"सोच का सृजन"
Sunday, 26 July 2026
बोझ/कल्पना/मृगतृष्णा?
Wednesday, 22 July 2026
बदले ताले
“तुम्हें पता है, पिछले आपातकाल में सबसे ज़्यादा किस चीज़ की आवाज़ आती थी?” वाइन ग्लास बढ़ाते हुए प्रभाकर जी ने पूछा।
“मुझे ऐसी कोई भी चीज नापसन्द है जो मेरे दिमाग को भ्रमित करती है,” रोहन ने इंकार रूप में अपना हाथ और अनभिज्ञता स्वरूप सिर हिलाया।
“खामोशी की…। जब आधी रात को लोग उठाए जाते थे, तब पूरा मोहल्ला जागता था, मगर कोई खिड़की नहीं खुलती थी।” प्रभाकर जी ने कहा।
“अब तो लोग दोपहरी में उठाए जाते हैं और खिड़कियाँ खुली रहती हैं, प्रभाकर जी।” रोहन ने मुस्कराते हुए उत्तर दिया। उसने अपना लैपटॉप खोला। कई दिनों की मेहनत से तैयार की गई रिपोर्ट सामने थी। उसने प्रकाशित करने का बटन दबाया। कुछ पल तक स्क्रीन पर एक गोल निशान घूमता रहा। फिर सब कुछ सामान्य हो गया। बस उसकी रिपोर्ट कहीं दिखाई नहीं दे रही थी। कुछ ही देर में उसे एक-एक कर कई सन्देश आए। सोशल मीडिया की कुछ सुविधाएँ बन्द कर दी गई थीं। कुछ लोग, जो रोज़ उसकी फेसबुक पोस्ट पर बहस करते थे, अचानक जैसे उसे देख ही नहीं पा रहे थे। रोहन ने अनायास प्रभाकर जी की ओर देखा।
प्रभाकर जी ना तो मुस्कराए और ना कुछ कहा। धीरे से उठे, अलमारी खोली और वही पुरानी डायरी उसके हाथ में रख दी, जिसे वे बरसों पहले जेल से लौटते समय साथ लाए थे।
“जब सोशल मीडिया बोलना बन्द कर दें…” रोहन ने कहना चाहा।
“…तब इंसान एक-दूसरे को पढ़ना शुरू करते हैं।” प्रभाकर जी ने उसकी बात पूरी कर दी—
शाम ढल रही थी। चाय की दुकान पर लोग पहले की तरह बैठे थे। मौसम, महँगाई, क्रिकेट और राजनीति— इत्यादियों पर बातें हो रही थीं, लेकिन शिक्षा-चिकित्सा की बातें नहीं हो रही थी। रोहन ने डायरी खोली। पहला वाक्य “इतिहास दोहराया गया है” लिखने से पहले उसने एक बार चारों ओर देखा। शहर बिल्कुल सामान्य था।
Tuesday, 30 June 2026
आँखों की धुँध
सर्दियों की एक बेहद सर्द शाम थी। राघव एक आलीशान होटल में से अपनी कम्पनी की कामयाबी का जश्न मनाकर लौट रहा था। रास्ते में चौराहे पर बने भव्य मन्दिर, मस्जिद, गुरुद्वारे के बाहर रोशनी जगमगा रही थी। राघव ने गाड़ी रोकी, श्रद्धा से सिर झुकाया और बाहर बैठे कुछ आदतन माँगने वालों को नोट बाँट दिए। तभी उसकी नजरें कुछ दूरी पर, एक दीवार के सहारे बैठी एक बूढ़ी महिला पर पड़ी। कम्पकम्पाती ठंड में उसके पास ढंग का कोई ऊनी कपड़ा नहीं था। उसके पास ही एक छोटी लड़की फटी हुई कॉपियों को समेटे रो रही थी। राघव कौतूहलवश उनके पास गया।
"क्या हुआ माताजी? आप वहाँ कतार में क्यों नहीं बैठीं? वहाँ पैसे बँट रहे हैं," राघव ने पूछा।
बूढ़ी महिला ने स्वाभिमान से सिर उठाया और कहा, "बेटा, हम भिखारी नहीं हैं। मेरे बेटे-बहू दुर्घटना में चल बसे। मैं लोगों के घरों में झाड़ू-पोछा करके इस बच्ची को पढ़ा रही हूँ। आज मकान मालिक ने किराया न देने पर रात को ही बाहर निकाल दिया और बच्ची की स्कूल की फीस न भरने के कारण उसकी किताबें भी फेंक दी गईं। मुझे भीख नहीं, बस सिर छुपाने की जगह और मेरी बच्ची के लिए मदद चाहिए।"
