Wednesday, 28 January 2026

वनवास की विरासत

मयंक की शादी का भव्य भोज कल रात में समाप्त हुआ था।रिसॉर्ट से मेहमानों की गाड़ियों की कतार धीरे-धीरे सड़क में विलीन हो रही थी। रिसॉर्ट के एक कोने में उसके पिता ज़मीन से टिके बैठे थे—फूट-फूटकर रोते हुए। अंशु, मयंक के ताऊ का बेटा—यह दृश्य देख रहा था। उसकी आँखें भी नम थीं, परन्तु उसके सीने में दबी कड़वाहट आँसुओं से भारी पड़ रही थी।

“मयंक जी, अपनी पत्नी के साथ कहाँ चले गए? चाचा जी, इतना क्यों रो रहे हैं?” अंशु की पत्नी ने बेहद संकोच से पूछा।

अंशु ने ठंडी साँस छोड़ी, “ये आँसू आज बेमानी हैं, इन दिनों बात-बात पर चाचा जी आजकल की बहुओं पर तीखा कटाक्ष कर रहे थे।”

“तो क्या हो गया? यह तो सामान्य सी बात है। पुरानी पीढ़ी नई पीढ़ी की!” अंशु की पत्नी ने कहा।

“तुम इनका इतिहास नहीं जानती हो! हर थोड़े दिनों के बाद यही चाचा जी मेरे ननिहाल चले जाया करते थे—मेरे नाना और बड़े मामा को बुला लाने के लिए। घर में ज़रा-सी तकरार होती और घर इजलास बन जाता। मेरी माँ को ऐसे निकल जाने का आदेश जारी किया जाता, जैसे वह उस घर का हिस्सा ही न हों।”

“अंशु भैया, आप उन्हें ही क्यों दोष दे रहे हैं? दादी भेजती थीं। मेरे पिता जी क्या करते? उनकी बात न मानकर क्या वे उस घर में रह सकते थे?” पास खड़ी मयंक की बड़ी बहन बोल पड़ी।

अंशु की आँखों में बरसों पुरानी टीस दामिनी बन उतर आई, “फर्ज़ और साज़िश के बीच एक बहुत बारीक रेखा होती है,” वह बोला। “दादी की आज्ञा के नाम पर मेरी माँ को बार-बार अपमानित किया गया। आज जब मयंक सक्षम है, अपना घर बसा सकता है, तो ये रो रहे हैं—क्योंकि अब किसी को बाहर भेजने का अधिकार नहीं बचा। काश! मेरे पिता भी मयंक जैसे होते।” चाचा का रोना और तेज़ हो गया। अंशु ने अपनी पत्नी की ओर देखा। उसकी आँखों में सवाल था, उत्तर की प्रतीक्षा थी। अंशु ने चुपचाप गाड़ी का दरवाज़ा खोला और धीमे, पर दृढ़ स्वर में कहा— “जिस घर में अपनों को बार-बार बाहर भेजने की परम्परा हो, वहाँ नया गृह-प्रवेश नहीं होता!”


Tuesday, 6 January 2026

स्वाद की मर्यादा

 शान्त, सजग और आत्मसम्मान से भरी मृदुला एक बड़ी विज्ञापन एजेंसी में क्रिएटिव हेड थी। नाम की तरह ही उसका स्वभाव भी बेहद मृदु था। —न उसकी आवाज ऊँची होती थी, न उसको चालाक राजनीति आती थी और न ही उसमें दूसरों को नीचा दिखलाकर आगे बढ़ने की आकांक्षाएँ ही थीं।इसलिए वह अपनी जगह पर सदैव स्थिर रहा करती थी—

