युद्धान्तहीन—
पृष्ठों के युद्धपोत
बाड़ के पास
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ख़िंज़ाँ की शाम—
ग्रहण में ही रहा
आह या वाह
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तुम और मैं
ना/क्यों ‘हम' नहीं रहे—
ख़िज़ाँ की शाम
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भिन्नार्चा स्थल
शरणार्थी शिविर—
युद्धान्तहीन
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युद्धान्तहीन—
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बाड़ के पास
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ख़िंज़ाँ की शाम—
ग्रहण में ही रहा
आह या वाह
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तुम और मैं
ना/क्यों ‘हम' नहीं रहे—
ख़िज़ाँ की शाम
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भिन्नार्चा स्थल
शरणार्थी शिविर—
युद्धान्तहीन
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लघुकथा 1️⃣
“तुम्हें तितली बनना है! तुम कब तितली बन जाओगी ?” कमरे की खिड़की पर रखे गमले में एक हरी-सी इल्ली कई दिनों से चुपचाप पड़ी थी। राधिका रोज़ उसे देखती और पूछती। घर के भीतर उसकी अपनी दुनिया भी कुछ वैसी ही थी—नियमों के धागों में लिपटी, उम्मीदों के खोल में बन्द।
“अच्छी लड़कियाँ ज़्यादा उड़ान नहीं भरतीं, बस! अपने घर की होकर रह जाती हैं…। सभी कन्याओं का तितली बनना ठीक नहीं होता है।” उसकी माँ की आवाज़ रोज़ गूँजती रहती। राधिका मुस्कुरा देती है, पर उसकी आँखें खिड़की के उस कोने में टिक जाती हैं, जहाँ इल्ली अब कोकून बन चुकी थी। एक सुबह, हल्की धूप के साथ कोकून फटा। रंगों से भरी एक तितली बाहर आई—धीरे-धीरे पंख फैलाए, फिर एक झटके में उड़ गई। राधिका ने गहरी साँस ली।
“देखा? तितली बनकर उड़ गई न? अब कहीं मसल दी जाएगी!” उसके पीछे से माँ ने कहा।
“हाँ माँ… वह तितली बन गई।” राधिका ने खिड़की से बाहर झाँकते हुए कहा—
थोड़ी देर रुकी, फिर धीमे से पूछा-
“और मैं…! मेरे लिए माँ तुम कब कहोगी, बनना तितली!?”
“जा, बन जा तितली! -वायुयान चालक बनने की तैयारी कर ले!” माँ ने कहा
“देखना माँ! मेरे पंखों के रंग किसी अन्य की हथेलियों में नहीं दिखेंगे!” उस दिन पहली बार, राधिका ने खिड़की बन्द नहीं की।
लघुकथा 2️⃣
“ऐसी रहस्यमयी दुनिया जिसमें सेवा-निवृत्त पदाधिकारी गुम हो जाता है और वर्षों बाद पता चलता है कि वह किसी दूसरी औरत के साथ नई ज़िन्दगी बसा ली! उसी दुनिया में साठ साल का शिक्षक, अट्ठाइस साल की शिक्षिका से शादी कर लेता है—यह समय किस काल से गुजर रहा है?” पूछते हुए सीमा की आवाज़ में खिंचाव था।
“तुम्हें आज इस फिसलने वाले काल की बेचैनी क्यों है?” राघव ने चाय का कप रखते हुए पूछा।
“बेचैनी?” सीमा हँसी, पर हँसी में कड़वाहट थी— “जाके पाँव न फटी बिवाई, वह क्या जाने पीर पराई!” व्यंग्य की धार तीखी थी।
“अगर तुम सच में इस पीर से गुजर रही हो, तो कहो… यूँ पहेलियों में बात करोगी तो कोई नहीं समझेगा।” पहले राघव कुछ पल चुप रहा, फिर पूछा।
सीमा ने खिड़की के बाहर देखा। सामने स्कूल का प्रांगण था। एक कोने में बासठ साल के सेवानिवृत्त गुरुजी खड़े थे—सफेद बाल, हल्की मुस्कान। उनके पास एक नई शिक्षिका थी—हँसती, कुछ कहती हुई।
“आइए प्रिय। आज तो आप सच में तितली लग रही हैं।” गुरुजी ने सहजता से उसे पुकारा।
“देखा? यही है आज का फिसलपट्टी का काल। उम्र, मर्यादा, संबंध—सब घुल गया है जैसे।” सीमा का चेहरा कस गया था।
“या फिर हम देखने का नज़रिया खो चुके हैं। क्या पता… दोनों ने अपने जीवनसाथी खोए हैं, दोनों अकेले हैं! एक-दूसरे की खाली जगह को भरने का प्रयास कर रहे हों। हर रिश्ता छल नहीं होता, सीमा।” राघव ने धीरे से कहा।
सीमा मौन साधे रही। उसके चेहरे का ज्यामिति विभिन्न आकार दर्शा रहा था।
