Wednesday, 14 April 2021

सत्य कथा

 

आज सुबह गुचुरामन में गुजरा.. पोछा का 'डंडा' घुमाते हुए सहायिका ने मेरे फोफले पर नमक छिड़क दी,-"पहिले की तरह रोज-रोज त आप नहीं निकलती होंगी आँटी जी?"

"नहीं.. किसी से भेंट ही नहीं होना है तो कहाँ जाना है..!"

बेटियों की सख़्त हिदायत थी कि मुझे घर से बाहर नहीं निकलना है..। घर में कर्फ्यू लगा ही है... लेकिन लघुकथा की बात हो तो कुछ-कुछ होने लगता है...। मन में था कि आज भीड़ कम होगी.. टीवी पेपर और फेसबुक की खबरें सबको दुबकने में सहायक है.. । शाम 5 बजे से लघुकथा गोष्ठी थी 4 बजे ओला बुक हुआ वो 5 मिनट का दिखाते-दिखाते/शो करते-करते 4:35 में आया। समय पर पहुँच पाना कठिन था... देर से पहुँचना बिलकुल पसन्द नहीं। ओला में बैठते ड्राइवर को ओटीपी बताते उसने पूछा, "कहाँ जाना है?"

"कदमकुआँ!"

"किस रास्ते से चलें?

"ओटीपी से रास्ता का पता नहीं चलता है क्या?" मेरा खिंजा और भन्नाया स्वर थोड़ा तेज निकल गया। अफसोस हुआ कि नहीं होना चाहिए था।

"इतना न ई फ्लाईओवर बन गया है और कई जगहों पर वन वे हो गया है न आँटी जी कि ग्राहक से ही रूट पूछना पड़ता है।"

"मुझे पहले ही आधा घण्टा का देरी हो चुका है जिधर से जल्दी पहुँचा सकें उधर से ले चलिए।"

ड्राइवर का घुमाना शुरू हुआ बेली रोड से स्टेशन, स्टेशन से घुमाते हुए कदमकुआँ।

मंगलवार को हनुमान मन्दिर और महावीर मन्दिर में पट बन्द होना चकित करने वाली बात थी। ड्राइवर से पूछी कि "मन्दिर का पट कब से बन्द है?"

"तीन दिनवा से। कोरोना का भय दिखाकर।"

"पटना के लोग बीमारी की गम्भीरता समझ नहीं रहे हैं। हर जगह भीड़ ही भीड़ और मास्क भी नहीं लगाते।"

"मास्क लगाने से क्या हो जाएगा? आप ही बताइए क्या हो जाएगा?"

"मास्क लगाने से और थोड़ी दूर रहने से बचाव है!"

"अउरी उ रैलियन में, कुम्भ के नहान में भीड़ दिखा आपको?"

"वे सब के सब मूर्ख हैं.. सभी बीमारी फैला रहे तो क्या हम भी वही करें?"

"ई बताइए... दिनभर में हमलोग सौ सवा सौ लोगन के हाथ से पइसा लेते हैं अउरी इहाँ से उहाँ घूमते हैं...,"

"जब इतना ज्ञान है तो बताओ इतनी मौत कहाँ से टीवी पेपर दिखा रहा लाशें दिखा रहा और तो और जलाने की मशीन गल गयी.. जलाने की जगह नहीं बच रही।"

"आँटी जी ई त आप वहाँ जाकर ही देखकर आएँ या किसी बड़ी साजिश का पर्दाफाश हो सका त जनता जागेगी.. ,"

ड्राइवर रॉक विभा रानी श्रीवास्तव शॉक

Saturday, 10 April 2021

पश्चाताप

 "माता-पिता के सामने जाकर केवल खड़ा हो जाने से, रिश्तों पर इतने समय से जम रही धूल साफ हो जाएगी..!" मीता ने अपने पति अमित से कहा।

"सामने जाकर खड़ा होने का ही तो हिम्मत जुटा रहा हूँ, जैसे उनसे दूर जाने की तुम्हारे हठ ठानने पर हिम्मत जुटाया था।"

"मेरे हठ का फल निकला कि हमारी बेटी हमें छोड़ गयी और बेटा को हम मरघट में छोड़ कर आ रहे ड्रग्स की वजह से..। संयुक्त परिवार के चौके से आजादी लेकर किट्टी पार्टी और कुत्तों को पालने का शौक पूरा करना था।"

"उसी संयुक्त चौके से बाकी और आठ बच्चों का सुनहला संसार बस गया..।"

"हाँ! अब मेरे भी समझ में आ गया है, शरीर से शरीर टकराने वाली भीड़ वाले घर में एच डी सी सी टी वी कैमरा दादा-दादी, चाचा-चाची, बुआ की आँखें होती हैं..,"

"अब पछतात होत क्या...,"

"आगे कोई बागी ना हो... उदाहरण अनुभव के सामने रहना चाहिए...!"