“बेटी, जिस कॉर्पोरेट दुनिया में तुम कार्यरत हो, वहाँ के लोग एक-दूसरे को काट खाने को हमेशा तैयार रहते हैं। वह तेज बत्तीस दाँतों वालों की दुनिया है—और तुम उनके बीच एक अकेली जीभ जैसी हो। इतनी सिधाई से वहाँ कैसे टिक पाओगी?” उसके पिता अक्सर वीडियो कॉल पर उससे पूछ लेते थे।और मृदुला हर बार बस! एक विश्वास के साथ मुस्कुराकर गुनगुनाने लगती थी।

कुछ समय गुजरने के बाद एक दिन उसके कार्यालय में एक भारी संकट आ खड़ा हुआ। एजेंसी का एक बड़ा क्लाइंट मुकदमे की धमकी देने लगा। कारण था—एक पुराने सीनियर मैनेजर का अहंकार और बदतमीज़ी वाला व्यवहार, जिसके कारण वर्षों की मेहनत पर पानी फिरता नज़र आ रहा था। मीटिंग रूम में बैठे और अन्य सारे कड़क आवाज़ वाले अधिकारी—कभी धमकी देने लगते, कभी दबाव बनाने की कोशिश करने लगते। लेकिन जितना वेलोग बोलते जाते मामला उतना ही बिगड़ता जा रहा था। अंततः सभी की निगाहें मृदुला पर आकर टिक गईं।

बड़े धैर्य के साथ मृदुला आगे बढ़ी। उसने न तो अपनी ऊँची आवाज़ की, न तर्कों की तलवार चलाई। उसने बड़े धैर्य और ध्यान से क्लाइंट की पूरी बात सुनी—बिना टोके, बिना एजेंसी के बचाव के लिए। फिर बड़ी विनम्रता से एजेंसी की ही चूक को स्वीकार की, और उतनी ही विनम्रता और शान्ति से समाधान रखा। उसकी भाषा में न पछतावे की बनावट थी, न सफ़ाई का दिखावा—सिर्फ़ ईमानदारी और बस! ईमानदारी थी।उसकी कोमल वाणी ने वह कर दिखाया, जो कठोर अहंकार नहीं कर पा रहा था। क्लाइंट का क्रोध बहुत हद तक शान्त हो गया, और आहिस्ता-आहिस्ता बातचीत पटरी पर लौटने लगा  —और कुछ ही देर के बाद में पुनः अनुबंध (कॉन्ट्रैक्ट रिन्यू) तैयार हो गया।

उस शाम मृदुला ने अपने पिता को फोन किया और मुस्कराते हुए कहा,

“पापा, आज उन ‘दाँतों’ को समझ में आ गया कि चबाने का काम दाँत करते हैं, लेकिन स्वाद तो हमेशा जीभ ही बताती है। दाँत आपस में टकराकर टूट सकते हैं, पर जीभ सबको साथ लेकर चलती है। मैंने निभाना सीख लिया है—बिना कठोर बने।”

फोन के उस पार पिता कुछ क्षण चुप रहे। मानों उनकी चिन्ता अब गर्व में बदल चुकी हो!

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Wednesday, 31 December 2025

लौटती राह

बरसात के बाद भीगी सड़क पर पेड़ों की परछाइयाँ काँप रही थीं, और अत्यधिक ठंड के एहसास से शाम सोने ही जा रही थी। आसमान से झरती कालिमा लिए नीली उदासी ज़मीन पर फैल रही थी, ठीक वैसी ही, जैसे राघव बाबू के मन की परछाई हो। वे बालकनी में अकेले बैठे थे। सामने खाली बेंच, बगल में ठंडी हो चुकी चाय और उनके भीतर कहीं जमता हुआ उनके घर का ही सन्नाटा। 

बाहर बहुत तेज हवा चल रही थी, और उनके भीतर—यादों की धूल, जो हर रात, थोड़ी-सी और जमती जा रही है। कभी यह उनका घर आवाज़ों से भरा रहता था—विमर्श-हँसी, चुहल-बहस, जल्दी-जल्दी फटते तकिया बिखरते बर्फ से रूई!

