Friday, 31 December 2021

'छँटा धुन्ध'

"जानते थे न कि बड़े भैया से गुनाह हुआ था? अपने चार मित्रों के साथ मिलकर भादो के कृष्णपक्ष सा जीवन बना दिया पड़ोस में रहने वाली काली दी का। काली दी अपने नाम के अनुरूप ही रूप पायी थीं..।"

"इस बात को गुजरे लगभग पचास साल हो गए..,"

"जानते थे न कि मझले भैया जिस दम्पत्ति पर रिश्वत लेकर नौकरी देने का आरोप लगवा रहे हैं वो दम्पत्ति उस तारीख पर उस शहर में क्या उस राज्य में नहीं थे। मझले भैया जी जान से बहन-बहनोई मानते थे उस दम्पत्ति को। बस बहनोई की तरक्की उनसे बर्दाश्त नहीं हो पायी?"

"उस बात को गुजरे सोलह साल गुजर गए। अब तो दोनों भैया भी मोक्ष पा गए।"

"आज बड़े भैया की तरह उनका भतीजा वही कृत्य दोहराकर तुझे अपना वकील बनाया है.."

"सुन मेरी आत्मा! मुझे प्रायश्चित करने का मौका मिला है.."

Friday, 24 December 2021

हाइकु

मिलनोत्सव

कुल्फी व मोमबत्ती

दोनों पिघले!

रेत से हटे

स्वचित्र की लहरें-

सन्धिप्रकाश

लो

मारू

वैवर्त

गुणधर्म

अति में गर्त

ना प्यार में शर्त

जल स्त्री संरचना

हाँ

हर्ता

शर्वाय

जलवाहिनी

सिंधु की सत्ता

भू स्त्री व लंकारि

भूले न स्व महत्ता

Friday, 17 December 2021

कवच

"क्षोभमण्डल गुरु-शिष्य की अतुलनीय जोड़ी मंच पर शोभायमान हो रही है।" सञ्चालक महोदय ने घोषणा की

"दोनों शब्दों के जादूगर साहित्य जगत के सिरमौर। बेबाकी से आलोचना करने में सिद्धस्त। दोनों एक दूसरे के घटाटोप प्रशंसक।"

"दोनों कूटनीतिज्ञ अन्य के तिजोरी से हाथ सफाई दिखलाकर अपने सृजन का सिक्का जमाने में सफल।"

"समरथ को नहीं..." हर बार दर्शक दीर्घा में अण्डा और टमाटर गप्प करते तथा मायूस रह जाते..।

ऐसी बातें यथार्थ नहीं है लेकिन सत्य है। ऐसा सत्य जो अनेक सृजक को अवसाद में जाने के लिए विवश करता। और हम कन्धें को उचकाते हुए मौन रह जाते हैं।

'हमें क्या फर्क पड़ता है..,' –क्या वास्तव में हमें फर्क नहीं पड़ता है?

★◆★

Tuesday, 7 December 2021

नरक


"क्या तुमलोगों का राजगीर यात्रा में वहाँ के गरम जल कुण्ड में स्नान हुआ ?"

"बस्तर/छतीसगढ़ इलाके में चूना पत्थर से बनी कुटुमसर गुफाओं की मछलियाँ सी हम नहीं हो सके..,

Thursday, 2 December 2021

प्रलय

 [01/12, 9:29 pm]: मेरा कुत्ता अपने अंत समय में आ गया है 15 साल का साथ छूटने वाला है

[01/12, 9:59 pm]: सब घर में रो रहे हैं

[01/12, 10:00 pm]: हम लोग सोच रहे हैं कल उसे इच्छा मृत्यु दे दिया जाये

[01/12, 10:54 pm] विभा रानी श्रीवास्तव: स्वाभाविक है... लेकिन यह कैसे सम्भव है ?

[01/12, 10:55 pm] : भारत में पालतू जानवरों के साथ यह करने की इजाजत सरकार देती है

[01/12, 10:56 pm] : जब आपका पालतू पशु बेड पकड़ ले और खाना पानी त्याग दे। तब वह कष्ट असहनीय हो जाता है उस पशु के लिए और उस घर के लोगों के लिए: तब समय आता है यह कड़ा कदम उठाने का

[01/12, 10:57 pm]: उस समय एक कागज बनता है जिसमें लिखा होता है मैं अपने पालतू पशु को बिना दर्द के उसे एक अच्छी मुक्ति दे रहा हूँ : उसके बाद डॉक्टर इंजेक्शन देते हैं और वह पशु 5 से 6 मिनट में चला जाता है

[01/12, 10:58 pm] : हमेशा के लिए

[01/12, 10:58 pm] विभा रानी श्रीवास्तव: बेहद दर्दनाक है

[01/12, 10:58 pm]: इस कागज़ में घर के सभी सदस्यों को हस्ताक्षर करने होते हैं.…: दर्दनाक नहीं है माँ : काफी आरामदायक है उस कष्ट से जो वह झेल रहा है

[01/12, 10:59 pm]: Lungs खराब हो चुका है, हार्ट कमजोर पड़ रहा है

[01/12, 10:59 pm] विभा रानी श्रीवास्तव: मैं पहली बार जान रही हूँ.. मेरे घर में गाय बैल पाला जाता रहा है

[01/12, 10:59 pm]: किडनी काम कम कर रहा है

[01/12, 11:00 pm] विभा रानी श्रीवास्तव: मुक्त कर दो

लेकिन दर्द तो है

[01/12, 11:00 pm]: रोज़ रात को अटैक आता है : अटैक के वक़्त पलट के किसी को देखते रहती है.. शायद उसे कुछ दिखता होगा

[01/12, 11:03 pm]: यह सोचकर ही हिम्मत जवाब दे जाता है

[01/12, 11:05 pm] विभा रानी श्रीवास्तव: मैंने कभी देखा जाना नहीं तो कल्पना करने में रौंगटे खड़े हो रहे हैं.. ऐसा भी होता है..!

[01/12, 11:08 pm]: इसके बारे में घर मे मैंने ही सबको बताया है

[01/12, 11:09 pm] : जबकि बचपन से उसे सब *मेरी बेटी है* कहा करते थे: और मैं ही उसके लिए इतना बड़ा फैसला ले रहा हूँ

[01/12, 11:18 pm] विभा रानी श्रीवास्तव: तुम्हारी भावनाओं को समझने में अभी असमर्थता है..

Saturday, 27 November 2021

अभिविन्यास

 "अद्धभुत, अप्रतिम रचना।

नपे तुले शब्दों में सामयिक लाजवाब रचना। दशकों पहले लिखी यह आज भी प्रासंगिक है। परिस्थितियाँ आज भी ऐसी ही हैं।

लाज़वाब.. एक कड़वी हकीकत को बयां करती सुंदर रचना।

रचना में अनकहा कितना सशक्त है। मार्मिक व सच्चाई को उजागर करती उम्दा रचना।

सशक्त, गजब, बेहतरीन, बहुत शुक्रिया, इस रचना को पढ़वाने का हृदय से आभार.. 

जैसे आदि-इत्यादि टिप्पणियों के बीच में कोई भी विधा की रचना हो तुम्हारे भाँति-भाँति के सवाल, तुम्हें ख़ुद में अटपटे नहीं लगते?"

"नहीं ! बिलकुल नहीं.. अध्येता हूँ। मेरा पूरा ध्यान विधा निर्देशानुसार अभिविन्यास पर रहता है।"

"प्रस्तुति कर्त्ता-कर्त्री रचनाकार से अकेले में विमर्श किया जा सकता है न? आँखों के किरकिरी बनने से बचना चाहिए.."

"यानि तुम्हारा गणित यह कहता है कि डरना चाहिए...। जो डर गया...,"

Friday, 19 November 2021

'दुर्गन्ध से मुक्ति'

 


"जानते थे न कि बड़े भैया से गुनाह हुआ था? अपने चार मित्रों के साथ मिलकर भादो के कृष्णपक्ष सा जीवन बना दिया पड़ोस में रहने वाली काली दी का। जबकि काली दी अपने नाम के अनुरूप ही रूप पायी थीं..।"

"इस बात को गुजरे लगभग पचास साल हो गए..,"

"जानते थे न कि मझले भैया जिस दम्पत्ति पर रिश्वत लेकर नौकरी देने का आरोप लगवा रहे हैं वो दम्पत्ति उस तारीख पर उस शहर में क्या उस राज्य में नहीं थे। मझले भैया जी जान से बहन-बहनोई मानते थे उस दम्पत्ति को। बस बहनोई की तरक्की उनसे बर्दाश्त नहीं हो पायी?"

"उस बात को गुजरे सोलह साल गुजर गए। अब तो दोनों भैया भी मोक्ष पा गए।"

"आज बड़े भैया की तरह उनका भतीजा वही कृत्य दोहराकर तुझे अपना वकील बनाया है.."