“तितली बनना हमेशा देह का ही नहीं होता है, कई बार यह मन का खोल तोड़ने का साहस भी होता है।” राघव ने आगे कहा— शायद वे ‘तितली बनना’ नहीं, ‘बनना तितली’ सीख रहे हैं—देर से ही सही।”
सीमा की आँखें फिर उस दृश्य पर टिक गईं। गुरुजी और वह शिक्षिका अब साथ-साथ चल रहे थे—धीमे, मगर सन्तुलित कदमों से। सीमा ने पहली बार उनके चेहरे पढ़ने की कोशिश की—वहाँ कोई उछाल नहीं था, बस एक थकी हुई शान्ति थी… जैसे दो टूटे पंखों ने मिलकर उड़ना सीख लिया हो।
“शायद… हर उड़ान उच्छृंखल नहीं होती।”-उसने धीमे से कहा।
“और प्रत्येक तितली बनने की कहानी, एक जैसी भी नहीं होती।” राघव ने मुस्कुराते हुए कहा।
“आज का साहित्य चरित्रहीनों का होता जा रहा है।” वार्षिकोत्सव की साहित्यिक गोष्ठी अपने अन्तिम पायदान पर थी। मंच पर बैठे वरिष्ठ साहित्यकारों के बीच हो रही परिचर्चा में बहस छिड़ी हुई थी— और नीचे बैठी साहित्यिक श्रोताओं की भीड़ में मेधा चुपचाप सब सुन रही थी। अभी-अभी उसे अपने लिखे उपन्यास के लिए प्रतिष्ठित साहित्य पुरस्कार मिला था। लेकिन बधाइयों से ज्यादा उसके कानों में फुसफुसाहटें पड़ रही थीं—
“समझ रहे हो न, कैसे मिला होगा पुरस्कार…”
“अकेली औरत इतनी जल्दी ऐसे कहाँ पहुँचती है…”
“आजकल स्त्रियाँ खुद अपने चरित्र का पतन कर रही हैं, तभी समाज बिगड़ रहा है।” मंच पर बैठे एक वरिष्ठ कवि ने उदाहरण देते हुए कहा— मेधा का साथ उसके धैर्य ने छोड़ दिया। वह उठी और बिना बुलाए ही मंच की ओर बढ़ गई। हॉल में सन्नाटा छा गया। “क्या मैं कुछ कह सकती हूँ?” उसने माइक थामते हुए पूछा।
“चारित्रिक पतन सिर्फ़ स्त्रियों के लिए ही क्यों कहा जाता है? अगर कोई स्त्री वैश्या बनती है, तो क्या पुरुष सहभागी नहीं होता? जो स्त्री को मैला कहकर खुद को साफ़ घोषित कर देते हैं, वे आखिर किस आईने में खुद को देखते हैं?” अनुमति की प्रतीक्षा किए बिना ही वह बोल भी पड़ी— भीड़ में हलचल हुई। मंच पर बैठे चेहरे असहज हो उठे।
“गाँव में भीड़ द्वारा स्त्रियाँ प्रताड़ित की जाती हैं, तो उसके चरित्र को मोहरा बनाया जाता है, कार्यालय में किसी स्त्री को पदोन्नति मिल जाए, तो उसकी मेहनत नहीं, उसके चरित्र पर सवाल उठते हैं। और हद तो यह है कि साहित्य—जो समाज को दिशा देने वाला कहलाता है—वहाँ भी इस सोच से अछूते मनुष्य नहीं हैं।” मेधा ने आगे कहा— अब उसकी आवाज़ और गम्भीर हो गई थी—
“दोष अगर है, तो आईने का नहीं, देखने वाली नज़रों का है। लेकिन यहाँ तो आधा आईना ही धुंधला कर दिया जाता है… ताकि धब्बे सिर्फ़ स्त्री के चेहरे पर दिखें।” सभागार कुछ पल के लिए बिल्कुल शान्त हो गया। फिर पीछे की पंक्ति से एक महिला खड़ी हुई और उसने ताली बजाई। उसके बाद दूसरी, फिर तीसरी… देखते ही देखते पूरा हॉल तालियों से गूँज ज उठा। मंच पर बैठे वही वरिष्ठ कवि धीरे से अपना चेहरा झुका चुके थे। शायद पहली बार उन्हें एहसास हुआ था— कि चरित्र का दर्पण किसी एक लिंग का नहीं होता।
मेधा के मन में उठे तूफ़ान और उसके द्वारा की गई बेबाक बात ने सभा को स्तब्ध कर दिया था। उस शाम, जब वह स्मृति-चिह्न लेकर घर लौट रही थी, उसने एक पुराने, जर्जर काठ के पुल पर रुकना चाहा।
शाम गहरा रही थी, और वातावरण में धुंध सी छा गई थी। मेधा पुल के किनारे, काठ के जंगले पर टेक लगाकर बैठ गई। वह हताश और अकेली महसूस कर रही थी। चारों ओर सूखी पत्तियों का ढेर था, जो उसके मन की सूखी उम्मीदों की तरह बिखरा था। पुल के परे, पेड़-पौधों से भरी धुंधली और उदास दुनिया दिख रही थी। अचानक, उसकी नज़र दूर, धुंध में उड़ते हुए पक्षियों पर पड़ी। वे काली, परछाइयों की तरह लग रहे थे, एक समूह में, मुक्त और निर्भीक। वे उस धुंध को चीरते हुए, किसी अनदेखी दिशा में उड़ रहे थे। मेधा ने उन्हें देखते हुए एक गहरी साँस ली। "मैं भी तो इन पक्षियों की तरह हूँ। पितृसत्तात्मक धुंध को चीर कर, अपनी स्वतंत्र पहचान और अपनी योग्यता के आधार पर आगे बढ़ रही हूँ। सभा में मैंने जो बात रखी, वह बिलकुल सही थी। अपनी मेहनत और प्रतिभा के लिए सम्मान की मांग ही तो रखी थी।" बुदबुदाते हुए उसने अपनी स्मृति-चिह्न को ध्यान से देखा, जो अब उसके हाथ में एक मशाल की तरह लग रही थी।