राघव के चेहरे का भूगोल बदल गया। तभी वहाँ से एक साधारण से कपड़ों में एक सज्जन गुजरे, उन्होंने उस बूढ़ी महिला की बात सुन ली थी। उन्होंने तुरन्त आगे बढ़कर अपनी गर्म शॉल उस बुजुर्ग महिला के कंधों पर डाल दी। फिर बच्ची की कॉपियाँ उठाईं और कहा, "माताजी, मेरे घर के पास एक छोटा सा कमरा खाली है। आप वहाँ रह सकती हैं और मेरी पत्नी को घर के कामों में मदद कर सकती हैं। और रही बात इस बच्ची की पढ़ाई की, तो इसका दाखिला मैं कल अपने स्कूल में मुफ्त करवा दूँगा। पास के ही सरकारी स्कूल में मैं शिक्षक हूँ।”
शिक्षक ने राघव की दुविधा को भाँप लिया और बेहद शान्त स्वर में कहा, "धर्म शिक्षण है, जाति से शिक्षक हूँ तो मेरा सम्प्रदाय आस्था का विषय है, मन्दिर, मस्जिद, गुरुद्वारा, गिरजाघर श्रद्धा का और जरूरतमन्दों की मदद करना ही मेरे लिए पूजा है। तो दान हमेशा पात्र व्यक्ति को देना ही श्रेयस्कर समझता हूँ!”
“बड़े-बड़े नोट बाँटकर मैं खुद को बहुत बड़ा धर्मात्मा महसूस कर रहा था। आपका कर्म देखकर मेरी अपनी गलती का अहसास हो रहा है। मैंने जिन लोगों को रुपये दिया, रात में ही उसी रुपये से नशा करने वाले होंगे जबकि यहाँ एक स्वाभिमानी परिवार को सचमुच मदद की जरूरत थी।” राघव ने कहा।
“अब आपने सही समझा। सच्ची श्रद्धा पत्थरों की दीवारों तक सीमित नहीं होती, वह इंसानियत के रूप में भी धड़कती है।” शिक्षक ने कहा।
ग़ज़ल
मेरा फ़लक के सितारों से राब्ता है बहुत,
जो गिर गया वो नज़र से तो ख़ाब्ता है बहुत।
जो चल पड़े हैं तो मंज़िल को ढूँढ ही लेंगे,
मगर ये वक़्त की गर्दिश का रास्ता है बहुत।
उलझ गया है जो धागा उसे सुलगने दो,
कि अब ज़माने से अपना ही वास्ता है बहुत।
वो कायदे जो बनाए थे दिल की बस्ती ने,
उन्हीं उसूलों का दुनिया में वाब्ता है बहुत।
मेरा फ़लक के सितारों से राब्ता है बहुत,
जो गिर गया वो नज़र से तो ख़ाब्ता है बहुत।
चमकना सीख लिया जिसने मुश्किलों में 'विभा',
उसी चिराग़ का तूफ़ाँ से जाब्ता है बहुत
Friday, 26 June 2026
२६-०६-२०२६ : शून्योपरान्त या लंतरानी?
छोड़ चुकी हूँ
समस्याओं पर विचार रखना।
हर गाँठ को खोलने की ज़िद में
उँगलियाँ ही लहूलुहान होती थीं।
अब जो नहीं बदल सकता,
उसे समय के हवाले कर देती हूँ।
जो बदल सकता है,
उसे अपने साहस के।
दर्द जब ज्वार से भी ऊँचा उठता है,
लहरें शोर करना छोड़ देती हैं।
समुद्र सिर्फ़ गहरा हो जाता है।
दुःख का बिम्ब भाटा में नीचा बैठता है
लकड़ी जब पूरी जल जाती है,
लपटें नहीं बचतीं—
बस एक मुट्ठी राख
हवा के साथ चल देती है।
राख के बिम्ब के लिए वैतरणी मचल जाती है
बादल जब जी भर बरस लेते हैं,
आकाश रोता नहीं,
बस धुला-धुला-सा
चुप पड़ा रहता है।
वर्षा का बिम्ब सरस लेते हैं-
पेड़ जब अन्तिम पत्ता भी खो देता है,
हवा से शिकायत नहीं करता।
वह अगली ऋतु की प्रतीक्षा में
स्थिर खड़ा रहता है।
वृक्ष का बिम्ब अक्खो-मक्खो करता है!