"इस दोहराये इतिहास पर दीवाल चुनवाना है। सुन मेरी आत्मा! मुझे प्रायश्चित करने का मौका मिला है..।"

Wednesday, 10 November 2021

जहर की गाँठ

 रक्षाबंधन, 1976

"यों तो तुम चिकना घड़ा हो गयी हो! जरा बताना, यह कहाँ का न्याय है? एक भाई के मोक्ष के कारण अन्य सारे भाइयों की कलाई सूनी रह जाए। अक्सर ऐसा हो जाता है, हमारा जो खो गया उसके विलाप में जो हमारे पास है उसको हम अनदेखा करने लग जाते हैं।" अन्तर्देशीय पर छपे शब्दों को आँसू धुंधले कर रहे थे।

रक्षाबंधन, 1977

"जिस पर पाँच रुपया या दस रुपया टाँका गया हो वही राखी मेरे लिए मंगवाना..,"

"यह तो अन्याय है। आप अभी अध्येता हैं। जो रुपया नेग में देने के लिए मिलता है, उसे भी आप अपने पास रख लेते हैं और ऊपर से..,"

"सुग्गिया! गाँठ बाँधकर रख ले.. ! जब तू बड़ी होगी और तेरी शादी होगी तो मैं ही तुझे बुलाने भेजने की जिम्मेदारी मेरी होगी। मैं पिता के संग ही रहूँगा... तब सब गाँठ खुल जायेगा।"

रक्षाबन्धन, 1982

शादी के बाद की पहली राखी.. कहीं कोई सुगबुगाहट नहीं..! बहुत 

रक्षाबंधन, 1995

सुग्गिया और उसके कुछ भाई अब एक ही शहर में रहते हैं तो राखी में गुलजार रहता है।

रक्षाबंधन, 2015

सुग्गिया दूसरे राज्य में रहती है। ऐसा पहली बार हुआ है कि आज राखी के दिन ही सुग्गिया का जन्मदिन पड़ा। सुग्गिया सारे भाइयों को न्योता दिया गया था। सुग्गिया उल्लासित प्रतीक्षा करती रह गयी।

रक्षाबंधन, 2018

बहुत सालों पहले चिकना घड़ा कहने वाले सारे भाई सुग्गिया को अब पत्थर कहते हैं...। 

रक्षाबंधन, 2021

पौधे वृक्ष बनने के कगार पर पहुँच गए हैं। सुग्गिया पत्थर से मीठा स्त्रोता फूट गया है। थाली में अक्षत रोली राखी के खाली पैकेट और बुझे दीप संग पाँच-पाँच सौ के रुपये गवाही दे रहे हैं


Saturday, 30 October 2021

...अंधेर नहीं हुआ!


"अपने सृजन का कबाड़ा करती ही हो। अन्य लेखक की रचनाओं में अपनी ओर से अन्तिम पँक्ति जोड़कर रचना को कमजोर कर दिया.., वरना कलम तोड़ थी!"

"तुम क्या जानों, रचना की आत्मा कहाँ बसती है..!"

"थोथा चना...! तुम जैसे सम्पादक-प्रकाशक की नज़रों में पाठक-समीक्षक तो गाजर मूली होते हैं!"

"क्या मैंने लेखक गाँव है, जिसको गोद लिया है?"

"मित्रता के आड़ में आँखों में धूल झोंक देना आसान होता है। अरे! मैं मित्रता की बात कहाँ से उठा लायी। वो तो अनजान था जो तुम्हारा चक जमा सुनकर आ गया था।"

"ऊंह्हह्ह! क्या मैंने उसे न्योता भेजवाया था?"

"गाँठ के पूरे, आँख के अंधे! उसके गिड़गिड़ाने का लिहाज़ कर, दो-तीन हजार कम कर देने से..,"

"क्या मैं तुम्हें मन्दिर की दानकर्त्री नजर आ रही हूँ। अपने और अपनों के पेट पर गमछा बाँध कर रहती।"

"समुन्दर पाटकर पुल-मकान बन जायेगा। तुम जैसों का पेट भर जाए तो कोई आत्महत्या ही ना करे।"

"घोड़ा घास से यारी..,"

"अरे! उतना ही होता तो तुम पुस्तकों के कुतुबमीनार पर सिंहासन नहीं लगा पाती...,"

"सभी गर्दन ऊँचीकर बात करते..,"

"अंधे के हाथ बटेर लगा। काश! उनके बातों में सम्मान भी होता..,"

बात पूरी होने के पहले पुस्तकों का कुतुबमीनार हिल गया और मैं धड़ाम से पुस्तकों के नीचे दब गयी। साँसों का साथ छूटने के पहले मेरी आँखें खुल गयीं। कमरे के चौसीमा में नजरें दौड़ाई तो जीवन रक्षक यंत्रो की भीड़ दिखी। परिचारिका की बातों से लगा कि मुझे नयी जिन्दगी मिली है।


Thursday, 28 October 2021

'चालाकी'

 


किसी भी कार्यक्रम में समय के पहले पहुँचने की आदत होने से ज्यों ही देर होने लगती है हड़बड़ाहट हो जाती है। जब ओला की गाड़ी ने रफ्तार पकड़ी तब ध्यान आया कि खुदरा पैसा बैग में नहीं है। केवल पाँच सौ वाले रुपये हैं..।

"क्या आपके पास पाँच सौ का खुल्ला पैसा है?" चालक से मैंने पूछा।

"नहीं मैडम जी। आज सुबह से जितनी सवारी बैठी सबने पाँच सौ का ही नोट दिया और खुल्ला खत्म हो गया।" चालक ने कहा।

"ओह्ह! अब कैसे काम चलेगा?" मैंने व्याकुलता में कहा।

"किसी दूकान में खुल्ला करा लेते हैं।" चालक ने कहा। सड़क के किनारे गन्ने का जूस, गोलगप्पे, चाट-मोमोज बेचने वाले चार-पाँच रेहड़ी वालों से पाँच सौ का खुल्ला पूछने पर इंकार मिला।

आखिरकार मैं ने भाई मो नसीम अख़्तर जी को फोन किया कि "मुझे पाँच सौ का खुल्ला चाहिए। उसमें भी साठ रुपया जरूर हो। वैसे मुझे अट्ठावन ही देना है।"

"ठीक है! आप आइये, हो जाएगा। मेरे पास खुल्ला है।"

"शुक्रिया भाई।"

आयोजन स्थल के थोड़ा पहले चौराहा पड़ा। जहाँ पानी वाला नारियल का ठेला लगा था। गाड़ी रोककर चालक उतरा साठ रुपया का नारियल पानी पी लिया। जब हम आयोजन स्थल पर पहुँचे तो वह मुझसे नारियल वाला पैसा मांगने लगा।

"गरीब हूँ! मैं नारियल का पैसा कहाँ से दूँगा?"

"तुम गरीब हो तो अपने बच्चे के लिए के कॉपी-कलम खरीद लेेते । मैं तुम्हें पूरा पाँच सौ दे देती।


Tuesday, 19 October 2021

चालाकी कि धूर्तता

लघुकथा लेखक द्वारा आयोजित 'हेलो फेसबुक लघुकथा' सम्मेलन का महत्त्वपूर्ण विषय 'काल दोष : कब तक?' था।

आमंत्रित मुख्य अतिथि महोदय डॉ. ध्रुव कुमार, डॉ. सतीशराज पुष्करणा के विचारों को उदाहरण में रखते हुए अपने विचारों को रखा कि काल-खण्ड दोष से बचना चाहिए। सारिका में छपे स्व रचित दो लघकथाओं का पाठ भी किया। जिमसें काल दोष से बचाव नहीं हो सका था।

अध्यक्षता कर रहे अतिथि महोदय को अपनी बात दृढ़ता से रखने का आधार मिल गया। उन्होंने कहा कि "हम अगर काल दोष को अनदेखा ना करें तो उम्दा लघुकथाओं से पाठक वर्ग वंचित रह जायेगा। देखिए सारिका में छपी लघुकथा में काल दोष है लेकिन भाव सम्वेदनाओं से परिपूर्ण लघुकथा एक ऊँचाई पा रही है।

  अब बारी आयी विभा रानी श्रीवास्तव की, कहना पड़ा कि इतने वरिष्ठ जनों के सामने क्या बोलूँ.., बस! एक उदाहरण देती हूँ जो आपलोग अवश्य पढ़े होंगे, मधुदीप जी की लिखी कथा 'समय का पहिया' (विश्वास था कि उपस्थित में से कोई पढ़ा नहीं होगा)। अगर लघुकथा में डायरी विधा , पत्र लेखन या यादों को शामिल किया जाए तो काल दोष से बचा भी जा सकता है और उम्दा लघुकथाओं को पाठक के सामने लाया भी जा सकता है। वैसे ना तो सभी पाठक और ना पुस्तक, पत्रिका, समाचार पत्र के सभी सम्पादक विधा के पारंगत होते हैं। वैसे भाई जान! लघुकथा से ही पाठक को क्यों सन्तुष्ट करना। लघु कथा से भी पाठक सन्तुष्ट हो जाते हैं।

    अगर हम लघुकथा के प्रति समर्पित हैं तो उसके दिशा निर्देश और अनुशासन मानने के प्रति भी प्रतिबद्धता रखेंगे।

राजनीत

 "वाह। बहुत खूब। इतना विशाल आयोजन..! आयोजक संयोजक को बधाई के संग साधुवाद। सफल कार्यक्रम रहा। मंच संचालन का तो क्या कहने..,"

"हार्दिक धन्यवाद। सच कह रहे हैं। मुख्य-अतिथियों का दो-तीन घण्टे विलम्ब से पहुँचना.., प्रशंसा के पात्र थे संयोजक महोदय जो थोड़ी-थोड़ी देर पर मंच से समय से पहुँचे को अवगत कराते रह रहे थे..,"

"उतना त स्वाभाविक है। इतना त मानकर चलना..,"

"मंच संचालक की कुशलता को दाद देनी चाहिए। कितना अध्ययन किया होगा..। नेपाली, दिनकर, इन्दौरी साहब, कबीर, मीर की चार-चार पँक्तियों को सहेजना और उनका सफलता से प्रयोग करते हुए। लगभग सात-आठ घण्टे में सात-आठ प्रतिभागियों को मंच पर मौका देना। बहुत बड़ी बात है। पीड़ या पीर..,"

"अगले मतदान में मनचाहा पार्टी से टिकट मिल जाने का पक्का इंतजाम हो गया है।"

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–अपनों में अपने संग केवल अपनी आत्मा रहती है...!

