Thursday, 29 September 2022

उऋण

बैताल ने कहना शुरू किया :-

पूरी तरह से उषा का सम्राज्य कायम नहीं हुआ था लेकिन अपनों की भीड़ अरुण देव के घर में उपस्थित थी। मानों निशीथकाल में शहद के छत्ते से छेड़खानी हो गयी हो...।

"आपने ऐसा सोचा तो सोचा कैसे..?"

"सोचा तो सोचा! हमसे साझा क्यों नहीं किया...?"

 भीड़ के प्रश्नों के बौछार से अरुण देव की आँखें गीली होकर धुंधली हो रही थी।

वहाँ रहने के इच्छुक वृद्धजन को अपने अतीत और वर्तमान जीवन की स्थिति एवं परिस्थिति के बारे में उल्लेख कर, एक आवेदन देना था। उसमें अपने पुत्र, पुत्री, पति, पत्नी यानी अन्त समय में संस्कारादि करने वालों के नाम, संपर्क में रहने वाले दो विश्वसनीय रिश्तेदारों के नाम, पता तथा मोबाइल नम्बर आदि विशेष रूप से दर्शाना था। वृद्धजनों को साथ लाने वाले उनके परिजनों को अपने परिचय –पत्र , आधार –कार्ड के साथ वृद्धजन की चिकित्सा–सम्बन्धित रिकॉर्ड भी लाना था।

जिसके कारण वृद्धाश्रम जाना अरुण देव का निर्णय गुप्त नहीं रह गया। रक्त के संबंधी और समाज से कमाएं रिश्तेदार उनके सामने खड़े थे।

"तुमलोग चिन्ता ना करो तुम्हारे बरगद की देखभाल अच्छे से होगी एक चिकित्सक हर तीन दिन में एक बार प्रत्येक वृद्धजन का रक्तचाप,  शुगर –लेवल निरीक्षण कर आवश्यक परामर्श देता रहेगा। विशेष आवश्यकता पड़ने पर वृद्ध महिला के लिए महिला–सेविका/नर्स अथवा महिला–चिकित्सक की सामयिक व्यवस्था भी की जा सकती है।"

"हम आपको वृद्धाश्रम नहीं जाने देंगे। नहीं ही जाने देंगे..," अनेकानेक स्वर गूँज उठे।

"हवा कुछ और बह रही है और हमें दिखलाई कुछ और दे रहा। ऐसा क्यों आप बताइए महाराज विक्रम।"

"बिना फल वाला और उसकी लकड़ी का भी कोई उपयोग नहीं, भले ही पेड़ पुराना और बुड्ढा हो गया हो लेकिन तपती धूप में लोगो को छाँव देता हो, यदि ऐसा पेड़ आस -पास हो तो प्रदूषण और गर्मी से बेहाल नहीं हो सकते। पेड़ों को बचाना उसके प्रति दया दिखाना नहीं है, बल्कि अपने मानव जीवन के प्रति दया दिखाते हैं।

पीपल ,बरगद ,तुलसी ,आवंला ,अशोक आदि अनेक पूजनीय वृक्ष माना जाता है, वैसे ही दादा-दादी, नाना-नानी, माता-पिता, मामा,ताऊ, मौसी, बुआ पूजनीय रिश्ते हैं।" महाराज विक्रम ने कहा।

और फिर बैताल...

Wednesday, 28 September 2022

यूटोपिया


"तू समूचे समाज से जुड़ा हुआ है जिसका एक अनिवार्य अंग मैं भी हूँ। तेरी अतिरिक्त स्वायत्तता के पैरोकार हमारी आपस में दुश्मनी साबित करके तुझको मुझसे दूर रखने में ही तेरी भलाई समझते समझाते हैं। जबकि तू मेरे आगे चलने वाली मशाल है।" राजनीत ने साहित्य से कहा।

"मशाल होते हुए भी तेरे में से भ्रष्टाचार वाले मैले पक्ष को दूर कहाँ कर पाती हूँ।" साहित्य ने कहा।

”तुझमें चाटुकारी वाली बातें दर्ज हो रही हैं। खेमेबाजी में गलत बातों को प्रोत्साहन मिल रहा है।" राजनीत ने कहा।

"ऐसी बात नहीं है।" साहित्य ने कहा।

"अगर ऐसी बात नहीं होती तो क्या कथा में 'पिता का पुत्री से रात्रि में कुत्ता के भौंकने का पूछना' प्रशंसा पा जाता?" राजनीत ने कहा।

Monday, 26 September 2022

परख/जौहरी

महाराज विक्रम ने पेड़ से शव को उतार कंधे पर डाला और शव में छिपे बैताल ने कहना शुरू किया :-

अध्यक्ष महोदय के द्वारा संस्था की एक सौ पाँचवीं वर्षगाँठ के महोत्सव में पूरे देश के विद्वानों को आमंत्रित किया गया।

विभिन्न प्रान्तों से एक सौ पाँच विद्वानों का आगमन हुआ। उनकी वेशभूषा अलग-अलग थी। चूँकि आगंतुक विद्वानों को अपने-अपने प्रान्त की पोशाक पहननी थी।

उनमें से कुछ विद्वानों पर अध्यक्ष की विशेष नजर पड़ी । वे सुरुचिपूर्ण नए वस्त्रों से सुसज्जित थे। अध्यक्ष उनके पहनावे से प्रभावित हुए और उन्हें अपने समीप मंच पर बैठाया ।

कुशल मंच संचालन में विद्वानों के वक्तव्य आरंभ हुए। एक-एक कर विद्वान अपने आलेख पढ़ते और अपने आसन पर जाकर बैठ जाते।

अंत में एक ऐसा विद्वान मंच पर आया जो पुराने वस्त्र पहने हुए था। उसका भाषण सुनकर लोग मुग्ध हो गए। अध्यक्ष भी उसकी विद्वता से बहुत प्रभावित हुए।

अध्यक्ष ने उसका विशेष सम्मान किया। यहाँ तक की अध्यक्ष उसे अपने निजी एकांत कमरे में बैठाया और उसे द्वार तक छोड़ने गए। 

मौका मिलने पर संस्था के सचिव ने पूछा "महोदय अनेक विद्वानों को आपने मंच दिया अपने समीप बैठाया। उन्हें आप छोड़ने द्वार तक नहीं गए लेकिन दूसरे को द्वार तक छोड़ने गए। इसका कोई कारण है क्या? उत्तर आपसे भी चाहिए महाराज विक्रम"

विक्रम ने उत्तर दिया- तुम्हें याद होगा नील में रंगे सियार की कथा..! वैसे भी विद्वान होना किसी के मस्तक पर नहीं लिखा होता है। जिसे पढ़कर उसकी विद्वता की पहचान हो सके। अध्यक्ष ने कुछके सुंदर पहनावे को देखकर उनका मान-सम्मान किया। जब तक कोई व्यक्ति नहीं बोलता तब तक उसके वस्त्रों की चमक-दमक से उसके बड़ा होने का अनुमान लगाया जा सकता है। उन विद्वानों का भाषण साधारण था। लेकिन जब साधारण दिखने वाले विद्वान ने बोलना शुरू किया तो सभी आश्चर्यचकित रह गए। उसकी भाषण शैली गजब की रही होगी । उसके गुणों से अध्यक्ष बहुत अधिक प्रभावित हुआ। जिसकी वजह से जाते समय उसे द्वार तक छोड़ने गया और उसका अभिनंदन किया। आरंभ में उन विद्वानों का अभिनंदन किया गया जो अच्छे वस्त्रों में थे और जाते समय उस विद्वान का अभिनंदन किया गया जो गुणों से परिपूर्ण था।'

बस! बैताल पुन: वापस...

Wednesday, 21 September 2022

वन का वट

गुरु माँ

चरण वन्दन

आपके आशीष वचनों के कवच में घिरा मैं पूर्णतया सुरक्षित हूँ। मैं आपसे ज्यादातर नाराज ही रहा। मुझे लगता था कि आप मुझसे प्यार नहीं करती। सदैव अनुशासन की छड़ी मेरे सर पर लटकती रही। सबसे छोटे मामा की खुशियों का ख्याल ही रखती दिखीं। मामा, आपको माँ का दर्जा देते थे। मामा को नानी का अक्स याद नहीं था।

आपके अनुशासन ने मुझे सैन्य प्रशिक्षण तक पहुँचा दिया लेकिन विद्रोही मन से कमजोर पड़ा तन-मन सफल होने नहीं दे रहा था।

कुछ दिनों के पश्चात् सहभागियों के संग प्रशिक्षक स्तब्ध रह गए जब मैं सफल होना शुरू किया। आप भी जानना चाहेंगी ऐसा क्यों हुआ? बताता हूँ.. एक दिन मैंने देखा, चूजों के साथ पला बाज आकाश में बहुत ऊँचे उड़ता बाज को देखकर भौंचक था। मुँडेर पर उड़ने वाले बाज नहीं होते..!

आकाश में उड़ते बाज की माता ने बिना पँख खुले अपने सगे बच्चे को आकाश के बहुत ऊँचाई पर ले जाकर छोड़ देने की क्रिया की होगी न..! उस सगी माँ को किसी ने सौतेली तो नहीं कहा होगा...!

Thursday, 8 September 2022

विसर्जन

"जब मैं छोटा था तो निसंतान-धनी रिश्ते के नानी के गोद में डाल दिया।

अनुज प्यारे को ताऊ जी, दादा-दादी, आप ताई जी के पास नहीं रहने देना चाहते थे.. उसके बाल बुद्धि में भरते थे कि ताई जी अपने सगे बेटे से प्यार नहीं करती..।

दादी से पैरवी लगाते कि ताऊ जी अनैतिक कार्य करें ताकि आप रिश्वत में धन उगाही कर सकें..ताऊ जी श्रवण पुत रहे।"

"मैंने जो किया तुम्हारे भविष्य को सुरक्षित करने के लिए किया.. क्या गलत किया?"

"मैंने नानी के अंधे प्यार में फँस प्रत्येक कक्षा में असफल रहा और आगे की कक्षा में बढ़ता रहा। नतीजा ना उनका धन मिला और ना मैं शिक्षित हो सका।"

"चिन्ता क्यों करते हो.. मैं हूँ न...।"

"हाँ, आप हैं! चावल से धान उगाने में प्रयासरत। मैं ताई जी के पास जा रहा हूँ...!"