नदी जब चट्टानों से लड़ते-लड़ते थक जाती है,
उन्हें तोड़ने की नहीं,
उनके बीच से रास्ता बनाने की
कला सीख लेती है।
नदी अपने बिम्ब को ढूँढते-ढूँढते पक जाती है
तेल जब आख़िरी बूँद तक पहुँचता है,
लौ काँपती नहीं,
एकदम स्थिर हो जाती है
बुझने से ठीक पहले।
दीपक का बिम्ब कोई नहीं खोजता है!
रेत ने कब का छोड़ दिया है
बादलों का हिसाब रखना।
उसे मालूम है—
हर बरसात उसकी नहीं होती।
मरुस्थल का बिम्ब कोई मरोड़ दिया है!
Thursday, 25 June 2026
हाइकु और ग़ज़ल
अमराई में
तोता का कलरव—
युद्ध विराम
ढोल का शोर
भगोड़ा का बजाया—
युद्ध विराम
युद्ध विराम—
भगौड़ा का उकेरा
इन्द्रधनुष
नभ में छाए
पतंग व पतंगी—
युद्ध विराम
ग़ज़ल
कुछ नहीं वक़्त का ही तकाज़ा तो है,
ग़म पुराना सही दर्द ताज़ा तो है।
टूटकर बिखरे रिश्ते कई बार पर,
दिल में जुड़ने का कोई इजाज़ा तो है।
रात भर अश्क आँखों से बरसे मगर,
दूर होकर भी मेरा वो ख़्वाजा तो है।
ख़्वाब सारे बिखर कर हुए धूल भी,
आँख पर एक सपने का क़ब्ज़ा तो है।
वो न आएँ कभी, कोई शिकवा नहीं,
दिल का बाक़ी अभी वे ही राजा तो है।
लोग पढ़ते नहीं दिल के मजमून को,
मीर के लेख का यह नतीजा तो है।
ये अंधेरा भी छँट जाएगा देखना,
आस के आसमाँ में वो इक जा तो है
आज हर ओर है बेयक़ीनी, विभा,
कल सँवरने का अंदाज़ दूजा तो है।
Monday, 22 June 2026
गुलदस्ते में वट
पिता ने दिया काया तो उस काया को निरोग रखना योग की माया
पिता का साया धूप में शीतल छाँव बन जाता है,
जीवन का हर कठिन रास्ता सहज बन जाता है।
सदा स्मरण करते पिता के मौन तपस्या को,
जिससे घर का हर कोना उजियारा पाता है।
तन को बल, मन को शांति, प्राणों को नव प्रकाश,
सदा योग देता है जीवन को सुन्दर विश्वास।
बाहर जितनी दौड़-धूप है, भीतर उतनी ही ख़ामोशी,
स्वयं को खोजो, मिल जाएगा अपना ही आकाश।
वही संस्कृति चाहिए वहीं के वहीं आँगन के कुशल टिकाई में
सुख, शांति और सफलता की खोज में निकले हम,
दुनिया भर में उत्तर ढूँढ़ते रहे हरदम।
योग ने सिखाया—अपने भीतर उतरना सीखो,
पिता ने कहा—सत्य और श्रम का पथ चुनो।
फिर समझ में आया जीवन का यह रहस्य,
जिसे खोजते रहे हम यहाँ-वहाँ,
वही-वहीं था—पिता की सीख और अपने ही योग के बीच।
संयम, साहस, श्रम और सच्चाई,
ये सब आसान नहीं थे,
पिता की रोज़मर्रा की साधना थी।
योग ने जब मन के भीतर दीप जलाया,
पिता का चेहरा उसी उजाले में नज़र आया।
पिता ने उँगली थामकर चलना सिखाया है,
योग ने गिरकर भी सम्भलना सिखाया है।
योग तन को साधता है, पिता मन को गढ़ते हैं,
वही दोनों मिलकर जीवन को वहीं ऊँचाई देते हैं।