Thursday, 14 October 2021

पल्लवन

बाड़ छाया की

आँगन से वापसी

गुल अब्बास

सूर्य की छाया

स्तुति जल में दृश्य

आँखों में आँसू

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'"दादा ने मुझसे कहा था कि जब मैं मेडिकल में नामांकन करवाने जाऊँगी तो वे मेरे साथ जाएंगे।"

"तो क्या हुआ, वे नहीं गए तुम्हारे साथ?"

"परिणाम आने के पहले वे मोक्ष पा गए।"

"ओह्ह!"

"बाबा के श्राद्धकर्म के बाद उनका बक्सा खोला गया तो उसमें लगभग चार लाख रुपया था और दादा की लिखी चिट्ठी। जिसमें लिखा था मुनिया की शिक्षा के लिए।"

"वाह! यह तो अच्छी बात है। तुम्हारी पढ़ाई में आर्थिक बाधा नहीं आएगी।"

"बाधा नहीं आएगी, मेरी माँ ने वादा किया है। उस रुपया को मेरी फुफेरी बहन की पढ़ाई के लिए देते समय।"

"क्या तुम चिन्तित हो?"

"नहीं! बिलकुल भी नहीं।"

"फिर?"

"आप इस बार हमारे घर में स्थापित नहीं होंगी। इसलिए तो मैं आपसे अपनी बात कहने कुम्हार काका के घर आयी हूँ। आप जगत जननी हैं। मेरी जननी का साथ दीजियेगा।"

"कर भला...,"


Saturday, 9 October 2021

पितृपक्ष

"हम एक ही प्रजाति के थे। तुम बौना रह जाते थे तब भी महंगे दामों में खरीद लिए जाते। हम विस्तार पाए रहते थे तब भी सस्ते दामों से बामुश्किल किसी चौके के छौंक तक पहुँच पाते थे,"

"भले हम कद में बौने होते, स्वास्थ्य के लिए हानिकारक नहीं होते थे।"

"हम अपना दर्द दिखाएं किसे और छुपा लें किनसे..!"

"बछड़े या पड़वा को दूध पिलाया जाए तो भी हमारा दूध नहीं उतरता था। ऑक्सिटोसिन के स्थान पर डिस्टिल वाटर का इंजेक्शन भी दूध उतारने में सहायक हो गया।"

"यम महाराज हमारी विनती पर गौर करें, इन मानवों को ऑक्सिटोसिन का इंजेक्शन ही दिया जाए।"

 " मैं तो आया हूँ- देवि बता दो

जीवन का क्या सहज मोल

भव के भविष्य का द्वार खोल

इस विश्वकुहर में इंद्रजाल

अचकचाकर उसकी आँख खुल गयी। सपने से मानों विलीनता के कगार से लौटी हो का शरीर पसीने से गीला था। वह तो कामायनी पढ़ते हुए सो गयी थी।

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हाँ!

किस्सा

भू लिप्सा

द्यौ का दित्सा

मेघ का कुत्सा

आँखें प्यासी रही

सिन्धु ना दे स्व हिस्सा। {01.}

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ज्जा!

सम

असम

मेघ नम

भू का दम है

व्योम को गम है

राहत व आफत। {02.}

Tuesday, 5 October 2021

पचहत्तर वीं जयन्ती के महोत्सव के अवसर पर



बदबू'

डॉ. सतीशराज पुष्करणा

"क्या बात है? ... आजकल दिखाई नहीं देते हो?"

"क्या बताऊँ यार! बहन के लिए लड़का ढूँढ़ने में ही आजकल परेशान कभी यहाँ तो कभी वहाँ। बस! दौड़-धूप में ही समय को नाप रहा हूँ।"

"भई ! लड़कों की ऐसी क्या कमी है?"

"कमी तो नहीं किन्तु सुरसा की तरह बढ़ता दान-दहेज... बस, यही चिंता खाये जा रही है।"

"अगर यह बात है तो तुम अपने को परेशानियों से आजाद ही समझो।"

"क्या!... क्या मतलब?"

"हाँ! तुम मेरे अनुज पर विचार कर सकते हो। वह पढ़ा-लिखा, सुन्दर स्वस्थ और होनहार युवक है। फिर नौकरी भी अच्छी है। तुम्हें दहेज वगैरा कुछ भी नहीं देना पड़ेगा। और हमारी दोस्ती भी रिश्ते में बदल जाएगी।"

"क्या बकते हो तुम!... अरे कभी यह तो सोचा होता... कहाँ हम उच्च जाति के और कहाँ तुम!... दोस्ती का हरगिज यह अर्थ तो नहीं कि तुम हमारी इज्जत से ही खेलने लगो।"

"तुम तो बुरा मान गए। मैं तो तुम्हारे विचारों के अनुरूप ही बात कर रहा था जिन्हें तुम अपने साहित्य के माध्यम से व्यक्त करते रहे हो।"

अचानक उसका चेहरा फक्क हो गया और जल्दी ही वह फिर सम्भल भी गया।

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समीक्षा

विभा रानी श्रीवास्तव, पटना

यार कहने कहलाने में कोई परेशानी नहीं! गहरी मित्रता तो है लेकिन रिश्तेदारी में नाक का सवाल आ जाता है..। मानवीय मूल्य और मनःस्थिति दोनों में ही मानव के व्यवहार को प्रेरित करने की क्षमता होती है। यों तो सामान्यतया मूल्य मनःस्थिति को उत्पन्न करती है। परन्तु कभी-कभी विशिष्ट परिस्थिति में मनःस्थिति मूल्य का निर्धारण करती है। जिस मानव के हृदय में ईश्वरीय गुण (ह्यूमैनीटी, वैल्यूज़) है, वो ही बड़े होने का सम्मान भी पाने लगता है। लेखक के लेखन में वो झलकता है जो

दरिया हो या पहाड़ हो टकराना चाहिए 

जब तक न साँस टूटे जिए जाना चाहिए 

~निदा फ़ाज़ली

के शेर से हमें जानने को मिला।

  समाज में फैला कोढ़ का दाग बना दहेज प्रथा, जीव-सम्पदा को नष्ट करता प्रदूषण का विषैला जहर सा जाति भेद... कर्म के आधार पर बंटा, मानव को मानव से बड़ा-छोटा के वर्ग में बाँटता और सबसे ज्यादा खतरनाक साहित्यकार का लेखन और व्यवहार में दिखलाई देता उसका दो-चित्तापन। 

       लेखक के द्वारा बूँद में सिंधु को समो दिया गया है .. प्रयोगशीलता के रूप सफल तीन-तीन मुद्दों को जो आज पूरे भुवन में सड़ान्ध फैलाये हुए है, बिना किसी भूमिका के सहारे सिर्फ कथोपकथन शैली में चुस्तदुरुस्त नपे तुले शब्दों में सांचे में ढली मूर्ति सृजन में से ना तो एक शब्द भी अलग किया जा सकता था और ना एक शब्द अतिरिक्त जोड़े जाने की गुंजाइश दिखलाई पड़ी। सुष्ठु तथा कालोचित लेखन का सटीक उदाहरण।

   –जी हाँ मैं बात कर रही हूँ डॉ. सतीशराज पुष्करणा द्वारा लिखित बदबू सटीक शीर्षक वाली लघुकथा की। जब हमारी आत्मा मर जाती है तो हमें किसी बदबू का अनुभव नहीं होता है। वरना हम एक बदबूदार काल में हिस्सेदार बन मरे पड़े नहीं होते।

 नेता भ्रष्ट, बदबूदार हैं । अभिनेता अंडरवर्ल्ड से मिलकर बदबूदार हैं। ऊँच पदाधिकारी से लेकर जो भी रिश्वतखोरी करते, बदबूदार हैं। दुकानदार मिलावट कर बदबूदार हैं। हम और आप झूठ बोलते हैं , दूसरों का हक़ मारते हैं , अनैतिक काम करते हैं -- क्या हम सभी बदबूदार नहीं  हैं? जब यह सारा काल बदबूदार है, यह समाज बदबूदार है ,  ऐसे में यदि हमको-आपको अब भी बदबू नहीं आ रही है तो क्या यह स्वाभाविक है?