Wednesday, 31 August 2022

'मुट्ठी में सृष्टि'

दृश्य एक

कैलिफोर्निया की रात्रि के आठ बज रहे थे तो ठीक उसी समय भारत की सुबह के साढ़े आठ बज रहे थे। एक घर में वीडियो कॉल पर बातें चल रही थी..

"भैया की तबीयत अब कैसी है?"

"दस बजे सिटी स्कैन होने जाएगा तो पता चलेगा कि कितनी चोट है..!"

"क्या बिना हेलमेट लगाए मोटरसाइकिल चला रहे थे कि सर में चोट लगी?"

"घर के नजदीक ही.."

"माँ! आप हमेशा उनके गलत पक्ष को ढ़कने की कोशिश करती रहती हैं..। खैर जैसा भी रिपोर्ट आये, बिना देर किए आपलोग दिल्ली पहुँचने की कोशिश करें..।"


दृश्य दो

सिडनी के मध्याह्न के एक बज रहे थे और भारत की सुबह के साढ़े आठ बजे वीडियो कॉल से बात हो रही थी... उसी परिवार में अन्य से वीडियो कॉल पर बातें हो रही थीं...

"रात में, वर्षा और पावर कट की स्थिति में तथा शहर के जख्मी सड़क पर निकलना ही नहीं चाहिए था। ऐसी स्थिति में असावधानी हो जाना स्वाभाविक है..!"

"मेरी बात सुनता कौन है..!"

"आप चिन्ता ना करें सब ठीक हो जाएगा हम आ रहे हैं।"

दृश्य तीन

अमरीका की रात्रि के साढ़े आठ बज रहे थे और सिडनी के मध्याह्न के डेढ़ बज रहे थे और वीडियो कॉल में बात चल रही थी...

"तू अपने ऑफिस से छुट्टी ले घर जा तैयारी कर और एयरपोर्ट पहुँच। मैं तेरी टिकट कटवाकर तुझे व्हाट्सएप्प पर भेज और मेल करता हूँ।"

"और आप भैया?"

"मैं भी अपनी टिकट लेकर पहुँच रहा हूँ। लगभग एक समय ही हम सभी दिल्ली पहुँचेंगे..!"

"दिल्ली में मदद मिल सके.. व्हाट्सएप्प और फेसबुक के समूहों में हमें अनुरोध का पोस्ट बना देना चाहिए..!"

Saturday, 27 August 2022

छिपा रूस्तम

 

मेरे देवर का बेटा तीन दिन से दुर्घटनाग्रस्त होकर गहन चिकित्सा विभाग में भर्ती था। आज लगभग साढ़े चार बजे हम पुनः गहन चिकित्सा विभाग के सामने उपस्थित थे लेकिन हमें अनुमति नहीं मिली शीशे के पार देखने की। वहाँ पर अफरातफरी मची हुई थी। एक बुजुर्ग लाये गए थे जो जहर खा लिए थे। अब खा लिए थे या खिला दिया गया था.. यह हमें पता नहीं चल पाया क्योंकि हमने किसी से पूछताछ नहीं किया। बुजुर्ग को देखकर एक महिला बोली कि, "मेरे घर के गेंहूँ में कीड़ा लग रहा था उसमें दवा डालने के लिए खरीदने गयी तो मुझे दवा नहीं मिली। लौटकर दो पुरुषों को लेकर गयी तब भी दवा नहीं मिली। इन्हें जहर कहाँ से और कैसे मिल गयी?"

"इतने बुजुर्ग को मिल जाना कोई आश्चर्य की बात नहीं है। आश्चर्य की बात है इनके साथ आये सभी युवा इनके गाँव के हैं। इनमें से कोई बुजुर्ग के घर का अपना नहीं है।" परिचारिका ने कहा।

थोड़ी देर में बुजुर्ग के घर से लोग आ गए।

"यह दस हजार रुपया रख लीजिए, पुलिस को सूचना नहीं दीजिएगा..," बुजुर्ग के घर से आये युवक ने कहा।

"मुझे रुपया देने की आवश्यकता नहीं। मैं परिस्थिति समझ रहा हूँ। आपलोग निश्चिंत रहिए मैं पुलिस को नहीं बुला रहा हूँ।" अस्पताल प्रबंधक और चिकित्सक ने एक स्वर में कहा।

"गहन चिकित्सा विभाग में ऐसे लोगों को नहीं रखना चाहिए जिनके शरीर से जहर निकालना हो अन्य रोगियों को परेशानी होती है। जल्दी से हटाइये।" गहन चिकित्सा विभाग में भर्ती अन्य रोगियों के रिश्तेदार आपत्ति जताने में शोर मचा रहे थे।

"आपलोग शान्ति बनाये रखें। बुजुर्ग की मौत अस्पताल आने के पहले ही हो चुकी थी। यहाँ जहर निकालने की प्रक्रिया नहीं की गयी हैं।" गहन चिकित्सा विभाग के पहरेदार ने कहा।

"फिर साढ़े आठ हजार किस बात की ली गयी है?" भीड़ में से किसी ने फुसफुसाया।

Saturday, 20 August 2022

चौमासे का गोबर

"बहुत-बहुत बधाई हो! तुम्हें काव्य में साहित्य अकादमी पुरस्कार मिला।"

"वो तो मिलना ही था..! बहुत वर्षों से दिन-रात इसके लिए मैं मेहनत कर रहा था...।"

"मुझसे बेहतर और कौन जान सकता था तुम्हारे द्वारा किये गए मेहनत को?"

"क्या अब भी तुम्हें शक़ है? हमारे गाँव में चिकित्सा की स्थिति बहुत बुरी थी। अपने पुरखों के जमीन पर चिकित्सालय बनवाया...,"

"और उसमें तुम्हारे द्वारा लायी चिकित्सक, तुम्हारी पत्नी  बन गयी..?"

"गाँव में शिक्षा की स्थिति सुधारने के लिए मुझे कितनी भाग-दौड़ करनी पड़ी इसके गवाही दोगे न?"

"भाग-दौड़ की गवाही जरूर दूँगा। शिक्षिका के संग तुम्हारे लिव इन का भी तो गवाह हूँ।"

"शहर जैसा गाँव में बाजार, सड़क, बिजली की व्यवस्था करवाने में मेरा जो खून-पसीना बहा उसके बारे में भी तो कुछ कहो...!"

"कितनी कन्या-बालिका-स्त्री-महिला लापता हैं? केंद्र में कौन है? उसके हिसाब के लिए ही तुम कारागार में हो। क्या सदैव कारागार से कृष्ण बाहर आते हैं?"

Wednesday, 17 August 2022

ज्वालामुखी

कुमार संभव जी की शानदार लघुकथा- "हर दिल तिरंगा"

उस छोटे से बच्चे की खुशी का कोई पार नहीं था। बड़ी मुश्किल से उसे एक तिरंगा मिल पाया था। आज वह भी अपने घर की छत पर तिरंगा लहराएगा।
तिरंगा लेकर घर की ओर दौड़ लगाते हुए उसके दिल में वे सभी जोशीले नारे उफन-उफनकर गूँज रहे थे जो पंद्रह अगस्त- छब्बीस जनवरी को उसके स्कूल में लगाए जाते थे, या कभी भारत मैच जीत जाता तो बस्ती के चौक पर पटाखों के साथ गूँजते थे, या पिछले साल उसके दोस्त के फौजी भैया के तिरंगे में लिपट कर आने पर गूँजे थे।
वह बस दोनों हाथों से तिरंगे के कोने पकड़े खुद भी ध्वज की तरह उल्लसित लहराता हुआ घर की ओर दौड़ रहा था।
नन्हे कदम थक तो जाते ही हैं, बस्ती से जरा पहले ढाबे पर वह पानी पीने रुका।
कुछ निगाहें भी उसके झण्डे की ओर लहरा गई।
"बब्बन मास्टर का लौंडा है ना ये?" ढाबे पर बैठे एक खास दल के नेता की आवाज उठी।
"हाँ। कमबख्त मास्टर खुद तो दोजख में जाने के काम कर ही रहा है, औलाद को भी वहीं धकेल रहा है।" एक दाँत पीसता सा छुटभैया स्वर उभरा।
"मालिक के सिवा हमारी कौम का सिर कहीं और नहीं झुकेगा। मारो साले को...!" इस बार आवाज कुछ ज्यादा हौलनाक थी।
वे उठते, इससे पहले दूसरी ओर से आवाजें शुरु हो गईं।
"बब्बन मास्टर का छोकरा है ना ये?" दूसरे कोने पर बैठे एक अन्य विशेष दल के नेता की आवाज आई।
"हाँ, तभी तो बेगैरत जानबूझकर तिरंगे को उलटा लहरा रहा है।" एक आवाज उठी।
"इनकी तो ख्वाहिश ही यही है कि 'हरा' सिर पर नाचे।" फिर एक दाँत पीसता सा छुटभैया स्वर उभरा।
"देशद्रोही... गद्दार... मारो साले को!" बिलकुल पहले के जैसी हौलनाक आवाज आई।
उनमें से कोई भी कुछ कर पाता इससे पहले बीच में बैठे कुछ बस्तीवासियों ने उनकी गर्दनें दबोची और बाहर का रास्ता दिखा दिया।
"हिन्दुस्तान जिंदाबाद।" बच्चे के दिल में गूँजता नारा होंठों पर आ गया। वह फिर उसी जोश के साथ दौड़ पड़ा बस्ती के आखिरी घर पर भी तिरंगा लहराने वाला था।


"आप बाजार जा रहे हैं तो नीला रंग लेते आइयेगा।" नीले रंग की खाली शीशी पकड़ाते हुए हिना ने अपने बड़े भाई अनस को कहा।

"वो नीला रंग की बड़ी शीशी पड़ी तो फिर और रंग क्यों मंगवा रही है।" अनस ने कहा।

"हमारे स्वभाव की तरह उनदोनों रंगों में फर्क है।" हिना ने कहा।

"तो क्या हुआ! थोड़ा सफेद रंग मिला लो काम चल जाएगा।" अनस ने कहा।

"माँ-पापा के बहुत प्रयास के बाद भी हम एक जैसे कहाँ बन पा रहे हैं। बहुत कोशिश की थी। स्वाभाविक रंग नहीं बन पा रहा है।" हिना ने कहा।