Sunday, 28 March 2021

फाल्गुनोत्सव की शुभकामनाएँ

 रंग, खुशी, उत्साह सब न जाने कहाँ गया ,

देखो ,ये कोरोना दूसरी होली भी खा गया !

( संजय सनन)

हमारा ही खा गया जिनको दूसरों की चिन्ता है

उनका ना तो मस्ती छूटा है ना धमाल जो हन्ता है

>>>>><<<<<

01. चैता दंगल–

बाँस के जंगल में 

सीत्कार गूँजें

02. मुट्ठी में दाबे

फरही और गेंहूँ–

भोर का सुर

03. वृद्धावलम्ब

बेड़ी से बंधा टॉमी–

मूर्ख दिवस

04. कोरे पन्ने में

केसर की खुशबू–

अप्रैल फूल

>>>>><<<<<

18 मार्च 2021

सुबह बैंगलोर से पटना आने के लिए तैयार ही हो रही थी कि रवि श्रीवास्तव का फोन गया, मेरे हेल्लो कहने पर उसने कहा,

"सोच रहा हूँ कि आपको बताऊँ कि नहीं बताऊँ, कॉल करने के बाद ध्यान आया कि इतनी सुबह तो आप यात्रा पर निकलने वाली होंगी?"

"जैसी भी सूचना हो तुम सहज मुझे बता सकते हो। अच्छी हो या बुरी हो.. अब मैं किसी भी तरह की सूचना के लिए हर पल तैयार रहती हूँ और तटस्थ हो जाती हूँ। चिन्ता बिलकुल नहीं करो। अंदाज़ा तो लगा ही ली हूँ कि तुम कोई बुरी सूचना दोगे। बस बता दो क्या और किसकी है?" मैंने कहा।

"सुनील जी के पिता का देहान्त रात ग्यारह बजे हो गया।" बेहद उदास स्वर में रवि ने कहा।

"नियति की जैसी मर्जी... बाकी लोगों को भी सूचित कर देना।

मैं ज्यादा देर उलझी नहीं रह सकती थी कि सुनील जी अभी किस मनोस्थिति में होंगे... फोन करूँ या फोन ना करूँ.. क्योंकि हवाईअड्डा के लिए ओला कैब बुक करना था..।

व्हाट्सएप्प पर ,"🙏बेहद दुःखद...।" सन्देश भेज ओला बुक की और हवाईअड्डा आ गयी...। दिमाग ना उलझने से बचा नहीं रह पाया.. सुनील जी और सुनील जी के पिता के बारे में सोचता रहा..। पिता जी का स्वास्थ्य ठीक नहीं रहने के कारण सुनील जी चिन्तित रहा करते थे। हवाईअड्डा से उन्हें फोन की लेकिन वे उठा नहीं पाए।

पन्द्रह महीने और पाँच दिन के बाद पटना पहुँचकर घर में धूल और बदबू के फैले साम्राज्य के मकड़जाल फँसी मैं छींक और दिमाग में हलचल से बेहोशी में डूबने-उतराने लगी...। 

22 मार्च 2021

"मेरे पसन्द के दो ही रंग श्वेत और श्याम हैं... श्वेत जिन्दगी से मिले बाकी सब रंगों को सहेज लेता है और श्याम उसे सहारा देता है...। 

आज कुछ सामान्य मनोस्थिति में आते सुनील जी को दो-तीन बार फोन की। वे शायद अति व्यस्त रहे होंगे.. मेरा फोन नहीं उठा पाए तो "चित्त शान्त हो तो फोन कीजियेगा..!" पुनः उन्हें व्हाट्सएप्प पर सन्देश भेज दी।

कुछ देर के बाद सुनील जी का फोन आया। उनसे उनके पिता जी के स्वास्थ्य और मोक्ष पर बातें हुई। बिस्तर पर पड़ा पिता भी बरगद का छाँव होता है। नियति के आगे बस सभी मजबूर हैं। अब सुनील जी अपने घर के बरगद हो गए। उनके सर पर पगड़ी बाँधने का रस्म 29 मार्च 2021 को होना था।

23 मार्च 2021

"उम्मीद है भाई सुनील कुमार जी से आप सभी की बात हुई होगी.. 29 मार्च 2021 को उनका पगड़ी का रस्म होगा ... होली भी है लेकिन उनके साथ खड़ा होना भी उतना ही आवश्यक है... क्या हम एक समय तय कर लें जिसमें हम सभी एक संग चलें ?" व्हाट्सएप्प समूह में मैं सन्देश दे दी।

कल सोमवार 29 मार्च 2021 को भाई सुनील जी से मिलने... संजय कुमार सिंह, रवि श्रीवास्तव, अभिलाष दत्त, एकता कुमारी, इन्दल जी, करुणा श्रीवास्तव जी और मैं ... शाम के साढ़े छ बजे निकलेंगे...

