मच, जीरा – 1 छोटा चम्मच, पिसा हुआ टमाटर (प्यूरी) – 1 कप, लालमिर्च पाउडर – 1/2 छोटा चम्मच, धनिया पाउडर – 1 छोटा चम्मच, हल्दी – 1/4 छोटा चम्मच, गरम मसाला – 1/2 छोटा चम्मच, कसूरी मेथी – 1 छोटा चम्मच, अदरक-लहसुन पेस्ट – 1 छोटा चम्मच, तेजपत्ता – 1, दालचीनी – 1 टुकड़ा, हरी इलायची – 2, हरी मिर्च – 2, तेल – 3 बड़े चम्मच, नमक – स्वादानुसार

पनीर दो प्याजा बनाने की विधि :पनीर दो प्याजा बनाने के लिए सबसे पहले एक बाउल लेना और उसमें दही डालकर अच्छे से फेंट लेना फेंटे दही में लाल मिर्च पाउडर, हल्दी, धनिया पाउडर और गरम मसाला डालकर अच्छे से मिला लेनाइसके बाद उसमें में कसूरी मेथी, बेसन और स्वादानुसार नमक डाल लेना और मिश्रण को अच्छे से मिलाकर फेंट लेना अब पनीर लेना और उसको छोटे-छोटे टुकड़ों में काट लेना पनीर के इन टुकड़ों को दही के मिश्रण में डालकर अच्छे से मिलाकर कुछ देर के लिए रखना होगा जिसे मैरिनेट करना कहते हैं उसके लिए बाउल को 10 मिनट के लिए अलग रख देना होगा...

अब एक गरम कड़ाही (नॉनस्टिक पैन हो तो बेहतर) में 1 बड़ा चम्मच तेल डालकर मध्यम आँच पर गर्म करना होगा जब तेल गर्म हो जाए तो इसमें मैरिनेट किया हुआ पनीर डालकर 2 से 3 मिनट तक तलना होगाअब तले पनीर को एक अलग प्लेट में निकालकर कर रख लेना होगा (अगर कोई चाहें तो कच्चे पनीर का भी इस्तेमाल कर सकते हैं...) अब कड़ाही में दोबारा तेल डाल और मध्यम आँच पर गर्म कर, इसमें एक बारीक-बारीक़ कटा प्याज, जीरा, तेज पत्ता, दालचीनी और हरी इलायची डालकर करछी की मदद से मिलाते हुए भूनना होगा अब इस भूने मसालों में थोड़े बड़े टुकड़े में कटे हुए दूसरा प्याज डालकर इसे 4 से 5 मिनट तक पकने देना। इस तरह बनाए जब प्याज का रंग सुनहरा हो जाए तो उसमें एक चम्मच अदरक-लहसुन का पेस्ट डालकर मिला देना और पकाना। जब प्याज सुनहला भूरा दिखने लगे तो गैस धीमी कर देना और उसमें सूखे मसाले डालकर अच्छे से मिला लेना. इसके बाद इसमें टमाटर प्यूरी डालकर मध्यम आँच पर 3-4 मिनट तक और पकने देना अब इसमें स्वादानुसार (कुशल गृहिणी को परिवार के लोगों के स्वादानुसार का अंदाज पता होता है) नमक मिला देना इसे तबतक पकाना होता है जबतक रस्सा (ग्रेवी) तेल न छोड़ देग्रेवी जब गाढ़ी हो जाए तो उसमें मेरिनेट तला पनीर के टुकड़े (क्यूब्स) डाल देना और एक से दो मिनट तक और पकने देना। अगर कोई चाहें तो इस सब्जी में मटर, शिमला मिर्च के बड़े-बड़े टुकड़े कर भी डाल सकते हैं इस तरह किसी समय के भोजन के लिए विशेष (स्पेशल-स्पेशल) पनीर-दो-प्याजा बनकर तैयार हो चुका होगा इसे तंदूरी रोटी या फिर लच्छा पराठा के साथ परोस किसी का दिल जीत लेना... लेकिन इते श्रम करने वाले/वाली का दिल कोई कैसे जीते...! तुम्हारी स्वादिष्ट लजीज़ पनीर दो प्याज़ा की सब्जी बनकर तैयार हो चुकी होगी.... उसके बाद क्या करें...!"