पिता ने कहा था—
जीत से पहले स्वयं पर विजय पाना,
योग ने वही बात
श्वासों की भाषा में दोहराई है।
एक ने जीवन का अनुशासन दिया,
एक ने मन का सन्तुलन दिया
वहीं दोनों मिलकर संस्कार को वही गहराई देते हैं।
Wednesday, 17 June 2026
मूल्यों का क़द
निखिल का पैतृक शहर विनाशकारी बाढ़ की चपेट में आ गया। बस्तियाँ डूब गईं, हाहाकार मच गया। राहत कार्य में जुटे थके-हारे निखिल ने जब पुस्तकालय का दरवाज़ा खोला, तो वह दंग रह गया।
पुस्तकालय की मेज़ें हट चुकी थीं। अलमारियों में किताबों की ओट से दवाइयाँ झाँक रही थीं। हॉल में बेघर परिवार आश्रय लिए हुए थे और शहर के युवा वहाँ सहमे बच्चों को सँभाल रहे थे।
वृद्ध पुस्तकाध्यक्ष ने आगे बढ़कर निखिल के कन्धे पर हाथ रखा और बोले, "बेटा! किताबें सिर्फ़ कागज़ का पुलिन्दा नहीं होतीं, वे समाज को संकट में एक-दूसरे के लिए खड़ा होना सिखलाती हैं।"
निखिल की आँखें शर्म से झुक गईं। उसने अपनी डायरी में लिखा, “पिछड़ा वह स्थान नहीं जहाँ आधुनिक सुविधाएँ कम हों, बल्कि वह है जहाँ मानवीय संवेदनाएँ और आपसी जुड़ाव ख़त्म हो जाए। यह शहर तो बहुत ही आगे है। जब मैं कुछ महीनों पहले यहाँ आया था तो इस जर्जर पुस्तकालय को देखकर महानगर से आए युवा अधिकारी के रूप में मैंने उपहास उड़ाया था, “आज के डिजिटल युग में भी यह कबाड़खाना चल रहा है! सचमुच, यह शहर कितना पिछड़ा है। वृद्ध पुस्तकाध्यक्ष ने सुना था पर अपनी सौम्य मुस्कान के साथ मौन रहे थे!”
ग़ज़ल
हर घड़ी अक्स को चमकाने की चाहत ही नहीं,
खुरदरा रहने की छूटेगी ये आदत ही नहीं
दाग़ से ही तो है इस चाँद में ऐसी रौनक़,
इस जहाँ में कहीं बेदाग़ फ़ज़ीलत ही नहीं।
हद से ज़्यादा जो सफ़ाई में लगे रहते हैं,
उनके चेहरों पे कोई सच्ची सी रंगत ही नहीं
कुछ खुरदरे से भी कोने हों ज़रूरी घर में,
हर तरफ़ सिर्फ़ नफ़ासत की ज़रूरत ही नहीं।
ये जो ठोकर है संभलने का सलीक़ा देती,
चिकने रोड़ों की मुझे कोई इबादत ही नहीं।
रास्ते का मुड़ा ही मोड़ हो हारा तो नहीं
इस सफ़र में मुझे राहों से शिकायत ही नहीं
अपनी अनगढ़ सी कला पर ही यक़ीं काफ़ी, 'विभा'
हर तरफ़ काँच के महलों की हिफ़ाज़त ही नहीं।
Sunday, 14 June 2026
ग़ज़ल
लफ़्ज़ वो अब तलक, तो बने ही नहीं
जो बयाँ कर सकें, हिय सुने ही नहीं।
रास्ते में जो थे, जाल नफ़रत के वो,
हम सफ़र में कभी, यूँ तने ही नहीं।
ग़म के जो ख़्वाब थे, वक़्त के रात-दिन,
जाने किस मोड़ पर, वो बुने ही नहीं।
ज़िन्दगी ने दिए, जितने ज़ख़्म-ओ-सितम,
दर्द वो हमने फिर, तो गिने ही नहीं!