   लेखक जैसा सभी को नाक मिल जाए तो बड़ी आसानी हो जाती! सबकी नज़रिया बदल जाती और हमारे आसपास की दुनिया अपने आप बदलने लगती वरना बखिया उधेड़ कर रखा जाता।

वैसे सामान्यतया मानव स्वभाव है कि वो वैसा ही व्यवहार करेगा कि लोगो की नज़रों में उसे बड़प्पन का सम्मान मिलता रहे चाहे हाथी का दाँत ही सही।

कथानक शिल्प में शीर्षक का उल्लेख ना होना और शीर्षक से लेखन को शीर्ष स्थान मिलता देखकर मैं बेहद रोमांचित हो जाती हूँ।

Saturday, 2 October 2021

संस्कार


"क्या ग्रैंम स्क्वायर से बात हो गयी तुम्हारी?" शाम को कार्यालय से लौटा मधुर ने अपनी पत्नी मिन्नी से पूछा।"

"अभी तो भारत में पौ फटा होगा और वो शायद जगी हों। आप कपड़े बदलकर आ जाएं। वीडियो कॉल करती हूँ।" मिन्नी ने कहा।

"किनसे क्या बात करनी है?" मिन्नी की माँ ने पूछा।

"महामारी काल में मधुर के दादा अनाथ हो गए थे, उनको सहारा मिला। मधुर के पिता, चाचा तथा बुआ को दादी की ममता उनसे भरपूर मिला। मधुर के दादा के समकालीन अनेकोनेक बच्चों को उनसे माँ के आँचल की छाँव मिली।"

"महामारी काल को बीते लगभग साठ साल हो गए। तीसरी पीढ़ी इस बात को याद रखे। मैं स्तब्ध हूँ।" मिन्नी की माँ ने कहा

"याद ही नहीं रखे माँ। किसी को किसी परेशानी का हल ढूँढ़ना हो, किसी की शादी हो, किसी बच्चे का अन्नप्राशन हो, किसी का गृहप्रवेश हो , किसी का नया काम शुरू.. मुहूर्त उनसे ही पूछा... मधुर आ गए मैं उन्हें वीडियो कॉल लगाती हूँ.., हमें भी कुछ...,"

"सुप्रभात! ग्रैंम स्क्वायर! आप कैसी हैं?" मधुर और मिन्नी ने संग-संग कहा।

"सस्नेहाशीष संग शुभ सन्ध्या मेरे बच्चों!" वीडियो कॉल पर दमकता चेहरा उभरा।

"मैंने कहीं पढ़ा है कि महामारी काल में रोबोट में इमोशन्स भरने की बात चल रही थी...," मिन्नी की माँ की बुदबुदाहट किसी के कानों तक नहीं पहुँच पायी।

Thursday, 30 September 2021

'त्रासदी'

01. मैं बक संग

अनिर्णीत दौड़ में

सन्धिप्रकाश

02. स्त्री के हाथों में

हारिल की लकड़ी

फौजी की चिट्ठी

03. खेमा में आये

शरणार्थी का रेला

श्वान का रोना

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ठाढ़ा सिंह चरावै गाई का

ना ऐसा हाल था

चींटी मुख में हाथी

समा जाए का काल था

गार्गी सूर्या मैत्रयी सुलभा के बाद आयी

सावित्री बाई अरुणा सुचेता दुर्गा बाई

उत्‍तमोत्‍तम ओजोन थीं

ओजोन में छेद होते ही

खूँटे के बल पर उछलने वाली

व्यथा व्यक्त करने में हो गयी असमर्थ

पल लहरों के संग ही तो बहा है सपना

योजन में कद बढ़ न सका है अपना

मीन वाले जाल में टूटे पँख कैसे मिले

उड़ने की चाह में समझौते के कैसे गिले

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कल किसी से मेरी बात हो रही थी कि उसकी स्थिति उसे बेटी होने से दोयम दर्जे की है तो उसकी सहेली को बेटी हुई तो उसके तथाकथित अपने उससे मिलने अस्पताल नहीं आये

हम इकीसवीं सदी में पहुँच गए और आज भी बेटी बचाने बेटी पढ़ाने के लिए गुहार लगा रहे हैं 

मन मछलता है तो हम लेखन कर सन्तुष्टि पा लेते हैं... समाज की दशा बदलने हेतु एक दिशा देने का प्रयास करते हैं लेकिन सुधार कितना दिखलाई दे रहा है

जब मैं सारे प्रान्त से आयी महिलाओं से मिलती हूँ और व्यथा की कथा सुनती हूँ कि आज भी बेटी जन्म लेने पर परिवार वाले कैसा व्यवहार करते हैं तो विश्वास करने का जी नहीं करता है क्योंकि हम बदली दुनिया में जी रहे हैं..

 शादी के एक महीना बीतने के बाद ही या तो बहू जला दी जाती है या कन्या तलाक की मांग कर लेती है

और दहेज लाने के लिए प्रताड़ित की जाती है या वर पक्ष को प्रताड़ित करने के लिए झूठा आरोप लगाया जाता है

बार-बार बयान बदलने वाले समाज में हम जी रहे हैं किसका पक्ष लें... आज का जब इतिहास लिखा जाएगा तो लिखने वाले का भूगोल बदल जायेगा

Friday, 24 September 2021

'हाथी के दाँत'


"सावन माह में रिमझिम व तेज बरसात होती है। मगर इस बार सावन में सूखा पड़ जाने से गर्मी व उमस में निकल रहा है।"नूतन जैन ने कहा।

"खरीफ की फसल को जलता देख बारिश की कामना को लेकर जगह-जगह पर सामूहिक सहयोग से 24 घंटे की अखण्ड रामधुनी का, रात जागरण का आयोजन किया जाता, बालाजी की भव्य झांकी सजाई जाती है।"मीरा सिंह ने कहा।

"बरसात के लिए पेड़ों की अहम भूमिका होती है..सागौन,  देवदार, आम, नीम, वट वृक्ष, पीपल शीशम के पौधे हम लगा.., अरे आपकी छतरी वाली टोपी तो बहुत ही सुन्दर लग रही है आपदोनों पर जँच भी रही है। कहाँ से और कितने में लीं?" नूतन जैन ने पूछा

संगनी क्लब की ओर से आयोजित पौधा रोपण कार्यक्रम में शामिल सँगनियों चरमोत्कर्ष पर हर्षोल्लासित नूतन जैन, सीमा अग्रवाल, मीरा सिंह , सुषमा माथुर, रंजना सिन्हा इत्यादि का ध्यान बदले विषय की ओर चला गया।

"बिग बाजार से तीन सौ में।" मीरा सिंह ने कहा।

पौधा रोपण आयोजन समाप्ति के बाद घर वापसी पर मीरा सिंह को सीमा अग्रवाल ने अपने सवालों के घेरे में लिया,"इसलिए आप बिग बाजार में सदृश टोपी देखकर उछल पड़ी थीं। वो तो लेख्य मंजूषा की ओर से पुस्तक लोकार्पण में हम नालन्दा भग्नावशेष देखने गए थे, नसीम अख्तर जी के मोल भाव के बाद दुकानदार ने मछलकर सौ-सौ रुपये में हमें टोपी दिया था । उस दिन आप दुकानदार को टोपी पहना देने पर व्यंग्य कर रही थीं.. आज नूतन जैन जी को भी टोपी...,"


Wednesday, 22 September 2021

अंधेर नगरी...,

                         "शनिवार रात्रि 12 बजे तक ही प्रतियोगिता हेतु रचना पोस्ट करने की अनुमति थी... रचना रविवार को पोस्ट हुई... और विजेता के लिए चयन कर ली गयी... क्या आप चकित नहीं हो गयी..?"

 "तभी मुझे लगा कि शनिवार को मैं सब रचनाएँ पढ़ी थी। पर यह मुझसे छूट कैसे गयी..! आप उन्हें लिखें दी। सर भी तो उस समूह में एडमिन है।"
 "जब रविवार को रचना दिखलायी दी तभी मुझे तो परिणाम का अंदाज़ा हो गया था..। आपके सर जी भले विधा के ज्ञाता हों लेकिन ईमान के पक्के नहीं लगते...। शनिवार की देर रात्रि की प्रस्तुति का कह देगा लोग..,"

"कितनी बार मैं शनिवार रात 11:30 के समय अपनी रचना पोस्ट की हूँ तो वह शामिल नहीं की गई है।"

"आप उनके कुनबे (लॉबी) की नहीं हैं...। ऊँची दूकान...,"



Sunday, 19 September 2021

पिण्डदान


"सितम्बर की उमस भरी दोपहरी में नालन्दा के खंडहरों में पुस्तक लोकार्पण करने का निर्णय करना क्या बुद्धिमत्ता है?" सम्पादक की ओर पत्रकार का प्रश्न उछलकर आया।

"क्या करूँ..! पितृपक्ष लगभग सितम्बर में ही आता है। वैसे भी जब मन अवकाश में होता है.. शीतलता उष्णता का अनुभव कर लेता है। अगर मजबूरी में आना होता तो शायद बुद्धिमानी नहीं होती.. लेकिन हमारे पास वातानुकूलित स्थल होने बाद भी हम यहाँ आये। संस्थापक कुमारगुप्त प्रथम को विश्वास दिलाना था... स्वर्ण काल का इतिहास दोहराया तिहराया जा सकता है।"

"आपकी हैसियत एक बूँद की है और ऐसी बात...,"

"क्या बिना बूँद के... झरना, नदी या समुन्दर की कल्पना...,"


'अवमानना'


चिलचिलाती धूप और भादो की उमस भरी दोपहरी में घर-घर जाकर वैक्सीन ले लेने के लिए अनुरोध कर रहे अध्यापक अध्यापिकाएं। बहुत देर तक दरवाजा थपथपाने पर दरवाजा खोलती महिला के चेहरे पर क्रोध झुँझलाहट स्पष्टरूप से दृष्टिगोचर हो रहा था,"आप! आज क्या काम है? कुछ दिनों पहले ही तो जनगणना हुआ है..,"

"जी! मैं तो सन्देशवाहक हूँ...। आज राष्ट्रनायक का जन्मदिन है। जनमोत्स्व पर सौ फी सदी वैक्सिनेशन करवाना है..,

"अच्छा तो अब आपलोगों को इस कार्य में भी लगा दिया गया। राष्ट्रसेवक को राष्ट्रनायक कहकर ही तो अनुरोध को आदेश में परिवर्त्तित कर दिया जा रहा है..।"

"हम तो मजबूर हैं , 'नौकरी करी तो ना ना करी' के अधीन। आप अपनों के साथ वैक्सीन लेने स्थल पर जरूर जाएं..,"

"आज विश्वकर्मा पूजा है.. सौ फी सदी क्या पच्चीस फी सदी भी वैक्सिनेशन नहीं हो पायेगा।"

"हमारा वेतन कट जाएगा..."