डायरी लेखन
सोमवार, ५ जून २०२३
"भाइयों! सरकार ने इस साल हर किसान को 'स्वर्ण-फसल’ किट मुफ्त देने का फैसला किया है। जो कि आपके पसीने का सम्मान है।" आज गाँव के चौपाल पर एक सरकारी जीप आकर जैसे रुकी सरपंच गजानन ने ऊँची आवाज में जुटे हुए किसानों की भीड़ को सम्बोधित करते हुए कहा।
"देख सोमनाथ, अपनी तो किस्मत चमक पड़ी! इस किट की वजह से, अब न तो बीज के पैसे देने हैं, न खाद के और न छिड़काव वाली दवा के। बिजली-पानी भी मुफ्त की व्यवस्था पहले से ही हो रखी है। हमारे तो मौजे ही मौजे हो गए। इस बार तो हमारा बचा हुआ पैसा हमारे मौज-मस्ती में उड़ पाएगा।" भीड़ में खड़े दीनू ने अपने बगल में खड़े सोमनाथ को कोहनी मारते हुए कहा।
"दीनू भाई, यह मुफ्त की चीज नहीं है, यह एक कर्ज है जो हमें अपनी धरती को ही चुकाना पड़ेगा।” सोमनाथ ने बड़े ही शान्त भाव से किट थामते हुए कहा।
मंगलवार, ११ जुलाई २०२३
आज अपने खेत के किनारे लगे नीम के पेड़ के नीचे लेटा दीनू बीड़ी फूँक रहा था और सोमनाथ पसीने से तर-बतर होकर अपने खेत में निराई कर रहा था।
"अरे सोमनाथ! क्यों जान सूखा रहा है? सभी चीजें तो मुफ्त के हैं। थोड़ा-बहुत भी उग गया अपने वारे-न्यारे हैं, और नहीं भी उगे तो अपना क्या जा रहा है? जेब से तो एक धेला नहीं लगा।" दीनू ने उपहास उड़ाते हुए कहा।
"यही तो तुम्हारी भूल है दीनू। जब सरकार हमें कुछ मुफ्त में देती है, तो हमारी जवाबदेही दोगुनी हो जाती है। वह किट किसी और के हक के भी हो सकते थे जो हमें मिले हैं। अगर मैंने इससे सोना नहीं उगाया, तो मैं उस भूखे पेट का गुनहगार हूँ जिसे यह मिल सकता था।"सोमनाथ ने निराई करते हुए ही कहा।
“अरे छोड़ो! ये किताबी बातें हैं। हम पात्र थे, इसलिए हमें मुफ्त में मिली हैं। चादर से चेहरा ढँको और सो जाओ।" मुँह फेरते हुए दीनू ने कहा।
शुक्रवार, ६ अक्टूबर २०२३
आज गाँव में कृषि अधिकारी मुआयने के लिए आए। दीनू के खेत में पीली और बीमार फसल खड़ी थी। उसने खाद का डिब्बा आधे दाम में शहर में बेच दिया था और खेतों में पानी देने के बजाय ताश खेलने में वक्त बिता रहा था! "साहब, बीज ही खराब थे! सरकार से हमें धोखा मिला।" जब अधिकारी ने दीनू से उसकी फसल के बारे में पूछा, तो दीनू रोते-रोते हुए कहने लगा।
उसे लेकर अधिकारी सोमनाथ के खेत पर गए। उसकी फसल ऐसी थी कि देखकर सभी की आँखें चौंधिया रही थी। सोमनाथ ने न केवल उन बीजों का सही उपयोग किया था बल्कि समय से पानी-दवा का छिड़काव किया था और अपनी मेहनत से मिट्टी को ऐसा तैयार किया था कि फसल से पैदावार उम्मीद से दुगनी होने वाली थी।
"दीनू! बीज खराब नहीं थे, तुम्हारी नीयत खराब थी।" कृषि अधिकारी ने सबके सामने कहा।
"साहब। गरीब, मूर्ख आदमी हूँ, एक मौका और दे दो।" कहते हुए दीनू ने कृषि अधिकारी के पाँव पकड़ लिया।
"नहीं दीनू भाई! जवाबदेही का मतलब सिर्फ हिसाब देना नहीं होता है बल्कि उस भरोसे को कायम रखना भी होता है जो व्यवस्था ने हम पर किया होता है। तुमने 'रेवड़ी' को 'खैरात' समझा, जबकि वह 'पूँजी' थी। हम अपाहिज नहीं थे कि सरकार ने हमें बैसाखी थी, बल्कि उसने हमें पंख दिए थे।" सोमनाथ ने आगे बढ़कर दीनू को उठाते हुए कहा।
"तदबीर से ही तक़दीर बदली जा सकती है!” एक तरफ़ अधिकारी अपने डायरी में नोट लिख रहा था और दूसरी तरफ़ दीनू खाली हाथ अपने घर लौट रहा था।
- स्त्र
- याग
- हे राम
- हरे रामा
- त्राण में न्यारा
- थके का सहारा
- अनादि पर वारा
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- हाँ!