Monday, 15 March 2021

धर्म अपना-अपना

 

मेरे लिए मुख्य महत्त्वपूर्ण बात यह है कि किसी ने मुझपर विश्वास किया..

बचपन से देखती आयी कि घर का मुख्य द्वार दिन में कभी बन्द नहीं होता था...। रात में भी बस दोनों पल्ला सटा दिया जाता था..। ... बाहर दरवाजे पर पहरेदार होते थे...। धीरे-धीरे समय बदला तो रात में मुख्य दरवाजा अन्दर से बन्द होने लगा। पहरेदार तो अब भी होते हैं लेकिन विश्वास कम हो चला है..। अपार्टमेंट का जमाना आया तो पल्ले के पहले लोहे का दरवाजा लगने लगा है। दिन में भी मुख्य द्वार में सीकड़ साँकल जंजीर कई आभूषण जड़े जा रहे..। पल्ले में लगे आँख के सुराख से झाँकने लगे हैं हम.. । अब चोरी कम डकैती ज्यादा होते हैं...।
'लॉक्ड प्रोफाइल' से फेसबुक सूची में जुड़ने के आमंत्रण से मुझे पहले भी कोई परेशानी नहीं थी.. अपना घर बन्द रखना दूसरों के द्वारा दिया दबाव है..।पत्थर अहिल्या में परिवर्तित सा... आपके स्वीकार करते लॉक्ड प्रोफ़ाइल खुल जा सिम-सिम वाली स्थिति... निरीक्षण के बाद आपके स्तर का नहीं लगे तो ब्लॉक का ऑप्शन.... यही सोच के आधार पर आज पुनः 'लॉक्ड प्रोफाइल' से फेसबुक सूची में जुड़ने के आमंत्रण को स्वीकार करते मैसेंजर हथेली का प्रतीक उभरा और दिखा

विभा का संदेश :- 25/11/15, 7:03 PM का शुभ संध्या
वर्ण पिरामिड विधा लिखती हैं आप ?

प्रभा का सन्देश :- 👋

विभा का संदेश  :- कैसी हैं ? छः साल प्रतीक्षा का मेहनताना क्या होगा ?

प्रभा का सन्देश :- अच्छी हूँ दी, आपकी मित्र सूची में पूर्णिमा शर्मा दी को देखा
6 साल प्रतीक्षा... मैंने भी तो कुछ खोया ही, एक अच्छी मित्रता

विभा का सन्देश :- हम परिचित पहले भी थे...

प्रभा का सन्देश :- ह्म्म्म, नंबर दीजिये व्हाट्सएप्प  का
पहले से? पर कैसे???
क्या हुआ?

विभा का सन्देश :- सोशल मीडिया के युग और फेसबुक है महोदया... कहीं न कहीं भेंट हुई होगी ... तभी आपसे विधा लेखन का सन्देश दी... मुख्यतया मैं सम्पादक हूँ तो पत्रिका-पुस्तक हेतु सामग्री की तलाश...

प्रभा का सन्देश :-सब कुछ रहस्यमय
व्हाट्सएप्प  करिये , भेजती हूँ रचनाएँ

विभा का सन्देश :- अभी पुस्तक के लिए कोरोना पर आधारित और पत्रिका के लिए माँ-पिता और अप्रैल से जून तक आने विषय पर रचनाओं हेतु भटक रही हूँ

lekhymanjoosha@gmail.com
पत्रिका हेतु

प्रभा का सन्देश :- कोरोना पर कई कविताएं हैं, वामा पर अपने मांगी थी भेजती हूँ व्हाट्सएप्प  ही कर दूं ?

विभा का सन्देश :-विश्व हिन्दी ज्योति , कैलिफ़ोर्निया, अमेरिका हेतु कोरोना
 vishvahindijyoti@gmail.com

प्रभा का सन्देश :- भेजती हूँ, कुछ और परिचय वगैरह तो नही भेजना?

विभा का सन्देश :- नाम और शहर...
आप अपने फेसबुक प्रोफाइल को लॉक्ड क्यों रखी हैं ?

प्रभा का सन्देश :- अब तो आप मित्र हैं अब कहाँ लॉक है
वैसे 6 साल इंतजार???
संबोघन तो दीजिये श्रीवास्तव महोदया

विभा का सन्देश :- यह तो मुझे पता है कि फेसबुक सूची में जुड़ते प्रोफ़ाइल लॉक्ड नहीं रह जाता है लेकिन जब तक नहीं जुड़ते तब तक प्रोफ़ाइल लॉक्ड होती है... तब तक लॉक्ड रखने के पीछे क्या आधार या मंशा है यह जानना है ?

नवम्बर 2015 में आपको सन्देश दी थी जिसका जबाब अभी भी नहीं दी आप... मार्च 2021 ... 6 साल की ओर अग्रसर

प्रभा का सन्देश :- मैं नई थी, हर सामने वाले को शक से... पता नही कौन असली ID से है और कौन नकली माने तो एक डर था। पर अब अभ्यस्त हूँ । पर एक बात के लिए sure भी कि इतना याद रखना सबके लिए तो नही ही होगा

मुझे याद रखा तो मैं कोई तो हूँ ही...