"इतनी भीड़ में क्या पता चलेगा...!" अनस ने कहा।

"आप कहना चाहते हैं कि भीड़ में दो चार बच्चे उलटा झंडा पकड़ ले सकते हैं...! बदले रंग पर ज्यादा नजरें गड़ती हैं।" हिना ने कहा।

"मेरे कहने का यह अर्थ नहीं था।" अनस की आवाज में झल्लाहट थी।"

"जिस-जिस बच्चे के हाथ में अलग रंग के अशोक चक्र वाला तिरंगा जायेगा, उस-उस बच्चे का एक समूह बन जायेगा। फिर आकाश, महासागर और सार्वभौमिक सत्य को दर्शाते प्रतीक के रंग में ही समझौता मैं क्यों करूँ..!" हिना के स्वर चिन्ताग्रस्त होना बता रहे थे।

Monday, 8 August 2022

प्रत्याक्रमण

"अरे! मेरी प्यारी सखी! लक्ष्मी क्या तुम तो कुबेर हो गयी। अलग-अलग राज्यों के अनेक शहरों में तुम्हारे नाम से फ्लैट और उन फ्लैटों के कैश में अनेकानेक करोड़ रुपए, भारी मात्रा में सोना-हीरे के आभूषण, अनेक संपत्तियों तथा तुमदोनों आरोपियों के संयुक्त स्वामित्व वाली कई कंपनी के दस्तावेज बरामद किए गए हैं। कौन विश्वास करेगा कि तुम भोली हो तुम्हें कुछ मालूम नहीं था?" प्रेमलता ने कहा।

"मेरी सहेली जो पूछ रही है उसका जबाब दो रवि.. तुमसे प्यार करने के बदले मुझे जेल जाने का उपहार मिला..।" अमृता ने कहा।
"मेरे साथ इंद्रधनुषी जीवन बिताने में क्या तुम्हें आनन्द नहीं आता था!" रवि ने कहा
"महोदय-महोदय-महोदय! एक बार एक लड़के ने एक सांप पाला, वो सांप से बहुत प्यार करता था उसके साथ ही घर में रहता .. एक बार वो सांप बीमार जैसा हो गया उसने खाना खाना भी छोड़ दिया था। कई दिनों तक उसने कुछ नहीं खाया तो वह लड़का परेशान हुआ और उसे पशु चिकित्सक के पास ले के गया .. चिकित्सक ने सांप का मुआयना किया और उस लड़के से पूछा "क्या ये सांप आपके साथ ही सोता है ?" उस लड़के ने बोला हाँ .. चिकित्सक ने पूछा आपसे बहुत सट के सोता है ? लड़का बोला हाँ ...
चिकित्सक ने पूछा "क्या रात को ये सांप अपने पूरे शरीर को फैलाने की कोशिश करता है..?"
ये सुनकर लड़का चौंका उसने कहा हाँ  .. यह रात को अपने पूरे शरीर को बहुत बुरी तरह फैलाने की कोशिश करता है और मुझसे इसकी इतनी बुरी हालत देखी नहीं जाती ,, और मैं किसी भी तरह से इसका दुःख दूर नहीं कर पाता..।
चिकित्सक ने कहा .... इस सांप को कोई बीमारी नहीं है ... और ये जो रात को तुम्हारे बिल्कुल बगल में लेट कर अपने पूरे शरीर को फैलाने की कोशिश करता है वो दरअसल तुम्हें निगलने के लिए अपने शरीर को तुम्हारे बराबर लम्बा करने की कोशिश करता है... वो लगातार यह परख रहा है कि तुम्हारे पूरे शरीर को वो ठीक से निगल पायेगा या नहीं और निगल लिया तो पचा पायेगा या नहीं..। आप तो वही सांप निकले...!"
"अपने औकात में रहिए। आप अमृता की सखी हैं। कुछ भी कहने का अधिकार नहीं पा जाती हैं...!" रवि जोर से चिल्लाया

"तुम देशद्रोही थे ही मुझे भी लपेटे में ले लिए?" अमृता ने कहा
"क्या तुम्हें पता नहीं था कि किंग कोबरा ही घोंसला बनाता है।" रवि ने कहा।
"उसको भी नेवले की धुलाई सहनी पड़ती है। कान खोल कर सुन लो जिसे आस्तीन में साँप पालने का जिगरा होता है उसे पहले से जहर का काट सीखना पड़ता है...।" अमृता ने कहा

Wednesday, 6 July 2022

सूक्ष्म स्थूल

अब वह जीवन के सन्ध्या में आ पहुँचा था। युवावस्था से उसके निजी जिन्दगी में खिजा ही छाया रहा क्यों कि पत्नी बिना तलाक लिए अलग रह रही थी। पत्नी को सन्देह था कि उनके इर्दगिर्द रहने वाली महिलाओं से उसके पति का गलत सम्बन्ध था जबकि उन महिलाओं का कहना था कि उतनी सुरक्षित तो कभी रहती ही नहीं। उसके घर में पल रहे पक्षी को बिल्ली झपट्टा मार दी बिल्ली को पालतू कुत्ता रपेट दिया। कुत्ता स्वाभाविक रूप से दम तोड़ दिया। अचानक से आये प्राकृतिक प्रहार से उसके घर में सुनामी आ गया था।
अपने बेहद करीबी को प्रतिदिन अपने घर बुलाने लगा जिसे सदा हिन्दी में लिखने के लिए प्रेरित किया करता था..। सैकड़ों छोटी-बड़ी बात उससे साझा करता। किसी दिन घर से भागी लड़कियों पर चर्चा करता, मतलब उसका मानना था कि घर से भागी लड़कियाँ सैकड़ों बार अपनी डायरी और अपने सपनों में भागी होती हैं।

किसी दिन वह कहता कि वह अत्यधिक प्रेम से ऊब जाता है..

किसी दिन किस्सा सुनाता कि कैसे उसे अपनी करीबी मित्र से प्यार हो गया था लेकिन बस इकतरफा वह महिला तो अपने पति के प्रति वफादार थी।

"अच्छा! आप यह बताइये कि यह जो आप महीनों से मुझसे जो बातें साझा कर रहे हैं उसके पीछे उद्देश्य क्या है?"

"यह बातें मेरे दो-चार करीबी जान समझ रहे हैं। वे लोग या तो हिन्दी, मैथली, अवधि, या भोजपुरी में लिखेंगे। तुम ही एकमात्र हो जो इन्हें अंग्रेजी में लिखोगे।"

Tuesday, 5 July 2022

रंगरेज


अनेक ऋतुओं के गुजर जाने के बाद वरुणा, अस्सी और गंगा की वर्चुअल गोष्ठी चल रही थी। वरुणा जहाँ अपने घाट के अनुभव साझा कर रही थी तो वहीं अस्सी, अपने घाट के।

"आज विपक्ष के एक प्रसिद्ध नेता इस नश्वर संसार से मुक्त हो गए,  गाँव में रह रही पत्नी को आस-पास वालों ने शायद खबर भी नहीं दी होगी। घाट पर लिव-इन रिलेशन वाली आयी थी।"

"वो लिव-इन रिलेशनशिप वाली पहले से विधवा थी न? इस घाट पर लिव-इन रिलेशनशिप वाले विधुर मुक्त हो गए। विधुर की लिव-इन रिलेशनशिप वाली अपने पति को बिना तलाक दिए तथा अपने दो बच्चों तथा उनके दो बच्चों के संग रहती थी।"

"आजकल के बच्चे ज्यादा संवेदनशील हो रहे हैं...," गंगा की कसकती चुप्पी टूटी।

"उन्हें भी तो... शादीशुदा होने के बावजूद लिव-इन में रहना क्या गुनाह नहीं है..!"

"पहले लिव-इन रिलेशनशिप वाली को ही #$#$#... कहा जाता था न...! ...उच्च कुलीन वर्ग आधुनिकता में अपने सुविधानुसार मुग्ध शब्दों की चाशनी में नए रिश्तों की परिभाषा का सृजन करती रहती है।"


Monday, 4 July 2022

'साहित्यिक आयोजन को जलसा क्यों बनाना'

 

[03/07, 3:48 pm] १७९९९/२०२१ : म ग स म का १२ वाँ स्थापना दिवस समारोह,

दि ०-०३-०७-२०२२ ई ०.

सत्र - ०२,

समय - ०२-०४ बजे तक,

विषय - साहित्यिक आयोजन में आने वाली मुश्किलें और समाधान,

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सिंहासन खाली करो कि जनता आती है । रामधारी सिंह दिनकर सत्ता के भी करीब थे और जनता के भी। वे राष्ट्रकवि के साथ-साथ जनकवि भी थे।

कभी किसी समयोचित अवसर पर दिनकर ने कहा था :-

*'जब-जब सत्ता लड़खड़ाती है तो सदैव साहित्य ही उसे संभालती है'*

सत्ता को संभाल लेने वाली साहित्यिक-आयोजन के लिए अनुदान हेतु सत्ता की ओर ही टकटकी लगाना और हाथ फैलाना पड़े तो गाँधी जी को मेज के नीचे से हस्तांतरित भी करना पड़ता है और आयोजन में किसी मंत्री को अध्यक्षता देनी पड़ती है। मुख्य अतिथि में बुलाना पड़ता है। अब मंत्री जी को जनता हित को छोड़ बाकी सभी कामों की व्यस्तता होती है। एक से डेढ़ घण्टे विलम्बकर और अपने लावलश्कर के संग पधारेंगे। आवभगत करवायेंगे। बात-बात में अपनी व्यस्तता जतायेंगे और मात्र दस से पंद्रह मिनट या ज्यादा से ज्यादा आधा घण्टा ठहर गायब हो जाएंगे।

जो वरिष्ठ साहित्यकार समय या समय के पहले से पधार कर ठगे से स्तब्ध रह जाते हैं । उनका हुआ यह अपमान क्यों सहन किया जाए।

