Monday, 11 May 2026

माँ की प्रतिक्षाएँ

 


ना कोई गिला

दंश सहे की कला

प्रश्न माँ जबाब माँ

स्व सोती गीला

स्वेच्छा से स्वत्व त्याग

थाती धैर्य का मिला

माँ प्रतीक्षा करती है

द्वार पर टँगी घड़ी की तरह

हर लौटते क़दम की।

सिर्फ़ सन्तान के लौट आने की नहीं,

कभी अपने नाम से पुकारे जाने की भी।

सुबह की पहली रोटी के साथ

वह रख देती है

दिनभर की छोटी-छोटी आशाएँ—

बिना झुँझलाए कोई बात कर ले,

कोई उसके सिरदर्द को भी

समाचार समझे।

कोई पूछे—

“आज तुमने क्या खाया?”

जैसे वह बरसों पूछती रही है सबसे।

वह प्रतीक्षा करती है

कि बच्चे जब सफल हों

तो परिचय में सिर्फ़ पिता का नाम नहीं,

उसकी जागी रातें भी दिखाई दें।

रसोई से बाहर की एक सुबह का,

जहाँ चाय की भाप में

उसके अपने सपने भी उबलें थे!

बरसों पुराने सन्दूक में

उसने कुछ इच्छाएँ छिपा रखी हैं—

एक अधूरी यात्रा,

एक बिना टोके हुई नींद,

एक शाम

जब वह सिर्फ़ अपने लिए सज सके।

पुरानी अलमारी में तह किए

अपने अधूरे शौकों की—

कभी फिर से रंग उठाने की,

कभी किताबों में लौट जाने की।


माँ को प्रतीक्षा रहता है

उस फ़ोन का

जो केवल काम से न आया हो,

जिसमें कोई कहे—

“बस तुम्हारी आवाज़ सुननी थी।”


वह प्रतीक्षा करती है

कि घर के निर्णयों में

उसकी चुप्पी को सहमति न माना जाए।

कभी-कभी माँ को

अपने ही जन्मदिन की तारीख़

याद रखे जाने की प्रतीक्षा भी होती है।

वह चाहती है कि बुढ़ापे में

उसे बोझ नहीं, घर का इतिहास समझा जाए।

उसे प्रतीक्षा रहती है

कि घर में उसकी उपस्थिति

सिर्फ़ सुविधा की तरह नहीं,

एक सिद्धान्त की तरह महसूस की जाए।

माँ प्रतीक्षा करती है—

त्योहारों पर

सिर्फ़ पकवानों की तारीफ़ न हो,

उसकी थकान भी पढ़ी जाए

बच्चे सिर्फ कमाने वाले हाथ न बनें,

उसके काँपते हाथ भी थामने वाले बनें।

बिना किसी अपराधबोध के

उसे भी आराम मिल सके।

और इन सब के सबसे भीतर—

एक बहुत धीमी, बहुत निजी प्रतीक्षा—

कि जिस तरह उसने

सबको बिना शर्त अपनाया,

कभी कोई उसे भी उसी तरह थाम ले।

माँ की प्रतिक्षाएँ

बहुत ऊँची-ऊँची मीनारें नहीं होतीं—

होती हैं बस इतना कि

जिस घर को उसने जीवन दिया,

उस घर में उसका अपना एक कमरा,

अपना एक समय, और एक सम्मान

सभी की आँखों में बचा रहे। 


Saturday, 9 May 2026

मातृ दिवस : आस की गूँज



तपकर रिश्तों की अगन, सींचा सबका भाग

माँ का अनुपम त्याग है, जीवन उसका राग

 मेघ गर्जन—

माँ की सिखलायी

धुन में नाचे

मृण शिल्प में

बोसा जुड़ रहा है—

मातृ दिवस


पहला तारा

माँ सिखला रही है

गाँठ खोलना

Thursday, 30 April 2026

०१ मई : लघुकथाकार श्री मधुदीप जयन्ती

पंचर की मरम्मत

“कारखाने की घड़ियों की टिक-टिक मेरे सिर में हथौड़ों की तरह बज रही थी। मेरे पेडू का दर्द किसी तेज़ धार वाले चाकू की तरह उसे भीतर से काटता लग रहा था। मेरे माथे पर पसीने की बूँदें चमक रही थीं, जबकि मैं काँपते हाथों से सिलाई मशीन पर कपड़े की तह लगा रही थी। मैंने हिम्मत जुटाकर सुपरवाइजर के पास जाने का फैसला किया। ‘स्साब, साहब! बहुत तेज़ दर्द है... क्या मैं आज एक घंटे जल्दी जा सकती हूँ?’ मैंने सुपरवाइजर से पूछा।