लाख शिकवे रहे, इस ज़माने से पर,
दर्द के वो फ़साने, गुने ही नहीं।
दिल में ऐसा बसा, हिज्र का सिलसिला,
कोई मौसम खुशी का, मने ही नहीं।
राह-ए-उल्फ़त में जो, अश्क बिखरे 'विभा',
हम ने दामन में वो, फिर चुने ही नहीं।
ग़ज़ल 2
बात निकली तो कई राज़ भी फिर दिल से निकले,
दर्द के फूल भी कुछ अश्कों की महफ़िल से निकले।
जब अँधेरों ने कहा तो कई सीमा से निकले,
रास्ते तब ही नए एक नई मंज़िल से निकले।
हमने चाहा था कि ख़ामोश रहें जीवन भर यूँ
पर कई शब्द अचानक ही मेरे दिल से निकले।
वक़्त की धूप में रिश्तों की नमी जाती ही रही,
फिर भी कुछ ख़्वाब सलामत थे जो मुश्किल से निकले।
उसकी यादों का समंदर था बहुत ही गहरा मगर,
कुछ चमकते हुए मोती उसी साहिल से निकले
ज़िन्दगी भर जिसे थे अपना समझते रह गए हम,
वे भी इक रोज़ किसी और के आदिल से निकले।
घात निकली तो नज़र उनके कई रंग ही आए
कुछ हँसी के थे, 'विभा' तो वे ही कुछ छल से निकले
Tuesday, 9 June 2026
ब्याज का टापू
दिन की चुभती हुई धूप की जगह अब एक ठंडी, मखमली हवा ने ले ली थी। पेड़ों पर चहचहाहट तेज हो गई थी। हरीश बाबू ने अपनी किराने की दुकान का शटर आधा गिराया और गल्ले (कैश बॉक्स) के पास बैठ गए। गल्ले से नोटों की गड्डी निकाली। कुल मिलाकर पन्द्रह हजार चार सौ रुपये। हरीश बाबू के चेहरे पर एक संतोषजनक मुस्कान तैर गई। उनके लिए यही उनकी 'दिन की पूँजी' थी, जिससे उनका घर चलता था और बैंक बैलेंस बढ़ता था। वे दुकान पूरी तरह बंद करने ही वाले थे कि तभी एक कमजोर सी आवाज आई, "बाबूजी... कुछ खाने को दे दो। बड़ी भूख लगी है।"
हरीश बाबू ने पलटकर देखा। सामने एक बूढ़ी औरत खड़ी थी। फटे-पुराने कपड़े, चेहरे पर झुर्रियों का जाल और आँखों में बेबसी। हरीश बाबू का हाथ अनजाने में ही जेब के नोटों की तरफ गया, लेकिन फिर कुछ सोचकर उन्होंने नोट हाथ में ही दबाए रखा।
उन्होंने दुकान के अन्दर देखा। एक शेल्फ पर ताजे ब्रेड का पैकेट, जैम की शीशी और दही की थैली रखी थी। हरीश बाबू ने शटर थोड़ा ऊपर उठाया, अन्दर गए और ब्रेड-जैम और दही ले आए। उस सामान को उस बूढ़ी औरत के हाथों में थमा दिया।
बूढ़ी औरत ने काँपते हाथों से सामान थाम लिया। उसकी सूखी आँखों में अचानक चमक आ गई। "जुग-जुग जियो बाबू! भगवान तुम्हारी तिजोरी हमेशा भरी रखे।" उसने आसमान की तरफ हाथ उठाया और भरभराई आवाज में कहा।
उसकी आँखों से छलकते आँसू और चेहरे पर के उस सुकूँ को देखकर हरीश बाबू के चेहरे पर सन्तोष का गाढ़ापन छा गया। बूढ़ी औरत दुआएँ देती हुई आगे बढ़ गई।
हरीश बाबू ने दुकान का ताला लगाया और घर की तरफ चल दिए। रास्ते में उन्होंने जेब में हाथ डाला।
"आज समझ में आया... तिजोरी की पूँजी तो बस जेब का बोझ है, असली 'दिन की पूँजी' तो वे दुआएँ हैं जो आज कमा कर घर ले जा रहा हूँ।" मुस्कुराते हुए आसमान की तरफ देखा और बुदबुदाए।