°°

म ग स म से उदाहरण में सीखा जा सकता यही नहीं होता।

संस्था ने विभिन्न शहरों के मोती  के नाम से बहुत सारे प्रकाशन किया। लगभग तीन लाख रुपय की पुस्तकें प्रकाशित की गई ।

उनके सभापति, कुछ स्थाई सदस्य, कुछ पदाधिकारी, कुछ गुमनाम साथियों की वजह से यह संस्था चल रही है।

लगभग 6 साल से लेख्य-मंजूषा  पंजीकृत संस्था की संस्थापक अध्यक्ष हूँ। सदस्यों के सहयोग से प्रत्येक महीने गोष्ठी और त्रैमासिक पत्रिका , वार्षिक पुस्तक, त्रैमासिक आयोजन वार्षिकोत्सव आयोजन होता जा रहा है।

अर्थ के आधार पर ही आयोजन की रूपरेखा बन जाती है और सफलता और असफलता की निर्भरता भी तय ।

स्थल चयन, संचालन - संयोजक आयोजक के कौशल पर निर्भर करता है तो उनका चयन संस्था के अध्यक्ष के अनुभव को परखने का मौका।

साहित्य प्रेमी तो अपने घर में भी कुशलतापूर्वक साहित्यिक आयोजन कर रहे हैं। घर में शादी का सालगिरह हो, बच्चों का , पति/पत्नी का जन्मदिन हो। 

आयोजन में अर्थ का व्यय कंजूसी से नहीं बल्कि मितव्ययिता से कैसे हो इसका पूरा ख्याल रखना चाहिए।

यह ना हो कि दिखावे में ज्यादा राशि उड़ जाए। साहित्यिक कार्यक्रम जलसा बन जाये। अतिथियों को आने-जाने का किराया देने में, होटल में ठहराने में, नगद राशि देने में भारी रकम खर्च हो जाये।

साहित्य व्यापारी होना है या साहित्य प्रेमी/सेवक होना है, निर्णय करने का वक्त मुकर्रर है...

°°

 १७९९९/२०२१

Saturday, 2 July 2022

मार्गदर्शन


"आप क्या सोच रहे हैं पिताजी?"पिता को बड़े गम्भीर मुद्रा में घर के बाहर बैठा देखकर पुत्र ने पूछा।

"देखिए काले बादल ने रवि को छुपाकर दिन को ही रात में बदल डाला है। घर के अन्दर चलकर बातें करते हैं। आप मुझे बताएँ कि आख़िर क्या बात है?" पुत्र ने पुनः पूछा।

"तुम्हारी माँ को किसी संस्था ने वाचस्पति पुरस्कार देने की बात किया है..," पिता ने कहा।

"अरे वाह! यह तो बेहद हर्ष और गर्व की बात है। और आप हैं कि यूँ चिंताग्रस्त बैठे हैं कि न जाने कौन सी बड़ी आपदा आन पड़ी। कोई पकी फसल में आग लग गयी या किसी फैक्ट्री गोदाम में...। मैं भी नाहक घबरा रहा था कि ना जाने क्या बात हो गयी।" पुत्र ने कहा।

"वाचस्पति पुरस्कार पाने के लिए तुम्हारी माँ को पन्द्रह से बीस हजार तक खर्च करने होंगे।" पिता ने कहा।

"बस! इतनी छोटी रकम! इतनी तो माँ घर के किसी कोने में रख छोड़ा होगा...। आपको घबराहट इस बात कि तो नहीं कि माँ अपने नाम में डॉक्टर लगाने लगेगी!" पुत्र ने कहा।

"इस पुराने अमलतास वृक्ष के कोटर में हवा के झोंके या खग-विष्ठा से उग आए बड़-पीपल को देखकर रहे हो! क्या बता सकते हो कि इससे प्र कृति को कितना लाभ होगा ?" पिता ने पुत्र से पूछा।

"..." निःशब्दता। पुत्र की चुप्पी ।

Friday, 1 July 2022

स्थापना दिवस समारोह

 

[30/06, 5:01 pm] सुधीर जी : *सभी आमंत्रित हैं

*स्वागत है आप सभी का

*३०/६/२२* सायं ५:०० से रात्रि ११:३० व्हाट्सएप्प पटल पर

*एक विशेष आयोजन*:*मगसम के १२ वर्ष* 

***

मंजिल ग्रुप साहित्यिक मंच(मगसम) को इस वर्ष स्थापित हुए 12 वर्ष होने को आए हैं, इस 12 वर्षों में संस्था से  जुड़े सदस्य और पदाधिकारी संस्था के इस लंबे से इतिहास के बारे में क्या सोचते हैं ? उन्हें क्या महसूस होता है? इस पर चर्चा विचार विमर्श किया जाएगा। सभी अपने विचार रख सकेंगे।

वर्ष 2010 से लेकर वर्ष 2022 तक हमने  साहित्य जगत से क्या कुछ खोया, हमने क्या कुछ पाया। इस  संबंध में चर्चा करेंगे।

संस्था के द्वारा इन 12 वर्षों में हजारों के संख्या में देश और विदेश के रचनाकार को *श्रोता और पाठक* के 📗📗आधार पर,उनके शहर गाँव,उन्हीं के जिले में जाकर सम्मानित किया गया है। सभी  सम्मानित रचनाकार अपने विचार आज इस पटल पर रख सकेंगे।

जिन साथियों के पास उन सभी  कार्यक्रमों की दस्तावेज व  फोटोग्राफ होंगे  उन्हें उसे पटल पर रखने का अवसर मिलेगा। अधिकतम 2 फोटो

बहुत सारी बातें होंगी। यह कार्यक्रम 30/6/22 को  सायंकाल 5:00 बजे प्रारंभ होगा और रात्रि 11:30 बजे तक चलेगा।

      इस पटल पर संस्था के 100 से अधिक रचनाकार सदस्य संपूर्ण भारत से हैं हम सभी को एक साथ इस भव्य कार्यक्रम में सम्मिलित होने के लिए आमंत्रित करते हैं।

कार्यक्रम में भाग लेने वाले :-

०१/ अनुराग

२०१७ से २०२२ की यादें

०२/ पुस्पेंदर

२०१५ से २०२२ की यादें

०३/ ज्ञांती सिंह 

२०१० से २०२२ की यादें

०४/ सुधीर सिंह सुधाकर 

२०१० से २०२२ की यादें

०५/ वीणा मेदनी 

     2017 से 2022 की यादें 

०६/निर्मला कर्ण 

        2020 से 2022

०१/अंजनी कुमार सुधाकर ०२/अनीता सोनी ०३/केशव चंद्र शुक्ला ०४/गीता सिन्हा गीतांजलि ०५/ज्योति तिवारी ०६/डॉक्टर भूमिका श्रीवास्तव ०७/डॉ रमा बहेड ०८/नवीन जैन ०९/नाथू लाल मेघवाल १०/मदन मोहन शर्मा सजल ११/मोती प्रसाद साहू १२/राजेश तिवारी मक्खन १३/रामबाबू शर्मा राजस्थानी १४/अरुणा रश्मि दीप्त १५/ वीणा मेदनी १६/ शिखा  अरोरा १७/ शिवालिका सिंह कुशवाहा १८/ शोभा पाठक १९/ सरला विजय सिंह सरल २०/ स्वर्ण ज्योति २१/ प्रशांत करण २२/ नरेंद्र परिहार २३/ अजय यादव २४/ अरुणिमा रेखा २५/ अर्चना जैन २६/ अल्पना नागर २७/ आशा जाकड २८/ आशा दिनकर २९/ आशा शर्मा ३०/ इरा जौहरी ३१/ उर्मिला श्रीवास्तव उर्मी ३२/ उषा जैन ३३/ उषा वर्मा वेदना ३४/ कमल किशोर कमल ३५/ कमल पुरोहित ३६/ कविता सिंह ३७/ किरण वैद्य कठिन ३८/ केवरा यदू मीरा ३९/ गिरीश चंद्र ओझा इंद्र ४०/ गीता चौबे गूंज ४१/ चंद्रकला भारतीय ४२/ ज्योति हरी प्रसाद श्रीवास्तव ४३/ डॉ सविता मिश्रा माधवी ४४/ डॉ शशि मंगल ४५/ डॉक्टर त्रिवेणी प्रसाद दूबे मनीष ४६/ डॉक्टर अनिता राज जैन विपुला ४७/ डॉक्टर ज्ञानचंद मर्मज्ञ ४८/ डॉक्टर मंजू रुस्तगी ४९/ डॉ सुधा चौहान राज ५०/ डॉक्टर सुशील शर्मा ५१/ दीप्ति सक्सेना दीप्त ५२/ नरेंद्र कुमार ५३/ नवीन मौर्य ५४/ निर्मला कर्ण ५५/ पुरुषोत्तम शाकद्वीपी ५७/ पूनम शर्मा स्नेहिल ५८/ प्रकाश राय ५९/ प्रवेश स्वरूप खरे ६०/ बी एल नायक ६१/ मधु अरोरा ६२/ मधु दायमा ६३/ योगिता चौरसिया ६४/ रमेशचंद द्विवेदी ६५/ राम हेतार मेघवाल ६६/ रेणु बाला धार ६७/ विद्या कृष्णा ६८/ विनीता निर्झर ६९/ विनोद कुमार हसोड़ा ७०/ विभा रानी श्रीवास्तव, पटना ७१/ शिल्पी भटनागर ७२/ श्रीमती कमल अरोड़ा ७३/ श्रीमती पुष्पा शर्मा ७४/ श्रीमती शशि ओझा ७५/ श्रीमती सरोज सिंह ठाकुर ७६/ रवि प्रकाश वोहरा ७७/ संध्या जावली ७८/ सुरंजना पांडे ७९/ सुशीला वसीटा दामिनी ८०/ स्वीटी गोस्वामी ८१/ मकसूद शाह ८२/हेमचंद सकलानी ८३/ सुषमा सिन्हा ८४/ सीमा गर्ग मंजरी ८५/ नंदलाल मणि त्रिपाठी पीताम्बर ८६/ वीना आडवाणी तन्वी ८७/ अमिता रवि दुबे ८८/ सुधीर श्रीवास्तव ८९/ विनोद कुमार सिल्ला ९०/ नीरू मोहन बागेश्वरी ९१/ कालिका प्रसाद सेमवाल ९२/ सरला विजय सिंह सरल ९३/ डॉक्टर माधवी मिश्रा शुचि ९४/ कृष्णकांत दरौनी ९५/ राजेश्वरी जोशी ९६/ अरुणा अग्रवाल ९७/ विपुल माहेश्वरी ९८/ गीतांजलि वाष्णेय सुयांजलि 