आज सब कुछ स्थिर था, जैसे समय ने ही उनकी साँस रोक ली हो। उनके तीन बच्चे दो बेटी और एक बेटा! लेकिन बेटा मानव आधुनिकता का शिकार! एक दिन वह विदेशी-परदेशी भीड़ में खो गया था—कहकर गया था कि “जल्दी लौटूँगा।”

पर कुछ विदाइयाँ लौटने के लिए नहीं होतीं, वे बस स्मृतियों में टिक जाती हैं—काँच की तरह, चुभती हुई। राघव बाबू को उसका जाना नहीं तोड़ सका, पर उसका बदल जाना भीतर ही भीतर उनके अन्दर कहीं दरार छोड़ रहा था! कभी जो बेटा उँगली पकड़कर चलना सीखता था, वही आज उँगलियाँ मोबाइल पर दौड़ती हैं—लेकिन जहाँ पिता का नाम ‘मिस्ड कॉल’ बनकर रह गया है।

“चाय ठंडी हो रही है, बाबूजी…” पड़ोसी लड़के की आवाज़ ने उन्हें वर्तमान में लौटाया।

उन्होंने हल्की मुस्कान ओढ़ ली—

“ठंडी चाय नहीं बेटा…। कुछ रिश्ते ठंडे पड़ जाते हैं, वही पी रहा हूँ। बिना गलती किए भी गलती ढूँढकर अच्छाई भूल जाना आसान है!”

रात गहराई। खिड़की से झाँकता आधा चाँद जैसे अधूरी बात कहकर रुक गया हो। माधव बाबू ने डायरी खोली और एक पंक्ति लिखी—

“घर इंसान के जाने से नहीं, उसके बदल जाने से सूना होता है।”

लेकिन उनकी डायरी बन्द होने के पहले उनका मोबाइल बजा-

“हैलो”

क्य्ययाऽ? सच में? मानव तुम लौट रहे हो…,” राघव बाबू की विस्फारित आँखें रक्तरंजित हो रही थीं।


Thursday, 18 December 2025

सीमांत के पहले

रात के बारह बज रहे थे। मोबाइल की नीली रोशनी में अदिति का चेहरा और भी चौकन्ना हुआ लग रहा था। स्क्रीन पर एक वीडियो चल रहा था—किसी लड़की का, आधा सच, आधी अफ़वाह। नीचे हज़ारों लाइक और सैकड़ों टिप्पणियाँ सैलाब लाने के प्रयास में भीड़ को उकसाती उमड़ रही थीं।

व्हाट्सएप्प ग्रुप में संदेश चमका—“सभी साझा करो, ट्रेंड में है। आपके भी फ़ॉलोअर्स बढ़ जाएँगे।”

अदिति की भी उँगली शेयर बटन पर ठिठक गई। वह बुदबुदा रही थी “यही तो सुनहला मौका है –पहचान बनने का, प्रमुखता से दिखने का। उसने वीडियो दोबारा चलाया। कटे-फटे दृश्य, भड़काऊ कैप्शन, और सच के नाम पर सिर्फ़ सनसनी दिख रहा था-

तभी पीछे से उसकी माँ की आवाज़ आई, “तुम! सोई नहीं अभी तक?”

“बस! एक पोस्ट डालकर सोने ही जा रही हूँ,” अदिति ने कहा।

माँ पास आकर खड़ी हो गईं। स्क्रीन पर नज़र पड़ी तो उन्होंने कुछ नहीं पूछा, बस इतना कहा—“हर रेखा ज़मीन पर नहीं खींची जाती, बेटी। कुछ उँगलियों के अधीन होती हैं।”

अदिति ने चौंककर माँ को देखा। “मतलब?”