बुचिया :- जबतक सभी सामग्री जुटाती हूँ और बनाने का प्रयास करती हूँ तबतक आप लेखक-प्रकाशक-प्रकाशन अपने आँखों से बेटों की कहानी सुनाएँ..."
तृप्ति —विभा रानी श्रीवास्तव, पटना
इतिहास अनेक बार बदले जाते हैं : सूर्य-चन्द्र को भी ग्रहण का सामना करना पड़ जाता है : हार को जीत में बदल देने का प्रयास शुरू करना ही जीत है… ऐसी ही प्रयास है कवि प्रभास सिंह की पुस्तक ‘अंतरंगानुभूति’! जी हाँ! प्रभास सिंह के पुस्तक का नाम *’अंतरंगानुभूति’* रखा गया है और लेख्य-मंजूषा से जितनी भी प्रति (पता नहीं है कितनी प्रति) क्रय होगी उसी आधार पर (यानी मुफ़्त : कभी-कभी घोड़ा घास से यारी कर लेता है) राहुल शिवाय प्रकाशित करने का सहयोग कर रहे हैं! ऋग्वेद के पहले मंडल में दो पक्षियों की कथा है। सुपर्ण पक्षी। दोनों एक ही डाल पर बैठे हैं। एक अमृत फल खाता है। दूसरा उसे फल खाते देखता है और प्रसन्न होता है। जितनी तृप्ति पहले पक्षी को फल खाने से मिल रही है, उतनी ही तृप्ति दूसरे को उसे फल खाते देखने से मिल रही है। दोनों के पास तृप्ति है — एक के पास खाने की तृप्ति, दूसरे के पास पहले को खाता देखने की तृप्ति। इसे ‘द्वा सुपर्णा सयुजा सखायौ’ कहा गया है। यही 'सख्य' भाव है- यानी सखा होने का भाव, मित्रता का भाव ! यही जीवन का सख्य है। यही प्रेम का सख्य है। यही साहित्य में लेखक-पाठक का सख्य है। पहले की तृप्ति दूसरे के लिए आनंद का कारण बन जाए। भारतीय दर्शन परंपरा के अंतर्गत यही 'साक्षी भाव' भी है। ©️गीत चतुर्वेदी प्रभास सिंह लेख्य-मंजूषा से कब जुड़े-कैसे जुड़े मुझे याद नहीं पड़ रहा है, लेकिन मैं (लेख्य-मंजूषा की अध्यक्ष) जब सन् २०१९ के दिसंबर में अमेरिका जा रही थी तो उन्हें लेख्य-मंजूषा में सहायक कोषाध्यक्ष बनाकर, कोष की सारी ज़िम्मेदारी उन्हें ही देकर गयी थी। कुछ दिनों के बाद वह नौकरी के सिलसिले में मुम्बई चले गये और लेख्य-मंजूषा संस्था से हट गये। अध्यक्ष की अनुपस्थिति में कोष की ज़िम्मेदारी सचिव को सौंप गए। कोष की आवश्यकता सचिव को ही ज़्यादा थी…! सन् २०२० -२०२१ के काल में काल का तांडव सभी के अनुभव में है और सदैव रहेगा ही…! मैं छ महीने के लिए अमेरिका गई थी कोरोना के कारण चौदह महीने के बाद वापस लौटी! उस बीच में प्रभास सिंह से एक -दो बार बातें हुईं! बाद में पता चला कि वह बहुत बीमार है! बीमार ऐसा है कि सजीला युवा दयनीय स्थिति में जी रहा है। उनके और उनकी पत्नी के धैर्य को नमन करती हूँ कि आज प्रभास सिंह के लिखी कविताओं को प्रकाशित किया जा रहा है! कवि की अंतरंगानुभूति अभिव्यक्ति पाठक के दिल को छू लेने का प्रयासाधिक्य है! खुले दिल से कहा गया है और पूरे मन से सुना जाना, दोनों दुर्लभाधिक्य तो नहीं है! भावाधिक्य के मर्म को सुना और गुना जा सके प्रयास यही रहा है! लेखक और पाठक दोनों को शुक्ल और कृष्ण पक्ष में ज्ञान के साथ सूर्य के आलोक का दर्शन मिलने की संभावनाधिक्य हो इसी शुभकामनाओं के संग प्रभास सिंह और राहुल शिवाय को साधुवाद के संग शुभाशीष देती हूँ!बुचिया —“और मुझे?”
अम्मू—“गले लगाकर ढेर सारा प्यार-दुलार स्नेह। तुमसे ज़्यादा और कहाँ किसी से…”