संस्था के वे साथी जो अभी तक जोड़ नहीं पाए हैं । मंच संदेश संचालकों से निवेदन है कि अगर वह उन्हें जोड़ना चाहते हैं ,इस कार्यक्रम में अपनी बात रखना चाहते हैं तो उन्हें जोड़ें अपने-अपने पटल पर यह संदेशा छोड़ें 4:00 बजे तक उन्हें जोड़ दें।

*विशेष/*

राज्य सरकार द्वारा राजस्थान में कई शहरों में कई जिलों में इंटरनेट सेवा बाधित कर दी गई है इसलिए राजस्थान के कई शहरों से हमारा संपर्क टूटा हुआ है।

             अगर आज संध्या तक इंटरनेट सेवा बहाल नहीं होती है तो यह कार्यक्रम 4 जुलाई 2022 या फिर 7 जुलाई 2022 को पुनः जारी किया जाएगा ताकि राजस्थान के तमाम साथी हमारे इस कार्यक्रम से जुड़ सकें।

अतः इस कार्यक्रम को पार्ट ०१ मान कर हम चलते हैं।

आज के कार्यक्रम के लिए सभी का स्वागत है सभी 4:50 पर कार्यक्रम में सम्मिलित हो जाने के लिए उपस्थित रहें।

अनुराग

[30/06, 5:01 pm] सुधीर माँपेरचना: *मैराथन साहित्यिक मंथन*

आज से हम उस कार्यक्रम का प्रारंभ करने जा रहे हैं, जिसमें साहित्यिक मंथन चिंतन का दौर चलेगा। यह कार्यक्रम 1 जुलाई 2022 से प्रारंभ होकर 15 जुलाई 2022 तक चलेगा।

[30/06, 5:02 pm] सुधीर माँपेरचना: आप सभी को जैसा कि ज्ञात  ही है। मंजिल ग्रुप साहित्यिक मंच की स्थापना वर्ष 2010 में 15 जुलाई के दिन की गई थी।

[30/06, 5:05 pm] सुधीर माँपेरचना: 5 साहित्यकारों को साहित्यिक समारोह में बुलाया गया लगभग डेढ़ हजार किलोमीटर की यात्रा कर कर जब वह दिल्ली पहुंचे तो उनको कार्यक्रम में मंच पर रचना पाठ करने का अवसर नहीं दिया गया।

     प्रेस दीर्घा में उस समय इस संस्था के सभापति जिनकी उम्र इस समय 96 वर्ष है जो इस समय कनाडा में हैं। तथा इस संस्था के राष्ट्रीय संयोजक भारतवर्ष सुधीर सिंह सुधाकर जी उस कार्यक्रम में उपस्थित थे।

[30/06, 5:08 pm] सुधीर माँपेरचना: उस कार्यक्रम से उन 5 साहित्यकारों को इंडिया गेट लेकर पांच सदस्य पहुंचे सबने उन साहित्यकारों की रचनाओं का रचना पाठ का आनंद लिया उसके बाद भी रचनाकार ट्रेन से अपने शहर को वापस चले गए।

[30/06, 5:08 pm] सुधीर माँपेरचना: एक साहित्यकार की द्वारा एक साहित्यकार की इस तरह से  बेज्जती सभापति जी को बर्दाश्त नहीं हो और उसी क्षण उन्होंने सात ngo की मीटिंग बुलाई और मीटिंग के दौरान 2 घंटे के चर्चा विचार विमर्श के बाद मंजिल ग्रुप  साहित्यिक मंच का गठन कर दिया गया।

[30/06, 5:09 pm] सुधीर माँपेरचना: अगले सात दिनों तक इस संस्था के नियम शर्तें क्या हो इस पर भी चर्चा हुई और तब जाकर 15 जुलाई 2010 को इस संस्था का विधिवत निर्माण किया गया।

[30/06, 5:11 pm] सुधीर माँपेरचना: इस संस्था का पहला कार्यक्रम पटना बिहार में आयोजित हुआ जिसमें कार्यक्रम की अध्यक्षता माननीय सभापति जी ने की थी।

    उस कार्यक्रम में सबसे पहली रचना मुंशी प्रेमचंद की बूढ़ी काकी कहानी पढ़ी गई थी। जिसे वहां उपस्थित 12 सदस्यों ने📒📒📒📒 पीला कार्ड भी दिया था।📗📗📗📗📗📗26 ने दिया था।📕📕📕लाल कार्ड किसी ने नहीं दिया था।

[30/06, 5:12 pm] सुधीर माँपेरचना: कार्यक्रम में जब हरा कार्ड की महत्ता को लोगों ने अच्छी तरह से जाना तो सभी ने मुंशी प्रेमचंद की रचना को हरा कार्ड ही देना चाहा पर जिन्होंने जो दिया था वही अंकित किया गया और आज तक वहीं अंकित है।

Saturday, 25 June 2022

बकैती


 उसने बताया

ठंढ़ा-ठंढ़ा – कूल-कूल

तेल गमकऊआ/गमकौआ

दर्द निवारक बाम

चेहरा चमकऊआ (फेसपाउडर)

में पिपरमिंट का रस मिला होता है

जो उगा लिया जाता है

गेंहूँ के फसल के कटने और

धान के बीज रोपने के अंतराल में

उस रस के बेचने से मिला धन

शौक को सुगन्धित करता है


उसने बताया

चाहे शाखाएँ जिस ओर फैली हों

जड़ पूर्वजों के जमीन पर होनी चाहिए

किसी छुट्टी में जाकर वह दीवाल खड़ी करेगा

पिता जाकर छत बनवा देंगे

छत होने से 

किसी काज प्रयोजन में जुटने से

उसके भाइयों को अधिक दो चार दिन

गाँव में विचरण करने में संकोच ना होगा


उसने बताया

आकलन करता है

टमाटर आलू प्याज

इतने लाया था इतने दिन पहले

समाप्ति के पहले ले आना है

धरनी की झुंझलाहट का ख्याल रखना है

उसे मज़ा आता है

इन छोटी-छोटी उलझनों को

सुलझाते हुए गुंजारना है

उसने बताया

ना ना उसने जताया

कार्यालय में अति व्यस्तता के बीच

दो चार पल चुरा लेता है

और अपनों को फोन करता है

सबकी खबर रखता है

कुशलमंगल पूछता है

खासकर जो मुझ जैसे बुजुर्ग हैं


बेटे को माँ के स्नेह की तड़प है तो

 माँ को बेटे के कन्धे का सहारा

दूर बैठे के ख्यालों में ख्याल जो है

बिना राजनीतिक बातों को शामिल किए

भाई ने बताया

नेता अपनी पार्टी के प्रति ही वफादार नहीं होते

और हम उन पर भरोसा करके

उनके हाथों में देश और राज्य दे देते।

अब क्या कहें

राजनीत वाले केवल

अपने तोंद के प्रति वफादार होते हैं

वायरल हुए वीडियो तो

खोदो पहाड़ मरल चुहिया भी नहीं निकलती



Sunday, 19 June 2022

स्वस्तिक पर खून के छींटे

 





"कल बिहार बन्द था।"

"कल भारत बन्द है और हमारी वापसी है, न जाने कैसे हालात होंगे..।"

"हालात जो होने चाहिए उसके पसङ्गा भर नहीं हो पा रहा।"

"क्या आपके द्वारा, तोड़-फोड़, आगजनी और देश के सम्पत्ति नष्ट करने को समर्थन देते हुए उचित ठहराया जाना समझ लूँ?"

"आपको क्या लगता है, कथा-कहानी, गीत-कविता लिखने से स्थिति बदल जाने वाली है? लिखते रहिए, कुछ नहीं होने वाला। पचासी साल के बुजुर्ग वकील से डर लगता है...,"

"क्या आपका कहना न्यायसंगत है कि कलम से जंग नहीं लड़ी जा सकती?"

"जरूर लड़ी जा सकती है। लड़ी भी जाती रही है। लेकिन वर्त्तमान काल क्या दुबककर रहने का चल रहा है...!

Wednesday, 15 June 2022

विषाक्तता

 


सिंदूरी सन्ध्या श्यामली निशा को अपना अधिकार सौंप देने ही वाली थी... घरों से निकले अनेकानेक गन्ध-सुगन्ध भुवन में फैल रहे थे। एक तरफ उन घरों में वामाएँ प्रतीक्षारत थीं तो दूसरी तरफ सजी सँवरी अनारकली पोशाक में , झीना घूँघट डाले, पैरों को हिलाते हुए घँघुरओं के स्वर से उतावलापन फैला रही थी। 

"बकरी की अम्मा कब तक खैर मनाएगी?" सारंगी ने तबले से कहा।

"मनाएगी न ! मनाएगी, बकरी की अम्मा खैर मनाएगी। शहर के धन्नाराम, नए-नए मूँछ वाले बोली में बढ़त लगाते जा रहे हैं.. । बकरे का सौदा जो ऊँची नाक के दिखावे में बदल गया।" तबले ने कहा।

दूर कहीं बज रहा था

न हीरा है न मोती है न चाँदी है न सोना है

नहीं क़ीमत कोई दिल की ये मिट्टी का खिलौना है

Tuesday, 7 June 2022

धर्म : विभा रानीश्री

"हम पशुपतिनाथ मन्दिर जा रहे हैं। क्या आप भी चलेंगे?" अख़्तर से रवि ने पूछा।

नेपाल भारत साहित्य महोत्सव में भारत से आये प्रतिभागी नेपाल दर्शन को निकले थे।

"मन्दिर के प्रवेश द्वार पर 'गैर हिन्दू का प्रवेश वर्जित' है का बोर्ड लगा हुआ है!" प्रदीप ने कहा

"रमज़ान माह होने के कारण अख़्तर भाई रोजा में हैं... वैसे भी मन्दिर में देवता का स्पर्श हिन्दू को ही कहाँ मिल रहा?" रवि ने तल्खी से कहा।

तभी प्रदीप का फोन टुनटुनाने लगता है और फोन पर बातकर वो बेहद परेशान नजर आता है.. 