विभा का सन्देश :- कौन असली आई डी से है कौन नकली आई डी.... यह तब तक पता नहीं चल सकता जब तक आप उनसे या आपका परिचित उनसे मिला ना हो सशारीरिक ? और 6 साल बहुत होता नए को पुराना बनाने के लिए .. साइबर क्राइम करने वाला कोरोना वायरस की तरह है जो रूप बदल लेना आसान... एक वैक्सीन को असफल बना ले रहा 
आप विशेष तो हैं

प्रभा का सन्देश :- चलो अच्छा है रिश्तेदार भी निकल ही आऊँगी

विभा का सन्देश :- सम्बोधन उम्र के हिसाब से तय कर लें

और आगे भी बहुत सारी बातों का आदान-प्रदान हुआ... लॉक्ड प्रोफाइल में दो बहनें जो कैद थीं....

Thursday, 4 March 2021

महोत्सव

04 मार्च 1921 – 04 मार्च 2021

साहित्यकार फणीश्वर_नाथ 'रेणु' जी का जन्मशती महोत्सव




01. विवर्ण भीत–

पत्रों की पेटिका में

पाखी के अण्डे

02. बाल विवाह–

तितली और कंचे

डोली में रखे

03. आँसू सिक्ताक्स

पश्चदर्शी शीशा में–

रण प्रारम्भ

04. सिमटे पाल

सरि से सिन्धु तक–

क्रौंच का रोर



05. अम्मू की डायरी

25 फरवरी 2018

दिल्ली से पटना आने वाली पुरवोत्तर सम्पर्क क्रांति 23 :45 में थी...  दोपहर से ही मेरी अकुलाहट बढ़ रही थी..  मुझे जल्दी भागना था.. हाँ! भाग निकलने की बैचेनी हो रही थी... साढ़े चार तक निकल ही भागी हाँ! भागते हुए निकली...

स्टेशन पहुँच ज्यों ही प्रतीक्षालय में बैठी कि बुचिया का फोन आया

"कहाँ हो अम्मू?"

"स्टेशन पर हूँ तुम कहाँ हो?

"मैं भी स्टेशन पर हूँ... मेरी ट्रेन छूट गई अम्मू... मैं क्या करूँ अम्मू... ?"

"अम्मू है तो चिंता क्यों करना...!" प्रतीक्षालय में हूँ आ जाओ सोचते हैं..."

प्रतीक्षालय में बुचिया आई , बेहद घबराई चिंतित...

"पहले तो रोनी सूरत बदलो... चिंता चतुराई चुरा लेती है..."

बहुत कोशिश की गई किसी तरह उस बोगी में कन्फर्म टिकट की व्यवस्था हो जाये ,जिस बोगी में हमारी टिकट थी... लेकिन होली का समय... घर आने का उल्लास... बिहारियों की भीड़ उमड़ी हुई थी स्टेशन पर... जेनरल टिकट लेकर ट्रेन की प्रतीक्षा शुरू हुई... रात के 2:50 में जाने की घोषणा सुन बुरा लगना चाहिए था लेकिन हम तो सेल्फी सेशन में व्यस्त हो-हल्ला किये जा रहे थे... दूसरे यात्री हमें दूसरे ग्रह का जीव समझ रहे थे... एक महिला चिल्ला भी पड़ी, उसकी नींद उचट गई हमारे ठहाके से... हम अपने तनाव को अपने ऊपर हावी नहीं होना देना चाहते थे... एक चुनौती थी, उस रात रेलयात्रा... साढ़े तीन-पौने चार के करीब रेल आई... टी. टी. की प्रतीक्षा ही रह गई रातभर.. अगर ट्रेन में चढ़ने के समय या तुरन्त टी. टी. से बात हो जाती तो शायद उसे रहम आता... लेकिन टी. टी. महोदय आये दूसरे दिन लगभग शाम को जब हमारी यात्रा समाप्ति की ओर थी... बोगी में आते उनका दूसरे यात्री से उलझना हो गया... मेरी बुद्धि जबाब दे गई कि ये महोदय तो कुछ सुनने वाले नहीं और संग है पुलिस... बुचिया को इशारा की... फिर डैने में छुपा गुजर गई यात्रा... हम लोमड़ी बिलकुल नहीं हैं..।

20 जुलाई 2019

"सुनो न अम्मू! कोई सफलता मिलने पर लोग व्यक्तित्व की सफलता नहीं मानकर चरित्र पर उँगली क्यों उठा देते हैं?