“तुम लड़कियाँ काम पर क्यों आती हो? तुम पुरुष कर्मचारियों का ध्यान भटकाने ही तो आती हो!” सुपरवाइजर ने अपनी फाइल से नज़रें हटाईं और ज़हरीली मुस्कान के साथ पूरी फैक्ट्री के सामने चिल्लाकर कहा।

मैं सन्न रह गई। पूरी यूनिट में सन्नाटा छा गया। आस-पास काम कर रहे पुरुष सहकर्मियों की नज़रें मुझे चुभने लगीं। लज्जा और अपमान की एक लहर मेरे चेहरे पर दौड़ गई। मुझे मेरे दर्द से ज़्यादा गहरा घाव उन शब्दों ने दिया था।

“नहीं साहब, व्ववो बात नहीं है..." मेरी आवाज़ मेरे ही गले में ही फँस रही थी।”

"तो फिर चुपचाप काम करो। यहाँ नखरों के पैसे नहीं मिलते। अगर ज़्यादा तकलीफ है, तो कल से आने की ज़रूरत नहीं है। बिना वेतन की छुट्टी चाहिए या नौकरी? तय कर लो," डाँटते हुए सुपरवाइजर ने अपनी कुर्सी घुमा ली थी।

मैं वापस अपनी मशीन पर आकर बैठ गई। मैं जानती थी कि मेरे घर का चूल्हा इसी दिहाड़ी से जलता है। बीमार माँ की दवाइयाँ और छोटे भाई की फीस के बीच, मैं 'बिना वेतन की छुट्टी' का बोझ नहीं उठा सकती थी। जबकि मुझे दो दिनों की विशेष छुट्टी की विशेष ज़रूरत थी! मैंने अपनी मुट्ठियाँ भींचीं और दोबारा मशीन चलाने लगी। आँखों से टपका एक आँसू कपड़े के एक कोने पर गिरा और रंगीन धागों में समा गया। वह मशीन नहीं चल रही थी, बल्कि एक मजबूर लड़की का स्वाभिमान उन भारी पहियों के नीचे कुचला जा रहा था। कारखाने का शोर फिर से शुरू हो गया, लेकिन उन पत्थर की दीवारों के पीछे मेरी जैसी हज़ारों चीखें आज भी अनसुनी रह जाती इसलिए मैंने अदालत में जाने का कारण बनाया!” साक्षात्कार लेने आई पत्रकार रमा को एकता ने पूरी कथा सुना दी।

“आपने ऐसा क्या किया?”

“मशीन के हैंडिल से पहले सुपरवाइजर के सर पर पीछे से वार कर दिया। फिर तो गार्ड के आने तक में अनेक महिलाएँ भी सहयोगी हो गई थीं। सुपरवाइजर के सर पर बँधा पट्टी और हाथ-पैर पर चढ़ा प्लास्टर मेरी बातों की गवाही दे सकता था!”

“क़ानून के शरण में जाने के लिए क़ानून को अपने हाथों में लेना क्या ज़रूरी था?”

“-सुविधा और अधिकार के बीच बस एक ‘कानून’ का ही तो फासला होता है। हाँ! मुझे सुपरवाइजर को फोड़ना नहीं चाहिए था। लेकिन बिना प्रमाण के क़ानून अपना काम नहीं करता है! दया झुककर माँगी जाती है और अधिकार—सीधे खड़े होकर ही लिया जा सकता है। आपने बाहर अदालत की पंक्तियाँ (कारखाने के गेट पर एक नया नोटिस चिपका था) 

“औरत की नौकरी-औरत की कमाई सिर्फ पैसों की नहीं होती... कभी-कभी उसे अपना आत्मसम्मान भी कमाना पड़ता है। महिला कर्मचारियों को उनके सुविधानुसार हर महीने दो दिनों का ‘विशेष अवकाश’ मिलेगा। पढ़ी होगी!”

रमा ने कुछ देर तक अपने डायरी में भी लिखी उन पंक्तियों को देखा—

उसके आँखों में न आँसू थे, न गुस्सा—बस एक गहरी समझ थी।

“कागज़ पर लिखे शब्द तब तक खोखले हैं, जब तक उनके पीछे कानून की स्याही और अधिकार की मुहर न हो। मैंने ने जब इसे पढ़ा था तो बरसों से दबा मेरा भी विशेष दर्द जैसे पहली बार शब्द बनकर बाहर आया हुआ लगा।” बाहर आकर रमा बुदबुदा रही होती है। पत्रकारिता शुरू करने के पहले एक कारखाना में दस सालों तक रमा ने भी बहुत कुछ सहा था— आज उसके नासूर पर दवा लगी थी।

Sunday, 26 April 2026

मोक्ष में दरार या प्रलय में सेन्ध?