“पोस्ट करने से पहले एक सीमा को परख लेना,” माँ ने पुनः कहा कि “इससे किसी की इज़्ज़त, सच या ज़िन्दगी आहत तो नहीं होगी? वरना भीड़ के साथ चलते-चलते हम वही बन जाते हैं, जिससे डरना चाहिए।”

उँगली काँपी। शेयर के बजाय उसने डिलीट दबा दिया। मोबाइल की स्क्रीन काली हो गई।

Tuesday, 9 December 2025

हठीला भँवर

हठीला भँवर  


थप्पड़ का सन्नाटा

रंगमंच के पीछे बने छोटे-से ‘तैयारी कक्ष’ में  बैठे आदित्य ने उत्तेजनापूर्ण स्वर में कहा, “हद हो गई यह तो। अंतराल के दौरान कार्यक्रम ठहर-सा गया था और उसी ठहराव को तोड़ने के लिए इन हम लोगों ने आधे घंटे में इतना बढ़िया पौराणिक प्रसंग तैयार कर मंच पर प्रस्तुत कर दिया, लेकिन जैसी आशा थी, वैसा तो कुछ हुआ नहीं। न तालियों की गड़गड़ाहट और न दर्शकों का उत्साह!”

विक्रम ने निराश स्वर में कहा, “हमने तो जैसे सूने में प्राण फूँक दिए! इतनी मुश्किल से तैयारी की, और मजाल है कि कोई एक बार भी बोले कि अच्छा किया! और तो और, अध्यक्ष महोदया तो कुछ बोलतीं कम से कम।”

आदित्य ने होंठों पर हल्की व्यंग्य-रेखा खिंची, “आदरणीया नीरा वाजपेयी को तुम जानते ही हो। तुझे पता है न वजह? आदरणीया को देवी-देवता, धर्म-वर्म पर प्रस्तुति पसंद नहीं। एक तो करेला, उस पर नीम चढ़ा सा है!  हम इतने आधुनिक हो गए हैं तथा साथ में विदेशी भी हो गए हैं! बस! यहीं उनके समझ से गड़बड़ हो गई।”

तभी दरवाज़े की कुंडी खड़की। कमरे में नीरा बाजपेयी कदम रख चुकी थीं— चेहरा कठोर, आँखें तपती हुई, और चाल में अनुशासन की तीखी गूँज। विक्रम के भीतर कहीं आशा थी कि अब जाकर सराहना सुनने को मिलेगी। पर उनकी आवाज़ तो मानो बर्फ पर पड़ी चोट-सी थी।

“यह क्या किया तुम लोगों ने?” उनके शब्द धारदार थे,

“संस्था की मर्यादा भी कोई चीज़ होती है। मंच पर जो प्रस्तुत किया गया है, वह हमारी संस्था के नियमों के पूर्णतः विपरीत है। मुझे पूर्व सूचना होती, तो मैं कभी अनुमति नहीं देती!”

विक्रम हतप्रभ रह गया! “आदरणीया हमने तो बस खाली समय भरने के लिए- भक्ति-भाव से—”

“बस!” नीरा ने फाइल मेज पर पटक दी। वह आवाज़ कमरे की हवा को चीरती चली गई।

“यह मेरा व्यक्तिगत मत नहीं है,” वे बोलीं, “संस्था की नीति है—कला को निष्पक्ष रखना। यहाँ न धर्म चलेगा, न राजनीति। तुम लोगों ने अच्छी नीयत से किया होगा, पर नीयत कभी नियम से बड़ी नहीं होती। मंच एक पवित्र स्थान है, और उसकी शालीनता उसकी सबसे पहली शर्त।”

कमरा अचानक बहुत छोटा लगने लगा था। पसीने की गंध के बीच अब खामोशी और अपराधबोध की परतें भी घुल चुकी थीं। विक्रम बुदबुदा रहा था- “कला का काम केवल प्रस्तुति देना नहीं, बल्कि उसके सीमित दायरे को समझना भी है। मंच की गरिमा, उसके नियम, उसकी तटस्थता— अगर इनसे बाहर कदम उठा लिया जाए, तो प्रस्तुति कला नहीं, अराजकता बन जाती है।”