आज बुचिया थोड़ी ज्यादा ही व्यथित थी..। वो अपने को साहित्यिक समाज में स्थापित करने के प्रयास में है। साहित्य में कई खेमे बंटे हुए हैं। आगे बढ़ने वाली को लंगड़ी लगाने वाले ज्यादा मिल रहे हैं। राजनीतिक गलियारा तो बेवजह बदनाम है। कोमल मन.. क्या करें समाज के अराजक तत्व पत्थर बना रहे हैं।

"तुम इतनी समझदार और सुलझी हुई हो कि मेरा कुछ भी कहना बचकाना लग सकता है तब भी दो बात कह जाना चाहती हूँ..

–हम विचलित इसलिए हो जाते हैं कि दूसरे के संस्कार परवरिश परिवेश से उपजी बातों के लिए खुद को जिम्मेदार समझने लगते हैं.. होना नहीं चाहिए न ?

–बहुत पुरानी बात है .. लेंगे तभी असर करेगा... जो नहीं पसन्द उसे नहीं लेते तो क्यों असर करेगा...

18 दिसम्बर 2020

"जानती हैं अम्मू मुझे मिट्टी का चूल्हा बनाना आता है! दादी सिखलाई थी, मुझे ये चूल्हा 'पारने' आता है.."बुचिया नन्ही विहँस रही थी।

"वाह मेरी सुघड़ लाडो! दादी का स्नेह जिन्हें मिला उनका जमी पर पकड़ बनाये नभ में विचरण स्वाभाविक तौर पर हो जाता है... मेरी बुचिया इसलिए ऐसी है!"

04 मार्च 2021

प्रभात खबर, दैनिक जागरण हिन्दुस्तान जैसे प्रसिद्ध अखबारों की परिचर्चा में और कई स्थानीय संस्थाओं में वह वक्ता के तौर पर आमंत्रित थी मौका था फणीश्वरनाथ रेणु के जन्मशती महोत्सव का। वरिष्ठ साहित्यकारों के संग मंच साझा करना और उसके संचित ज्ञान तथा सधा संचालन साझा नभ का कोना देखना सुखद दिवस गुजरा।



Wednesday, 17 February 2021

कील गहरा धँसा


 पार्थक्याश्रय–
आईना की किरचें
एड़ी में चुभे

>>><<<

"क्क्या आंटी! इतनी जल्दी क्यों जा रही हैं? सुनिए आपलोग आपसे भी कह रहा हूँ अंकल,  होली के बाद जाइये। होली में हम सब साथ रहेंगे तो अच्छा लगेगा।" दिनेश ने कहा।

रवि माथुर पत्नी के संग अपने बेटे के पास विदेश आये हुए थे।  हालांकि वो लोग छः महीने के लिए ही आये थे लेकिन आकस्मिक वैश्विक जंग छिड़ने के कारण लगभग पन्द्रह महीने के लिए रुक गए थे। आज वापसी थी तो बेटे के कुछ दोस्त उनसे मिलने आये और साग्रहानुरोध कर रहे थे कि कुछ दिनों के लिए और ठहर कर जाएँ।

"जाना जरूरी नहीं होता तो जरूर रुक जाता बेटा जी। पेंशन सुचारू रूप से चल सके उसके लिए लाइव सार्टिफिकेट के लिए सशरीर उपस्थिति होगी तथा एक जरुरी मीटिंग है उसमें शामिल होना है और सबसे महत्त्वपूर्ण बात कि टिकट कट गया है।"

"टिकट का क्या है उसे बदला जा सकता है। वर्त्तमान काल में सबकुछ ऑन लाइन हो रहा है। आप हमसे बहाना नहीं बनाइये। प्लीज़ रुक जाइये।" दिनेश के स्वर में बेहद दर्द नज़र आ रहा था, मानों कुछ है जो उसे बेहद सता रहा है।

"जानती है आंटी आपलोग यहाँ हैं तो हमलोगों को भी अच्छा लगता है!" दिनेश की पत्नी ने कहा।

"हाँ आंटी! बड़ों के साथ रहने से ही तो घर, घर लगता है। वरना हमें देखिए दो जन हर पल का साथ फिर भी यहाँ यहाँ दिल में ऐसा दर्द है कि आप दिखला नहीं सकता।" दिनेश ने पुनः कहा।

"जानती हैं आंटी हमारी सासु माँ के यहाँ नहीं आ पाने का बेहद दुःख है।" दिनेश की पत्नी ने कहा।

"हाँ! मेरी माँ का बीजा बार-बार रिजेक्ट हो जा रहा है। कैंसिल करने के पीछे उन्हें लगता होगा कि अकेली औरत बेटे पर ही निर्भर होगी जाएगी तो लौट पाने का कोई आधार नहीं होगा। रुक ही जाएंगी। इसलिए बीजा नहीं दे रहा है।" दिनेश ने कहा!"