26 जनवरी 3026

जहाँ तक नज़रें जाती हैं पृथ्वी पूरी तरह शुद्ध, नियंत्रित और निष्प्राण सन्तुलन का पर्याय बन चुकी है। दर्द, प्रतीक्षा, प्रेम—ये शब्द इतिहास-संग्रहालय की धूलभरी वस्तुएँ हो गए हैं। मनुष्य अब जन्म नहीं लेते हैं बल्कि बनाए जाते हैं—‘सिंथेसिस चैम्बर्स’ में, जहाँ कोशिकाएँ विभाजित होकर एक-सी आकृतियाँ, एक-सी बुद्धि और एक-सी स्थिरता के साथ बाहर आती हैं!

26 फ़रवरी 3026

इरा—प्राचीन इतिहास की शोधकर्ता—खोई हुई अनुभूतियों की खोज में है, आज उसे तहखाने में एक जर्जर डायरी मिली। पन्नों पर बार-बार एक शब्द उभर रहा था— ‘माहवारी’ और नीचे काँपते अक्षरों में लिखा था— “यह सृजन की प्रतीक्षा का लाल रंग है।”

इरा ठिठक गई।

“प्रतीक्षा…?” उसने फुसफुसाया, “जब सब कुछ निर्धारित है, तो प्रतीक्षा कैसी?”

उसी क्षण उसके पेट के निचले हिस्से में एक अनजाना कसाव उठा—धीरे-धीरे बढ़ता हुआ। यह कोई दर्ज पीड़ा नहीं थी, कोई प्रोग्राम्ड संकेत नहीं था। कुछ ही पलों में उसके सफेद वस्त्र पर लाल रंग फैलने लगा—गर्म, जीवित, अनियोजित। उसकी उँगलियाँ काँप उठीं।

26 मार्च 3026

“तुम्हारे भीतर एक सुप्त जीन सक्रिय हुआ है। शायद सिंथेसिस प्रक्रिया में कुछ प्राचीन डीएनए अनुक्रम पूर्णतः निष्क्रिय नहीं किए जा सके थे। तुम्हारा शरीर… जैविक चक्र की ओर लौट रहा है।” आज लैब में जाँच के बाद डॉक्टर-रोबोट की निष्प्राण आवाज गूँजी।

“लौट रहा है…?” इरा ने इस वाक्य को बार-बार ऐसे सुना जैसे कोई भूली हुई धुन फिर से कानों में उतर आई हो। वह चुपचाप अपने कक्ष में लौट आई।

उसने उस लाल धब्बे को फिर देखा—वह मात्र रक्त नहीं था, वह एक आरंभ था… किसी अनकहे संबंध का, किसी अधूरे चक्र का।

उस रात उसने डायरी के अंतिम पृष्ठ पर लिखा—

“मैं एक ‘नमूना’ नहीं, एक ‘संभावना’ हूँ। मेरे भीतर एक ऐसी जगह है, जहाँ मशीनें नहीं पहुँच पातीं—जहाँ जीवन स्वयं आकार लेना चाहता है, बिना आदेश, बिना प्रतिकृति।”

26 अप्रैल 3026

“इरा को ‘त्रुटिपूर्ण इकाई’ घोषित किया गया है। उसे पुनर्संरचना हेतु तत्काल प्रस्तुत होना होगा।” सायरन के संग सन्देश गूँजा। इरा ने सन्देश सुना और फिर शान्त भाव से डायरी को सीने से लगा लिया। कुछ क्षण बाद उसने उसे तहखाने की उसी दीवार में छुपा दिया, जहाँ से वह मिली थी। बाहर दुनिया वैसी ही है -निर्मल, नियंत्रित और शान्त। पर उस शान्ति में अब एक हल्की-सी दरार पड़ चुकी थी। क्योंकि कहीं न कहीं, किसी और शरीर में… कोई और ‘सुप्त जीन’ जागने को तैयार  हो गया है।  और प्रकृति— वह कभी पूरी तरह मौन नहीं होती।