अन्त की साँसें
बारूद के काले धुएं ने, वो नीला अम्बर निगल लिया,
इंसान के अंधी नफरत ने, हँसता हुआ चमन कुचल दिया।
जहाँ कभी थी नदियों की कल-कल, और पेड़ों की घनी छाँव,
वहाँ आज बस सन्नाटा है, मर गए शहर, उजड़ गए गाँव।
वो बम के गोले, वो मिसाइलें, वो बारूदी अन्धियारा,
जीत की खातिर इंसानों ने, अपनी ही साँसों को मारा।
जहरीली गैसों के तांडव ने, पत्तों का यौवन छिन लिया,
सूख गए सब बाग-बगीचे, पंछियों का जीवन छिन लिया।
जो शहर कभी था धड़कन जैसा, कंक्रीट का कंकाल हुआ,
नदियों का पानी तेजाब बना, हर कोना-कोना निवाला काल हुआ।
हवा हो गई इतनी कड़वी, फेफड़ों में अब अंगारे हैं,
हम जीत गए जो जंग मगर, खुद अपनी ही किस्मत हारे हैं।
पर देखो! उस मलबे के नीचे, काली राख को चीरकर,
एक नन्हा अंकुर उग आया, विपदा का सीना बींधकर।
वो चीख-चीख कर कह रहा, इंसानी इस नादानी से—
"ये धरती फिर सज सकती है, प्यार और बस पानी से।"
ग़ज़ल
नदी में जो दिखे वो चाँद बेकल है
मगर क्यों काँच के परदे में धूधल है।
धरा और चाँद की दूरी नहीं घटती,
उदासी में कटा जो वो ही इक पल है।
भटकता फिर रहा जो दिल वो है अक्खड़
मोहब्बत का कोई भी अब नहीं हल है।
दुआओं से बदल जाती है ये दुनिया
मुक़द्दर की लकीरें भी मुसज्जल है
हक़ीक़त की ज़मीं पर पैर हैं जलते
विभा ख़्वाबों का रिश्ता सिल्क मख़मल है।
Friday, 5 June 2026
अन्त की साँसें
कमलजीत ने अपने बख्तरबन्द सूट का हेलमेट उतारकर जहरीली हवा का सूचकांक देखा। रीडिंग लाल निशान से भी ऊपर थी। लगभग अट्ठाइस-तीस वर्ष पहले यह जगह ‘सपनों का शहर’ कहलाती थी—चौड़ी सड़कें, दोनों ओर अमलतास -गुलमोहर के वृक्ष और बीच से बहती एक शान्त नदी। वहीं आज यहाँ केवल कंक्रीट के काले कंकाल खड़े थे। नदी एसिड से भरे नाले में बदल चुकी थी और हवा में बारूद की गन्ध स्थायी रूप से घुल गई थी।
“सर, यहाँ हमें कुछ नहीं मिलेगा। यह पूरा इलाका ‘डेड ज़ोन’ घोषित हो चुका है,” युवा सैनिक कबीर ने सूखी धरती पर कदम रखते हुए कहा। उसके पैरों के नीचे मिट्टी राख बनकर उड़ने लगी। कमलजीत एक टूटे हुए फ्लाईओवर के नीचे बैठ गया। उसकी आँखों के सामने अतीत का वह भयावह दृश्य तैर उठा। दो महाशक्तियों के अहंकार ने जब युद्ध का रूप लिया, तब केवल इंसान ही नहीं मरे थे, प्रकृति भी लहूलुहान हो गई।रासायनिक हमलों और परमाणु विस्फोटों ने महीनों तक आसमान को काले धुएँ से ढके रखा। सूरज की रोशनी धरती तक न पहुँच सकी। जंगल, बाग-बगीचे और खेत कुछ ही दिनों में राख हो गए। पेड़ समाप्त हुए तो वर्षा रूठ गई, जलस्रोत सूख गए और जीवन का चक्र टूट गया। युद्ध ने कुछ महीनों में वह सब नष्ट कर दिया, जिसे प्रकृति ने करोड़ों वर्षों में सँवारा था।