Wednesday 8 May 2024

शांति का शोर


“अब तक प्रकाशित ५० अंकों की चुनिंदा रचनाओं के संकलन को अनेक पाठकों ने पसंद किया है तथा इसकी मुद्रित प्रति को उपलब्ध कराने का अनुरोध भी किया है। इसलिए इसे वार्षिकी २०२४ के रूप में प्रकाशित किया गया है। बड़ी साइज के ८८ रंगीन पृष्ठों का यह आकर्षक संग्रहणीय अपनी लागत मूल्य पर १५०/-₹ रजिस्टर्ड पोस्ट व्यय सहित उपलब्ध है।”

“4 प्रति हेतु 600/-₹ भेज चुकी हूँ। मुझे लगता है इतने में तो पाँच प्रति हो जाने चाहिए…!”

“आपको १० प्रतियाँ भिजवा देंगे, आदरणीया..! मुझपर लक्ष्मी-सरस्वती की अपार कृपा है...”

“अच्छा है! कुछ पुस्तकालयों कुछ -पुरस्कारों में देना अच्छा लगेगा। आभार! वैसे लक्ष्मी-सरस्वती की अपार कृपा पाने वाले अनेक मेरी निगाहों के सामने हैं... जिनको उदहारण बनने में कोई रूचि नहीं है ...।”

व्हाट्सएप्प के संदेशों की बात यहीं समाप्त नहीं हुई! पलक झपकते फोन की घंटी टुनटुना उठी!

“जी प्रणाम! आदरणीय!” पचास अंक निकालने वाले निश्चितरूप से वरिष्ठ होंगे। विश्वास था कि फोन किसी महिला ने नहीं किया।

“…” समुन्दर के गहराई सी शांत स्वर में प्रश्न गूँजा।

“बहुत जल्द बाँट दिए जाएँगे! आप अपने सामर्थ्यवश जितनी पत्रिका भेज सकें। दूसरा रविवार १२ मई को मातृ दिवस पटना के कार्यक्रम में लगभग चालीस से पचास लोग होंगे। रविवार १४ जुलाई को अयोध्या की पद्य गोष्ठी में भी लगभग इतने ही प्रतिभागियों की उपस्थिति की संभावना…”

“…” यक़ीनन पूछते हुए मेघ-विद्युत सी मुस्कुराहट फैली हो।

“जून के पिता दिवस के अवसर पर हमारी अपनी पत्रिका का लोकार्पण होगा। संस्था के सदस्यों के सामने स्पर्द्धा का विकल्प नहीं रखना चाहेंगे।”

“…,”

“एक दिन अवसर मिला सबको 

अपने संगी चयन का—

उषा-प्रत्युषा ने सूरज को गले लगाया

चाँद, तारों का साथ माँग लिया 

नदियाँ सागर से जा मिली

खारे-खोटे की कि किसने परवाह

हवा, खुशबू के पीछे भाग गई 

बरखा ने बादल को चूम लिया

और अंबरारंभ उलझाया हुआ

और साहित्य?

मनुष्य को मौक़ा दिया सब पर इंद्रधनुष बना देने का!”


दस की जगह पच्चीस पत्रिका आ गयी…

Tuesday 30 April 2024

लिट्टी-चोखा


आखिर कहाँ से आया 'लिट्टी-चोखा' और कैसे बन गया बिहार की पहचान....