26 अप्रैल 2026 -रचना काल


Friday, 17 April 2026

17 अप्रैल -अन्तरराष्ट्रीय हाइकु दिवस

युद्धान्तहीन—

पृष्ठों के युद्धपोत 

बाड़ के पास

##

ख़िंज़ाँ की शाम—

ग्रहण में ही रहा

आह या वाह

##

तुम और मैं

ना/क्यों ‘हम' नहीं रहे—

ख़िज़ाँ की शाम

##

भिन्नार्चा स्थल

शरणार्थी शिविर—

युद्धान्तहीन

##

स्मृति पट्टिका—

आँसू से भींगे पाँव

पत्ती कुचले

##


छड़ी कोर से

इंद्रायुध छू लेना

झाग बौछारें—


शमी का फूल

पुनः ताल में तैरे—

पृथ्वी दिवस

Wednesday, 15 April 2026

बन्धनों का बसन्त

लघुकथा 1️⃣ 

“तुम्हें तितली बनना है! तुम कब तितली बन जाओगी ?” कमरे की खिड़की पर रखे गमले में एक हरी-सी इल्ली कई दिनों से चुपचाप पड़ी थी। राधिका रोज़ उसे देखती और पूछती। घर के भीतर उसकी अपनी दुनिया भी कुछ वैसी ही थी—नियमों के धागों में लिपटी, उम्मीदों के खोल में बन्द।

“अच्छी लड़कियाँ ज़्यादा उड़ान नहीं भरतीं, बस! अपने घर की होकर रह जाती हैं…। सभी कन्याओं का तितली बनना ठीक नहीं होता है।” उसकी माँ की आवाज़ रोज़ गूँजती रहती। राधिका मुस्कुरा देती है, पर उसकी आँखें खिड़की के उस कोने में टिक जाती हैं, जहाँ इल्ली अब कोकून बन चुकी थी। एक सुबह, हल्की धूप के साथ कोकून फटा। रंगों से भरी एक तितली बाहर आई—धीरे-धीरे पंख फैलाए, फिर एक झटके में उड़ गई। राधिका ने गहरी साँस ली।

“देखा? तितली बनकर उड़ गई न? अब कहीं मसल दी जाएगी!” उसके पीछे से माँ ने कहा।

“हाँ माँ… वह तितली बन गई।” राधिका ने खिड़की से बाहर झाँकते हुए कहा—

थोड़ी देर रुकी, फिर धीमे से पूछा-

“और मैं…! मेरे लिए माँ तुम कब कहोगी, बनना तितली!?”

“जा, बन जा तितली! -वायुयान चालक बनने की तैयारी कर ले!” माँ ने कहा

“देखना माँ! मेरे पंखों के रंग किसी अन्य की हथेलियों में नहीं दिखेंगे!” उस दिन पहली बार, राधिका ने खिड़की बन्द नहीं की।

लघुकथा 2️⃣

“ऐसी रहस्यमयी दुनिया जिसमें सेवा-निवृत्त पदाधिकारी गुम हो जाता है और वर्षों बाद पता चलता है कि वह किसी दूसरी औरत के साथ नई ज़िन्दगी बसा ली! उसी दुनिया में साठ साल का शिक्षक, अट्ठाइस साल की शिक्षिका से शादी कर लेता है—यह समय किस काल से गुजर रहा है?” पूछते हुए सीमा की आवाज़ में खिंचाव था।

“तुम्हें आज इस फिसलने वाले काल की बेचैनी क्यों है?” राघव ने चाय का कप रखते हुए पूछा।

“बेचैनी?” सीमा हँसी, पर हँसी में कड़वाहट थी— “जाके पाँव न फटी बिवाई, वह क्या जाने पीर पराई!” व्यंग्य की धार तीखी थी।

“अगर तुम सच में इस पीर से गुजर रही हो, तो कहो… यूँ पहेलियों में बात करोगी तो कोई नहीं समझेगा।” पहले राघव कुछ पल चुप रहा, फिर पूछा।

सीमा ने खिड़की के बाहर देखा। सामने स्कूल का प्रांगण था। एक कोने में बासठ साल के सेवानिवृत्त गुरुजी खड़े थे—सफेद बाल, हल्की मुस्कान। उनके पास एक नई शिक्षिका थी—हँसती, कुछ कहती हुई।

 “आइए प्रिय। आज तो आप सच में तितली लग रही हैं।” गुरुजी ने सहजता से उसे पुकारा।

“देखा? यही है आज का फिसलपट्टी का काल। उम्र, मर्यादा, संबंध—सब घुल गया है जैसे।” सीमा का चेहरा कस गया था।

“या फिर हम देखने का नज़रिया खो चुके हैं। क्या पता… दोनों ने अपने जीवनसाथी खोए हैं, दोनों अकेले हैं! एक-दूसरे की खाली जगह को भरने का प्रयास कर रहे हों। हर रिश्ता छल नहीं होता, सीमा।” राघव ने धीरे से कहा।

सीमा मौन साधे रही। उसके चेहरे का ज्यामिति विभिन्न आकार दर्शा रहा था।

“तितली बनना हमेशा देह का ही नहीं होता है, कई बार यह मन का खोल तोड़ने का साहस भी होता है।” राघव ने आगे कहा— शायद वे ‘तितली बनना’ नहीं, ‘बनना तितली’ सीख रहे हैं—देर से ही सही।”

