Tuesday, 17 May 2022

आखिर क्यों...

 बैसाखी पूनो/बुद्ध पूर्णिमा

छान पर कोंपल

सदाफूली की

"क्या तुमने सुना वज़ू करने वाले स्थान में शिवलिंग मिला है!"

"जब तुम नास्तिक हो तो तुम्हें मन्दिर-मस्जिद से क्या लेना देना; या ऐसा तो नहीं कि तुम्हारा चित्त डगमगाने लगा है, जैसे कम्युनिस्ट से भाजपा समर्थक हो रहे हो? वैसे उपासना स्थल क़ानून कहता है कि भारत में 15 अगस्त 1947 को जो धार्मिक स्थान जिस स्वरूप में था, वह उसी स्वरूप में रहेगा, उसकी स्थिति में कोई बदलाव नहीं किया जा सकेगा,"

"सबसे अहम विवाद साल 1809 में हुआ था जिसकी वजह से सांप्रदायिक दंगे भी हुए थे। हिन्द के लिए जो उचित होगा उसको सभी का समर्थन मिलना चाहिए।"

"कैलाश पर्वत-मानसरोवर के लिए हिन्द कब प्रयासरत होगा ?"


छत में सजे

अन्ताक्षरी की गोष्ठी-

ग्रीष्मावकाश

जीत की मस्ती-

झुरनी डंडा संग

पीपनी शोर

Sunday, 24 April 2022

आतिशीलभ्य

 

"ये रे लखिया तू किस मिट्टी की बनी है? तुझे ना तो इस श्मशान बने जगह पर आने में डर लगा और ना मृतक को बटोरने में!"

"मेरा डर उसी समय भाग गया साहब जब युद्ध छिड़ा..।"

"तू इनका करेगी क्या?"

"मुझे भी अपना और अपने जैसों का पेट भरना और तन ढंकना है। मेरे पुस्तक में लिखा है कि वैज्ञानिकों ने शोध में पाया है कि इन्सान और जानवरों के टिशू को भी हीरे में बदला जा सकता है।"

"तू इतना क्यों मेहनत कर रही है। तू मेरी बात मान ले तो मैं तुझे अपने घर ले जा सकता हूँ। तेरा पेट भी भरेगा और तन पर भी रेशम चढ़ जाएगा।"

"मेरे तन का रंग ग्रेफाइट है जो क्रुसिबल बनाने में सहायक होता है साहब।और आपका मन..."

Friday, 8 April 2022

आक्षेप


"भादों के अमावस्या की रात से भी ज्यादा काली, गले में नरमुंडों की माला, हाथ में कटा हुआ सिर जिससे खून टपक रहा, पैरों के नीचे आदि मानव को दबाए खड़ी, इतनी भयानक स्त्री की सरंचना?" गीता-सार ने कहा।

"तेरे कृष्ण का विशालकाय शरीर और मुँख से झलकता भुवन। मनुष्य के शरीर को महज एक कपड़े का टुकड़ा बता रहा..।" कालरात्रि ने कहना शुरू किया, "काली सुंदर ही नहीं, सुंदरतम है। स्त्री के दो सत्य रूप है जन्मदात्री और मोक्षदायिनी भी। जानता है माँ को शहद बेहद पसंद है..," कालरात्रि ने कहा।

"जहाँ से जीवन आएगा, वहीं से मृत्यु भी आएगी। आत्मा स्थिर है। न शरीर मनु का है, न मनु शरीर के है। शरीर अग्नि, जल, वायु, पृथ्वी, आकाश से बना है और उनमें ही...,"

"ठहरो-ठहरो..! बिना उनके मर्जी के पत्ता नहीं हिलता न...। तो उनसे कहना अविरल विश्व युद्ध से हम शक्तिहीन हो चुके हैं...।" अग्नि, जल, वायु, पृथ्वी, आकाश का समवेत स्वर गूँज उठा और पंचतत्व ने आँखों तथा कानों को बन्द कर लिया।

Wednesday, 6 April 2022

अर्चना


 "अकील का फोन आया था वो बता रहा था कि आज कॉलोनी में अकील की अम्मी आने वाली हैं।" रवि ने कहा।

"सर! अकील सर की अम्मी अपने हाथ से काटा मुर्गा ही खाती हैं, वरना नहीं।" रसोइया ने कहा।

अकील और रवि विद्यार्थी जीवन से मित्र थे। कुछ महीनों पहले ही अकील के स्थान पर रवि स्थानांतरित होकर आया था। अकील उसी शहर का निवासी था। उसके परिवार के सदस्य अक्सर कॉलनी में घूमने आया करते थे।

"ठीक है उनके आने के बाद ही मध्याह्न भोजन बनेगा। उन्हें जैसे जो पसन्द हो वो बना लेना।" कार्यालय के लिए निकलते हुए रवि ने कहा।

"मेमसाहब! साहब को आपने कुछ कहा नहीं।" रसोइया ने रवि की पत्नी ज्योत्स्ना से कहा।

"आपके साहब को क्या कहना था महाराज?" ज्योत्स्ना ने पूछा।

"हमारा नवरात्र चल रहा है.. मेमसाहब!"

"हम उपवास तो कर नहीं रहे हैं,"

"मेमसाहब! नवरात्र करना अलग बात है और पर्व त्योहार में मास-मछली खाना अलग बात है।"

"आप चिन्तामुक्त रहें महाराज! अकील जी की अम्मी के पसन्द का ही भोजन बनेगा। पका मुर्गा कूद कर हमारे मुँह..,"

कुछ देर के बाद अकील की अम्मी ज्योत्स्ना से मिलने आ गयीं। चाय पानी के बाद रसोइया उन्हें मुर्गा काटने के लिए बुलाने आ गया।

"नवरात्र के समय हमारे परिवार में मुर्गा बनना बन्द हो गया है महाराज। वरना मैं इस काल में यहाँ क्यों आती?"

"पहले तो ऐसा नहीं था अम्मी!" रसोइया वर्षो से अकील के साथ भी रहा था।

"हाँ। पहले ऐसा नहीं था। पिछले साल नवरात्र के समय अकील की बड़ी बेटी हिना को बड़ी माता निकल गयी थीं तो..,"



Thursday, 24 March 2022

'हाइकु लेखन जुनून मांगता है'


गूगल में लिंक्स ढूँढने के क्रम में (सन् 2012 में) हाइकु विधा का पता चला..। बहुत आसान 'खेल' लगा पाँच, सात, पाँच सत्रह वर्ण में अपनी बात कहना। कुछ महीनों में तीन फेसबुक ग्रुप से जुड़ गयी। जोड़ने का काम डॉ. सरस्वती माथुर जी द्वारा हुआ। एक समूह के एडमिन श्री पवन जैन जी (लखनऊ), एक समूह में अनेक एडमिन श्री महेंद्र वर्मा जी, श्री योगेंद्र वर्मा जी, Arun Singh Ruhela जी(भाई अरुण रुहेला जी हम निशाचरों से बहुत परेशान रहे) एक समूह के एडमिन डॉ जगदीश व्योम जी मिले। तभी पता चला हाइकु लिखना खेल नहीं है।

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हाइकु लेखन में जो मुख्य आधार का पता चला

–अनुभूति का विशेष क्षण हो

–उसपर चित्रकार द्वारा चित्र बनायी जा सके

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व्योम जी के फेसबुक ग्रुप में हमारी कोई रचना पास हो जाती तो हम खुश हो जाते। उसपर चर्चा चलती। यात्रा लम्बी चली उनका कारवाँ बढ़ता रहा। और आज लगभग पन्द्रह साल से चल रहे उनके अथक श्रम से तीन पंक्तियों में सत्रह वर्णों के साथ रची जाने वाली, विश्व की सबसे लघु रचना 'हाइकु' को लेकर संपादित की गई पुस्तक में ७२८ पृष्ठों वाले इस वृहतकाय 'हिंदी हाइकु कोश' में देश-विदेश के १०७५ हाइकुकारों के कुल ६३८६ हाइकु संकलित हैं।

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किसी काल में देश के गाँव-शहर के क्या हाल थे..