लिट्टी चोखा का इतिहास रामायण में वर्णित है। ये संतो का भोजन होता था। जब राम और लक्ष्मण मुनि विश्वामित्र के यज्ञ की रक्षा हेतु गए थे तब भी उन्हें सुबह में सातु और रात्रि में लिट्टी चोखा मिलता था।

रही बात लिट्टी चोखा की तो ये विशुद्ध रूप से भोजपुरी भाषी भोजन है और भृगु क्षेत्र (बलिया) से लेकर व्याग्रहसर (बक्सर) तक प्रचलित थी। आज भी बक्सर में पंचकोशी मेला लगता है जिसमे 05 दिन लिट्टी ही बनती है। ये भगवान राम का अनुसरण है जो यज्ञ की रक्षा के समय किया गया था।

बूझलु, की ना..

हमारे देश के व्यजनों की खुशबू व चटकारे विश्व के हर कोने में प्रसिद्ध है। हजारों जायकेदार भारतीय व्यंजनों का मेन्यू दुनियाभर के हर महंगे होटल में बड़े शौक से पेश किए जाते हैं। ऐसे में लिट्टी-चोखा की लोकप्रियता से भला कौन किनारा कर सकता है। जी हाँ! चाहे वह कोई मजदूर हो या बड़े पोस्ट का अधिकारी, हर कोई लिट्टी-चोखा का लुत्फ उठाना चाहता है। वैसे तो लिट्टी-चोखा देश ही नहीं, बल्कि दुनिया विदेशों में भी पसंद किया जाता है। यह बिहार का लोकप्रिय व्यंजन है, लेकिन यह व्यंजन आपको दुनिया के हर हिस्से में मिल जाएगी। लिट्टी-चोखा एक ऐसा व्यंजन है, जो परंपरा, स्वाद और सांस्कृतिक विरासत की कहानी को दर्शाता है। इस व्यंजन को सफर का साथी भी कह सकते हैं। लोग लंबी यात्रा के दौरान लिट्टी जरूर ले जाते हैं, इसे पैक करना और खाना दोनों आसान रहता है। इसे चोखा के अलावा आचार या चटनी के साथ भी खा सकते हैं। कई लोग तो केवल लिट्टी खाना ही पसंद करते हैं। लेकिन क्या आप जानते हैं, आखिर लिट्टी-चोखा बनाने की शुरुआत कैसे हुई? तो चलिए जानते हैं इसकी रोचक कहानी।

मगध काल में हुई लिट्टी-चोखा की शुरुआत

माना जाता है कि लिट्टी-चोखा बनाने की शुरुआत मगध काल में हुई। मगध बहुत बड़ा साम्राज्य था, चंद्रगुप्त मौर्य यहाँ के राजा थे, इसकी राजधानी पाटलिपुत्र थी । जिसे अब पटना के नाम से जाना जाता है। कहा जाता है कि पुराने जमाने में सैनिक युद्ध के दौरान लिट्टी-चोखा खाते थे। यह जल्दी खराब नहीं होती थी। इसे बनाना और पैक करना काफी आसान था। इसलिए सैनिक भोजन के रूप में इसे अपने साथ ले जाते थे। 1857 के विद्रोह में भी लिट्टी-चोखा खाने का जिक्र मिलता है। कहा जाता है कि तात्या टोपे और रानी लक्ष्मी बाई के सैनिक भी लिट्टी चोखा खाना पसंद करते थे। यह व्यंजन अपनी बनावट के कारण युद्ध भूमि में प्रचलित हुआ। सैनिकों को इसे खाने के बाद लड़ने की ताकत मिलती थी। 

मुगल काल से भी जुड़ा है लिट्टी-चोखा।

लिट्टी-चोखा का जिक्र मुगल काल में भी मिलता है। मुगल रसोइयों में नॉनवेज ज्यादा प्रचलित था। ऐसे में लिट्टी मांसाहारी व्यंजनों के साथ भी खाया जाता था। समय के साथ लिट्टी चोखा को लेकर नए-नए प्रयोग होते गए। आज लिट्टी चोखा के स्टॉल हर शहर में दिख जाते हैं। यह खाने में स्वादिष्ट तो होता ही है, साथ ही सेहत के लिए भी बहुत फायदेमंद है।