"क्या फर्क पड़ता है...? यूँ भी सरकारी विभाग में आपके मजदूरी के बहुत भागीदार हैं...,"

Saturday, 18 September 2021

दासता है

 हम 

मातृ, कन्या, बालिका, महिला, बेटी,

वृद्ध के संग हिन्दी दिवस भी मनाते हैं।

विलोपित को याद करते हैं या

सतत विलोपित में सहायक होने का त्योहार मनाते हैं

जिन शब्दों का हिन्दी तथाकथित क्लिष्ट नहीं है

उसका भी आंग्ल प्रयोग करते हैं और 

सामयिक मांग गर्व से कहते हैं।

अधिकांशतः

उपहास उड़ाने वालों को

दर्पण भेंट देना भूल जाते हैं।


हिन्दी के वासी हिन्दी की बधाई देते हैं

इक दिवस की नहीं प्यासी हिन्दी 

आंग्ल की है नहीं न्यासी हिन्दी 

हँसते, रोते हैं कभी हम उदास होते हैं

सांस हिन्दी है, सदा इसके पास होते हैं।


आंचलिक शब्द हमें रास नहीं आते हैं

हम इन्हें हिन्दी का दुश्मन तलक बताते हैं।

और अंग्रेजी हेतु सूरदास होते हैं

सांस हिन्दी है, सदा इसके पास होते हैं।


कौन कितना गलत नहीं हमें बहस करनी है।

राष्ट्रभाषा हेतु प्रवाहित समर करनी है।

निर्णीत अपने धर्म का पालन सहर्ष करते हैं,

सांस हिन्दी है, सदा इसके पास होते हैं।

Friday, 10 September 2021

कृतघ्न

01. मेघ के स्पर्धा

अभिनय की मुद्रा

हवाई यात्रा

02. हौले से चढ़े

एक-एक सीढ़ियाँ

गुरु का ज्ञान

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"ओ! मिट्टी के लोदा। जितना साल वनवास भोगा गया था न उससे कुछ साल ज्यादा ही लगा था तुम्हें गढ़ने में... वनवास खत्म होते-होते दशहरा दीवाली मनी थी.. तुम से गढ़ने वाले कुम्हार पर कितने आरोप लगाए गए... शिशुपाल की सी हरकत..."

"जिसने गढ़ा था उसने मिटाने की कोशिश भी किया..,"

"धत्त! जिसकी आत्मा मर चुकी हो उसको और कोई क्या मिटा सकेगा...।"

Sunday, 5 September 2021

शिक्षक दिवस की बधाई


#शिक्षक नहीं बनी... अपनी शिक्षा के लिए ऋणी हूँ...
अवसर है बाँटने का

'ज्ञान"

"पिता जी के श्राद्ध के दिवस के लिए मैं इक्कीस पण्डित को न्योता दे आया हूँ.."
"इक्कीस पण्डित से क्या होगा भैया कम से कम इक्यावन पण्डित को बुलाया जाएगा..,"
"यह तो सही नहीं है बुआ...। ग्यारह पण्डित को बुलाना सही होता..., जब एक पण्डित तीन-तीन थाली भोजन लेते हैं तो इक्यावन पण्डित के लिए कितने थाली... "
"यह हमें निर्णय करने दो। बड़ों के बीच में तुम नहीं बोलो। तुमने दुनिया देखी ही कितनी है?"
"हमें दुनिया दिखलाने वाले ने ही बतलाया है कि महाभारत के दौरान, कर्ण की मृत्यु हो जाने के बाद जब उनकी आत्मा स्वर्ग में पहुँची तो उन्हें बहुत सारा सोना और गहने दिए गए। कर्ण की आत्मा को कुछ समझ में  नहीं आ रहा था , उसे आहार की आवश्यकता थी।

उन्होंने देवता इंद्र से पूछा कि उन्हें भोजन की जगह सोना क्यों दिया जा रहा है। तब देवता इंद्र ने कर्ण को बतलाया कि उसने अपने जीवित रहते हुए पूरा जीवन सोना दान किया लेकिन अपने पूर्वजों को कभी भी खाना दान नहीं किया। तब कर्ण ने इंद्र से कहा उन्हें यह ज्ञात नहीं था कि उनके पूर्वज कौन थे और इसी वजह से वह कभी उन्हें कुछ दान नहीं कर सका।

इस सबके बाद कर्ण को उनकी गलती सुधारने का मौका दिया गया और उसे सोलह दिन के लिए पृथ्वी पर वापस भेजा गया, जिससे वह अपने पूर्वजों को याद करते हुए उनका श्राद्ध कर उन्हें आहार दान किया।"
"तुम्हें सत्य बतलाया गया है। इसलिए तो मैं कह रही हूँ कि ज्यादा से ज्यादा पंडितों को बुलाया जाए..,"
"इसमें दादा को क्या मिलेगा.. दादा को तो वही मिलेगा जो उन्होंने अपने जीवन में...,"

Saturday, 4 September 2021

भाग लें..!