सवेरा हुआ

लोटे निकल पड़े

खेतों की ओर

–डॉ. जगदीश व्योम

पृष्ठ-613

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गोधूलि वेला

गजरा बेच रही

दिव्यांग बाला

–सविता बरई वीणा

पृष्ठ-181

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जीवन की सच्चाई समझाने वाले..

आखिरी पत्ता

हवा में लहराया

मौन विदाई

-डॉ. सरस्वती माथुर

पृष्ठ-63

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आँगन रीता

अकेला बूढ़ा जन

कैसे जी लेता

–डॉ. राजकुमारी पाठक

पृष्ठ-59

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बदलते ऋतु की पहचान बताने वाले

आँख मिचौली

कोहरा-धूप खेले

सिगड़ी जली

–निवेदिताश्री

पृष्ठ-57

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माघ की धूप

संदूक में जा छिपे

ऊनी कपड़े

–आरती पारीख

पृष्ठ-500

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बादल लाये

बारात द्वार पर

ढोल बजाते

–अंजुलिका चावला

पृष्ठ-444

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वाले हाइकु के संग अनेक मुद्दे समाहित हैं। बहुत कुछ, बहुत-बहुत-बहुत कुछ है...।

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हाइकु कोश से अध्येता-शोधार्थी को हाइकु लेखन समझना आसान होगा तो उन्हें मिलेगा अनेक हाइकु–संग्रह की सूची हाइकुकार/सम्पादक के नाम के संग तो

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हाइकु-संकलन, हाइकु–केन्द्रित समीक्षा एवं शोध-पुस्तकों की सूची तथा पत्र-पत्रिकाओं के नाम सम्पादक.. वर्ष-माह-अंक के साथ..

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यह पुस्तक हमें कल मिली है... लेख्य-मंजूषा पुस्तकालय में रखी जायेगी... अध्येताओं के लिए लाभकारी पुस्तक के लिए डॉ जगदीश व्योम जी को अशेष शुभकामनाओं और हार्दिक आभार के संग साधुवाद

हाइकु जुनून माँगता है


Saturday, 19 March 2022

क्रान्ति


"शिउली नीम पालक चुकुन्दर से रंग तैयार किया गया और यह क्या तुम पहले से अपने चेहरे पर लगा रखा है?" श्यामा की सास ने पूछा।

"बहू! उलटे तावे के रंग सा जिसके चेहरे का रंग हो उसके चेहरे पर काला रंग ही शोभ सकता है न! रुधिरपान करने वाली ‘ढुण्ढा' राक्षसी सी लग रही है तुम्हारी बहू..," श्यामा की दादी सास ने कहा।

"दादी! श्यामा के चेहरे का रंग काल के संग नहीं बदलेगा और जब मुझे श्यामा के पति को श्यामा के रंग से कोई फर्क नहीं पड़ता तो अन्य किसी को कटाक्ष नहीं करना चाहिए।"श्याम ने श्यामा को लाल अबीर लगाते हुए कहा।

"देखिए माँ जी! मेरी बहू ‘ढुण्ढा' राक्षसी के भय से परित्राण दिलाने वाली ‘होलिके' (रक्षादेवि) लग रही है।"श्यामा की सास ने कहा।

"मेरे परिहास को...," दादी की बात पूरी होने के पहले सब ठहाका लगा रहे थे।

Friday, 18 March 2022

पसन्द अपनी-अपनी

आपके जीवन में सब रंग मिले..

मित्र के हाथ

उपहारों से भरे

अबीर झोली


रिश्तों में दरार डालता कौन है

हद में स्याही जज्बे से पौन है

बौर का कहीं और ठिकाना

क्यों कोयल कहीं और मौन है

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लेखन और तस्वीर खींचना जुनून है

 

Saturday, 12 March 2022

'उऋण'


"तुझे चूहा कुतर देता तो दीमक तुम्हारे पन्ने को भुरभुरा कर देता। मेरी तीखी आँच तुम सह नहीं पाती। फिर ऐसा क्या है जो तुम पुनः-पुनः सज जाती रही?" वक्त ने पुस्तक से पूछा।

"इसका उत्तर तो सुल्तान जैनुल आबिदीन से लेकर योगराज प्रभाकर जैसे सिरफिरे दे सकते हैं। अरे! तू तो सब बातों का गवाह रहा है!'

"अच्छा ये बता तू किस-किस किस्से के दर्ज होने से खुश हुई?"

"–चीन के अलादीन के चिराग का भारत के नयी पीढ़ी से तुलना कर देने वाली कथाओं..,

–हार की जीत' से। बाबा भारती कुछ देर तक चुप रहे और कुछ समय पश्चात् कुछ निश्चय करके पूरे बल से चिल्लाकर बोले, "ज़रा ठहर जाओ।" खड़गसिंह ने यह आवाज़ सुनकर घोड़ा रोक लिया और उसकी गरदन पर प्यार से हाथ फेरते हुए कहा, "बाबाजी, यह घोड़ा अब न दूँगा"

–मुलक्करम' तो मर गया परन्तु ब्रेस्ट टैक्स ऑन दी साइज ऑफ दी ब्रेस्ट के चक्कर का अन्त करने के लिए जो 'नंगेली' शहीद हुई। उसके साथ चिरुकनन्दन के इकलौता सती होने का किस्सा जब दर्ज हुआ।"

 –राजा जाम दिग्विजयसिंह जाडेजा द्वारा पोलेंड के 500 शरणार्थी पोलिश महिलाओं और 200 बच्चों से भरे जहाज को शरण देना। तुम तो जानते हो उनके संविधान के अनुसार जाम दिग्विजयसिंह उनके लिए ईश्वर के समान है..,"

"इसलिए यूक्रेन से निकले भारत के लोगों को बिना बीजा पौलेंड शरण दे रहा है...! अगले सौ-दो सौ साल तक यह किस्से दोहराए जाते रहेंगे और बार-बार दोहराता मैं और तुम इसका गवाही देते रहेंगे।"

Monday, 7 March 2022

मोर का पैर

"एक तरफ आपका शहर स्मार्ट सिटी के होड़ में है दूसरी तरफ आप उदाहरण बनती जा रही हैं।"
"अरे! मेरे समझ में नहीं आ रहा है आप कहना क्या चाह रही हैं?"
"घर-घर तक पानी-गैस पाइप चला गया, बिजली की चकाचौंध है, अनेक मॉल, ब्रांडेड पोशाकों के बड़े-बड़े दुकान खुल गए, थमे अपार्टमेंट पूरे हो गए.. फुट ब्रिज-ओवरब्रिज के जाल बिछ गए, शराब बन्दी हो गए.."
"सरकारी कार्यालयों में रिक्तियों में बहाली नहीं, चिकित्सा में उन्नति नहीं, शिक्षा ठप्प होने के कगार पर, कुछ वर्षों के बाद प्रत्येक घर वृद्धाश्रम बन जायेगा।  बिन ब्याही माँ बनी चौदह-पन्द्रह साल की बच्चियों का आश्रयस्थल, शेल्टर होम की कहानी इसी शहर के किसी कोने में है,शराब बन्दी की खूब कही: दस करोड़ की उगाही माफिया-पुलिस-नेताओं के जेब में आज भी जा रही। अध्यापक-अध्यापिकाओं को आदेश मिला है शराबियों को पकड़ने का.. जैसे पिटाये खुले में शौच करने वालों को पकड़ने में, कर लें शिकार बड़े-बड़े मगरमच्छ, शार्क ह्वेल, एक बार औचके में राज्याध्यक्ष के घर का..."
"तुम न बड़ी वाली मक्खी हो जो बिगड़े घाव पर...,"
"जैसे बिगड़े घाव से ही तो राज्य की पहचान है., वैसे ही आर्थिक परतंत्रता देकर नारी सशक्तिकरण है!"