मुझे अपनी शादी के पहले लिट्टी बनने की जानकारी नहीं थी! हाँ! सत्तू भरी रोटी अक्सर मेरे घर में बनायी जाती थी। जब भी हल्की वर्षा होती, शाम में मेरे पापा सत्तू प्याज लेकर ही कार्यालय से घर वापिस आते। ताकि घर में सत्तू प्याज नहीं होने का कोई बहाना नहीं बनाया जा सके..।

शादी के बाद श्वसुर जी और बड़े देवर को लिट्टी लगाते देखा…! 

बड़े से कठवत में बहुत आटा साना गया। जब पहली बार बनते देखी तब दस लोग होंगे… लगभग अस्सी-पचासी लिट्टी बनाने योग्य सत्तू तैयार हुआ होगा। बारीक-बारीक प्याज, लहसुन, अदरक, हरी मिर्च काटी गयी, अजवाइन-मंगरैल, नीबू का रस, पुराने अचार का मसाला सत्तू में मिलाया गया। आटे का गोला पतला तैयार हुआ जिसमें सत्तू भरा गया…! सब चीज़ का अनुपात और चखकर सिसकारी भरते हुए श्वसुर जी के देखरेख में हुआ! जब तक सत्तू भरकर आटे का गोला तैयार हुआ तब तक देवर और श्वसुर जी चिपरी/गोइंठा का अलाव तैयार कर लिए और उसमें लिट्टी को सेंकना शुरू किए…! 

सेंके लिट्टी को पतले कपड़े में चाला गया जिससे राख निकल गया। चाले हुए लिट्टी को घी में डुबाया गया। तरमाल खाने को मिला तो अद्धभूत स्वाद था! स्त्री सशक्तीकरण का नमूना था सन् ८२-८८ में जब बरसात के गर्मी में चौके में बैठकर बिना पंखे के रोटियाँ ना सेकने का मन करे, लिट्टी लगाने के लिए पुरुषों को तैयार कर लिया जाये। ऐसे पुरुष जिन्हें जूते का फीता बँधवाना //न! न जूता ही रानी के हाथों पहनना, गुसलखाना में पानी रखवाना, दिनभर पलंग तोड़ना रईसी मर्द लगना होता हो…। उनसे कभी-कभी ताश (गोस्त का व्यंजन) मँगवा लिया जाता तो कभी मुर्ग़ा बनवा लिया जाता! वेबकूफ़ को सराह लो सौ कोस दौड़ा लो…!

हमारे भी बच्चे हुए! वे जब सहयोग करने योग्य हुए तो उन्हें बेहद मज़ा आता था! एक बार मेरी ननद का पूरा परिवार हमारे घर रात्रि भोजन पर आमंत्रित थे। ननद बोली कि भाभी के बनाए लिट्टी में ज़्यादा स्वाद है क्योंकि वो मुलायम (मैं बड़े मुँह वाले बर्तन में पानी खौलाती थी और उसपर पतला कपड़ा बाँध देती थी। उस पर भाप से लिट्टी पकाती और घी में जीरा का तड़का लगाकर लिट्टी को तल लेती थी) बनाती हैं…! अच्छा बनाना आना नहीं चाहिए…! मेरी माँ शौक लिए मोक्ष पा गयीं कि उनकी बेटी कभी शौक़ से चौका में जाती…! वो अक्सर कहा करती थीं कि “ना नीमन गीत गैईबू त बबुनी दरबार ना बुला के जैईबू!”

उन्हें कहाँ पता था कि केवल सुर साध लेने से दरबार से बुलावा नहीं आ जाता है। जब तक दरबार से बुलाने की कीमत चुकानी ना आती हो। क़ीमत चुकाने में अनाड़ी रह गये तो फिसड्डी रह जाना तय हुआ!