- दर्दी
- मनोज्ञ
- रामजस
- मेरा मैं स्वयं
- राम तत्व की लौ
- मर्यादाओं की नदी
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“पिछले साल कई शल्य-चिकित्साओं से गुज़री हैं, देख लो, इनके पेट की क्या हालत हो गई है— छोटे-छोटे टीले जैसे उभर आए हैं…” बहू धीरे-धीरे सास की साड़ी का पल्लू सरकाकर निशान दिखला रही थी। सास की कराहने की आवाज़ में दर्द था, पर उनकी आँखों में एक अजीब-सी जिद भी थी।
“जाने से पहले भी इनके कमर में दर्द था। चिकित्सक ने एमआरआई करवाने को कहा था, लेकिन इन्होंने कहा—पहले साहित्योत्सव से लौट आऊँ, फिर इलाज़ करवा लूँगी!”
“माँ! ये कोई समझदारी है? अपनी उम्र और हालत देखी हैं आपने?”कमरे में बैठे बेटे की आवाज़ अचानक बहुत ऊँची हो गई—
बेटे की बात पूरी भी नहीं हुई थी कि उसके पिता ने चश्मा उतारकर मेज़ पर रख दिया। उनकी आँखों में वर्षों का धैर्य और स्मृतियों की चिंगारी तैर रही थी।
“तुम्हारी माँ ने कुछ ग़लत नहीं किया…” वे धीरे, लेकिन ठहरकर बोले—
“तुम्हें याद है? जब इन्हें तेज़ बुख़ार होता था, तो यही सर पर पट्टी बाँधकर तुम्हारे लिए टिफ़िन बनाती थीं… खुद काँपती रहती थीं, पर तुम्हें भूखा नहीं जाने देती थीं।” बेटा का सर झुक गया।
“इतने सालों में न जाने कितनी बार अपने दर्द को किनारे रखकर इन्होंने घर, परिवार और तुम्हारी ज़रूरतों को चुना है, और आज अगर अपने शौक—अपने सपने—के लिए एक बार अपने ही कष्ट को पीछे कर दिया, तो तुम्हें यह ग़लत लग रहा है?” कमरे में घनघोर सन्नाटा उतर आया।
“इनकी उम्र अब कहाँ है कि हर बार ‘बाद में’ कहकर टालती रहें! स्त्रियों की भी कुछ इच्छाएँ होती हैं, जो इलाज़ से पहले पूरी हो जानी चाहिए।” पिता ने माँ की ओर देखा—
माँ की आँखों में नमी तैर रही थी।
“हमें क्षमा कर दो माँ। हम नासमझ भूल कर रहे थे- माँ भी तो इंसान होती है। मन्दिर की माँ बनाना चाह रहे थे! अगली बार के साहित्योत्सव में हम भी साथ चलेंगे।”बेटा धीरे से माँ के पास आया, उनके कन्धे पर हाथ रखा और धीमे स्वर में कहा।
विश्वविद्यालय के सभागार में चर्चा चल रही थी—विषय था “प्रवासी भारतीय और उनकी निष्ठा”। श्रोताओं के बीच बैठे लोग गम्भीर थे, जैसे हर शब्द किसी पुराने घाव को कुरेद रहा हो।
“फ़र्ज़ कीजिए, कभी ऐसा समय आए कि अमेरिका और भारत के रिश्ते बिगड़ जाएँ और अमेरिका भारत पर मिसाइल हमले करने लगे। तब अमेरिका में बसे भारतीय क्या चाहेंगे—अमेरिका की जीत और भारत की हार?” मंच से एक युवक ने सवाल उछाला। सभागार में खामोशी वापस लौटी लहरें सी उतर आई।
“क्रिकेट की तरह क्या वे वहाँ के नमक का हक़ अदा करेंगे? भले ही कोई मिसाइल उस गाँव पर गिरे जहाँ उनके अपने घरवाले रहते हों?” युवक ने आगे कहा।