Saturday, 5 March 2022

कुटिल बचन साधू सहै...

प्रिय अरुण

शुभाशीष

आशा है तुमलोग कुशल होंगे। तुम गाँव आये थे तो कह गए कि जो पैदावार होता है उससे आप कमरे सबका देखभाल भी करें और आपलोगों के रहने के लिए कमरा खोल जाता हूँ। जब कभी हमलोग गाँव आयेंगे तो हमें रहना भी अच्छा लगेगा।

पुराना घर होने के कारण कमरे की स्थिति बिगड़ रही थी। जिसको थोड़ा ठीक करवा दिया गया है। दो बार का फसल मुझे मिला। उसके बाद मुझे फसल मिलना बन्द हो गया। किसान से पूछा तो उसने कहा कि तुम्हारा छोटा भाई राजू खेत को मनी पर लगा दिया है जिसकी राशि उसे भेज दी जाती है। 

तुम्हारे कमरे को आगे मरम्मत करवाने में लगभग दो-ढ़ाई लाख का खर्च है।

कैसे क्या करना है पत्र पाते सूचित करना। बहू को सस्नेहाशीष बोल देना।

तुम्हारा चाचा

अखिलेश्वर


"क्या सोचा? गाँव के घर के मरम्मत करवाने के बारे में।" पत्र पढ़ने के बाद अरुण की पत्नी ने पूछा।

"पुरखों की निशानी बची रहे। मरम्मत तो करवाना ही होगा।"

"उससे हमलोगों को क्या लाभ होगा? आपको सेवा निवृत्त हुए पाँच वर्ष हो गए। गाँव जाना तो दूर की बात कभी चर्चा भी नहीं करते हैं।"

"सब कुछ स्वयं के लाभ के लिए ही नहीं किया जाता है। कुछ दायित्व समाज के लिए भी पूरा किया जाता है।"

"सहमत हूँ। इस बार की होली में गाँव चलते हैं और सब ठीक-ठाक करवाकर विद्यालय-पुस्तकालय शुरू करते हैं।"

"तुम अपने दिमागी-घोड़ों को तबेला में बाँध कर रखो। यह मेरे घर का मामला है। हम सब भाई जैसा चाहेंगे वैसा होगा।"

"आपके घर का मामला..?तो मैं इस घर में चालीस साल से क्या कर रही हूँ...!"

बेलौस वाई गुणसूत्र


रात को जब सास-ससुर और बच्चों का खाना निपट गया, तो पतीश्वर के आने की आहट सुनते ही वह हुलसकर दरवाजा खोलने गयी, "आज कुछ ज्यादा काम था ? " ....थोड़े सहमे स्वर में पूछ लिया।

बच्चों की पढ़ाई-परवरिश की कोई चिन्ता नहीं। वृद्ध माता-पिता की सेवा हो रही। रिश्तेदारों-अतिथियों का स्वागत में कोई कसर नहीं रह रहा। पच्चीस साल से मिली एक सुघड़ सेविका पत्नी के होने का परम् आनन्द है पतीश्वर महोदय को। रात का वह पल आया जब पतीश्वर का नाखून पत्नी के उस-उस घाव पर भी गया जो सूख ही नहीं पा रहा था।

एक आह के साथ उसने विरोध का स्वर मुखर करना चाहा लेकिन पंजा में दबा..। दबी-दबी सी फफक रही थी पर पतीश्वर को इस बात से कोई फर्क नहीं पड़ रहा था। विरोध ज्यादा देर तक नहीं चल पाया क्योंकि बिलकुल साथ वाला कमरा सास-ससुर का था । पतीश्वर के करवट बदलते वह आँगन में आकर बैठ गयी। थोड़ी देर में उसके सामने एक लिफाफा लहराने लगा। 

"तुम ध्यान से पुनः पढ़ लेना.." झटके से पलट कर देखी तो उसकी सास ने कहा।

वह पढ़ने लगी :- सरकार : अनुज्ञा पत्र

प्रिय महोदय/महोदया

आपको वाहन चलाने के लिए अधिकृत अनुज्ञा पत्र प्राप्त होने पर बधाई !

एक जिम्मेदार चालक के रूप में यह आपका दायित्व है कि "आप परिवहन नियमों से भिज्ञ रहें तथा वाहन को गति-सीमा के भीतर रहते हुए सुरक्षित रूप से चलायें ।

'आपका जीवन बेहद मूल्यवान है।'

पथ पर एक सीमित गति से वाहन चलाएंगे, 'पथ पर उग्र प्रतिस्पर्धा' में नहीं पड़ेंगे तो यह अनुज्ञा पत्र आपको गति और प्रगति दोनों का हकदार बना देगा।

हमारी शुभकामनाएँ सदैव आपके साथ रहेंगी।

शुभेच्छु

परिवहन विभाग

"तुम्हारी जीवन-गाड़ी कैसे चले यह तुम्हें ही तय करने का पूरा अधिकार है।" सास ने कहा

Thursday, 3 March 2022

'का से कहूँ'

 प्रश्न :– पुस्तकें पढ़ना क्यों अच्छा लगता है?