"तुमलोग ही क्यों नहीं अपने देश वापस चले जाते हो?" रवि माथुर का हर्षित स्वर में सवाल था।

"यह तो पक्का तय है अंकल कि मैं अपने देश लौट जाऊँगा। दो साल में लौट जाऊँ या चार साल में लौट जाऊँ। एकलौता पुत्र होने के नाते इतना ख्याति कमा लेना चाहता हूँ कि समाज को गर्व हो सके मुझपर। पिता का देखा सपना पूरा करना चाहता हूँ। जिस देश में मेरी माँ नहीं आ सकती है उस देश में तो मुझे रहना ही नहीं है।" दिनेश ने कहा।

"एक दिन भी ऐसा नहीं जाता कि ये अपनी माँ से फोन पर बात ना करते हों। इनकी सुबह माँ से बात करने के बाद ही होती है। मुझे भी लगता है कि हमें माँ के पास ही रहना चाहिए।" दिनेश की पत्नी ने कहा।

"और नहीं तो क्या जिसके खून से मैं बना हूँ उसके लिए कुछ ना कर पाना.. ओह्ह! मैं समझा नहीं सकता अपनी बैचेनी।" दिनेश बिन जल मीन की स्थिति में दिखलाई दे रहा थ।

"तुम जो अर्जन करना चाहते हो वह तो तुम अपने देश में भी कर सकते हो..!" अंकल ने कहा।

"मुझे इस देश की एक बात बहुत व्यवहारिकता पूर्ण लगी। एक-दो महीने के बच्चे को अलग कमरे में सुलाना। वयस्क होने पर अलग कर लेना।" आंटी का स्वर कहीं दूर गए व्यक्ति सा गूँज रहा था।

सभी एक दूसरे को स्तब्धता से देख रहे थे।


Wednesday, 10 February 2021

बस यूँ

01.हिमस्खलन–

कोने से फटी चिट्ठी

डाकिया बाँटे

02.चैता के संग

ध्वनित जंतसार-

चौका चौपाल

03.खण्डों में बँटे

ओस में गीले पत्ते 

मध्याह्न तम

>>><<<

छोटी सी ही थी

तो किसी ने कहा

'अरे! बड़ी चुलबुली है

सोती कब है?

जरा नहीं थकती है!"

थोड़ी ही बड़ी हुई

तो किसी ने कहा

'अरे! इतनी चहकती परी

रेगिस्तान में जल की बूँदें सी'

और थोड़ी बड़ी हुई

तो 'सायरा बानो' सी लगती हो

चुहलबाजी में जी डरता है 

उससे आगे थोड़ी और बड़ी हुई

तो घमंडी, हिटलर, खड़ूस कहने लगे

जानते हो क्यों ?

मनमानी नहीं चलने लगी थी

खुद से प्यार होना खटकने लगी थी  ...


अपने अंगों की सुरक्षा

हर जीव करता है

तभी तो हिमपात के पहले

पेड़ों से पत्ता झरता है।

शाखाओं पर जो टिक जाता हिम

गलन पैदा करता हानिकारक

अंबरारंभ सा नजरों का भरम

जलन पैदा करता हानिकारक

Monday, 8 February 2021

निदान

भारत और वेस्टइंडीज के मध्य क्रिकेट का मैच चल रहा था और ऋत्विक जो कि क्रिकेट का ना मात्र शौकीन था अपितु अपने महाविद्यालय की क्रिकेट टीम का एक खिलाड़ी भी की आँखें टी.वी. स्क्रीन पर गड़ी हुई थी। वह भारत की वॉलिंग एवं वेस्टइंडीज की बैटिंग बड़े गौर से देख रहा था...। भारत की बॉलिंग और फील्डिंग पर वह बार-बार मोहित हुआ जा रहा था। उसे टीम के प्रत्येक सदस्य का तालमेल लुभा रहा था तो वेस्टइंडीज की बिखरी–बिखरी बैटिंग पर वह भीतर ही भीतर क्रोधित हो रहा था...।

वेस्टइंडीज के लगातार चार खिलाड़ियों के आउट होते ही उसके मुँह से अकस्मात् निकला,-"इस टीम का हार तो निश्चित है।"

बगल में बैठे उसके छोटे भाई ने कहा,-"अभी तो बैटिंग हेतु उनके खिलाड़ी बाकी हैं..। अभी से ही भैया आप ऐसा कैसे कह सकते हैं..?"

"छोटे! तू नहीं समझेगा... जहाँ बिखराव हो वहाँ हार निश्चित है... भारत ने बॉलिंग एवं फील्डिंग की तरह ही यदि आपसी तालमेल से बैटिंग की तो उनकी जीत निश्चित है।"

"हूँह.. ये.. तो है भैया!"