पतझड़ में गिरे आखरी पत्ता सा सवाल हवा में तैरता रह गया। कुछ लोग असहज होकर कुर्सियाँ खिसकाने लगे।
तभी पीछे की पंक्ति से एक अधेड़ स्त्री उठीं। उसके चेहरे पर थकान नज़र आ रही थी, “उत्तर क्यों नहीं देना चाहेंगे?” उन्होंने स्थिर आवाज़ में कहा। सभागार का ध्यान उनकी ओर मुड़ गया।
“मेरा बेटा अमेरिका में रहता है। कई बार उसकी कुछ बातों से मुझे लगा कि वह अपनी जड़ों को भूल रहा है। मैं तो कई मंचों से उस पर देशद्रोह का आरोप लगाने की माँग तक कर चुकी हूँ।” उन्होंने धीमे-धीमे कहना शुरू किया— लोग चौंक गए।
“लेकिन…” उन्होंने हल्की मुस्कान के साथ जोड़ा—
“अमेरिका में जितने भारतीयों से मिली हूँ, वे भारत में रहने वाले बिहारी, बंगाली, राजस्थानी से ज़्यादा सिर्फ भारतीय लगे—कई बार तो उनसे बहुत ज़्यादा।” सभागार में सन्नाटा अमावस्या सा गहरा गया।
“वे वहाँ की मिट्टी में रहते हैं, पर उनकी धड़कनें अभी भी यहाँ की धूल से जुड़ी रहती हैं। वे भारत की हार कभी नहीं चाहेंगे।” थोड़ा रुककर उन्होंने युवक की ओर देखा—
“और जहाँ तक क्रिकेट की बात है… वह खेल है। खेलों में तो एक ही देश के दो दल भी होते हैं—अभ्यास के लिए, सीखने के लिए। वहाँ जीत-हार से दिल नहीं टूटते।”
उनकी आवाज़ हल्की काँप रही थी-
“पर युद्ध… युद्ध में तो दिल ही टूटते हैं। और जिनके दिल दो मिट्टियों के बीच धड़कते हों, वे किसी की हार नहीं—बस अपनों की सलामती चाहते हैं।”
सभागार में सुई/पिन भी गिरती तो लाउडस्पीकर पर शोर गूँज जाती-
पटना -२० फरवरी २०२६
भाई राजेन्द्र,
सस्नेहाशीष!
आशा करती हूँ, सपरिवार तुम सानन्द होगे। तुम जब पिछली बार पटना आए थे तब भी रामदीन को लेकर चिन्ताग्रस्त थे। रामदीन की झुर्रियों में धूप के धब्बे स्पष्ट दिख रहे थे लेकिन उसके आँखों में कोई पुराना उजाला अटका हुआ था। उसके एक हाथ में कपड़ों की पोटली थी—रंगहीन, थकी हुई, जैसे उसके लिए रोज़ी-रोटी की मजबूरी हो। दूसरे हाथ में वह एक अजीब-सा, बहुत बड़ा चित्तीदार गुब्बारा थामे था। गुब्बारा बहुत विशाल था। लग रहा था कि, वह रामदीन को सहारा दे रहा है, रामदीन उसे नहीं सहारा दे रहा है। गली से गुजरते लड़के ठिठककर हँस पड़े थे- “काका! बुढ़ापे में मेला लगाओगे क्या?”
रामदीन ने मुस्कुराकर सिर झुका लिया था। तुमने कहा था, “देखो न दीदी। उसकी मुस्कान में जवाब नहीं, बस धैर्य है! बच्चों को कौन समझा सकता है कि ऐसा ही यह गुब्बारा उसके बीमार पोते की जिद है,”
“हाँ, उसका पोता, जिसकी खाँसी रातों को दीवारों से टकराती रहती है। चिकित्सक ने दवाइयाँ दी है। पर बच्चे ने दादा से कहा था, -‘दादा, बड़ा वाला गुब्बारा लाना, आसमान जितना।’ मैंने कहा था और
रामदीन बुदबुदा रहा था—“क्या आसमान खरीदा जा सकता है?”