Saturday, 4 October 2025

कंकड़ की फिरकी/सड़ांध की सफ़ाई


“कचरे का मीनार सज गया।” सहायक ने गोदाम की सफ़ाई के बाद चारों ओर नज़र दौड़ाते हुए कहा।

“सबके घरों से थोड़ा-थोड़ा निकलता है,”महिला ने ठंडी साँस ली,

“इसी तरह तो सागर भरता चला जाता है।बरस भर पर तो आप सफ़ाई करवाती ही हैं,” वह बोला।
महिला अचानक चिड़चिड़ा उठी, “तुम हर महीने क्यों नहीं कर देते? साल भर में भी तुम्हें टोकना पड़ता है तब होती है यह सफ़ाई! मैं अकेली क्या-क्या करूँ? बेटी-बहू होती तो बीच-बीच में हाथ बँट जाता।”

सहायक ने दिलासा देने वाले लहजे में कहा, “आप जैसी भी हैं, बहुत अच्छे से हैं। एक और घर में काम करता हूँ—वहाँ बहू की आँखों में ज़रा भी पानी नहीं है। सिर्फ़ अपने लिए खाना बनाती है। सास, पति और उसकी बेटी के लिए मैं बनाता हूँ। आपके यहाँ बेटी-बहू नहीं है, एक दुख तो है। पर जिन घरों में हैं—वहाँ भाँति-भाँति की समस्याएँ हैं!”

महिला कुछ देर चुप रही। फिर अचानक फुसफुसाई— “सुन… किसी दिन मौक़ा देखकर बहू को बता देना, उसका पति और सास मकान को ठिकाने लगाने वाले हैं…”
सहायक ठिठक गया। झाड़ू उसके हाथ से धीरे-से फिसल पड़ी। वह बुदबुदा उठा—यह सिर्फ़ कचरे की सफ़ाई नहीं थी, यहाँ घर के भीतर सड़ते रिश्तों का इलाज करने का अस्पताल है। और उससे अपेक्षा की जा रही थी, कि वह निदान बाहर भी पहुँचा दे। उसने बिना कुछ कहे झाड़ू उठाई, दरवाज़े की ओर बढ़ गया। साथ में वह बुदबुदा भी रहा था— मुखबिरों को भी टाँके लगते हैं, और कई बार सच बोलने की सज़ा चुप रहने से ज़्यादा गहरी होती है।”

—विभा रानी श्रीवास्तव, पटना

डॉ. सतीशराज पुष्करणा की ७९ वीं जयन्ती के महोत्सव में उन्हें शब्दांजलि




Wednesday, 2 July 2025

अन्तर्कथा

अन्तर्कथा


“ख़ुद से ख़ुद को पुनः क़ैद कर लेना कैसा लग रहा है?”

“माँ! क्या आप भी जले पर नमक छिड़कने आई हैं?”

“तो और क्या करूँ? दोषी होते हुए भी दुराचारी ने माफी नहीं माँगी और तुम पीड़िता होकर भी एफ.आई.आर. करने से बच रही हो…! जब मामला विश्वव्यापी हो रहा हो तो एफ.आई.आर. नहीं करना, कहीं न कहीं तुम्हारी विश्वसनीयता पर ही  प्रश्नचिन्ह लगाता रहेगा!”

“कैसे करूँ एफ.आई.आर.?”

“तो आगे भी सैदव अँधेरे में रहने के लिए तैयार रहो- जाल में फँसी हजारों गौरैया-मैना की आजादी का फ़रमान जारी हो सकता था…! तुम उदाहरण बन सकती थी। लेकिन तुमने ही स्वतंत्रता और स्वच्छंदता की बारीक अन्तर को नहीं समझा।”

“माँ!”