"क्या बात है प्रदीप जी आप बेहद घबराए हुए लग रहे हैं...?" अख़्तर ने पूछा।

"मेरी पत्नी को गहरी चोट लग गयी है। अस्पताल में भर्ती करवा दी गयी है। लेकिन उसको खून देना है और अस्पताल में खून मिल नहीं रहा है.."

"किस ग्रुप का खून है ?" अख़्तर ने पूछा

"बी-नेगेटिव," प्रदीप ने कहा।

"ना तो चिन्ता कीजिये और ना चलने में देरी। मेरा भी खून बी-नेगेटिव है..," अख़्तर ने कहा।

"आप गैर हिन्दू भी हैं और रोजा में भी। आप?" रवि ने कहा।

"आप मुझे शर्मिंदा क्यों कर रहे हैं रवि जी..," प्रदीप जी, अख़्तर के पंजों को कसते हुए कहा।

Thursday, 2 June 2022

कोंपल के रक्षक

"क्या इस घर के मालिक को बच्चे पसन्द नहीं थे कि इकलौता बेटा हुआ और उस इकलौते बेटे ने औलाद ही नहीं किया?"अभी फँख फैले नहीं थे लाल-लाल गलफड़ वाले दुधमुँहे चूजे ने माँ चिड़ी से पूछा।

"अरे नहीं रे! मालिक को बच्चे बहुत पसन्द थे। मेरी दादी बताया करती थीं कि ये अपनी ही शादी में आए छोटे-छोटे बच्चों को कप-प्लेट, लैंप-लालटेन के शीशे को फोड़ने पर क्रमानुसार चवन्नी-अठन्नी-रुपया-दो रुपया दिया करते थे।  च च चनाक, ट्टुन ट्टुन टनाक बिखरे किरचों के ढ़ेर पर माँ, बुआ, मामी, चाची, मौसी से डाँट खाने से बेहद प्रफ्फुलित होते।" माँ चिड़ी किस्सा सुना रही थी।

"संयुक्त परिवार के सुख को भोगा पिता-पुत्र अपने पुश्तैनी घर को बाल गृह बना रखा है।"

"मालिक के बेटे के अनुशासन में हमें निश्चिंतता की जिन्दगी मिल जाती है। है न माँ!"

Wednesday, 25 May 2022

अलंकार


लगभग तीन साल से चिकित्सा जगत से दूरी बना रखा था।  इस काल का सदुपयोग चिकित्सक के चक्कर लगाने में करने का निर्णय करते हुए इंदिरा गांधी आयुर्विज्ञान संस्थान पहुँच गए। कुछ दिनों से सीने और गले में परेशानी थी।  अच्छा था कि मास्क लगाना अनिवार्य था। चीटीं को भी सरकने में दम घूंट रहा होगा इंसानों के बीच से। पहला दिन जेनरल फिजिशियन ने कार्डियोलॉजी में रेफर कर दिया। भीड़ के कारण नम्बर नहीं लग पाया। दूसरे दिन जाने पर चिकित्सक से भेंट हुई और जाँच शुरू हुआ। एक परेशान हितैसी का प्रवेश हुआ

"इको टेस्ट करवाना है नम्बर लगा दें,"

"जाँच आज नहीं हो सकेगा, कल सुबह आइए।"

"कल डॉक्टर ऑपरेशन करेंगे टेस्ट का रिपोर्ट आज ही चाहिए।"

"आज नहीं हो सकेगा,कह...,"

"लीजिए; डॉक्टर साहब से बात कर लीजिए, इमरजेंसी है।"

"मुझे किसी डॉक्टर से बात नहीं करनी। कल सुबह आइए टेस्ट हो जाएगा ऑपरेशन के पहले रिपोर्ट मिल जाएगा।"

"आप एक बार डॉक्टर...,"

"टेस्ट रिपोर्ट पर डॉक्टर को केवल पुर्जी लिखनी है। वो भी दवा विक्रय प्रतिनिधि के वैसाखी के सहारे...। टेस्ट करने वाले डॉक्टर का काम ज्यादा जोखिम भरा है..,"

Tuesday, 17 May 2022

आखिर क्यों...

 बैसाखी पूनो/बुद्ध पूर्णिमा

छान पर कोंपल

सदाफूली की

"क्या तुमने सुना वज़ू करने वाले स्थान में शिवलिंग मिला है!"

"जब तुम नास्तिक हो तो तुम्हें मन्दिर-मस्जिद से क्या लेना देना; या ऐसा तो नहीं कि तुम्हारा चित्त डगमगाने लगा है, जैसे कम्युनिस्ट से भाजपा समर्थक हो रहे हो? वैसे उपासना स्थल क़ानून कहता है कि भारत में 15 अगस्त 1947 को जो धार्मिक स्थान जिस स्वरूप में था, वह उसी स्वरूप में रहेगा, उसकी स्थिति में कोई बदलाव नहीं किया जा सकेगा,"

"सबसे अहम विवाद साल 1809 में हुआ था जिसकी वजह से सांप्रदायिक दंगे भी हुए थे। हिन्द के लिए जो उचित होगा उसको सभी का समर्थन मिलना चाहिए।"

"कैलाश पर्वत-मानसरोवर के लिए हिन्द कब प्रयासरत होगा ?"


छत में सजे

अन्ताक्षरी की गोष्ठी-

ग्रीष्मावकाश

जीत की मस्ती-

झुरनी डंडा संग

पीपनी शोर

Sunday, 24 April 2022

आतिशीलभ्य

 

"ये रे लखिया तू किस मिट्टी की बनी है? तुझे ना तो इस श्मशान बने जगह पर आने में डर लगा और ना मृतक को बटोरने में!"

"मेरा डर उसी समय भाग गया साहब जब युद्ध छिड़ा..।"

"तू इनका करेगी क्या?"

"मुझे भी अपना और अपने जैसों का पेट भरना और तन ढंकना है। मेरे पुस्तक में लिखा है कि वैज्ञानिकों ने शोध में पाया है कि इन्सान और जानवरों के टिशू को भी हीरे में बदला जा सकता है।"

"तू इतना क्यों मेहनत कर रही है। तू मेरी बात मान ले तो मैं तुझे अपने घर ले जा सकता हूँ। तेरा पेट भी भरेगा और तन पर भी रेशम चढ़ जाएगा।"

"मेरे तन का रंग ग्रेफाइट है जो क्रुसिबल बनाने में सहायक होता है साहब।और आपका मन..."

Friday, 8 April 2022

आक्षेप


"भादों के अमावस्या की रात से भी ज्यादा काली, गले में नरमुंडों की माला, हाथ में कटा हुआ सिर जिससे खून टपक रहा, पैरों के नीचे आदि मानव को दबाए खड़ी, इतनी भयानक स्त्री की सरंचना?" गीता-सार ने कहा।

"तेरे कृष्ण का विशालकाय शरीर और मुँख से झलकता भुवन। मनुष्य के शरीर को महज एक कपड़े का टुकड़ा बता रहा..।" कालरात्रि ने कहना शुरू किया, "काली सुंदर ही नहीं, सुंदरतम है। स्त्री के दो सत्य रूप है जन्मदात्री और मोक्षदायिनी भी। जानता है माँ को शहद बेहद पसंद है..," कालरात्रि ने कहा।

"जहाँ से जीवन आएगा, वहीं से मृत्यु भी आएगी। आत्मा स्थिर है। न शरीर मनु का है, न मनु शरीर के है। शरीर अग्नि, जल, वायु, पृथ्वी, आकाश से बना है और उनमें ही...,"

"ठहरो-ठहरो..! बिना उनके मर्जी के पत्ता नहीं हिलता न...। तो उनसे कहना अविरल विश्व युद्ध से हम शक्तिहीन हो चुके हैं...।" अग्नि, जल, वायु, पृथ्वी, आकाश का समवेत स्वर गूँज उठा और पंचतत्व ने आँखों तथा कानों को बन्द कर लिया।

Wednesday, 6 April 2022

अर्चना


 "अकील का फोन आया था वो बता रहा था कि आज कॉलोनी में अकील की अम्मी आने वाली हैं।" रवि ने कहा।

"सर! अकील सर की अम्मी अपने हाथ से काटा मुर्गा ही खाती हैं, वरना नहीं।" रसोइया ने कहा।

अकील और रवि विद्यार्थी जीवन से मित्र थे। कुछ महीनों पहले ही अकील के स्थान पर रवि स्थानांतरित होकर आया था। अकील उसी शहर का निवासी था। उसके परिवार के सदस्य अक्सर कॉलनी में घूमने आया करते थे।

"ठीक है उनके आने के बाद ही मध्याह्न भोजन बनेगा। उन्हें जैसे जो पसन्द हो वो बना लेना।" कार्यालय के लिए निकलते हुए रवि ने कहा।

"मेमसाहब! साहब को आपने कुछ कहा नहीं।" रसोइया ने रवि की पत्नी ज्योत्स्ना से कहा।

"आपके साहब को क्या कहना था महाराज?" ज्योत्स्ना ने पूछा।

"हमारा नवरात्र चल रहा है.. मेमसाहब!"

"हम उपवास तो कर नहीं रहे हैं,"

"मेमसाहब! नवरात्र करना अलग बात है और पर्व त्योहार में मास-मछली खाना अलग बात है।"

"आप चिन्तामुक्त रहें महाराज! अकील जी की अम्मी के पसन्द का ही भोजन बनेगा। पका मुर्गा कूद कर हमारे मुँह..,"

कुछ देर के बाद अकील की अम्मी ज्योत्स्ना से मिलने आ गयीं। चाय पानी के बाद रसोइया उन्हें मुर्गा काटने के लिए बुलाने आ गया।

"नवरात्र के समय हमारे परिवार में मुर्गा बनना बन्द हो गया है महाराज। वरना मैं इस काल में यहाँ क्यों आती?"