सन् ९४ में पटना के पटेल नगर में बतौर किरायेदार रहने लगे। मकान मालिक दम्पति से पारिवारिक रिश्ता बन जाता था किराएदारों का! उस मंडली में हम भी शामिल हो गये! उनलोगों को भी लिट्टी बेहद पसंद था। उस मण्डली में एक बाबू मोशाय थे जिन्हें दाल में डूबाकर लिट्टी खाना पसंदीदा था! मकान मालिक के बेटे को मुर्ग चाहिए होता। अपने शौक़ अपने-अपने चौके से पूरे होते! जीभ दागने के लिए को सबको मिल जाता। पूरी मण्डली का लिट्टी-चोखा एक जगह बनता! बड़ा मज़ा आता, हम बाज़ार से आटा सत्तू, सत्तू में पड़ने वाला सारा सामान ख़रीद कर लाते, घर के बगल में गेंहूँ पीसने वाला चक्की था, भुजा वाला ताज़ा पीसा सत्तू देता। सब्जी वाला बाक़ी सामान घर में पहुँचा जाता। अरे! तब हमारी मण्डली पाव -आधा किलो -किलो से सामान नहीं ख़रीदती थी।मटर -साग -गोभी -सब्ज़ियों की टोकरी का मोल लगाते! उस्ताद मकान मालकीन थी तो हम शागिर्द पक्के वाले हो गये! जाड़े में काश्मीरी शाल वाले का रिक्शा हमारे घर से आगे बढ़ता ही नहीं। बासी लिट्टी नाश्ते के संग हमें उदारमना भी बना जाती! चोखा हमें धोखा करना नहीं सिखलाया!


Wednesday 17 April 2024

छतरी का चलनी…

 हाइकु लिखने वालों के लिए ०४ दिसम्बर राष्ट्रीय हाइकु दिवस के रूप में महत्त्वपूर्ण है तो १७ अप्रैल अन्तरराष्ट्रीय हाइकु दिवस के रूप में यादगार है…

सुरकानन—

तितली पपड़ियाँ

नख में चढ़े


छतरी का चलनी…

“शहर के किसी कोने में कोई आयोजन हो आप बतौर अतिथि नज़र आ ही जाती हैं और पत्रकार होने नाते हमारी भेंट हो जाना स्वाभाविक है! पहले पद्मश्री पुरस्कार से सम्मानित थीं अभी साल-दर-साल नारी शक्ति पुरस्कार, मानव सेवा पुरस्कार, बालिका प्रोत्साहन पुरस्कार इत्यादि आपकी झोली में गौरवान्वित हो रहे हैं! हमारी ओर से बधाई स्वीकार करें महोदया!”

“हमारी संस्था और हम सभी के श्रम का फल मिल रहा है!”

“आपकी संस्था के अन्दर की बातें बाहर फैलने भर की देर है!”

“कैसी बातें?”

“संस्था के अन्दर में जो विद्यालय चलता है उसमें रात्रि कक्षा चलना दिखाया जाता है लेकिन कभी-कभी महीने में दो-तीन दिन अध्यापकों को सुबह में बुलाकर शाम तक रखा जाता है।आपके संस्था में और बाहर के दो चेहरे हैं! कर्मचारियों और बच्चिओं पर तानाशाही वाला माहौल है। वाणी में कठोरता से : अटकती हैं बोलने में! बहुत - बहुत अहंकारी है! हवा में उड़ती रहती है।

 उन्नति के कार्यक्रम में नौ-दस लाख का बिल दिखलाया गया।और इस बिल का भुगतान तीन-चार जगहों से करवाया गया! यानी मुश्किल से लगभग तीन-चार लाख का खर्चा हुआ मिला लगभग तीस-चालीस लाख मिला!”

“प्रवाद है सब! परखने वाली दुनिया में समझने वाले कम मिलते हैं!”

“हँसना और रोना समानांतर में असरदार नहीं होते!”

लड्डू : फूटना मन का!

जॉर्ज बर्नाड शॉ ने कहा है, “दुनिया में दो ही तरह के दु:ख हैं —एक तुम जो चाहो वह न मिले और दूसरा तुम जो चाहो वह मिल जाए!” हमलोग कामख्या मन्दि...