अपनी बात के साथ ही ऋत्विक के मन–मस्तिष्क में अंकित होने लगे नित्य प्रतिदिन के आपसी लड़ाई-झगड़े... अभी वह इन मानसिक उलझनों में उलझ सुलझ ही रह था कि बाहर से सबसे छोटा भाई रोते हुए दाखिल हुआ,-"भैया! मोहल्ले के हातिम और उसके भाई ने मिलकर मुझे पीटा है...।" इतना कहते हुए वह अपने कमरे में चला गया।

उसके मुँह से अकस्मात् निकला,-"अब मेरा कोई भाई या किसी और का भी भाई ऐसे रोता नहीं आएगा.. हम सब भाई आपस में प्यार-मोहब्बत से मिलकर उदाहरण बनकर रहेंगे और किसी भी समस्या का समाधान मिलकर करेंगे।"

Saturday, 6 February 2021

जागृत समाज

पुस्तक मेला में लघुकथा-काव्य पाठ समाप्त होते ही वे बुदबुदाये-"ईश्वर तूने आज सबकी प्रतिष्ठा रख ली।"

बगल में बैठे मुख्य अतिथि उनके मित्र के कानों में जैसे ये शब्द पड़े उन्होंने पूछा,-"क्यों क्या हुआ?"

"अरे! तुम नहीं जानते... मैं आयोज में अध्यक्षता तो जरूर कर रहा था परंतु मन में एक अजीब सा डर भी समाया हुआ था.. बकरे की अम्मा सी.. कहीं यहाँ कोई घमासान हुआ तो...!"

"क्यों?"

"ओह्ह! आज सुबह तुमने सुना नहीं क्या अयोध्या राम मंदिर के विषय में, उच्च न्यायालय का क्या निर्णय आया है..?"

"हाँ! सुना तो है... पर ऐसा आपने क्यों सोचा...?"

"तुम समझ तो सब रहे हो फिर भी पूछ रहे हो...!"

"भाई जान! आज समय काफी बदल गया है... ख़ुदा का शुक्र है। सभी समुदाय के लोग पूर्व की अपेक्षा साक्षर ही नहीं अब सुशिक्षित भी हो रहे हैं... वे जानते हैं... सम्प्रदायों की क्षति किसमें है और लाभ किसे है। फूट डालो राज करो अब सफल नहीं होने वाला।"

संध्या हो चुकी थी... एकाएक पूरा मैदान बत्तियों से जगमगा उठा।

Wednesday, 3 February 2021

वसन्तोत्सव

कुहू का शोर–

दराज में अटके

चिट-पुरजे

मेघ गर्जन–

पन्ने की नाव पर

चींटी सवार

हिमावृत्ताद्रि–

मालकौंस टंकार

तम्बू में गूँजें


≥>>>><<<<≤

–"सुनो ना ! मुझे जानना है आज के समय में अकेले का साथ कौन देता है? यानी जैसे "बिना शादी किये जीवन व्यतीत करना..?"

-"अपने शर्तों पर जीवन व्यतीत करने वालों को दूसरे का अपने दिनचर्या में प्रवेश स्वीकार ही नहीं तो उन्हें क्या फर्क पड़ता है कि उनका कोई साथ दे रहा है या नहीं दे रहा है..।"

–"विवाहित जोड़ी में से किसी एक का ही जीवित रह जाना?"

-पास में धन नहीं है तो कोई साथ देने वाला नहीं होता है। अगर धन है तो साथ देने वाले अनेक आस-पास में होते हैं...। शहद पर मक्खियों की तरह। निःस्वार्थ सहायता करने वाले विरले होते हैं। परन्तु अपवाद तो प्रत्येक जगह मिल जाता है।"

–"यह तो अकाट्य सत्य है कि तकनीकी समृद्धि ने कहीं ना कहीं अकेले रहना सीखला दिया है..?"

-"वैसे पूरी तरह यह भी सत्य नहीं है..। अपने विचारों के अनुरूप भीड़ सभी जगहों पर एकत्रित कर लिया जाता है। लगभग चालीस-पैंतालीस परिवारों का एक संगठन है 'जीवन की दूसरी पारी' । इसमें सभी लोग लगभग साठ-सत्तर वय के होंगे। एक बार इस संगठन में तय हुआ कि प्रीतिभोज किया जाए। लगभग डेढ़-दो सौ व्यक्तियों का भोजन बनना था। ऐसा केटर्टर ढूँढ़ना था जिसका भोजन लज़ीज हो। अब मस्ती करने हेतु बेवक्त की शहनाई बजाने का मौका ढूँढ़ लिया गया था। कुछ महिलाओं की मण्डली बनी कि वे लोग कुछ कैटरर्स के भोजन का स्वाद लेंगी और तब एक केटर्टर तय किया जाएगा ताकि उस सुुुनहले अवसर पर मिट्टी पलीद ना हो। स्वाद लेने वालीी मण्डली किसी दिन मध्याह्न भोजन तो किसी दिन रात्रि भोजन का स्वाद लेतीं और बिना निर्णय वापिस हो जातीं.. उस 'मुंडे मुंडे स्वादेर्भिन्ना' मण्डली का कुछ वैसा हाल था कि 

एक बादशाह के आगे पाँच आदमी बैठे थे –अन्धा, -भिखारी, -प्रेमी , -इस्लाम धर्मगुरु , -सत्य ज्ञानी