"पहले तो ऐसा नहीं था अम्मी!" रसोइया वर्षो से अकील के साथ भी रहा था।

"हाँ। पहले ऐसा नहीं था। पिछले साल नवरात्र के समय अकील की बड़ी बेटी हिना को बड़ी माता निकल गयी थीं तो..,"



Thursday, 24 March 2022

'हाइकु लेखन जुनून मांगता है'


गूगल में लिंक्स ढूँढने के क्रम में (सन् 2012 में) हाइकु विधा का पता चला..। बहुत आसान 'खेल' लगा पाँच, सात, पाँच सत्रह वर्ण में अपनी बात कहना। कुछ महीनों में तीन फेसबुक ग्रुप से जुड़ गयी। जोड़ने का काम डॉ. सरस्वती माथुर जी द्वारा हुआ। एक समूह के एडमिन श्री पवन जैन जी (लखनऊ), एक समूह में अनेक एडमिन श्री महेंद्र वर्मा जी, श्री योगेंद्र वर्मा जी, Arun Singh Ruhela जी(भाई अरुण रुहेला जी हम निशाचरों से बहुत परेशान रहे) एक समूह के एडमिन डॉ जगदीश व्योम जी मिले। तभी पता चला हाइकु लिखना खेल नहीं है।

°°

हाइकु लेखन में जो मुख्य आधार का पता चला

–अनुभूति का विशेष क्षण हो

–उसपर चित्रकार द्वारा चित्र बनायी जा सके

°°

व्योम जी के फेसबुक ग्रुप में हमारी कोई रचना पास हो जाती तो हम खुश हो जाते। उसपर चर्चा चलती। यात्रा लम्बी चली उनका कारवाँ बढ़ता रहा। और आज लगभग पन्द्रह साल से चल रहे उनके अथक श्रम से तीन पंक्तियों में सत्रह वर्णों के साथ रची जाने वाली, विश्व की सबसे लघु रचना 'हाइकु' को लेकर संपादित की गई पुस्तक में ७२८ पृष्ठों वाले इस वृहतकाय 'हिंदी हाइकु कोश' में देश-विदेश के १०७५ हाइकुकारों के कुल ६३८६ हाइकु संकलित हैं।

°°

किसी काल में देश के गाँव-शहर के क्या हाल थे..

सवेरा हुआ

लोटे निकल पड़े

खेतों की ओर

–डॉ. जगदीश व्योम

पृष्ठ-613

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गोधूलि वेला

गजरा बेच रही

दिव्यांग बाला

–सविता बरई वीणा

पृष्ठ-181

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जीवन की सच्चाई समझाने वाले..

आखिरी पत्ता

हवा में लहराया

मौन विदाई

-डॉ. सरस्वती माथुर

पृष्ठ-63

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आँगन रीता

अकेला बूढ़ा जन

कैसे जी लेता

–डॉ. राजकुमारी पाठक

पृष्ठ-59

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बदलते ऋतु की पहचान बताने वाले

आँख मिचौली

कोहरा-धूप खेले

सिगड़ी जली

–निवेदिताश्री

पृष्ठ-57

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माघ की धूप

संदूक में जा छिपे

ऊनी कपड़े

–आरती पारीख

पृष्ठ-500

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बादल लाये

बारात द्वार पर

ढोल बजाते

–अंजुलिका चावला

पृष्ठ-444

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वाले हाइकु के संग अनेक मुद्दे समाहित हैं। बहुत कुछ, बहुत-बहुत-बहुत कुछ है...।

°°

हाइकु कोश से अध्येता-शोधार्थी को हाइकु लेखन समझना आसान होगा तो उन्हें मिलेगा अनेक हाइकु–संग्रह की सूची हाइकुकार/सम्पादक के नाम के संग तो

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हाइकु-संकलन, हाइकु–केन्द्रित समीक्षा एवं शोध-पुस्तकों की सूची तथा पत्र-पत्रिकाओं के नाम सम्पादक.. वर्ष-माह-अंक के साथ..

°°

यह पुस्तक हमें कल मिली है... लेख्य-मंजूषा पुस्तकालय में रखी जायेगी... अध्येताओं के लिए लाभकारी पुस्तक के लिए डॉ जगदीश व्योम जी को अशेष शुभकामनाओं और हार्दिक आभार के संग साधुवाद

हाइकु जुनून माँगता है


Saturday, 19 March 2022

क्रान्ति


"शिउली नीम पालक चुकुन्दर से रंग तैयार किया गया और यह क्या तुम पहले से अपने चेहरे पर लगा रखा है?" श्यामा की सास ने पूछा।

"बहू! उलटे तावे के रंग सा जिसके चेहरे का रंग हो उसके चेहरे पर काला रंग ही शोभ सकता है न! रुधिरपान करने वाली ‘ढुण्ढा' राक्षसी सी लग रही है तुम्हारी बहू..," श्यामा की दादी सास ने कहा।

"दादी! श्यामा के चेहरे का रंग काल के संग नहीं बदलेगा और जब मुझे श्यामा के पति को श्यामा के रंग से कोई फर्क नहीं पड़ता तो अन्य किसी को कटाक्ष नहीं करना चाहिए।"श्याम ने श्यामा को लाल अबीर लगाते हुए कहा।

"देखिए माँ जी! मेरी बहू ‘ढुण्ढा' राक्षसी के भय से परित्राण दिलाने वाली ‘होलिके' (रक्षादेवि) लग रही है।"श्यामा की सास ने कहा।

"मेरे परिहास को...," दादी की बात पूरी होने के पहले सब ठहाका लगा रहे थे।

Friday, 18 March 2022

पसन्द अपनी-अपनी

आपके जीवन में सब रंग मिले..

मित्र के हाथ

उपहारों से भरे

अबीर झोली


रिश्तों में दरार डालता कौन है

हद में स्याही जज्बे से पौन है

बौर का कहीं और ठिकाना

क्यों कोयल कहीं और मौन है

°°

लेखन और तस्वीर खींचना जुनून है

 

Saturday, 12 March 2022

'उऋण'


"तुझे चूहा कुतर देता तो दीमक तुम्हारे पन्ने को भुरभुरा कर देता। मेरी तीखी आँच तुम सह नहीं पाती। फिर ऐसा क्या है जो तुम पुनः-पुनः सज जाती रही?" वक्त ने पुस्तक से पूछा।

"इसका उत्तर तो सुल्तान जैनुल आबिदीन से लेकर योगराज प्रभाकर जैसे सिरफिरे दे सकते हैं। अरे! तू तो सब बातों का गवाह रहा है!'

"अच्छा ये बता तू किस-किस किस्से के दर्ज होने से खुश हुई?"

"–चीन के अलादीन के चिराग का भारत के नयी पीढ़ी से तुलना कर देने वाली कथाओं..,

–हार की जीत' से। बाबा भारती कुछ देर तक चुप रहे और कुछ समय पश्चात् कुछ निश्चय करके पूरे बल से चिल्लाकर बोले, "ज़रा ठहर जाओ।" खड़गसिंह ने यह आवाज़ सुनकर घोड़ा रोक लिया और उसकी गरदन पर प्यार से हाथ फेरते हुए कहा, "बाबाजी, यह घोड़ा अब न दूँगा"

–मुलक्करम' तो मर गया परन्तु ब्रेस्ट टैक्स ऑन दी साइज ऑफ दी ब्रेस्ट के चक्कर का अन्त करने के लिए जो 'नंगेली' शहीद हुई। उसके साथ चिरुकनन्दन के इकलौता सती होने का किस्सा जब दर्ज हुआ।"

 –राजा जाम दिग्विजयसिंह जाडेजा द्वारा पोलेंड के 500 शरणार्थी पोलिश महिलाओं और 200 बच्चों से भरे जहाज को शरण देना। तुम तो जानते हो उनके संविधान के अनुसार जाम दिग्विजयसिंह उनके लिए ईश्वर के समान है..,"

"इसलिए यूक्रेन से निकले भारत के लोगों को बिना बीजा पौलेंड शरण दे रहा है...! अगले सौ-दो सौ साल तक यह किस्से दोहराए जाते रहेंगे और बार-बार दोहराता मैं और तुम इसका गवाही देते रहेंगे।"

Monday, 7 March 2022

मोर का पैर

"एक तरफ आपका शहर स्मार्ट सिटी के होड़ में है दूसरी तरफ आप उदाहरण बनती जा रही हैं।"
"अरे! मेरे समझ में नहीं आ रहा है आप कहना क्या चाह रही हैं?"
"घर-घर तक पानी-गैस पाइप चला गया, बिजली की चकाचौंध है, अनेक मॉल, ब्रांडेड पोशाकों के बड़े-बड़े दुकान खुल गए, थमे अपार्टमेंट पूरे हो गए.. फुट ब्रिज-ओवरब्रिज के जाल बिछ गए, शराब बन्दी हो गए.."
"सरकारी कार्यालयों में रिक्तियों में बहाली नहीं, चिकित्सा में उन्नति नहीं, शिक्षा ठप्प होने के कगार पर, कुछ वर्षों के बाद प्रत्येक घर वृद्धाश्रम बन जायेगा।  बिन ब्याही माँ बनी चौदह-पन्द्रह साल की बच्चियों का आश्रयस्थल, शेल्टर होम की कहानी इसी शहर के किसी कोने में है,शराब बन्दी की खूब कही: दस करोड़ की उगाही माफिया-पुलिस-नेताओं के जेब में आज भी जा रही। अध्यापक-अध्यापिकाओं को आदेश मिला है शराबियों को पकड़ने का.. जैसे पिटाये खुले में शौच करने वालों को पकड़ने में, कर लें शिकार बड़े-बड़े मगरमच्छ, शार्क ह्वेल, एक बार औचके में राज्याध्यक्ष के घर का..."
"तुम न बड़ी वाली मक्खी हो जो बिगड़े घाव पर...,"
"जैसे बिगड़े घाव से ही तो राज्य की पहचान है., वैसे ही आर्थिक परतंत्रता देकर नारी सशक्तिकरण है!"

Saturday, 5 March 2022

कुटिल बचन साधू सहै...