उत्तर :– 
बस अपना ही ग़म देखा है
हमने कितना कम देखा है।
खुली आँखों से काले कोट पहने कोर्ट में बहस करते हुए स्वयं को सपने में देखना शुरू किया। जब से होश सम्भाला पुस्तकों के बीच में ही मेरा रहना हुआ। मुझसे तीन बड़े और एक छोटा भाई था। उनके पास जो पुस्तकें क्रमानुसार नन्दन, चम्पक, बाल भारती, धर्मयुग, सारिका, गुलशन नन्दा, रानू, राजहंस, शिवानी, प्रेमचन्द इत्यादि आतीं, कक्षा की पुस्तकों के संग उन्हें पढ़ती रही। बी.एड –वकालत की पढ़ाई पूर्ण करते-बढ़ते उम्र के साथ मनोरमा, वनिता, गृहशोभा, सरिता, कल्याण, कादम्बनी, पढ़ना शुरू किया। अल्पायु में मेरे मझले भाई और मेरी माँ का साथ छूट जाने के बाद मैं अपने को पुस्तकों में डुबो दी। पुस्तकें मेरी सखी बनीं। तन्हा नहीं थी लेकिन तन्हाई थी...। नारी सुलभ समस्याओं का हल, आदर्श बेटी, आदर्श बहन, आदर्श पत्नी, आदर्श बहू की समझ पुस्तकों से ही मिली। वरना किससे पूछती! कभी खुशी मिलती, लिख लेती। जब कभी दुखी होती, लिख लेती। आस-पास सुनने वाली कोई नहीं थी।
लेलिन-मार्क्स को पढ़ना शुरू किया। सिवाय गायत्री मंत्र– ॐ नमः शिवाय –वो भी कभी-कभी, जब बेहद विचलित होती रही.. रात्रि में सोते समय जप लेती हूँ। 'वोल्गा से गंगा' पढ़ने के बाद पूजन का अर्थ इतना ही समझ में आ सका।
समय कालान्तर में बहन-बेटी-सखी विहीन मैं, मेरे लिए पुस्तकें नींद लाने में सहायक हुईं। विधा में लेखन शुरू किया तो अध्ययन अत्यन्त आवश्यक हो गया। 
छन्दमुक्त कविता, मुक्तक, हाइकु दोहा लघुकथा को समझने में सहायक।
उदाहरण के रूप में देखें:-©रवि कुमार 'रवि'
वह उसकी आँखों की गहराईयों में डूब गया
यह पंक्ति बिल्कुल सपाट है और यह कविता की आदर्श पंक्ति नहीं हो सकती | अगर इसी पंक्ति को हम इस प्रकार लिखें:-
गहरा बहुत है उसकी आँखों का समंदर
एकबार डूबा कि डूबता गया वह
उपरोक्त दोनों पंक्तियों के भाव एक जैसे हैं परंतु कहन और शिल्प बिल्कुल जुदा | हमें इसतरह अपने शिल्प और शब्दों के चयन पर विशेष ध्यान देना होगा |

 सन् 2015 में डॉ. सतीशराज पुष्करणा जी से भेंट हुई तो उनसे जाना कि सौ पृष्ठ पढ़ लो तो एक पृष्ठ का लेखन करो। किसी ग़ज़लकार ने भी कहा कि हजार शेर पढ़ लो तो ग़ज़ल लिखना शुरू करो

  कथानक, वाक्य विन्यास, शैली, शिल्प, मुहावरे, शब्दों के चयन और अलंकार आदि पढ़ने से ही समझ में आने लगे।

बस! पाठक का पाथेय होना इतना ही...

Tuesday, 1 March 2022

रत्नाकर-सागर

हर-हर महादेव : ॐ नमः शिवाय
महात्रिरात्रि
विप्लपत्र में घिरी
मीन की भीड़

 शिव=अत्रि
 महात्रिरात्री=महाशिवरात्रि
एक की खुशी
दूसरे के लिए
परेशानी का कारण
नहीं होना चाहिए

"मैंने सभी प्रकार के मुख्य शल्य क्रिया का शुल्क एक कर देने का निर्णय लिया है। इससे समाज में यह सन्देश जायेगा कि हमारे अस्पताल में प्रसव से धन उगाही के उद्देश्य से शल्य क्रिया नहीं की जाती। मेरे इस निर्णय से आपलोग भी सहमत होंगे,  ऐसी उम्मीद करता हूँ।" अस्पताल के प्रबंधक ने अपनी मंडली के सम्मुख कहा।

"महोदय आप ऐसा कैसे कर सकते हैं? गरीबों से आप और आपकी स्त्री रोग विशेषज्ञ पत्नी द्वारा की गई शल्य- क्रिया की कोई राशि नहीं ली जाती है। आप पहले से ही ‘सोसाइटी फॉर एजुकेशन, एक्शन एंड रिसर्च इन कम्यूनिटी हेल्थ’ ट्रस्ट की स्थापना कर अपनी सारी कमाई दान कर रहे हैं। आपके पास आने वाले रोगी खुशी से राशि खर्च कर सकते हैं। उन्हें आपलोगों पर पूरा विश्वास होता है।"

"आपलोग तो ऐसा कह रहे हैं मानों मैं महादेव हूँ और गणेश के कटे सर को जोड़ सकता हूँ..!"

Sunday, 27 February 2022

अक्ल की चाभी

"यह तुमने क्या किया ? ढ़ाई-तीन सौ वैक्सीन फ्रीज से बाहर निकाल कर रख दी। फ्रिज से कुछ घण्टे बाहर रह जाएं तो बर्बाद हो जाते हैं। यह तो रात भर बाहर रह गए।"

"मुझे वैक्सीन पर कोई भरोसा नहीं है। मैं नहीं चाहती थी कि यह किसी को दिया जाए।"
"तुम नर्स होकर ऐसा कैसे सोच सकती हो?"
"नर्स हूँ इसलिए तो रोगियों का भला सोच रही हूँ।"
"ये वैक्सीन रोगियों को नहीं दिया जा रहा है। रोगी ना हो सकें, रोग से बचाव के लिए दिया जा रहा है और पहले हम चिकित्सक को और सत्तर साल उम्र वालों को दिया जा रहा है। क्या तुम वैक्सीन ली?"
"जी नहीं..,"
"बिना उपयोग-प्रयोग के तुमने यह कैसे निर्णय कर लिया कि यह वैक्सीन रोग से बचाव के योग्य नहीं?"
"वो.. जी वो.. नपुंसक बनाने की खबर...,"
"तुम्हारे भेजा में भूसा..., दाद देता हूँ नर्स मारिया को । सब उसके आभारी भी होंगे, फ्रिज काम नहीं कर रहा यह जानते ही उसने सबसे सम्पर्क किया और 600 लोगों को वैक्सीन लगवा कर वैक्सीन बर्बाद होने से बचा लिया । "
"शायद मैं ट्यूबलाइट हूँ सर..।"

Thursday, 24 February 2022

कालोत्परिवर्तन


हाथ पसारे अम्मा आँचल के छोर से सुहाग का धागा माँग रही थी। धोबिन काकी का मुँह सीधा ही नहीं हो रहा था और सीधा हो भी कैसे..! कुछ दिनों पहले दूसरे टोला में शादी थी और दादी ने धोबिन काकी और उनकी बहू-बेटे, पोता-पोती को अपने घर के पोशाक में देखकर लताड़ लगायीं तो लगायीं अपने घर का दरवाजा बन्द कर दी थीं। "यह भी कोई बात हुई, हमारे खेत भी लो धुलाई के अनाज भी लो और धुलने गए कपड़ों को पहन भी लो।" दादी के गुस्से का बादल फट पड़ा था।

बड़ी अम्मा रंग बिरंगी चिड़ियों की लड़ी से पिटारा भर रही थीं जिसे उन्होंने दर्जी काका से कतरनें लाकर बनायी थीं। "छ महीने से लेकर तीन साल के बच्चे  की पोशाक तुम हमारे कपड़ों से बना लेते हो!" जोर की डाँट और खेत वापस लेने की धमकी भी दे आई थीं।

बुआ धान का लावा भुनने के लिए नेग में झुमका ठानी थीं लेकिन गोंड़ दादी के कान पर जूं नहीं रेंग रहा था। उन्हें भी अपने गोंसार उजाड़े जाने का मलाल था जो दादा के अमराई में था। अमराई की शोभा कटहल, अड़हड़-बड़हड़ भी बढ़ाते थे।

चिकित्सक बन्नी के होने वाले ससुराल की मांगों को पूरा करने के लिए बाबा उन जमीनों के कागजात के बदले लाखों रुपये ले ही रहे थे कि चिकित्सक बन्ना ने रोक दिया। लू दोपहरी में धोरे के दौरे में बादल उमड़ रहे थे।

