डायरी लेखन
सोमवार, ५ जून २०२३
"भाइयों! सरकार ने इस साल हर किसान को 'स्वर्ण-फसल’ किट मुफ्त देने का फैसला किया है। जो कि आपके पसीने का सम्मान है।" आज गाँव के चौपाल पर एक सरकारी जीप आकर जैसे रुकी सरपंच गजानन ने ऊँची आवाज में जुटे हुए किसानों की भीड़ को सम्बोधित करते हुए कहा।
"देख सोमनाथ, अपनी तो किस्मत चमक पड़ी! इस किट की वजह से, अब न तो बीज के पैसे देने हैं, न खाद के और न छिड़काव वाली दवा के। बिजली-पानी भी मुफ्त की व्यवस्था पहले से ही हो रखी है। हमारे तो मौजे ही मौजे हो गए। इस बार तो हमारा बचा हुआ पैसा हमारे मौज-मस्ती में उड़ पाएगा।" भीड़ में खड़े दीनू ने अपने बगल में खड़े सोमनाथ को कोहनी मारते हुए कहा।
"दीनू भाई, यह मुफ्त की चीज नहीं है, यह एक कर्ज है जो हमें अपनी धरती को ही चुकाना पड़ेगा।” सोमनाथ ने बड़े ही शान्त भाव से किट थामते हुए कहा।
मंगलवार, ११ जुलाई २०२३
आज अपने खेत के किनारे लगे नीम के पेड़ के नीचे लेटा दीनू बीड़ी फूँक रहा था और सोमनाथ पसीने से तर-बतर होकर अपने खेत में निराई कर रहा था।
"अरे सोमनाथ! क्यों जान सूखा रहा है? सभी चीजें तो मुफ्त के हैं। थोड़ा-बहुत भी उग गया अपने वारे-न्यारे हैं, और नहीं भी उगे तो अपना क्या जा रहा है? जेब से तो एक धेला नहीं लगा।" दीनू ने उपहास उड़ाते हुए कहा।
"यही तो तुम्हारी भूल है दीनू। जब सरकार हमें कुछ मुफ्त में देती है, तो हमारी जवाबदेही दोगुनी हो जाती है। वह किट किसी और के हक के भी हो सकते थे जो हमें मिले हैं। अगर मैंने इससे सोना नहीं उगाया, तो मैं उस भूखे पेट का गुनहगार हूँ जिसे यह मिल सकता था।"सोमनाथ ने निराई करते हुए ही कहा।
“अरे छोड़ो! ये किताबी बातें हैं। हम पात्र थे, इसलिए हमें मुफ्त में मिली हैं। चादर से चेहरा ढँको और सो जाओ।" मुँह फेरते हुए दीनू ने कहा।
शुक्रवार, ६ अक्टूबर २०२३
आज गाँव में कृषि अधिकारी मुआयने के लिए आए। दीनू के खेत में पीली और बीमार फसल खड़ी थी। उसने खाद का डिब्बा आधे दाम में शहर में बेच दिया था और खेतों में पानी देने के बजाय ताश खेलने में वक्त बिता रहा था! "साहब, बीज ही खराब थे! सरकार से हमें धोखा मिला।" जब अधिकारी ने दीनू से उसकी फसल के बारे में पूछा, तो दीनू रोते-रोते हुए कहने लगा।
उसे लेकर अधिकारी सोमनाथ के खेत पर गए। उसकी फसल ऐसी थी कि देखकर सभी की आँखें चौंधिया रही थी। सोमनाथ ने न केवल उन बीजों का सही उपयोग किया था बल्कि समय से पानी-दवा का छिड़काव किया था और अपनी मेहनत से मिट्टी को ऐसा तैयार किया था कि फसल से पैदावार उम्मीद से दुगनी होने वाली थी।
"दीनू! बीज खराब नहीं थे, तुम्हारी नीयत खराब थी।" कृषि अधिकारी ने सबके सामने कहा।
"साहब। गरीब, मूर्ख आदमी हूँ, एक मौका और दे दो।" कहते हुए दीनू ने कृषि अधिकारी के पाँव पकड़ लिया।
"नहीं दीनू भाई! जवाबदेही का मतलब सिर्फ हिसाब देना नहीं होता है बल्कि उस भरोसे को कायम रखना भी होता है जो व्यवस्था ने हम पर किया होता है। तुमने 'रेवड़ी' को 'खैरात' समझा, जबकि वह 'पूँजी' थी। हम अपाहिज नहीं थे कि सरकार ने हमें बैसाखी थी, बल्कि उसने हमें पंख दिए थे।" सोमनाथ ने आगे बढ़कर दीनू को उठाते हुए कहा।
"तदबीर से ही तक़दीर बदली जा सकती है!” एक तरफ़ अधिकारी अपने डायरी में नोट लिख रहा था और दूसरी तरफ़ दीनू खाली हाथ अपने घर लौट रहा था।