सीमा की आँखें फिर उस दृश्य पर टिक गईं। गुरुजी और वह शिक्षिका अब साथ-साथ चल रहे थे—धीमे, मगर सन्तुलित कदमों से। सीमा ने पहली बार उनके चेहरे पढ़ने की कोशिश की—वहाँ कोई उछाल नहीं था, बस एक थकी हुई शान्ति थी… जैसे दो टूटे पंखों ने मिलकर उड़ना सीख लिया हो।

“शायद… हर उड़ान उच्छृंखल नहीं होती।”-उसने धीमे से कहा।

“और प्रत्येक तितली बनने की कहानी, एक जैसी भी नहीं होती।” राघव ने मुस्कुराते हुए कहा।




Friday, 3 April 2026

मैग्मा की रसीद

“आज का साहित्य चरित्रहीनों का होता जा रहा है।” वार्षिकोत्सव की साहित्यिक गोष्ठी अपने अन्तिम पायदान पर थी। मंच पर बैठे वरिष्ठ साहित्यकारों के बीच हो रही परिचर्चा में बहस छिड़ी हुई थी— और नीचे बैठी साहित्यिक श्रोताओं की भीड़ में मेधा चुपचाप सब सुन रही थी। अभी-अभी उसे अपने लिखे उपन्यास के लिए प्रतिष्ठित साहित्य पुरस्कार मिला था। लेकिन बधाइयों से ज्यादा उसके कानों में फुसफुसाहटें पड़ रही थीं—

“समझ रहे हो न, कैसे मिला होगा पुरस्कार…”

“अकेली औरत इतनी जल्दी ऐसे कहाँ पहुँचती है…”

“आजकल स्त्रियाँ खुद अपने चरित्र का पतन कर रही हैं, तभी समाज बिगड़ रहा है।” मंच पर बैठे एक वरिष्ठ कवि ने उदाहरण देते हुए कहा— मेधा का साथ उसके धैर्य ने छोड़ दिया। वह उठी और बिना बुलाए ही मंच की ओर बढ़ गई। हॉल में सन्नाटा छा गया। “क्या मैं कुछ कह सकती हूँ?” उसने माइक थामते हुए पूछा।

“चारित्रिक पतन सिर्फ़ स्त्रियों के लिए ही क्यों कहा जाता है? अगर कोई स्त्री वैश्या बनती है, तो क्या पुरुष सहभागी नहीं होता? जो स्त्री को मैला कहकर खुद को साफ़ घोषित कर देते हैं, वे आखिर किस आईने में खुद को देखते हैं?” अनुमति की प्रतीक्षा किए बिना ही वह बोल भी पड़ी— भीड़ में हलचल हुई। मंच पर बैठे चेहरे असहज हो उठे।

“गाँव में भीड़ द्वारा स्त्रियाँ प्रताड़ित की जाती हैं, तो उसके चरित्र को मोहरा बनाया जाता है, कार्यालय में किसी स्त्री को पदोन्नति मिल जाए, तो उसकी मेहनत नहीं, उसके चरित्र पर सवाल उठते हैं। और हद तो यह है कि साहित्य—जो समाज को दिशा देने वाला कहलाता है—वहाँ भी इस सोच से अछूते मनुष्य नहीं हैं।” मेधा ने आगे कहा— अब उसकी आवाज़ और गम्भीर हो गई थी—

“दोष अगर है, तो आईने का नहीं, देखने वाली नज़रों का है। लेकिन यहाँ तो आधा आईना ही धुंधला कर दिया जाता है… ताकि धब्बे सिर्फ़ स्त्री के चेहरे पर दिखें।” सभागार कुछ पल के लिए बिल्कुल शान्त हो गया। फिर पीछे की पंक्ति से एक महिला खड़ी हुई और उसने ताली बजाई। उसके बाद दूसरी, फिर तीसरी… देखते ही देखते पूरा हॉल तालियों से गूँज ज उठा। मंच पर बैठे वही वरिष्ठ कवि धीरे से अपना चेहरा झुका चुके थे। शायद पहली बार उन्हें एहसास हुआ था— कि चरित्र का दर्पण किसी एक लिंग का नहीं होता।

मेधा के मन में उठे तूफ़ान और उसके द्वारा की गई बेबाक बात ने सभा को स्तब्ध कर दिया था। उस शाम, जब वह स्मृति-चिह्न लेकर घर लौट रही थी, उसने एक पुराने, जर्जर काठ के पुल पर रुकना चाहा।