Tuesday, 22 February 2022

22022022

दो दो लड्डू दो दो लड्डू दो दो
खिली सरसों–
बवंडर में नाचे
पत्ते व पन्ने
°°
कुर्सी कुछ ऐसी है
जिससे चिपकते ही
राग बदल जाता है

पंच में परमेश्वर नहीं दिखता है
न्याय का क्रय-विक्रय होता है
अपने होने का उपहार पाता है

Tuesday, 15 February 2022

सोच में हूँ

सह जाने की मिसालें नहीं दी जाती

काश गुलाब में कांटे नहीं होते

जीवन आतंक में सिमटे नहीं होते

जंग में मिसाइलें नहीं होते

कहीं सास बहू से पीड़ित है

कहीं बहू सास से पीड़ित है

कहीं बेटी के लिए माँ का दुखड़ा है

कहीं भाई-भाई में झगड़ा है

सोच के कचरे की अति भीड़ का रगड़ा है

नासमझ, काल का बड़ा विशाल जबड़ा है

जो पीड़ित वो किसी के दिल का टुकड़ा है

जाल में मकड़ी का रहना ही बड़ा लफड़ा है


मिसाइलें /प्रक्षेपास्त्र

Sunday, 13 February 2022

ताजमहल


बोसा की नमी 

पंखुड़ी पर छायी–

रूपा तितली

°°

प्यार का बोसा–

तृण कोर अटकी

ओस की कनी

°°

"क्या कर रही हो?"

"साड़ी के मिलान का शॉल ढूँढ़ रही हूँ..,"

"लाओ मैं मिलाकर ढूँढ़ देता हूँ। तुम दूसरा काम देख लो।"

"क्या कर रही हो, खाना बन गया?"

"भुजिया बनाना बाकी है,"

"मैं देख लेता हूँ, तुम तब तक तैयार हो जाओ।"

"जोरू का गुलाम हो गया है।"

"हाँ! आपने सही कहा। सेवा निवृति के बाद तो पता चला कि मैं कितना ऋणी होता रहा। बच्चों को सोये देखा। माता-पिता मुझे श्रवण पूत कहते रहे। लेकिन मैं उनके लिए कभी कुछ नहीं किया । सारी जिम्मेदारियों में जोरू को जोते रखा।"

"अब तू घर में बैठा रहता है और तेरी..."

"समाजिक ऋण उतार रही है।"

Tuesday, 8 February 2022

चक्रव्यूह

"कैसे हो?"

"ठीक नहीं हूँ , उलझनें बहुत हैं।"

"जब तक जीवन है तबतक उलझनों को रहना ही है। कुछ मोह के धागे हैं। कुछ स्नेह के धागे हैं। कुछ इश्क के धागे हैं। कुछ कर्त्तव्य के धागे हैं। कुछ अधिकार के धागे हैं। अब तुम पर है किस सिरे को किस सिरे से अलग रख पाते हो। जीवन जंग हो तो प्रयास करो कि जिन्दगी दंग हो..!"

"तनाव से मुक़ाबिला ही करना पड़ता है। वही कर रहा हूँ। आपसे यों भी कुछ छुप नहीं सकता। कार्यालय के संग घर में भी बहुत अशान्ति चल रही है। दोहरा तनाव है। फिर भी जंग जारी है। जीत ही एकमात्र विकल्प।"

"बस अपनी भूमिका के प्रति सचेत और ईमानदार रहो। बाकी वक्त पर छोड़ दो वह गणित पढ़ाता रहता है। तनाव से तुम्हारे शरीर पर भी प्रभाव पड़ेगा..।"

"सचेत हूँ। ईमानदार रहता हूँ, पर विश्वास नहीं दिला पाता।"

"विश्वास दूसरों को दिलाने की आवश्यकता ही नहीं, गवाही स्वयं की आत्मा देती है। ...कभी-कभी कोई फोड़ा बिना शल्यक्रिया के ठीक नहीं हो पाता है। अब चिकित्सक मोह तो नहीं कर सकता।"

"सभी अपनी आत्मा में साफ होते हैं। जब हम लोग अपना स्पष्टीकरण देते हैं तो सामने वाले को वह बचाव की दलील लगती है।"

"स्पष्टीकरण किसे और क्यों देना? जब सामने वाला तय कर बैठा हो कि अपराधी बनाकर ही छोड़ना है। अब अपराधी हैं या नहीं यह तो अपनी आत्मा के गवाही पर निर्भर..,"

"सुनिए न कुछ कहना है :-  कि कैकेयी सदैव कुटिल नहीं होती।

:- कि हर दशरथ इतना "भाग्यशाली" नहीं होता कि विछोह के पश्चात प्राण त्याग दे।

:- कि दशरथ को पौत्र नहीं था।

:- कि लक्ष्मण भी साथ जाए, और पीछे भरत शत्रुघ्न भी न हो, तो दशरथ का क्या होता?"

"अपने स्वास्थ्य हेतु और मुखिया होने के नाते तुम्हें अपने मन पर काबू रखना होगा। मुझे कलयुग में सतयुग व द्वापरयुग की बातें समझ में बिलकुल नहीं आती हैं और ना सभी परिस्थितियाँ एक सी होती हैं कि उससे उदाहरण ली -दी जा सके। 

°°

–कैकयी कुटिल नहीं थी । रावण के लिए राम को वन में भेजना जरूरी था तो सरस्वती को मन्थरा के जिह्वा पर विराजमान होना पड़ा... मात्र एक घटना से किसी के व्यक्तित्व का निमार्ण नहीं होता है।

°°

–दशरथ को श्रवण के पिता के श्राप को फलीभूत करना था... एक कड़ी से दूसरी कड़ी का जोड़.. ।

°°

यह तो उनका भाग.. आठ पौत्र का सुख भोगने को नहीं मिला।

°°

राम-लक्ष्मण के वन गमन के बाद दशरथ के साथ भरत -शत्रुघ्न कितने दिन-माह साथ रहे ?

°°

माँ का व्यवहार छोटी भाभी के साथ न्यायसंगत नहीं होता था। उनका शिकायतों का पिटारा भरा ही रहता था। बड़ी भाभी और बच्चों के संग बड़े भैया अपना दुर्ग अलग बसा चुके थे। माता-पिता की सेवा से वे चूक गए थे। छोटा भाई जितनी देर घर में होता, उस पिटारे से शिकायत झाँकते ही नहीं, उच्छृंखल हो जाते। सोने पर सुहागा तो तब हुआ जब छोटे भाई की बहू आ गयी। दादी और पोते की बहू में गहरी दोस्ती हो गयी या यों कहें कि दोनों सिरे छोटे भाई की पत्नी के हाथों से फिसल गए। तीनों का मायका एक ही शहर में था। छोटी भाभी के मायके का घर वीरान पड़ा था। उन्हें बुलावा भेजने वाला कोई नहीं था जबकि उनकी बहू और सास का मायका पूरी तरह से गुलजार था। सभी को दोनों की दोस्ती का मुख्य कारण वह भी लगता था। पर्व-त्योहार पर या तो दोनों अपने-अपने मायका चली जातीं या उनके मायके से लोग आ जाते। किसी भी हालात में सिर्फ छोटी भाभी से जिम्मेदारी-समझदारी की उम्मीद की जाती थी। छोटा भाई तीन पाट में पीस रहा था।

मायके आयी ज्योत्स्ना ने छोटे भाई को सुझाव दिया था कि बेटे बहू को अलग घर में रहने को कहा जाए।

Friday, 4 February 2022

तुझ में रब दिखता है

 "फरवरी : वसन्त आ गया...वसन्त आ गया.. इश्क का मौसम आ गया...