 01. कर्मी बटोरे

तितली के पखौटा

भगौड़ा तम्बू

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02. बैले नृतन

फव्वारा में उछाले

कंधे से सिक्का

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गोरे जेलर ने देखा कि जिस युवक को कल फाँसी दी जाने वाली है उसके चेहरे पर मनोहारी मुस्कान फुट रही है.. और बड़ी आत्मीयता के साथ वह उसका अभिवादन कर रहा है..। जिस दिन से यह सुदर्शन कैदी जेल में आया जेलर के विचार-धारणाओं में क्रांतिकारी परिवर्त्तन होने लगे..। जेलर से रहा नहीं गया उसने पूछ लिया, “तुम इतने प्रसन्न क्यों हो ?” “मैं अगले जन्म की तैयारी में व्यस्त हूँ...!” युवक ने कहा जेलर को आशा थी कि युवक राष्ट्र पर अपने बलिदान के सौभाग्य पर प्रसन्न होगा पर विपरीत उत्तर पाकर कहा, “आज तो हँस रहे हो कल तुम्हारे यही मुस्कुराते होठ मत्यु की कालिमा से काले पड़ जायेंगे..,” फाँसी के तख्ते पर जब युवक को खड़ा किया गया और जल्लाद ने गले में रस्सी के फन्दे को डाला तो उसने मुस्कराकर पूछा- ‘क्या यह रस्सी थोड़ी मुलायम नहीं हो सकती थी? बड़ी खुरदरी और कड़ी है गर्दन में लगती है, भाई!’ युवक को मिले फाँसी के बाद जेलर ने चेहरा देखा ... युवक के चेहरे पर वही अमर मुस्कान बिखरी हुई थी..। मत्यु की कालिमा का कोई चिह्न वीर के शरीर पर नहीं था...। फाँसी के बाद शहीद का शव लेने आये बड़े भाई की रुलाई नहीं थम रही थी ...। गोरे जेलर ने उनकी पीठ को थपथपाते हुए कहा, आप रोते क्यों हैं जिस देश में ऐसे वीर पैदा होते हैं वह देश धन्य है मरेंगे तो सभी .., अमर होकर कौन आया है पर आपके भाई जैसे भाग्यवान कितने होते हैं ...?” सबने विस्मय से देखा गोरा अधिकारी स्वयं रो रहा था जैसे उसका अपना भाई दिवंगत हो गया हो ...। बड़े भाई ने शहीद के मुख पर से कम्बल हटाया तो देखा कि उनके शहीद भाई उन रोने वालों पर हँस रहे थे...। तालियों के शोर के बीच मंच से माइक पर नाट्य प्रस्तुति के संचालक बता रहे थे, "हम सभी अभी देख रहे थे वीर क्रांतिकारी शहीद कन्हाई दत्त की कथा पर नाट्य प्रस्तुति...। मैं बेहद शर्मिंदा हूँ कि मुझे वीर क्रांतिकारी शहीद कन्हाई दत्त के बारे में पहले से पता नहीं था ...। उनके रूप का अभिनय करने वाले छात्र ने ही हमें बताया और विदेशों में निवास करने वालों के संग पूरे देश में स्वतन्त्रता दिवस का अमृतोत्सव हर्षोल्लास से मनाया जाने के क्रम में नाट्य प्रस्तुति देने का प्रस्ताव रखा।” दर्शक दीर्घा में उपस्थित अभिनय करने वाले के माता-पिता को अपने कानों से सुनी और आँखों देखी बात पर विश्वास करने में असमर्थता हो रही थी ...। माता को निंदा रस में बड़ा मजा आता था जिसके कारण कुछ महीनों पहले तक पुत्र के चुगलखोरी की आदत के कारण रिश्तेदारों के सामने शर्मिंदा होना पड़ रहा था वो आदत छूट रही थी..."अजी! हमारे बेटे ने कब दिशा बदल ली और सही के रेस में शामिल हो गया यह हमें पता भी नहीं चल पाया..!" माता ने पिता से कहा। "मैं तुम्हें सदा कहता था.. हमारे बच्चों का नजरिया बिगड़ने लगेगा वो सच को अनदेखा करना सीख जाएंगे.. । चुगलखोरी उसको बेसिर पैर की बातें बनाना सिखा देगी...। यह बहुत ही जोखिम भरा स्वभाव है जो बच्चे में तब ही विकसित होता है जब माता या पिता उसमें रूचि लेते हैं, क्योंकि उनके द्वारा बताई जानेवाली ख़बरों का अंदाज बहुत ही रोचक होता है। भले ही आधार ख़ुद बच्चे को भी मालूम नहीं होता..। ऐसी बातों को अहमियत न दो..। वरना हमारे बच्चों के सोचने का तरीका बेढंगा होता जाएगा और उनका भविष्य अंधकारमय होता चला जायेगा। बालमन बहुत ही उत्सुक हुआ करता है। अक्सर बच्चों की आदत होती ही है कि वे अपने तथा औरों के घर की बातें आते-जाते कान लगाकर सुनने की कोशिश करते हैं। ऐसे में हमें प्रयास करना चाहिए कि हम जब भी कोई ऐसी बात कर रहे हों तो सामान्य बनकर करें ताकि बच्चों में कान लगाने वाली आदत विकसित न हो सके। जब माता का ही अपनी भावनाओं पर कोई काबू नहीं हो और हमेशा आक्रोश में आकर बगैर कुछ सोचे समझे अडो़स -पड़ोस, नाते रिश्तेदारों की बातें बच्चों के सामने बेहिचक कर देती हो...। माता की बातें सुनकर उसके बच्चों के मन में भी संबंधित व्यक्ति के लिए बहुत ही गलत भावना पैदा होने लगती है और सामाजिक- पारिवारिक उत्सवों में बच्चे उस रिश्तेदार की बहुत सारी चुगली खुलेआम कर देते हैं.. माता पिता और वहाँ उपस्थित बाकी सब भी हक्के -बक्के से रह जाते हैं कि बच्चों के मुख से ऐसी बातें आखिर निकलीं भी तो निकली कैसे .. जो तुम्हारे कारण हमारे कन्हैया में आदत बनती रही..।" एक बार फिर पिता अपनी बात रखने का प्रयास किया। "कुछ दिनों पहले तक जो विद्यार्थी पूरे विद्यालय के लिए सिरदर्द बना हुआ था आज अपने कक्षा का सिरमौर हो गया है। संयोग देखिए इसका नाम भी कन्हैया है..," "हमें क्रांतिकारी कन्हाई लाल दत्त के बारे में विस्तार से जानकारी उपलब्ध करायी जाए.., पत्रकार दीर्घा से स्वर गूँजा। "यह अकाट्य सत्य है कि सर्वप्रथम अंग्रेजों ने बंगाल में ही अपने चरण रखे। उसी भूमि पर शक्ति अर्जित कर सारे भारतवर्ष पर शासन चलाया, उसे सुदृढ़ किया अर्थात् बंगाल से ही उनके स्वर्णिम स्वप्न साकार हुए।बंगालियों ने ही सर्वप्रथम अंग्रेजी शिक्षा, वेश-भूषा, रहन-सहन और उनकी संस्कृति की नकल करते हुए स्वयं में परिवर्तन किये। अंग्रेजों के सहयोगी, वफादार और नौकरियों में भद्र बंगाली पुरुष ही अधिक हुए। इसी प्रकार जब अंग्रेजी राज्य की जड़ें उखाड़ फेंकने की इच्छा जाग्रत हुई तो यह भी सत्य है कि बंगाल के लोगों ने ही बगावत का बिगुल बजाया, गोरी सरकार की जड़ों को समूल नष्ट करने के लिए सर्वप्रथम बंगालिगों ने ही हथियार उठाकर चलायी। सन् 1888 के 30 अगस्त कन्हाई लाल दत्त का जन्म कृष्णाष्टमी की काली अधेरी रात में अपने मामा के घर चन्दनंनगर में हुआ था, कदाचित् इसी से उनका नाम कन्हाई पड़ा हो। यद्यपि उनका आरम्भिक नाम सर्वतोष था। चन्दन नगर तब फ्रांसीसी उपनिवेश था। वास्तव में तो उनका पैत्रिक घर बंगाल के ही श्रीरामपुर में था। कन्हाई जब चार वर्ष के थे तब उनके पिता उनको लेकर बम्बई चले गये थे। पाँच वर्ष बम्बई में रहने के बाद नौ वर्ष की आयु में वह वापस चन्दन नगर आ गये थे और वही उनकी प्रारम्भिक से लेकर विश्वविद्यालय तक की शिक्षा हुई। चन्दन नगर के डुप्ले कालेज से उन्होंने स्नातक की परीक्षा दी थी। उसी कालेज के एक प्राध्यापक चारु चन्द्र राय से गहनता के कारण कन्हाई को क्रान्ति पथ का परिचय प्राप्त हुआ था। चन्दन नगर में सर्वप्रथम क्रान्ति की योजना बनाने वाले थे - संध्या के सम्पादक ब्रम्हबाधव उपाध्याय। कन्हाई उनके सम्पर्क में भी अपने प्राध्यापक के माध्यम से ही आये थे। स्नातक की परीक्षा देने के उपरांत कन्हाई कलकत्ता आ गये और युगांतर कार्यालय में कार्य करने लगे। कलकत्ता की अनुशीलन समिति से जब उनका सम्पर्क हो गया तो न केवल वह उसके सदस्य बने अपितु उन्होंने अपने घर ही उसकी एक शाखा भी स्थापित की तथा बाद में अपने क्षेत्र में पाँच अन्य शाखाओं की भी स्थापना की थी। इन शाखाओं में व्यायाम तथा लाठी आदि चलाने की शिक्षा दी जाती थी। बाहर से देखकर उन्हें कोई भी विप्लवी समिति की शाखा नहीं समझ सकता था। स्वयं कन्हाई ने विप्लवी बनने की दीक्षा अमावस्या की रात्री में एक वटवृक्ष के तले ली थी। खुदीराम बोस द्वारा किये गये मुजफ्फरपुर बम काण्ड के उपरान्त अंग्रेजी राज्य की रातों की नीद हराम हो गयी थी। सारा अंग्रेजी शासन चौकन्ना हो गया था। चारो ओर संदिग्ध लोगो की खोज आरम्भ कर दी गयी थी। खूब दौड़-धूप के बाद पुलिस को पता चला कि इन क्रान्तिकारियो का अड्डा मानिकतल्ला के एक बगीचे में है। यह बगीचा अरविन्द घोष के भाई सिविल सर्जन डाक्टर वारीन्द्र घोष का था। गुप्तचर विभाग वह से क्रान्तिकारियो की गतिविधि पर दृष्टि रखने लगे। दुर्भाग्य से क्रान्तिकारी गुप्तचर विभाग की इस कारस्तानी से सर्वथा अनभिज्ञ रहे। इसका परिणाम क्रान्तिकारियों के लिए भारी संकटकारी साबित हुआ। गुप्तचर विभाग को इससे सफलता मिली और उसने देश के सर्वप्रथम बम षड्यंत्र का पर्दाफाश कर दिया। इसमें बगीचे के मालिक वारींद्र घोष उनके भाई अरविन्द घोष , नलिनी कन्हाई लाल दत्त समेत लगभग 35 देशभक्त लोगो को बन्दी बनाने में पुलिस सफल हो गयी। इन सब बन्दियो को अलीपुर कारागार में रखा गया था और वही पर इन क्रान्तिकारियो पर अभियोग चलाया गया। इसी कारण इस अभियोग का नाम अलीपुर षड्यंत्र रखा गया था। कन्हाई लाल दत्त के साथ-साथ उसके प्रेरक प्रोफ़ेसर चारु चन्द्र राय भी बन्दी बनाये गये थे। सब पर अभियोग चला किन्तु चारू चन्द्र राय को फ्रांसीसी सरकार की बस्ती का नागरिक होने के कारण रिहा कर दिया गया। अलीपुर अभियोग में भी नरेन्द्र गोस्वामी नामक का एक व्यक्ति भी बन्दी बनाया गया था जिसने सरकारी गवाह बनना स्वीकार कर लिया। उसके इस देशद्रोह से क्रान्तिकारियो के रहे-सहे प्रयत्नों पर पर पानी फिर जाने की आशंका होने लगी। यद्यपि नरेन्द्र के इस कुकृत्य की देशभक्त समुदाय द्वारा चारो ओर भर्त्सना होती रही किन्तु इससे अभियोग में तो किसी प्रकार की सहायता मिलने की संभावना थी ही नहीं। यहाँ तक की अभियोग के दौरान ही एक दिन भरी अदालत में किसी अभियुक्त ने उसको लात तक मार दी थी। उसका परिणाम यह हुआ कि एक तो वह इन बन्दियो के सामने आने से सदा बचता रहा और दूसरे सरकार ने भी उसके लिए सुरक्षा की व्यवस्था कर दी। उसको दो सरकारी अंगरक्षक दिए गये। अब जेल में ही कन्हाई लाल दत्त और सत्येन्द्र बसु ने इस देशद्रोही को सबक सिखाने की एक अदभुत योजना बना डाली। उन्होंने निश्चय किया कि नरेंद्र अपना ब्यान पूरा करे उससे पूर्व ही उसको इस संसार से प्रयाण कर लेना चाहिए। कन्हाई लाल दत्त और सत्येन्द्र की बुद्धि निरंतर कार्य कर रही थी। उन्होंने सबसे पहले जेल के वार्डन से घनिष्टता बढाई उन्हें बहुत हद तक प्रभावित कर लिया। उसके फलस्वरूप जेल के भीतर लाये जाने वाले कटहल- मछली के भीतर रखी दो पिस्तौल को प्राप्त करने में वो सफल हो गये। उसमें किसी प्रकार की बाधा उपस्थित नहीं हुई। वे पिस्तौल किन वाडरो द्वारा आयोजित किये गये और किसने बाहर से भेजे थी , इस तथ्य को बाह्य जगत कभी नहीं जान पाया। सितम्बर माह की तिथि निकट आ गयी जिस तिथि को नरेन्द्र को अपना वक्तव्य देना निर्धारित किया गया था। नरेन्द्र नियमित रूप से प्रतिदिन सत्येन्द्र और कन्हाई लाल के पास मिलने के लिए आता था। 31 अगस्त 1908 के दिन भी वह अपने समय पर उनके पास आया। तभी सत्येन्द्र ने अपने सिरहाने रखी पिस्तौल से नरेन्द्र पर वार किया गोली उसके पैर में लगी किन्तु वह उससे गिरा नही। सत्येन्द्र ने तभी दूसरी गोली चलाई तब तक नरेन्द्र भागने लगा था। सत्येन्द्र और कन्हाई दोनों ने उसके निकट पहुँचकर उसे गोलियों से छलनी कर दिया। कन्हाई को 10 नवम्बर 1908 को फांसी देने का दिन तय किया गया। क्रांतिकारी कन्हाई की कथा पर नाट्यप्रस्तुति की तैयारी करते समय इस चुगलखोर कन्हैया की आदतें परिवर्त्तनशील हो सकीं। अपनी अक्षम्य गलतियों के लिए आप सभी से क्षमा याचना करता हूँ।"