शाम गहरा रही थी, और वातावरण में धुंध सी छा गई थी। मेधा पुल के किनारे, काठ के जंगले पर टेक लगाकर बैठ गई। वह हताश और अकेली महसूस कर रही थी। चारों ओर सूखी पत्तियों का ढेर था, जो उसके मन की सूखी उम्मीदों की तरह बिखरा था। पुल के परे, पेड़-पौधों से भरी धुंधली और उदास दुनिया दिख रही थी। अचानक, उसकी नज़र दूर, धुंध में उड़ते हुए पक्षियों पर पड़ी। वे काली, परछाइयों की तरह लग रहे थे, एक समूह में, मुक्त और निर्भीक। वे उस धुंध को चीरते हुए, किसी अनदेखी दिशा में उड़ रहे थे। मेधा ने उन्हें देखते हुए एक गहरी साँस ली। "मैं भी तो इन पक्षियों की तरह हूँ। पितृसत्तात्मक धुंध को चीर कर, अपनी स्वतंत्र पहचान और अपनी योग्यता के आधार पर आगे बढ़ रही हूँ। सभा में मैंने जो बात रखी, वह बिलकुल सही थी। अपनी मेहनत और प्रतिभा के लिए सम्मान की मांग ही तो रखी थी।" बुदबुदाते हुए उसने अपनी स्मृति-चिह्न को ध्यान से देखा, जो अब उसके हाथ में एक मशाल की तरह लग रही थी।

Wednesday, 1 April 2026

रेवड़ी की जवाबदेही


 डायरी लेखन

सोमवार, ५ जून २०२३

"भाइयों! सरकार ने इस साल हर किसान को 'स्वर्ण-फसल’ किट मुफ्त देने का फैसला किया है। जो कि आपके पसीने का सम्मान है।" आज गाँव के चौपाल पर एक सरकारी जीप आकर जैसे रुकी सरपंच गजानन ने ऊँची आवाज में जुटे हुए किसानों की भीड़ को सम्बोधित करते हुए कहा।

"देख सोमनाथ, अपनी तो किस्मत चमक पड़ी! इस किट की वजह से, अब न तो बीज के पैसे देने हैं, न खाद के और न छिड़काव वाली दवा के। बिजली-पानी भी मुफ्त की व्यवस्था पहले से ही हो रखी है। हमारे तो मौजे ही मौजे हो गए। इस बार तो हमारा बचा हुआ पैसा हमारे मौज-मस्ती में उड़ पाएगा।" भीड़ में खड़े दीनू ने अपने बगल में खड़े सोमनाथ को कोहनी मारते हुए कहा। 

"दीनू भाई, यह मुफ्त की चीज नहीं है, यह एक कर्ज है जो हमें अपनी धरती को ही चुकाना पड़ेगा।” सोमनाथ ने बड़े ही शान्त भाव से किट थामते हुए कहा।

मंगलवार, ११ जुलाई २०२३

आज अपने खेत के किनारे लगे नीम के पेड़ के नीचे लेटा दीनू बीड़ी फूँक रहा था और सोमनाथ पसीने से तर-बतर होकर अपने खेत में निराई कर रहा था।

"अरे सोमनाथ! क्यों जान सूखा रहा है? सभी चीजें तो मुफ्त के हैं। थोड़ा-बहुत भी उग गया अपने वारे-न्यारे हैं, और नहीं भी उगे तो अपना क्या जा रहा है? जेब से तो एक धेला नहीं लगा।" दीनू ने उपहास उड़ाते हुए कहा।

"यही तो तुम्हारी भूल है दीनू। जब सरकार हमें कुछ मुफ्त में देती है, तो हमारी जवाबदेही दोगुनी हो जाती है। वह किट किसी और के हक के भी हो सकते थे जो हमें मिले हैं। अगर मैंने इससे सोना नहीं उगाया, तो मैं उस भूखे पेट का गुनहगार हूँ जिसे यह मिल सकता था।"सोमनाथ ने निराई करते हुए ही कहा।

“अरे छोड़ो! ये किताबी बातें हैं। हम पात्र थे, इसलिए हमें मुफ्त में मिली हैं। चादर से चेहरा ढँको और सो जाओ।" मुँह फेरते हुए दीनू ने कहा।

शुक्रवार, ६ अक्टूबर २०२३

आज गाँव में कृषि अधिकारी मुआयने के लिए आए। दीनू के खेत में पीली और बीमार फसल खड़ी थी। उसने खाद का डिब्बा आधे दाम में शहर में बेच दिया था और खेतों में पानी देने के बजाय ताश खेलने में वक्त बिता रहा था! "साहब, बीज ही खराब थे! सरकार से हमें धोखा मिला।" जब अधिकारी ने दीनू से उसकी फसल के बारे में पूछा, तो दीनू रोते-रोते हुए कहने लगा।