तुम्हारा दुःख और बढ़ जाएगा यह जानकर कि उस समय रामदीन ने अपनी दो वक्त की रोटी में से भी कुछ कौर कम कर दिया था और उस त्याग की कीमत पर खरीदा जाता था ऐसा गुब्बारा—हवा से भरा, पर उसके लिए उम्मीद से भरी। तब रामदीन के हाथ में एक खुला आसमान का अवसर था। वह जानता था—गुब्बारा फूटेगा। हवा निकल जाएगी। शायद पोते की हँसी भी कुछ दिनों की मेहमान हो। पर उस क्षण, उसे विश्वास था जब वह छोटा-सा बच्चा इस बड़े गुब्बारे को देखकर खिल उठेगा, तब उसके कमरे में बीमारी नहीं, रंग भर जाएँगे। और वही सच हुआ-
जैसे आज परदेश से लौटे उसी पोते ने ठीक वैसा ही गुब्बारा रामदीन को थमाया था-
“कभी-कभी जिन्दगी में रोटी से भी ज्यादा जरूरी एक मुट्ठी हवा हो जाती है—जो किसी के फेफड़ों में नहीं, उसके दिल में भर दी जाए!” बुदबुदाता हुआ रामदीन ने गुब्बारे को थोड़ा कसकर थाम लिया।
जीजी सा को चरण स्पर्श और बिटिया सी भाभी अनीता से मेरी ओर से स्नेह और बच्चों को शुभाशीष कह देना!
पत्रोत्तर की प्रतीक्षा में
तुम्हारी दीदी माँ (नारियल)
सुझाव मिला
थाती का व्यास
जोधपुर
२१-०२-२०२६
प्रिय मित्र सुनील,
सप्रेम नमस्कार
मैं यहाँ सपरिवार सकुशल हूँ। आशा है तुम भी सकुशल होगे।
पिछले पत्र में तुमने मुझसे एक साहित्यिक पहेली पूछी थी, “हवा की क़ीमत क्या है?” मैंने बहुत सोचा कि क्या उत्तर दूँ। तभी कल ऐसा कुछ घटा कि पहेली का उत्तर स्वतः हो प्राप्त हो गया। मेरे घर के पीछे कच्ची बस्ती में एक रामदीन नामक निर्धन व्यक्ति रहता है। अक्सर मिलता है, तो राम-राम करता है। कल मैं घर लौट रहा था, तभी कड़ी धूप में रामदीन को देख कर चौंक उठा।
रामदीन की झुर्रियों में धूप के धब्बे स्पष्ट दिख रहे थे लेकिन उसके आँखों में कोई पुराना उजाला अटका हुआ था। एक हाथ में कपड़ों की पोटली थी—रंगहीन, थकी हुई, जैसे रोज़ी-रोटी की मजबूरी हो। दूसरे हाथ में वह एक अजीब-सा, बहुत बड़ा चित्तीदार गुब्बारा थामे था। गुब्बारा बहुत विशाल था। लग रहा था कि, वह रामदीन को सहारा दे रहा है, रामदीन उसे नहीं सहारा दे रहा है। गली से गुजरते लड़के ठिठककर हँस पड़े—
“काका! बुढ़ापे में मेला लगाओगे क्या?”
मैंने भी मुस्कुराकर उसे प्रश्नवाचक दृष्टि से देखा।
रामदीन ने मुस्कुराकर सिर झुका लिया। उसकी मुस्कान में जवाब नहीं, बस धैर्य था। उसने क्लांत स्वर में कहा, “अब क्या बताऊँ साहब? ऐसा ही गुब्बारा मेरे बीमार पोते की जिद है। मेरा पोता महकू जिसकी खाँसी रातों को दीवारों से टकराती रहती है। चिकित्सक ने दवाइयाँ दी, पर बच्चे ने कहा था—“दादा, बड़ा वाला गुब्बारा लाना, आसमान जितना! अब आप ही बताइये,क्या आसमान खरीदा जा सकता है?”
मेरी आँखें भर आईं।
रामदीन बोलता रहा, “मैंने अपनी दो वक्त की रोटी में से भी कुछ कौर कम कर दिए। उसी त्याग की कीमत पर आज खरीदा है यह गुब्बारा—हवा से भरा, लेकिन मेरे लिए उम्मीद से भरपूर। मेरे हाथ में सारा आसमान है न साहब?”
मैं मुस्कुरा दिया, “लेकिन रामदीन गुब्बारा फूटेगा। हवा निकल जाएगी। फिर क्या होगा?”