बादशाह ने पाँचों के आगे एक शे’र की अन्तिम पङ्क्ति (मिस्रा) 

“इस लिये तस्वीरे-जानान् हमने बनवाई नहीं।”

 बोल कर कहा कि, इसमें पहली पङ्क्ति को जोड़कर इसे पूरा करो।

अन्धे ने इस पद्यांश (शे’र) में पहली पङ्क्ति जोड़ते हुए कहा –

इसमें गूयाई नहीं और मुझमें बीनाई नहीं। इस लिये तस्वीरे-जानान् हमने बनवाई नहीं

भिखारी ने कहा –माँगते थे ज़र्रे-मुस्वर जेब में पाई नहीं। इस लिये तस्वीरे-जानान् हमने बनवाई नहीं।

प्रेमी ने कहा –एक से जब दो हुए फिर लुत्फ़ यक्ताई नहीं। इस लिये तस्वीरे-जानान् हमने बनवाई नहीं।

इस्लाम धर्मगुरु ने कहा –बुत परस्ती दीने-अह्मद में कभी आई नहीं। इस लिये तस्वीरे-जानान् हमने बनवाई नहीं

सत्य ज्ञानी ने कहा –हमने जिस को हक़ है मान, हक़ वो दानाई नहीं। इस लिये तस्वीरे-जानान् हमने बनवाई नहीं।

हर किसी की सोच भिन्न-भिन् होती है। संस्कृत (वायुपुराण) में एक कथन है –

मुंडे मुंडे मतिर्भिन्ना कुंडे कुंडे नवं पयः।

जातौ जातौ नवाचाराः नवा वाणी मुखे मुखे।।

जितने मनुष्य हैं, उतने विचार हैं; एक ही गाँव के अंदर अलग-अलग कुऐं के पानी का स्वाद अलग-अलग होता है, एक ही संस्कार के लिए अलग-अलग जातियों में अलग-अलग रिवाज होता है तथा एक ही घटना का बयान हर व्यक्ति अपने-अपने तरीके से करता है । 

मण्डली में सबका स्वाद अलग-अलग था... इसमें आश्चर्य कर लेने या बुरा मान लेने की आवश्यकता नहीं पड़ी। और सभी ने एक संग मिलकर स्वयं ही बनाने कानिश्चय किया और महीनों व्यस्त रहने का अवसर भी प्राप्त हुआ। 

जहाँ दीवाली के अवसर पर सबके ड्योढ़ी पर मिठाई का पैकेट रखा गया और दरवाजे को खटखटाकर दूर से ही शुभकामनाओं के संग बधाई का आदान-प्रदान हुआ था वहाँ वसन्तोत्सव के प्रीतिभोज में सामाजिक तन से तन की दूरी भी मिटी और किसी के मन में अवसाद रहा होगा तो वह भी मिटा दिया गया।"


Sunday, 24 January 2021

बालिका दिवस

 राष्ट्रीय बालिका दिवस 24 जनवरी को मनाया जाता है। इस दिन भारत की पहली महिला प्रधानमंत्री इन्दिरा गाँधी को नारी शक्ति के रूप में याद किया जाता है। इस दिन ही इन्दिरा गाँधी को भारत की पहली महिला प्रधानमंत्री बनने का अवसर मिला था।

 
पार्वती -अनसुइया माता का प्रतीक
दुर्गा शक्ति का प्रतीक
सरस्वती , ज्ञान का प्रतीक
लक्ष्मी , धन का प्रतीक
सीता , मंदोदरी, रुकमणी भार्या का प्रतीक
मीरा , राधा प्रेम का प्रतीक
गंगा  , पवित्रता का प्रतीक

 प्रतीक चिह्नों के अनुसरण का
सीख देते-देते बालिकाओं को
पत्थर बनना सिखला देते हैं
तुम कठपुतली हो
तुम्हारा एक दायरा है
लक्ष्मण रेखा खींच जतला देते हैं।

कन्या पक्ष वर पक्ष से अनुरोध करे
बेटी का पिता खड़ा कर जोड़े
बारात बराती का सेवा सत्कार
वर ढ़ाई दिन का बादशाह 
भ्रूण हत्या मिटाना नहीं चाहते
दान दहेज मिटाना नहीं मानते
बहू को बेटी बस
कह देने के लिए कह देते हैं।

मेरे बुजुर्ग मांसाहार नहीं खाते
तुम मांसाहार मत पकाओ
उसे आदेश सुना देते हैं।
बिना आँगन ड्योढ़ी का छत दिया
सहमे सिकुड़े रहने में मत किया
अधिकार की तुलना कर्त्तव्य
कई गुणा देते हैं।





सत्य कथा

  आज सुबह गुचुरामन में गुजरा.. पोछा का 'डंडा' घुमाते हुए सहायिका ने मेरे फोफले पर नमक छिड़क दी,-"पहिले की तरह रोज-रोज त आप नहीं ...