Wednesday, 25 August 2021

जंग

     अनेकानेक सृजक जुगनुओं को तैयार कर चुके वरिष्ठ साहित्यकार की अचानक अन्तिम यात्रा शुरू हो गयी...। साहित्य जगत अनहद तम घिर जाने की कल्पना से भयभीत हो उठा। सन्ध्या में सूर्यास्त एक पक्षीय दृष्टिकोण है। मोक्ष जीवन सन्ध्या का सत्य सदैव स्वीकार नहीं हो पाता है। श्रद्धांजली-शब्दांजली का दौर शुरू हो गया। एक संस्था ने श्रद्धांजली सभा एक अन्य के जयंती सभा के संग रखी। पुष्पांजली के लिए तस्वीर और बैनर केवल जयंती वाले का रहा। एक अन्य गोष्ठी में किसी ने कहा, -"मैं उनसे लगभग चालीस-पैतालीस सालों से जुड़ा हुआ था। अपने सारे दुःख उनसे साझा करता था और उसका निदान पा भी लेता था।" ये वो महाशय थे जो गुरू के नाम को कैश करते रहे... । अन्तर होता है अपने दुःख साझा कर लेना और सामने वाले के दुःख को समझ लेना.. । हमारी साँसों तक सूर्य का अस्त होना सम्भव नहीं होगा ख़ुद से वादा तो कर लें... । मैं से मैं
"गुरु जी ! क्या आप अपना निवास स्थान बदल रहे हैं ?
"निवास स्थान बदल नहीं रहा हूँ स्थायी रूप से अब यह शहर ही छोड़ कर जा रहा हूँ..!"
"उस बच्ची का क्या होगा जिसे आप निःशुल्क शिक्षा दे रहे हैं ?"
"वो बच्ची प्रतियोगिता जीत कर पुलिस बन गयी और दूसरे शहर में नियुक्त हो गयी..!"
"किलकारी के बच्चों-बच्चियों का साहित्यिक भविष्य अंधकारमय दिखलाई पड़ रहा है मुझे..,"
"उनकी मुझे बिलकुल चिन्ता नहीं, क्योंकि मेरा योग्य शागिर्द वादा किया है कि उनका साहित्यिक लेखन निर्बाध्य रूप से प्रगति करता रहे इसकी जिम्मेदारी निभाएगा।
"आप कई संस्थाओं के अध्यक्ष-अभिभावक हैं उनका तो निश्चिंत बेड़ा गर्क हो जाएगा !"
"उन संस्थाओं में अध्यक्ष से ज्यादा मजबूत कन्धे और इरादों वाले सदस्य और सचिव हैं... सैलाब नहीं आने देंगे.."
यूँ तो गुरु जी प्रत्येक पर्व-त्योहार में अपने बच्चों के पास चले जाते थे। फोन पर बात करते समय उनके आस-पास वो शान्ति समझ में नहीं आती थी जिनकी वे चाहत प्रकट करते थे।
 गुरु जी अक्सर कहा करते थे कि उनका जी अब केवल लिखने-पढ़ने में लगता है। बगल में रेडियो बजता रहे और कुछ टॉफियाँ पास में हो तथा बीच-बीच में चाय मिलती रहे। अब स्थायी रूप से शहर छोड़ने की बात सुनकर एकता विचलित थी। गुरु जी को रोकने का असफल प्रयास कर रही थी क्यों कि उन्होंने कहा कि अब बच्चे चाहते है कि डैडी उनके साथ रहें। आखिर आत्मज और खून का रिश्ते का पलड़ा भारी होता दिखलाई दे रहा था। अभी तक जिन्हें केवल पैसों से मतलब रहा और शिकवा कि हमारे लिए किया ही क्या है। सारी जिन्दगी तो समाज हेतु साहित्य में डूबे रहे। अब तो सेवा की जरूरत है तो
कर्मस्थली ने एक ही लेखनी को शिक्षक, लेखक, समीक्षक, प्रकाशक, सम्पादक, पथ प्रदर्शक बना डाला। लघुकथा नगर, महेन्द्रू पटना यह पता रहा एक लम्बे अर्से तक। कोई मकान नम्बर नहीं , कोई गली नम्बर नहीं, बस लघुकथा नगर। यह एक ऐसे आदमी का पता रहा है , जो लघुकथा में ही जागता, लघुकथा में ही स्वप्न देखता। ओढ़ना बिछाना लघुकथा ही रह। यह लघुकथा का वह सूत्रधार रहा , जिससे भारत भर के लघुकथाकार, समीक्षक, समर्थक, स्थापित साहित्यकार, नवोदित रचनाकार, राजनेता, पत्रकार, सभी जुड़े हुए रहे। आजीवन लेखन का जज़्बा एक ही रफ्तार से कायम रहा। जन्मस्थली देश बँटवारा के कारण छूट गया और कर्मस्थली उम्र ढ़लने के बाद अस्वस्थ्यता के कारण। हजारों लेखक उनका सानिध्य चाहते थे। लेकिन सात बेटियों के संग पला इकलौता बेटा अपने पिता से आजीवन विरक्त रहा। कर्मस्थली पर कभी नहीं ही दिखलाई दिया। कर्मस्थली छोड़ने के बाद मात्र आठ महीने के जीवन काल में यानि बरगद के ध्वस्त होते समय भी झलक पाने नहीं आया। पिता को प्रतिपल अपने पुत्र की प्रतीक्षा रह गयी। नाती मुखाग्नि दिया..। बेटियाँ सेवा से लेकर श्राद्धकर्म की तैयारी कीं। धीरे-धीरे पुत्र की अभिलाषा खत्म हो जाएगी।
यूँ तो वर्षों से अपने पुत्र और पोते को हर बात में याद करते थे लेकिन जबसे रामरतन बीमार पड़े तबसे नाती और बेटी से बार-बार फोन कर बुलाने के लिए कहते। बेटी फोन करती लेकिन उसका फोन कोई उठाता ही नहीं। रटते-रटते रामरतन अन्तिम यात्रा पर निकल गए। सात बहनों का इकलौता भाई ना तो बहनों के गले लग दिलासा देने आया और ना अन्धी माँ का सहारा देने आया। जब बेटा ही नहीं आया तो बुआ-चाचा-मामा क्या आते..! एक दूसरे को दिलासा देती बहनें खुद को ज्यादा समझाती, –"चार दिन बाद उसकी बेटी की शादी है भला कैसे आ पाता..!"
–"हाँ! तुम ठीक कह रही हो। लड़की की शादी दस तरह का डर लगा रहता है।"
–"दिन बढ़ाने पर कहीं लड़के वाले किसी तरह का बहाना बनाकर इन्कार कर देते तो...,"
–"मरनी पर सात पुश्तों को हड्डी का छूत लगता है दीदी..! भला लड़के वाले ऐसे घर में पानी कैसे पीने आयेंगे?" घर की सहायिका से बर्दाश्त नहीं हो सका तो वह उबल ही पड़ी।
–"तुमको इससे क्या लेना-देना? तुम अपने काम से मतलब रखो। घर के मामले में मत बोलो। तुम क्या जानों समय बदल गया है। अब ऐसी रूढ़ि परम्परा की बातों को आधुनिक लोग नहीं मानते हैं..! " कई बहनें एक साथ बोल पड़ीं।
–सच में मुझे क्या मतलब दीदी। लेकिन कह देते हैं कहीं आगे पछताना ना पड़े। अभी कहीं यह बात लड़के वालों से छुपा लिया हो। समाज कितना भी आधुनिक हो जाये। मरनी में पूजा-पाठ नहीं होता तो शादी-ब्याह... तौबा-तौबा...!"