°°
मुझे चम्पा से इश्क हुआ...,
°°
और आपको ?"

"सभी जगह ये मौसम इस बार इश्क़ ले कर नहीं आया।"

"ऐसा हो ही नहीं सकता..। शुरू हुआ इश्क कभी समाप्त नहीं हो सकता..।
मुझे बचपन से चम्पा से लगाव था, तब पागलपन समझने की उम्र नहीं थी। गुड़ियों से या घर-घर खेलना रुचिकर नहीं रहा। चम्पा के पेड़ के नीचे कंचा खेलना अच्छा लगता था। जब-तब अमरूद के पेड़ पर चढ़कर अमरूद खाना और चम्पा को निहारना अच्छा लगता। जब सन् 1994 में पटना निवास की तो बगीचा में चम्पा से पुनः भेंट हो गयी। कुछ सालों के बाद एक दिन पथ चौड़ीकरण में कट गया पेड़। रात को भोजन नहीं किया जा सका। लेकिन बहुत ज्यादा देर उदास रहने की मोहलत नहीं मिली। कुछ दिनों के बाद कटे ठूँठ बने मृतप्राय तने में से कोपल झाँक रहा था। "तुम्हारी उदासी मुझसे बर्दाश्त नहीं हो सकी। वृक्ष बनने का स्थान बनाओं..।"
सन् 2017 में हरिद्वार साहित्यिक सम्मेलन में उपहार स्वरूप चम्पारण के चम्पापुर से आया चम्पा का पौधा मिला। "तू जहाँ -जहाँ चलेगा, मेरा साया, साथ होगा.." 

14 जुलाई 2019 को वृक्षारोपण के लिए कुछ पौधा मंगवाया गया था। सवाल आया "किस चीज का पौधा भेज दूँ?"

"अपने मन से भेज दो जो तुम्हारे पास उपलब्ध हो!"

और पौधों के झुंड में चम्पा मुस्कुरा रहा था..। उसे द इंस्टीच्यूशन ऑफ इंजीनियर्स(इंडिया) पटना में बड़ा होने का मौका दिया जा रहा है पर अभी तक खिला नहीं। हर गोष्ठी में पूछती हूँ, "तू मुकम्मल कब होगा?"

"जो मुकम्मल हो जाऊँ तो बिखड़ना पड़ेगा न...,"

एक ऋतु या कुछ पल का मोहताज नहीं हो सकता इश्क!

–जीवन में ऐसे ही तो आता है..


Wednesday, 2 February 2022

हाइकु

2, 2, 22
2 फरवरी 2022

चिन/सीने से लगा

घुटनों को हटाये

हिम का स्राव

भैया ने कहा तू एकदम माँ सी लगती है..

9 जून 1982 से 9 जून 2022 शादी के चालीस साल पूरे होंगे


रूबी जयंती–

शीशे की छवि देख

माँ का स्मरण

या

शीशे में दिखी

मुझमें माँ की छवि

रूबी जयन्ती

Monday, 31 January 2022

टके के तीन


"सैनानी जिसने सेना में जवानों को खिलाये जाने वाले खाने में परसी जा रही पतली दाल का वीडियो वायरल करने पर सेवा मुक्त कर दिया गया, यह समाचार पढ़कर दुःख भी हुआ और सन्तोष भी।" अभी मैं उधेड़बुन में ही था।

कि मित्र रमेश आ गया,-"महेश किस दुविधा में फँसे हो?" आते ही उसने मुझसे कहा।

मैंने समाचार-पत्र उसके आगे बढ़ा दिया और वह उसे पढ़ने लगा। कुछ देर के बाद मुझे लौटाते हुए बोला, "इसमें दुविधा जैसी तो कोई बात नहीं है।"

"क्यों?"

"इसलिए कि जिन सैनिकों के हाथों में देश की सुरक्षा की बागडोर है.., सेना की किसी भी कार्यवाही को वायरल नहीं करना चाहिए और यह सेना के नियमों के विरुद्ध भी है।"

"किन्तु यह तो सैनिकों के साथ नाइंसाफी है...।"

"नहीं! नाइंसाफी नहीं है..., जैसे अपने घर की बातें कभी बाहर नहीं करनी चाहिए...। घर की बातें घर में ही सुलझा लेनी चाहिए। बाहर की हवा भी नहीं लगनी चाहिए। ऐसा ही सेना में होता है... होना ही चाहिए..।"

"हाँ! यह बात तो बिलकुल ठीक है...।"

"देश की सुरक्षा सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण सदैव है गाँठ में बाँधकर रखना चाहिए...। दाल –पतली है या मोटी इसकी चिन्ता किए बेगैर यह सोचना चाहिए दाल काली ना हो सके।"

Saturday, 29 January 2022

आज की


 सिल पर पीसते हुए

चटनी बना डाली

 तय किया गया

दूसरों का हद

वो चार लोग

जो विराजमान थे

समाज के भयावह पद।

°°°

एक उम्र तक आते-आते

 समझौता भी खत्म हो जाता है

खुद की आदत

 खुद को ही कमजोर

दिखलाने में अव्वल हो जाती है।

°°°

जब तक मौन रही

सह देती रही

सह देना तो

सहना किसे..?

 शासक होना

किसे नहीं जँचता!



Monday, 24 January 2022

कोढ़

कई दिनों पहले से अनेक स्थलों पर बड़े-बड़े इश्तेहार लग गए... 'नए युग को सलामी : खूँटे की नीलामी'
तय तिथि और निर्धारित स्थल पर भीड़ उमड़ पड़ी थी। नीलामी में विभिन्न आकार-प्रकार के सजे-सँवरे खूँटे थे और सब पर अलग-अलग तख्ती लटकी हुई थी और उसपर लिखा हुआ था... "जो खूँटा रास्ते की रुकावट बने, उस खूँटे को उखाड़ फेंकना चाहिए।"

नए युग की सलामी : पर्दा उन्मूलन के खूँटे की नीलामी

नए युग की सलामी : भ्रूण हत्या के उखड़े खूँटे की नीलामी

नए युग की सलामी : बाल विवाह के उजड़े खूँटे की नीलामी

नए युग की सलामी : देवदासी पुनर्वास के खूँटे की नीलामी

नए युग की सलामी : नारी शिक्षा के खूँटे की नीलामी

नए युग की सलामी : विधवा विवाह के खूँटे की नीलामी

इत्यादि..! 

लेकिन एक बड़े खम्भेनुमा मजबूत खूँटे पर तख्ती लटकी हुई थी। जिस पर लिखा था, "अभी नीलामी का समय नहीं आया है.."