“तुम क़ानून-अनुशासन समझती नहीं हो या तोड़ना स्वतंत्रता लगता है?”

“माँ!”

“जब तुम पंजाब अपने घर में नहीं थी। तुम पटना/बिहार में थी, जब बिहार में शराबबंदी है तो तुमने मस्ती के नाम पर उसका उपयोग क्यों की?”


किसी-किसी दुर्घटना में अपनी भी नासमझी रहती है- जिसके कारण अपनी ही आवाज धीमी पड़ जाती है—-


Monday, 30 June 2025

आषाढ़ का एक दिन




“बुधौल लाने के लिए आपको हमारी ही टोली मिली थी, सब की सब गऊ, हमें बुद्धू बनाने की क्या आवश्यकता थी…?”

 “यहाँ आपको क्या पसन्द नहीं आया?”

 “अच्छा प्रश्न है…! दो दिनों पहले ब्याह-बहू भोज वाले स्थल पर हो रहे साहित्यिक कार्यक्रम में हम इसलिए शामिल नहीं हुए कि गरिमामयी अनुभूति नहीं हो पाएगी… और महाविद्यालय के सभागार को सपनों में बसाए हमने यात्रा की! सपनों के शीशमहल की किरचें लहूलुहान कर रही हैं…! यहाँ महाविद्यालय के सभागार के बाहर कैटरर के शामियाना, बन्द पंखे, ढुलमुलाती ये प्लास्टिक की कुर्सियाँ। सोने पर सुहागा ये ग्रामीण श्रोता! क्या इन्हें हमारी रचनाएँ समझ में भी आयेंगी?”

”आपको क्या लगता है भैंस के आगे…,”

थोड़ी देर के बाद कार्यक्रम की शुरुआत हुई और मंच पर बतौर विशिष्ट अतिथियों के रूप में शिकायतें दर्ज करती टोली को बुला लिया गया! भीषण उमस वाली गर्मी का एहसास कम हो चला जब दर्शक-दीर्घा से गम्भीर टिप्पणियाँ तालियों के गूँज के संग आने लगी।

  “तूझे तो इन ग्रामीण श्रोताओं पर शक़ था…? शहर की भीड़ तो सिर्फ अपनी रचना सुनाने आती है। जब मंच से दूसरे रचना पाठ कर रहे हों, तो बग़लगीर की गप्पें सुनती है…!”

वरिष्ठ साहित्यकार के पुण्य स्मृति पर्व पर आयोजित साहित्यिक समारोह की समाप्ति पर विदाई के समय सगुन के लिफ़ाफ़े थामते शिकायती गऊ टोली की आँखें जय/पराजय से परे सावन-भादो सी झर रही थीं…!

Tuesday, 10 June 2025

स्फुरदीप्ति

 क्या शीर्षक : ‘पूत का पाँव पालने में’ या ‘भंवर’

ज़्यादा सटीक होता?



“ज्येष्ठ में शादी के लिए मैं इसलिए तैयार हुआ था कि ‘एक पंथ -दो लक्ष्य’ बेधने का मौक़ा मिल रहा था! हनीमून के लिए रोहतांग पास-स्पीति वैली जाना और पर्यावरण दिवस के लिए होने वाली प्रतियोगिता में तुम्हारा सहयोगी होना चाहता था…!”

“तुमने ख़ूब याद दिलायी! मुझे तुमसे अपनी उत्सुकता के निदान भी जानने थे…।”

“ये हसीन वादियाँ, ये खुला आसमाँ

इन बहारों में दिल की कली खिल गई

मुझको तुम जो मिले, हर ख़ुशी मिल गई 

ऐसे में तुम अभी भी पर्यावरण दिवस में ही उलझी हुई हो? पूछ ही लो -अपनी उलझन दूर कर लोगी तो आनन्द से आगे का पल गुजर सकेगा…!”