रामदीन की आँखों से गंगा-जमुना बह निकली, “साहब, बीमारी-हारी का तो क्या भरोसा? लेकिन उस क्षण, जब मेरा छोटा-सा महकू इस बड़े गुब्बारे को देखकर खिल उठेगा, तब उसके कमरे में बीमारी नहीं, रंग भर जाएँगे।
कभी-कभी जिन्दगी में रोटी से भी ज्यादा जरूरी एक मुट्ठी हवा हो जाती है—जो किसी के फेफड़ों में नहीं, उसके दिल में भर दी जाए!” कहते हुए रामदीन ने गुब्बारे को थोड़ा कसकर थाम लिया।
क्या बताऊँ सुनील,मेरी क्या हालत हुई। जितने पैसे जेब में थे, रामदीन को महकू के इलाज के लिए दे कर बड़ी मुश्किल से अपने आँसू रोकता, मैं घर चला आया। घर पहुँचते ही तेरी पहेली याद आई। आशा है, उत्तर मिल गया होगा।
घर में सभी का ध्यान रखना। उर्मिला भाभी को मेरा नमस्कार कहना। सौम्य और सुयश को मेरा आशीर्वाद।
पत्रोत्तर की प्रतीक्षा में,
तुम्हारा मित्र,
राजेन्द्र
“महोदया! पिछले पाँच वर्षों से इस कम्पनी में कार्यरत हूँ। एक बाहरवाले की शिकायत आई और आपने बिना पूछे मुझे निलम्बित कर दिया?” अमित की आवाज़ भारी थी।
“मुझे भी अफ़सोस है, लेकिन क्लाइंट बड़ा था अमित! आरोप गम्भीर लगाया था। कम्पनी की साख दाँव पर लग गई थी।” सीईओ रीमा मुखर्जी ने कहा।
“और मेरा नाम? क्या आपकी नज़रों में वह साख का हिस्सा नहीं था? क्या पेशेवर दुनिया में साधारण कर्मचारी के सम्मान की कोई देहरी नहीं होती है?” अमित की आवाज़ तल्ख़ भरी थी।
कुछ क्षण के लिए मौन का साम्राज्य छा गया।
“तुम जानते हो, समझ सकते हो! वह समय बतौर निजी लेने का नहीं था,” रीमा ने संयत स्वर में कहा।
“पर असर तो निजी तौर ही हुआ, न! जब तक जाँच पूरी हुई, मुझे ‘गुनहगार’ की तरह देखा गया। टीम की मीटिंग्स से बाहर रखा गया। किसी ने पूछा तक नहीं कि सच क्या है!”
रीमा की निगाहें झुक गईं। “जाँच में तुम निर्दोष पाए गए हो, क्लाइंट ने लिखित माफ़ी भेजी है।” उसने धीमी स्वर से कहा।
अमित हल्के से मुस्कुराया— “निर्दोष साबित होना और निर्दोष माना जाना—दो अलग बातें हैं, महोदया!” अमित की भौं टेढ़ी और नथुने फड़क रहे थे।
“तो क्या तुम जा रहे हो?” रीमा ने पूछा।
अमित ने गहरी साँस ली। “मैं भाग नहीं रहा। बस यह याद दिला रहा हूँ कि भरोसा भी कॉन्ट्रैक्ट का हिस्सा होना चाहिए। अगर कम्पनी अपने कर्मचारी पर पहला विश्वास नहीं रखेगी, तो बाहर की दुनिया क्यों रखेगी?” अमित ने कहा।
“यक़ीनन हमने जल्दबाज़ी की! कम्पनी की साख बचाने के चक्कर में हमने तुम्हारी साख पर सवाल लगा दिया।” रीमा ने लज्जित होते हुए कहा!
“अगर तुम रहो… तो मैं पूरी टीम के सामने अपनी गलती स्वीकार करूँगी। सार्वजनिक रूप से। विश्वास वापस लेने का अधिकार तुम्हारा है—पर उसे लौटाने की कोशिश मेरा कर्तव्य।” कुछ पल की खामोशी के बाद रीमा ने अनुरोध भरे स्वर में कहा!
अमित ने अपने सूटकेस को धीरे से सीधा कर दिया—पर बाहर की ओर खींचा नहीं, “मैं रहूँगा,” उसने कहा।
प्राणा कम्पनी का सबसे बड़ा प्रोजेक्ट लॉन्च हो गया, लेकिन प्रतिस्पर्धी कंपनी ने अंतिम क्षणों में कानूनी दाँव खेल दिया। मीडिया, निवेशक, सबकी निगाहें विभा पर टिक गईं।अंदरूनी जानकारी बाहर जाने की आशंका थी। उसी समय समीर आगे आया। उसने वह ईमेल ट्रेल, वह गोपनीय प्रस्ताव और प्रतिस्पर्धी कम्पनी की चालों के सबूत बोर्ड के सामने रख दिया, जिन्हें उसने समय रहते रिकॉर्ड कर लिया था।
“सर,” उसकी आवाज़ काँपी, “एक बार मैंने गलती की थी। इस बार खुद को खोना नहीं चाहता था।”
कानूनी टीम सक्रिय हुई। मामला पलट गया। प्रोजेक्ट बच गया।
“शायद… इस बार साँप ने डसा नहीं।” मीटिंग खत्म होने के बाद विभा ने धीरे से चांद्री के पास आकर कहा।