"ऐसा क्यों ?" भीड़ ने पूछा।

"तख्ती पलट कर देख लो!" आयोजक ने कहा

तख्ती के पीछे लिखा था,

'13 वाँ राष्ट्रीय बालिका दिवस'

24 जनवरी 2022

और

 '72 वाँ गणतंत्र दिवस'

26 जनवरी 2022

'बलात्कार व भ्रष्टाचार का खूँटा'


Wednesday, 19 January 2022

राष्ट्रभक्ति


"चार सौ एक वाले नहीं रहे..,"

"मतलब?" सुबह-सुबह मेरी आँख खुली ही थी, खबर को समझना नहीं चाह रही थी।"

"मृत्युंजय बाबू! 401 फ्लैट वाले की मुक्ति कल दोपहर में ही हो गयी थी। अभी गार्ड ने बताया।"

"अपने बेटे को छत पर खेलने मत भेजा कीजिये। क्रिकेट के बैट का खट-खट सिर में लगता है।"

"आप ही बताइए कहाँ खेले? कार पार्किंग में खेले तो गाड़ी वाले हल्ला करते हैं। सड़क पर खेले तो जिनकी खिड़की का काँच टूटता है वे शोर करते हैं।"

"अपार्टमेंट में रहने वाले बच्चों को घर में बैठकर खेलना चाहिए।"

"यह ज्ञान आप अपने नाती पोतों को दीजियेगा।"

"पहले बेटे की शादी होने दीजिए।

"सचिव बदल लिया जाए! यह सचिव फेरी वाले को ऊपर नहीं आने देते हैं"

"सचिव का हुक्का पानी बन्द कर दिया जाएगा।"

जब मैं (सचिव की पत्नी) मृत्युंजय बाबू के मुँह में गंगाजल तुलसी डाल रही थी तो फ्लैश बैक से गुजर रही थी। लगभग चार साल पर उन्हें देख रही थी।

मुझ पर नजर पड़ते उनकी पत्नी को मुझे अँकवार में भर ली और जोर से फफक पड़ी, "मैं हार गई मिसेज श्रीवास्तव। मैं हमेशा कहती थी कि मैं पहले जाऊँगी। ये कहते थे पहले जाएँगे। देखिए ये पहले चले जायेंगे।"

"हार-जीत कैसा..! कौन पहले जाएगा कौन पीछे जाएगा यह अपने हाथ में कहाँ। पहले पुरुष चला जाये तो उनके लिए अच्छा। स्त्रियों को समझौता कर जीने में ज्यादा परेशानी नहीं होती।"

मैं दिलासा किसे दे रही थी.. उन्हें या अपने भविष्य को...

घर वापसी पर सवाल किया गया, "मृत्युंजय बाबू की उम्र क्या रही होगी?"

"अपने रहने का आकलन करना है क्या?"

"उनको चार बच्चे हैं चारों आस-पास रहे। और हमदोनो..?"

"'वन फैमली वन चाइल्ड', में यह दिन आना ही था। तब देश हित था सामने...! आगे भी देश हित ही लक्ष्य रहना चाहिए"

Tuesday, 18 January 2022

विभिन्न स्वतंत्रता

 

प्रवासी इन्द्र अपनी यात्रा की यादों को छायांकन के माध्यम से साझा कर रहा था।

 "बहुत सुन्दर-सुन्दर तस्वीरें। लेकिन इन तस्वीरों में आपदोनों के अलावा, वहाँ का कोई और नहीं दिखलाई दे रहा... क्या छुट्टियाँ चल रही थी ?" एलबम देखते हुए राघव ने पूछा।

"छुट्टीयाँ चले या ना चले, बिना अनुमति वहाँ किसी का फोटो कोई अन्य नहीं ले सकता..., ध्यान रखना होता है कि गलती से भी गलती ना हो जाये।"

 "जी ठीक कहा। वहाँ निजता का बहुत ख्याल रखा जाता है। अपना भारत थोड़े न है , जब चाहें जिसे चाहें गरिया लें। अब तो रचनाओं में भी अपशब्दों से परहेज नहीं किया जाता।"

°°°

नानी के नुस्खे

माता से मुझे मिले–

कलमी आम

मूल पिता को

वंशावली में ढूँढे–

वट जटाएँ

Monday, 17 January 2022

शब्दांजलि

कथाकार- उपन्यासकार- लघुकथाकार- संपादक - प्रकाशक -गुरु सखा मधुदीप जी

मधु और दीप को परिभाषित करने के लिए मधुदीप जी से जुड़े लोगों के अनुभव को सुनने- पढ़ने से आसान हो जाएगा। मधुदीप जी के स्वभाव में माधुर्य था तो उनका लघुकथा के प्रति समर्पण, लघुकथा के लिए किया कार्य सदैव दीपक रहेगा व सूर्य ही रहेगा। 

ना भूतों ना भविष्यति

बलराम अग्रवाल, दिल्ली के अनुसार :- शुरू में सम्भवतः सन् 1976 से सन् 1988 तक, उसके बाद सन् 2013 से मृत्युपर्यन्त। बाद की पारी उन्होंने धुआंधार खेली, हरियाणवी वीरू की तरह। लघुकथा पर 33 खण्डों के प्रकाशन का रिकॉर्ड भले ही कोई तोड़ दे, लेकिन उसके आविष्कर्ता के रूप में तो मधुदीप ही जाने जाते रहेंगे।

लगभग चालीस पुस्तकों को सम्पादित/प्रकाशित करने वाले ,अखिल भारतीय प्रगतिशील लघुकथा मंच के 29 वाँ (5 नवम्बर 2017) लघुकथा सम्मेलन में मधुदीप जी से मेरी पहली भेंट हुई थी। उस मंच से भी उनका 'लघुकथा' को अंग्रेजी में भी 'लघुकथा' कहा जाए क्योंकि ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी, लंदन में डॉ. इला ओलेरिया शर्मा द्वारा प्रस्तुत शोध प्रबंध 'द लघुकथा ए हिस्टोरिकल एंड लिटरेरी एनालायसिस ऑफ ए मॉर्डन हिन्दी पोजजेनर' (he Laghukatha , A Historical and Literary Analysis of a modern Hindi Prose Genre') में उन्होंने लघुकथा को storiette न लिखकर 'लघुकथा' (Laghukatha) ही लिखा है। कहना उनका लघुकथा से प्रीति परिभाषित करता रहा।

मैसेंजर में मधुदीप जी से पहली वार्ता 2 फरवरी 2017 को हुई। उन्होंने लिखा कि "पुष्करणा जी आपकी जो लघुकथा भेज देंगे उसे मैं ले लूँगा।" 'नयी सदी की धमक' नामक पुस्तक उनके सम्पादन में आ रही थी और डाक से भेजी मेरी रचना उन्हें पसन्द नहीं आयी थी। लघुकथा गुरु डॉ. सतीशराज पुष्करणा जी के वे मित्र। तब से हमारे बीच जो भी बातें होनी होती गुरु पुष्करणा जी मध्यस्थ होते।

एक दिन भाई पुष्करणा जी का फोन आया कि, "मधुदीप तुमसे बहुत गुस्सा हैं।"

"क्यों क्या हुआ, ऐसा मैंने क्या किया?"

"तुम फेसबुक पर नए लघुकथाकार की लिखी लघुकथा के शीर्षक अपने पसन्द के अनुसार लिखी हो। उनका कहना है कि क्या तुम वरिष्ठ लघुकथाकारों को नहीं पढ़ा?"

"वर्त्तमान में अत्यधिक विचारणीय है क्या लोकप्रियता सृजक के सृजन की स्तरीयता का मानक हो सकती है...!