प्रिय अरुण

शुभाशीष

आशा है तुमलोग कुशल होंगे। तुम गाँव आये थे तो कह गए कि जो पैदावार होता है उससे आप कमरे सबका देखभाल भी करें और आपलोगों के रहने के लिए कमरा खोल जाता हूँ। जब कभी हमलोग गाँव आयेंगे तो हमें रहना भी अच्छा लगेगा।

पुराना घर होने के कारण कमरे की स्थिति बिगड़ रही थी। जिसको थोड़ा ठीक करवा दिया गया है। दो बार का फसल मुझे मिला। उसके बाद मुझे फसल मिलना बन्द हो गया। किसान से पूछा तो उसने कहा कि तुम्हारा छोटा भाई राजू खेत को मनी पर लगा दिया है जिसकी राशि उसे भेज दी जाती है। 

तुम्हारे कमरे को आगे मरम्मत करवाने में लगभग दो-ढ़ाई लाख का खर्च है।

कैसे क्या करना है पत्र पाते सूचित करना। बहू को सस्नेहाशीष बोल देना।

तुम्हारा चाचा

अखिलेश्वर


"क्या सोचा? गाँव के घर के मरम्मत करवाने के बारे में।" पत्र पढ़ने के बाद अरुण की पत्नी ने पूछा।

"पुरखों की निशानी बची रहे। मरम्मत तो करवाना ही होगा।"

"उससे हमलोगों को क्या लाभ होगा? आपको सेवा निवृत्त हुए पाँच वर्ष हो गए। गाँव जाना तो दूर की बात कभी चर्चा भी नहीं करते हैं।"

"सब कुछ स्वयं के लाभ के लिए ही नहीं किया जाता है। कुछ दायित्व समाज के लिए भी पूरा किया जाता है।"

"सहमत हूँ। इस बार की होली में गाँव चलते हैं और सब ठीक-ठाक करवाकर विद्यालय-पुस्तकालय शुरू करते हैं।"

"तुम अपने दिमागी-घोड़ों को तबेला में बाँध कर रखो। यह मेरे घर का मामला है। हम सब भाई जैसा चाहेंगे वैसा होगा।"

"आपके घर का मामला..?तो मैं इस घर में चालीस साल से क्या कर रही हूँ...!"

बेलौस वाई गुणसूत्र


रात को जब सास-ससुर और बच्चों का खाना निपट गया, तो पतीश्वर के आने की आहट सुनते ही वह हुलसकर दरवाजा खोलने गयी, "आज कुछ ज्यादा काम था ? " ....थोड़े सहमे स्वर में पूछ लिया।

बच्चों की पढ़ाई-परवरिश की कोई चिन्ता नहीं। वृद्ध माता-पिता की सेवा हो रही। रिश्तेदारों-अतिथियों का स्वागत में कोई कसर नहीं रह रहा। पच्चीस साल से मिली एक सुघड़ सेविका पत्नी के होने का परम् आनन्द है पतीश्वर महोदय को। रात का वह पल आया जब पतीश्वर का नाखून पत्नी के उस-उस घाव पर भी गया जो सूख ही नहीं पा रहा था।

एक आह के साथ उसने विरोध का स्वर मुखर करना चाहा लेकिन पंजा में दबा..। दबी-दबी सी फफक रही थी पर पतीश्वर को इस बात से कोई फर्क नहीं पड़ रहा था। विरोध ज्यादा देर तक नहीं चल पाया क्योंकि बिलकुल साथ वाला कमरा सास-ससुर का था । पतीश्वर के करवट बदलते वह आँगन में आकर बैठ गयी। थोड़ी देर में उसके सामने एक लिफाफा लहराने लगा। 

"तुम ध्यान से पुनः पढ़ लेना.." झटके से पलट कर देखी तो उसकी सास ने कहा।

वह पढ़ने लगी :- सरकार : अनुज्ञा पत्र

प्रिय महोदय/महोदया

आपको वाहन चलाने के लिए अधिकृत अनुज्ञा पत्र प्राप्त होने पर बधाई !

एक जिम्मेदार चालक के रूप में यह आपका दायित्व है कि "आप परिवहन नियमों से भिज्ञ रहें तथा वाहन को गति-सीमा के भीतर रहते हुए सुरक्षित रूप से चलायें ।

'आपका जीवन बेहद मूल्यवान है।'

पथ पर एक सीमित गति से वाहन चलाएंगे, 'पथ पर उग्र प्रतिस्पर्धा' में नहीं पड़ेंगे तो यह अनुज्ञा पत्र आपको गति और प्रगति दोनों का हकदार बना देगा।

हमारी शुभकामनाएँ सदैव आपके साथ रहेंगी।

शुभेच्छु

परिवहन विभाग

"तुम्हारी जीवन-गाड़ी कैसे चले यह तुम्हें ही तय करने का पूरा अधिकार है।" सास ने कहा

Thursday, 3 March 2022

'का से कहूँ'

 प्रश्न :– पुस्तकें पढ़ना क्यों अच्छा लगता है?

उत्तर :– 
बस अपना ही ग़म देखा है
हमने कितना कम देखा है।
खुली आँखों से काले कोट पहने कोर्ट में बहस करते हुए स्वयं को सपने में देखना शुरू किया। जब से होश सम्भाला पुस्तकों के बीच में ही मेरा रहना हुआ। मुझसे तीन बड़े और एक छोटा भाई था। उनके पास जो पुस्तकें क्रमानुसार नन्दन, चम्पक, बाल भारती, धर्मयुग, सारिका, गुलशन नन्दा, रानू, राजहंस, शिवानी, प्रेमचन्द इत्यादि आतीं, कक्षा की पुस्तकों के संग उन्हें पढ़ती रही। बी.एड –वकालत की पढ़ाई पूर्ण करते-बढ़ते उम्र के साथ मनोरमा, वनिता, गृहशोभा, सरिता, कल्याण, कादम्बनी, पढ़ना शुरू किया। अल्पायु में मेरे मझले भाई और मेरी माँ का साथ छूट जाने के बाद मैं अपने को पुस्तकों में डुबो दी। पुस्तकें मेरी सखी बनीं। तन्हा नहीं थी लेकिन तन्हाई थी...। नारी सुलभ समस्याओं का हल, आदर्श बेटी, आदर्श बहन, आदर्श पत्नी, आदर्श बहू की समझ पुस्तकों से ही मिली। वरना किससे पूछती! कभी खुशी मिलती, लिख लेती। जब कभी दुखी होती, लिख लेती। आस-पास सुनने वाली कोई नहीं थी।
लेलिन-मार्क्स को पढ़ना शुरू किया। सिवाय गायत्री मंत्र– ॐ नमः शिवाय –वो भी कभी-कभी, जब बेहद विचलित होती रही.. रात्रि में सोते समय जप लेती हूँ। 'वोल्गा से गंगा' पढ़ने के बाद पूजन का अर्थ इतना ही समझ में आ सका।
समय कालान्तर में बहन-बेटी-सखी विहीन मैं, मेरे लिए पुस्तकें नींद लाने में सहायक हुईं। विधा में लेखन शुरू किया तो अध्ययन अत्यन्त आवश्यक हो गया। 
छन्दमुक्त कविता, मुक्तक, हाइकु दोहा लघुकथा को समझने में सहायक।
उदाहरण के रूप में देखें:-©रवि कुमार 'रवि'
वह उसकी आँखों की गहराईयों में डूब गया
यह पंक्ति बिल्कुल सपाट है और यह कविता की आदर्श पंक्ति नहीं हो सकती | अगर इसी पंक्ति को हम इस प्रकार लिखें:-
गहरा बहुत है उसकी आँखों का समंदर
एकबार डूबा कि डूबता गया वह
उपरोक्त दोनों पंक्तियों के भाव एक जैसे हैं परंतु कहन और शिल्प बिल्कुल जुदा | हमें इसतरह अपने शिल्प और शब्दों के चयन पर विशेष ध्यान देना होगा |

 सन् 2015 में डॉ. सतीशराज पुष्करणा जी से भेंट हुई तो उनसे जाना कि सौ पृष्ठ पढ़ लो तो एक पृष्ठ का लेखन करो। किसी ग़ज़लकार ने भी कहा कि हजार शेर पढ़ लो तो ग़ज़ल लिखना शुरू करो

  कथानक, वाक्य विन्यास, शैली, शिल्प, मुहावरे, शब्दों के चयन और अलंकार आदि पढ़ने से ही समझ में आने लगे।

बस! पाठक का पाथेय होना इतना ही...

Tuesday, 1 March 2022

रत्नाकर-सागर

हर-हर महादेव : ॐ नमः शिवाय
महात्रिरात्रि
विप्लपत्र में घिरी
मीन की भीड़

 शिव=अत्रि
 महात्रिरात्री=महाशिवरात्रि
एक की खुशी
दूसरे के लिए
परेशानी का कारण
नहीं होना चाहिए

"मैंने सभी प्रकार के मुख्य शल्य क्रिया का शुल्क एक कर देने का निर्णय लिया है। इससे समाज में यह सन्देश जायेगा कि हमारे अस्पताल में प्रसव से धन उगाही के उद्देश्य से शल्य क्रिया नहीं की जाती। मेरे इस निर्णय से आपलोग भी सहमत होंगे,  ऐसी उम्मीद करता हूँ।" अस्पताल के प्रबंधक ने अपनी मंडली के सम्मुख कहा।

"महोदय आप ऐसा कैसे कर सकते हैं? गरीबों से आप और आपकी स्त्री रोग विशेषज्ञ पत्नी द्वारा की गई शल्य- क्रिया की कोई राशि नहीं ली जाती है। आप पहले से ही ‘सोसाइटी फॉर एजुकेशन, एक्शन एंड रिसर्च इन कम्यूनिटी हेल्थ’ ट्रस्ट की स्थापना कर अपनी सारी कमाई दान कर रहे हैं। आपके पास आने वाले रोगी खुशी से राशि खर्च कर सकते हैं। उन्हें आपलोगों पर पूरा विश्वास होता है।"

"आपलोग तो ऐसा कह रहे हैं मानों मैं महादेव हूँ और गणेश के कटे सर को जोड़ सकता हूँ..!"

उऋण

बैताल ने कहना शुरू किया :- पूरी तरह से उषा का सम्राज्य कायम नहीं हुआ था लेकिन अपनों की भीड़ अरुण देव के घर में उपस्थित थी। मानों निशीथकाल मे...