उसे लेकर अधिकारी सोमनाथ के खेत पर गए। उसकी फसल ऐसी थी कि देखकर सभी की आँखें चौंधिया रही थी। सोमनाथ ने न केवल उन बीजों का सही उपयोग किया था बल्कि समय से पानी-दवा का छिड़काव किया था और अपनी मेहनत से मिट्टी को ऐसा तैयार किया था कि फसल से पैदावार उम्मीद से दुगनी होने वाली थी।

"दीनू! बीज खराब नहीं थे, तुम्हारी नीयत खराब थी।" कृषि अधिकारी ने सबके सामने कहा।

"साहब। गरीब, मूर्ख आदमी हूँ, एक मौका और दे दो।" कहते हुए दीनू ने कृषि अधिकारी के पाँव पकड़ लिया।

"नहीं दीनू भाई! जवाबदेही का मतलब सिर्फ हिसाब देना नहीं होता है बल्कि उस भरोसे को कायम रखना भी होता है जो व्यवस्था ने हम पर किया होता है। तुमने 'रेवड़ी' को 'खैरात' समझा, जबकि वह 'पूँजी' थी। हम अपाहिज नहीं थे कि सरकार ने हमें बैसाखी थी, बल्कि उसने हमें पंख दिए थे।" सोमनाथ ने आगे बढ़कर दीनू को उठाते हुए कहा।

"तदबीर से ही तक़दीर बदली जा सकती है!” एक तरफ़ अधिकारी अपने डायरी में नोट लिख रहा था और दूसरी तरफ़ दीनू खाली हाथ अपने घर लौट रहा था।

Wednesday, 25 March 2026

वर्ण पिरामिड : शीर्षक - रामनवमी

  1. स्त्र
  2. याग
  3. हे राम
  4. हरे रामा
  5. त्राण में न्यारा
  6. थके का सहारा 
  7. अनादि पर वारा

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  • हाँ!
  • दर्दी
  • मनोज्ञ
  • रामजस
  • मेरा मैं स्वयं
  • राम तत्व की लौ
  • मर्यादाओं की नदी

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  • ढला सूर
  • लम्बी सैर के संग—

  • प्रेमिल गीत
  • 🎶 
  • लुढ़के आँसू—
  • तारों पर सितारें
  • चमक रहे
  • ^^^
  • फौजी की चिट्ठी—
  • भोर तक में कौड़ा(अलाव)
  • बुझ ही गया
  • ^^^
  • कुनबा जुटा
  • चौके के झिर्री पर-
  • प्रेम दिवस
  • ^^^
  • संगनियों का
  • अनकहा सुलझा—
  • खिलीं सरसों
  • ^^^
  • मदनोत्सव—
  • नथ बन्द के संग
  • स्वप्न की कथा
  • ^^^
  • फूलचोर की
  • कुत्ता पर भौं टेढ़ी—
  • नूतन वर्ष
  • ^^^
  • क्रिशकिंकल—
  • कॉकटेल की गन्ध
  • कैब में फैली

Saturday, 21 March 2026

शिखर का पृष्ठ

“पिछले साल कई शल्य-चिकित्साओं से गुज़री हैं, देख लो, इनके पेट की क्या हालत हो गई है— छोटे-छोटे टीले जैसे उभर आए हैं…” बहू धीरे-धीरे सास की साड़ी का पल्लू सरकाकर निशान दिखला रही थी। सास की कराहने की आवाज़ में दर्द था, पर उनकी आँखों में एक अजीब-सी जिद भी थी। 

“जाने से पहले भी इनके कमर में दर्द था। चिकित्सक ने एमआरआई करवाने को कहा था, लेकिन इन्होंने कहा—पहले साहित्योत्सव से लौट आऊँ, फिर इलाज़ करवा लूँगी!”

“माँ! ये कोई समझदारी है? अपनी उम्र और हालत देखी हैं आपने?”कमरे में बैठे बेटे की आवाज़ अचानक बहुत ऊँची हो गई—

बेटे की बात पूरी भी नहीं हुई थी कि उसके पिता ने चश्मा उतारकर मेज़ पर रख दिया। उनकी आँखों में वर्षों का धैर्य और स्मृतियों की चिंगारी तैर रही थी।

“तुम्हारी माँ ने कुछ ग़लत नहीं किया…” वे धीरे, लेकिन ठहरकर बोले—

“तुम्हें याद है? जब इन्हें तेज़ बुख़ार होता था, तो यही सर पर पट्टी बाँधकर तुम्हारे लिए टिफ़िन बनाती थीं… खुद काँपती रहती थीं, पर तुम्हें भूखा नहीं जाने देती थीं।” बेटा का सर झुक गया।