आपकी लगभग सत्रह सौ लघुकथा है सबकी सब पसन्द नहीं की जा सकती।"

गुरु पुष्करणा जी अक्सर कहते "दिल्ली जाती हो उनसे भेंट कर लिया करो। दो तीन बार ऐसा हुआ कि उन्होंने कहा,"मैं उनके पास रहूँगा तुम आ जाना।"

मेरे पास नहीं जाने के कई बहाने होते क्योंकि मधुदीप जी मुझे कड़क लगते। और मैं ठहरी अपने आप में खड़ूस अकड़ू।

दिसम्बर 2019 में मैं कैलिफोर्निया चली गई। अक्टूबर 2020 में गुरु पुष्करणा जी स्थाई रूप से पटना छोड़ दिये। उनका स्वास्थ्य ठीक नहीं रहने लगा। मार्च 2020 से महामारी का ताण्डव शुरू हो गया।

मधुदीप जी पड़ाव पड़ताल का 32 वाँ 33 वाँ खण्ड की योजना बना रहे थे उन्होंने मुझे मैसेंजर सन्देश दिया कि "आप लघुकथा भेजें"

"कैसे भेजूँ आप बिना डाक से लघुकथा लेते नहीं और मैं कैलिफोर्निया में हूँ तो डाक से भेज नहीं सकती।"

"भारत में तुम्हारा कोई अपना नहीं?"

"आप हैं न!"

"मुझे मेल कर दो!"

मेरे मेल किये अनेक लघुकथाओं में से आखिरकार एक लघुकथा उन्हें पसन्द आ गयी।

और उस दौरान पता चला चट्टानों के नीचे मीठे जल का स्रोता होता है।

अफसोस इस बात का है कि भाई पुष्करणा जी के संग भाई मधुदीप जी से मिलने नहीं जा सकी। लेकिन भेंट के पन्द्रह दिनों के बाद दोनों भाइयों का मिलन हुआ तो मेरी चर्चा जरूर चली होगी कि विभा मिलने आई थी।

Saturday, 15 January 2022

जहर

चित्राधारित लेखन

"लघुकथा वाले पोस्ट पर आपकी टिप्पणी दिखलाई नहीं दे रही है?"

"मैंने बहस से बचने के लिए डिलीट कर दी। मुझे वह लघुकथा अस्वाभाविक एवं अतिरंजित लगी।"

"डिलीट करने का कारण मेरे समझ में आ गया था लेकिन सुनिश्चित होने के लिए आपसे पूछ लिया। वो लेखक हमारे शहर में ही रहते हैं और हमारे गुरु एक हैं। बस फर्क इतना है कि जब मैं नर्सरी का अध्येता तो वे स्नातक होने का दम्भ बटोर रहे थे। लेकिन वे विधा का विनाश करने में जुटे हैं तो...,"

"मेरे सामने लघुकथा, जो ठीक नहीं लग रही थी । मैं लेखक और लेखन के बारे में नहीं जानना चाहता क्योंकि यही बातें हमसे हमारी ईमानदारी डिलीट करवाती हैं । वे कहाँ से सीखे है यह मायने नहीं रखता । मायने रखता है कि वे प्रस्तुत क्या कर रहे हैं । अगर वे काबिल हैं तो फिर गुरु का नाम लेकर लघुकथा का बचाव क्यों कर रहे थे?"

"आज गुरु हैं नहीं तो प्रमाणित कैसे हो पाता..,"

"शायद यह उनके शिष्य को भी समझ में आ गया है..।"

"साहित्य समुन्द्र का जो नदी हो सकता था वो फैक्ट्री से निकलने वाला नाला होकर रह गया शिष्य। गुरु के जीते जी गुरु का अपमान करता ही रहा। अब गुरु का नाम जपकर...।"

Tuesday, 11 January 2022

मधुदीप जी को शब्दांजली : "ना भूतो ना भविष्यति""




 "मधुदीप गुप्ता नहीं रहे! लघुकथा जगत में शोक की लहर फैल गयी है। हाहाकार मच गया है। हालांकि लघुकथा विधा के लिए जुनून की हद तक जाकर किए अपने कार्य के लिए, मधुदीप सदैव याद रखे जाएंगे।"

"लगभग बीस लाख अपनी जमापूँजी लघुकथा की पुस्तकों को प्रकाशित करवाने, लघुकथाकारों को पुरुस्कार देने में लगा दिया। अपनी अन्तिम साँस तक लघुकथा के लिए काम करता रहा। मधुदीप पिछले तीन महीने से अस्पताल का चक्कर लगा रहा था क्या तुम उससे भेंट करने गए थे। तुम्हारे घर से उसका घर बस पाँच मिनट की दूरी पर है न?"

"नहीं न जा सका हमारा मतभेद रहा।"

"अरे! जीवन से बड़ा रहा मतभेद? समय रहते बेबाकी पचने योग्य अपना हाज़मा दुरूस्त करवा लेना चाहिए।"


हाँ, मैं जीतना चाहता हूँ / मधुदीप / लघुकथा 

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‘आओ, जिन्दगी से कुछ बातें करें !’ हाँ, अनुपम खेर ने एक टीवी विज्ञापन में यही तो कहा था |

     वह भी पिछले साठ साल से अपनी जिन्दगी से बातें करता रहा है मगर जिन्दगी ने जैसे उसकी बातें कभी सुनी ही नहीं |

     उसने अपने बचपन से बातें की थीं | सफेद कमीज और पतलून पहनकर क्रिकेट का बल्ला घुमाने की बातें मगर जिन्दगी ने उसकी बातें सुनने की बजाय उसके पिता की बातें सुनीं और उसे फुटबाल का खिलाड़ी बना दिया | हासिल रहा शून्य |

     बचपन से युवावस्था आने तक वह अपनी जिन्दगी से फुसफुसाहटों में बातें करता रहा | यह जिन्दगी से सपनों की बातें करने का समय था | उसने जिन्दगी से प्राध्यापक बनने के सपने की बात की मगर यहाँ भी जिन्दगी ने उसकी बजाय नियति की बातें सुनी | पिता के अचानक अवसान के कारण वह भारत सरकार में एक अदना-सा लिपिक बनकर रह गया |

     उसके बाद अब तक वह जिन्दगी से बतियाने और उसे अपनी सुनाने का भरसक प्रयास करता रहा मगर जिन्दगी ने जिस अन्धी दौड़ में उसे धकेल दिया था उसमें उसे ठहरकर इत्मीनान से बातें करने का मौका ही नहीं मिला | घर,परिवार,बच्चे और उन सबका दायित्व...वह जिन्दगी से कब अपने मन की बात कह सका ! कब अपनी बात उससे मनवा सका ! वह बस हारता ही तो रहा |

     आज वह सेवा-निवृत्त हो रहा है | कार्यालय से उसे विदाई की पार्टी दी जा रही है | अभी एक अधिकारी ने उसके सेवाकाल की प्रशंसा करते हुए यह जानने  की जिज्ञासा जताई है कि वह आगे क्या करना चाहता है |

     “मैं जिन्दगी से खुलकर बातें करना चाहता हूँ | सिर्फ बातें करना ही नहीं चाहता, जिन्दगी से अपनी बातें मनवाना भी चाहता हूँ | हाँ, मैं जीतना चाहता हूँ |” बस, इतना ही कह सका है वह और उसने अपने दोनों हाथ जोड़ दिए हैं |०००

Monday, 10 January 2022

हिन्दी दिवस

 अन्य के कार्य देखकर

पीड़ित होना छोड़ दिया... 

कुछ पल का बचत..

एक वक्त में एक कार्य तो

इश्क करना आसान किया


लाल घेरे में

गूढ़ाक्षरों को करे

हिन्दी दिवस


नाक भौं टेढ़ी

गूढ़ाक्षरों से करे

हिन्दी दिवस

आखिर क्यों...

 बैसाखी पूनो/बुद्ध पूर्णिमा छान पर कोंपल सदाफूली की "क्या तुमने सुना वज़ू करने वाले स्थान में शिवलिंग मिला है!" "जब तुम नास्ति...