“हम समझते रहे कि हम शहर क्या देश बचाने के लिए लड़ रहे हैं,” कमलजीत की आवाज़ भर्रा गई, “लेकिन हम यह भूल गए कि शहर इमारतों से नहीं, उसकी साँसों से बनता है। जब पर्यावरण ही नहीं बचा, तो शहर भी मर गया।”
कबीर की नज़र अचानक फ्लाईओवर की एक दरार पर पड़ी। मलबे और जहरीली मिट्टी के बीच एक नन्हा-सा हरा अंकुर सिर उठाए खड़ा था। कंक्रीट के उस मरुस्थल में वह जीवन की पहली दस्तक था।
“सर! देखिए!” कबीर उत्साह से चिल्लाया।
कमलजीत झुककर उस अंकुर को देखने लगे। उनकी आँखों में वर्षों बाद चमक लौटी। उन्होंने अपने वॉटर-पैक से कुछ बूँदें उसकी जड़ों में टपका दीं।
“इंसान के युद्ध ने शहर मिटा दिया, कबीर,” वे धीमे से बोले, “लेकिन प्रकृति हार मानना नहीं जानती। यदि हम अपनी बंदूकें हमेशा के लिए रख दें, तो यह खोया हुआ शहर फिर साँस लेना सीख सकता है।”
"हाँ! हाँ इस उजड़े हुए शहर में यही एक अकेला अंकुर है, पर इसके भीतर एक पूरे भविष्य का जंगल हरा हो रहा हैं।" अति उत्साहित कबीर सर ऊँचा कर हथेली जोड़े आकाश को आह्वान कर रहा था।
दोनों सैनिकों ने उस नन्हे पौधे को सलाम किया।
Thursday, 28 May 2026
सूत और साँसें
“देख भैया! कितना बड़ा केला!” बुचिया ने आधा साफ़ केला उठाकर अपनी फटी फ्रॉक में छुपा लिया। उसके चेहरे पर वही चमक थी, जो किसी अमीर बच्चे के हाथ नया खिलौना आने पर होती है।
मंगरू मिट्टी में पड़े बताशे और भीगे चने बीन रहा था। दूसरों की पूजा का बचा हुआ प्रसाद, उनके कुछ अंश का भोजन था।
“अरे! हटो वहाँ से…! पूजा की जगह अपवित्र कर दी तुम लोगों ने!” उनके पीछे से तभी तेज आवाज गूँजी—
गाँव की मुखिया चाची अपनी भूली हुई चाँदी की थाली लेने लौटी थीं। बच्चों को देखकर उनका चेहरा तमतमा उठा।
बुचिया डरकर पीछे हट गई, पर मंगरू वहीं खड़ा रहा। उसके हाथ में मिट्टी का एक छोटा-सा दीया था, जिसमें थोड़ी-सी घी की परत और सिंदूर बचा था।
“इतनी मिठाई छोड़कर ये गन्दा दीया क्यों उठा रखा है?” चाची ने झुँझलाकर पूछा।
“माई ने कहा है, बरगद बाबा के पैर का सिन्दूर और घी लगा देंगे तो हमारे बाबू की भी साँस लम्बी हो जाएगी। भोर से भट्ठे पर खाँस रहे हैं…” मंगरू ने सहमे स्वर में कहा— वाक्य पूरा होते-होते उसकी आवाज भर्रा गई।
“आज मैंने अपने पति की लम्बी उम्र के लिए सोने का धागा चढ़ाया था, और इस बच्चे ने टूटी मिट्टी के दीये में अपने पिता की पूरी जिन्दगी समेट ली।” बुदबुदाती चाची के हाथ काँपने लगे और चाँदी की थाली अचानक बहुत डगमगाने लगी। कुछ क्षण तक वे निश्चल खड़ी रहीं। फिर चुपचाप थाली में बचे फल और लड्डू बुचिया के फ्रॉक में डाल दिए। बच्चे खिल उठे। वे दौड़ते हुए मुसहरी की ओर भाग गए। बरगद की छाँव अब भी वैसी ही थी-
बोझ/कल्पना/मृगतृष्णा?
26-07-2026 2+6+0+7+2+0+2+6=25 2+5=7 प्रदर्शनी का आख़िरी दिन, आज सभागार के बीच में चित्रकार ने एक बड़ा-सा दर्पण रख दिया था- भीड़ उसके सामने...