“ग्रीष्म शिविर में पर्यावरण दिवस के विषय पर चित्र बनाकर रंग भरने वाली प्रतिभागिता में तुमने सभी को सहभागिता प्रमाण पत्र क्यों नहीं दिया? बहुत ही छोटे-छोटे अबोध विद्यार्थियों को प्रथम-द्वितीय में बाँट कर प्रतियोगिता में बढ़ने वाले द्वेष को बढ़ाने की ओर क्यों प्रेरित करना!”

“तुमने गौर से देखा, एक अबोध बच्चे ने कुँआ के अन्दर के अँधेरे को कितनी बारीकी से उकेरा और श्वेत-श्याम में ही चित्रकारी की थी…! द्वेष नहीं स्पर्धा की ओर प्रेरित करना। होड़ नहीं होगा तो समाज कैसे बदलेगा…!”


स्फुरदीप्ति

Wednesday, 7 May 2025

सहानुभूति के ओट में राजनीति

“दीदी अगर डाँटो नहीं तो एक बात कहूँ…” रात के ग्यारह बजे राजू ने कहा।

“डाँटने वाली बात होगी तो नहीं डाँटने की बात कैसे कह दूँ? तुमसे डरने लगूँ क्या…!”

“आप किसी से कहाँ डरती हैं? सभी को डाँटती हैं। डाँटने में तो आप सबके सामने भी नहीं चूकतीं।”

“सबके सामने डाँटने लायक बात होती ही क्यों है? क्या डरूँ कि कहीं हिन्द-पाक की लड़ाई आज से ही शुरू न हो जाए. . डाँटते समय मैं यह थोड़े देखती हूँ कि तुम बहू के ससुर हो, पोता के दादा हो, सेवानिवृत हो गए हो, उम्र हो गई है. ..। डाँट खाने वाले का ख़ेमा भी तो बन जाता है…! बहुत हमदर्द पैदा हो जाते हैं. . .! वैसे डाँट के प्रतिशत का अधिक-से-अधिक अंक अख़्तर⁩ के खाते में है : अगर किसी को दरार डालने का इरादा हो तो एक बार कोशिश ज़रूर करना चाहिए. . .! पेट्रोल डालना ही है तो अचूक वाण चलाएँ : अभी देश भी हिन्दू-मुस्लिम खेमे में बाँटा गया हुआ है-। हद है! ड्योढ़ी के बाहर साफ़ करूँ कि आस्तीनों को-!”

“सत्य कथन, डाँटने और डाँट खाने वाले के बीच जब तक कोई तीसरा माचिस पेट्रोल का प्रयोग नहीं करता है तबतक मामला उलझता नहीं है।” 

“वरवो की काकी -कनियावो की काकी की भूमिका प्रबल कभी-कभी सफल हो जाती है। चलो डाँट ही लेना, बात बता ही देता हूँ! आप जो तीन तस्वीर दी थीं, उस पर मुझे भी कहानी लिखनी है, शानदार कथानक सूझा है।”

“तुमने तो कहा था कि, “एक तस्वीर पर तो कहानी लिखी नहीं जाती है, तीन-तीन तस्वीरों पर कोई कैसे कहानी लिखेगा. . .!” चलो अच्छा है! लिख लो। कम से कम आगे से यह तो नहीं कहोगे कि खलिहर खुराफात करती है. . .! ख़ुद तो लिखना नहीं होता है, बच्चे की जान साँसत में डालती हैं. . .!”

“मूर्खों की ज़मात से आगे ग़लती नहीं होने की प्रत्याभूति /गारन्टी (Guarantee) का वारन्टी (warranty) या जमानत (सेक्योरिटी) कौन लेगा।

वनवास की विरासत

मयंक की शादी का भव्य भोज कल रात में समाप्त हुआ था।रिसॉर्ट से मेहमानों की गाड़ियों की कतार धीरे-धीरे सड़क में विलीन हो रही थी। रिसॉर्ट के एक ...