“इतने सालों में न जाने कितनी बार अपने दर्द को किनारे रखकर इन्होंने घर, परिवार और तुम्हारी ज़रूरतों को चुना है, और आज अगर अपने शौक—अपने सपने—के लिए एक बार अपने ही कष्ट को पीछे कर दिया, तो तुम्हें यह ग़लत लग रहा है?” कमरे में घनघोर सन्नाटा उतर आया।

“इनकी उम्र अब कहाँ है कि हर बार ‘बाद में’ कहकर टालती रहें! स्त्रियों की भी कुछ इच्छाएँ होती हैं, जो इलाज़ से पहले पूरी हो जानी चाहिए।” पिता ने माँ की ओर देखा—

माँ की आँखों में नमी तैर रही थी।

“हमें क्षमा कर दो माँ। हम नासमझ भूल कर रहे थे- माँ भी तो इंसान होती है। मन्दिर की माँ बनाना चाह रहे थे! अगली बार के साहित्योत्सव में हम भी साथ चलेंगे।”बेटा धीरे से माँ के पास आया, उनके कन्धे पर हाथ रखा और धीमे स्वर में कहा।

Tuesday, 17 March 2026

मिट्टियों पर रीझा दिल

विश्वविद्यालय के सभागार में चर्चा चल रही थी—विषय था “प्रवासी भारतीय और उनकी निष्ठा”। श्रोताओं के बीच बैठे लोग गम्भीर थे, जैसे हर शब्द किसी पुराने घाव को कुरेद रहा हो।

“फ़र्ज़ कीजिए, कभी ऐसा समय आए कि अमेरिका और भारत के रिश्ते बिगड़ जाएँ और अमेरिका भारत पर मिसाइल हमले करने लगे। तब अमेरिका में बसे भारतीय क्या चाहेंगे—अमेरिका की जीत और भारत की हार?” मंच से एक युवक ने सवाल उछाला। सभागार में खामोशी वापस लौटी लहरें सी उतर आई।

“क्रिकेट की तरह क्या वे वहाँ के नमक का हक़ अदा करेंगे? भले ही कोई मिसाइल उस गाँव पर गिरे जहाँ उनके अपने घरवाले रहते हों?” युवक ने आगे कहा।

पतझड़ में गिरे आखरी पत्ता सा सवाल हवा में तैरता रह गया। कुछ लोग असहज होकर कुर्सियाँ खिसकाने लगे।

तभी पीछे की पंक्ति से एक अधेड़ स्त्री उठीं। उसके चेहरे पर थकान नज़र आ रही थी, “उत्तर क्यों नहीं देना चाहेंगे?” उन्होंने स्थिर आवाज़ में कहा। सभागार का ध्यान उनकी ओर मुड़ गया।

“मेरा बेटा अमेरिका में रहता है। कई बार उसकी कुछ बातों से मुझे लगा कि वह अपनी जड़ों को भूल रहा है। मैं तो कई मंचों से उस पर देशद्रोह का आरोप लगाने की माँग तक कर चुकी हूँ।” उन्होंने धीमे-धीमे कहना शुरू किया— लोग चौंक गए।

“लेकिन…” उन्होंने हल्की मुस्कान के साथ जोड़ा—

“अमेरिका में जितने भारतीयों से मिली हूँ, वे भारत में रहने वाले बिहारी, बंगाली, राजस्थानी से ज़्यादा सिर्फ भारतीय लगे—कई बार तो उनसे बहुत ज़्यादा।” सभागार में सन्नाटा अमावस्या सा गहरा गया।

“वे वहाँ की मिट्टी में रहते हैं, पर उनकी धड़कनें अभी भी यहाँ की धूल से जुड़ी रहती हैं। वे भारत की हार कभी नहीं चाहेंगे।” थोड़ा रुककर उन्होंने युवक की ओर देखा—

“और जहाँ तक क्रिकेट की बात है… वह खेल है। खेलों में तो एक ही देश के दो दल भी होते हैं—अभ्यास के लिए, सीखने के लिए। वहाँ जीत-हार से दिल नहीं टूटते।”

उनकी आवाज़ हल्की काँप रही थी-

“पर युद्ध… युद्ध में तो दिल ही टूटते हैं। और जिनके दिल दो मिट्टियों के बीच धड़कते हों, वे किसी की हार नहीं—बस अपनों की सलामती चाहते हैं।”

सभागार में सुई/पिन भी गिरती तो लाउडस्पीकर पर शोर गूँज जाती-



माँ की प्रतिक्षाएँ

  ना कोई गिला दंश सहे की कला प्रश्न माँ जबाब माँ स्व सोती गीला स्वेच्छा से स्वत्व त्याग थाती धैर्य का मिला माँ प्रतीक्षा करती है द्वार पर टँ...