चांद्री ने मेज़ पर रखे पत्थर को देखा और कहा—
“साँप को पालना जोखिम है। पर हर जोखिम मूर्खता नहीं होता। कुछ जोखिम नेतृत्व की परीक्षा होते हैं।”
खिड़की के बाहर शहर की रोशनियाँ चमक रही थीं, विभा उन रौशनियों में कंपनी की आपात बैठक को देख रही थी। उसके नज़रों में माहौल में व्याप्त तनाव की महीन परत तैर रही थी।
ऑपरेशंस हेड चांद्री ने फाइल टेबल पर पटक दी—
“सर, आप सच में समीर को प्रोजेक्ट हेड बना रहे हैं? वही समीर, जिसने पिछले साल गोपनीय डेटा लीक किया था? वह कंपनी छोड़कर प्रतिस्पर्धी फर्म से मिला हुआ था। यह सीधा जोखिम है।”
सीईओ विभा ने कुर्सी पर पीछे सिर टिका लिया। उसके सामने मेज़ पर एक छोटा-सा पेपरवेट रखा था—काला, साधारण-सा पत्थर। वह उसे उँगलियों से घुमाने लगी, “हाँ, वही समीर,” उसने विवेकपूर्ण शान्त स्वर में कहा।
“महोदया! यह व्यापार है, आश्रम नहीं। साँप को आस्तीन में रखेंगी तो डसेगा ही।” खिसियानी चांद्री ने कहा।
विभा हल्के से मुस्कुरा रही थी—
“हो सकता है। लेकिन हर गलती स्थायी चरित्र नहीं होती, कुछ लोग परिस्थितियों से हारते हैं, कुछ अवसर मिलने पर बदलते भी हैं। अगर हम किसी को सुधार का अवसर ही न दें, तो फिर नेतृत्व का अर्थ क्या रह जाएगा?” कमरे में सन्नाटा छा गया। निर्णय हो चुका था। और भीतर, विश्वास ने एक बार फिर अपना व्यास बढ़ा लिया था।
मयंक की शादी का भव्य भोज कल रात में समाप्त हुआ था।रिसॉर्ट से मेहमानों की गाड़ियों की कतार धीरे-धीरे सड़क में विलीन हो रही थी। रिसॉर्ट के एक कोने में उसके पिता ज़मीन से टिके बैठे थे—फूट-फूटकर रोते हुए। अंशु, मयंक के ताऊ का बेटा—यह दृश्य देख रहा था। उसकी आँखें भी नम थीं, परन्तु उसके सीने में दबी कड़वाहट आँसुओं से भारी पड़ रही थी।
“मयंक जी, अपनी पत्नी के साथ कहाँ चले गए? चाचा जी, इतना क्यों रो रहे हैं?” अंशु की पत्नी ने बेहद संकोच से पूछा।
अंशु ने ठंडी साँस छोड़ी, “ये आँसू आज बेमानी हैं, इन दिनों बात-बात पर चाचा जी आजकल की बहुओं पर तीखा कटाक्ष कर रहे थे।”
“तो क्या हो गया? यह तो सामान्य सी बात है। पुरानी पीढ़ी नई पीढ़ी की!” अंशु की पत्नी ने कहा।
“तुम इनका इतिहास नहीं जानती हो! हर थोड़े दिनों के बाद यही चाचा जी मेरे ननिहाल चले जाया करते थे—मेरे नाना और बड़े मामा को बुला लाने के लिए। घर में ज़रा-सी तकरार होती और घर इजलास बन जाता। मेरी माँ को ऐसे निकल जाने का आदेश जारी किया जाता, जैसे वह उस घर का हिस्सा ही न हों।”
“अंशु भैया, आप उन्हें ही क्यों दोष दे रहे हैं? दादी भेजती थीं। मेरे पिता जी क्या करते? उनकी बात न मानकर क्या वे उस घर में रह सकते थे?” पास खड़ी मयंक की बड़ी बहन बोल पड़ी।
अंशु की आँखों में बरसों पुरानी टीस दामिनी बन उतर आई, “फर्ज़ और साज़िश के बीच एक बहुत बारीक रेखा होती है,” वह बोला। “दादी की आज्ञा के नाम पर मेरी माँ को बार-बार अपमानित किया गया। आज जब मयंक सक्षम है, अपना घर बसा सकता है, तो ये रो रहे हैं—क्योंकि अब किसी को बाहर भेजने का अधिकार नहीं बचा। काश! मेरे पिता भी मयंक जैसे होते।” चाचा का रोना और तेज़ हो गया। अंशु ने अपनी पत्नी की ओर देखा। उसकी आँखों में सवाल था, उत्तर की प्रतीक्षा थी। अंशु ने चुपचाप गाड़ी का दरवाज़ा खोला और धीमे, पर दृढ़ स्वर में कहा— “जिस घर में अपनों को बार-बार बाहर भेजने की परम्परा हो, वहाँ नया गृह-प्रवेश नहीं होता!”
युद्धान्तहीन— पृष्ठों के युद्धपोत बाड़ के पास ## ख़िंज़ाँ की शाम— ग्रहण में ही रहा आह या वाह ## तुम और मैं ना/क्यों ‘हम' नहीं रहे— ख़िज...