Tuesday, 24 August 2021

उऋण

"कन्यादान कौन करेगा..?" नेहा और नितिन की शादी के समय पण्डित जी ने कहा। दोनों की शादी मन्दिर में हो रही थी..।

"आप अनुमति दें तो मेरा दोस्त दीपेन कन्यादान करना चाहता है और वह अपनी पत्नी के साथ यहाँ उपस्थित भी है..। सामने आ जाओ दीपेन..," वर नितिन ने कहा। 

सबके सामने दीपेन के आते ही उपस्थित लोगों में खलबली मच गयी। दबे आवाज में कानाफूसी शुरू हो गयी तथा वधू नेहा और उसकी माँ भौंचक दिख रहे थे। क्योंकि दीपेन और नेहा एक दूसरे के जेरोक्स कॉपी लग रहे थे।

"यह तुम्हारा ही अंश है देवकी... जो हमें तुम्हारे सेरोगेट मदर के रूप से दान में मिल गया था..," दीपेन की माँ यशोदा ने कहा।


स्वसा के आँसू

मौली को गीला करे

श्रावणी पूनो


पहला तारा

कौन जलाने उठे

 साझे का चूल्हा!

Friday, 20 August 2021

स्वाश्रय का सुख

 


"इस साल भी मामा दादा की कलाई सूनी रह जायेगी दादी माँ..! पिछले साल नहीं भेज पाने का कारण समझ रहा था, लेकिन इस साल भी...?" पोता सुयश ने पूछ लिया।

"राखी से भाईयों की कलाई कब से सजने लगी होगी क्या तुम मुझे इसका इतिहास बता सकते हो ?" दादी ने कहा।

"जी अवश्य! मार्च 1534 में गुजरात के शासक बहादुर शाह ने चितौड़ के नाराज सामंतो के कहने पर चित्तौड़ के शासक महाराणा विक्रमादित्य को कमजोर समझकर उनके राज्‍य पर आक्रमण कर दिया था। राजमाता कर्णावती को जब यह पता चला तो वे चिंतित हो गईं। उन्‍हें पता था कि उनके राज्‍य की रक्षा केवल हूमायूं कर सकता है। इसलिए मेवाड़ की लाज बचाने के लिए उन्होने मुगल साम्राट हुमायूं को राखी भेजी और सहायाता मांगी।

राज्य पर संकट मुसीबत से निपटने के लिए कर्णावती ने सेठ पद्मशाह के हाथों हुमायूं को राखी भेजी थी। राखी के साथ कर्णावती ने एक संदेश भी भेजा था। उन्‍होंने सहायता का अनुरोध करते कहा था कि मैं आपको भाई मानकर ये राखी भेज रही हूँ।..,"

"हुन्ह्ह्! मेवाड़ की लाज बचाने के लिए...। आज चार सौ सत्तासी साल के बाद भी कन्याओं की लाज बचाने की गुहार जारी है..।" सुयश की बात पूरी होने के पहले ही दादी ने कहा।

"इससे और आपके राखी नहीं भेजने में क्या सम्बंध है दादी माँ?" सुयश ने कहा

"उन्हें मैं अपनी जिम्मेदारियों से मुक्त करने का संदेश भेज रही हूँ!मेरी माँ अपने भाई को राखी कभी नहीं बाँधा। पण्डित जी से राखी लेकर अपने सिंहोरा में लपेट दिया करती थीं। सुयश तुम मेरा साथ देना ...!"

"जी अवश्य दादी माँ!" सुयश ने कहा

"जब तक हुमायूं अपनी सेना लेकर मेवाड़ पहुँचे, रानी कर्णावती का जौहर हो चुका था। आज तक कन्याओं का गुहार लगाना जारी है। इस साल से मैं भी भैया को राखी नहीं बाँधूगी...!" पोती सुमन का दृढ़ निश्चयी स्वर गूँजा।

"स्त्रियों को वल्लरी बनने के नसीब को बदलकर बरगद बनना तय करना होगा...।" पोता-पोती को अपने बाँहों में समेटते हुए दादी ने कहा।



Tuesday, 17 August 2021

"सुरक्षा कवच"

"तुम मेरे पैंट के पॉकेट से रुपया निकाली हो क्या?" श्यामलाल ने अपनी पत्नी रुक्मिणी से पूछा।

"नहीं तो ! क्यों कितना निकला हुआ है?" रुक्मणी ने सवाल किया ।
"कुछ खुदरा निकला हुआ है। और ऐसा पहली बार नहीं हुआ है।" श्यामलाल ने कहा।
"मैंने मना किया था कि बच्चों का नामांकन अंग्रेजी स्कूल में नहीं करवाइए...। उड़ती-उड़ती कई खबरें फैली हुई हैं।" रुक्मणी ने कहा।
"मैकोले का स्पष्ट कहना था कि भारत को हमेशा-हमेशा के लिए अगर गुलाम बनाना है तो सांस्कृतिक शिक्षा व्यवस्था को पूरी तरह से ध्वस्त करना होगा और मैकोले का प्रसिद्ध मुहावरा बना, कि 'जैसे किसी खेत में कोई फसल लगाने के पहले पूरी तरह जोत दिया जाता है वैसे ही इसे जोतना होगा और अंग्रेजी शिक्षा व्यवस्था लानी होगी..।" रुक्मणी ने पुनः कहा।
शाम में जब श्यामलाल अपने दोनों बच्चे जो नौंवी और दसवीं के विद्यार्थी थे को पढ़ाने बैठे तो गाँधी जी का बीड़ी पीने की लत के कारण नौकर की जेब में पड़े दो-चार पैसों में से एकाध पैसा चुरा लेने की आदत और उस लत और आदत के कारण आत्महत्या करने का फैसला करने। पर आत्महत्या कैसे करें? अगर तुरन्त ही मृत्यु न हुई तो क्या होगा? मरने से लाभ क्या? क्यों न ये सब सह ही लिया जाए? ऐसे उलझनों में फँस कर फिर बीड़ी पीना छोड़ देना। यानि नौकर के पैसे चुराकर बीड़ी खरीदने और फूंकने की आदत भूल गए वाले प्रसंग को पढ़ने के लिए कहा।
रात्रि भोजन के बाद श्यामलाल जब सोने गए उन्हें अपने बिस्तर पर एक चिट्ठी मिली..,
पूज्य पिता जी
मैं बेहद शर्मिन्दा हूँ। आज आपको मेरी वजह से लज्जित होना पड़ा। आगे प्रयास करूँगा कि ऐसा मौका दोबारा ना आये। आप आम का वृक्ष लगा रहे हैं , आपको बबूल का काँटा ना मिले। भविष्य में शायद गर्व करने लायक पुत्र बन सकूँ। तब आप मुझे क्षमा कर देंगे न?
              
                                                 आपका अपराधी

उन्होंने चिट्ठी पढ़ी। आँखों से निकली धारा से चिट्ठी भीग गई। उन्होंने क्षणभर के लिए आँखें मूंदी, चिट्ठी फाड़ डाली और देर रात बच्चों के सर को सहलाकर अपने कमरे में आकर चैन से सो गए। अब वे बच्चों के प्रति आश्वस्त लग रहे थे।

'अन्त भला तो...'

"नमस्ते आँटी जी!"

मैं बुटीक में अपने कपड़े पसन्द कर रही थी कि लगा किसी ने मुझे ही सम्बोधित किया है। आवाज की दिशा में देखा तो एक प्यारी सी युवती मुझे देखकर दोनों हाथ जोड़कर मुस्कुरा रही थी। लेकिन उसकी मुस्कान और आँखें निश्चेत लगीं।

"खुश रहो सुमन! कैसी हो और क्या कर रही हो आजकल?" मैंने पूछा।

"ठीक हूँ आँटी जी। अभी कुछ नहीं कर रही हूँ।" सुमन ने कहा। उसकी आँखें नम हो रही थीं।

"अब अपने माता पिता को रजामंदी दे दो कि वे तुम्हारी शादी कर दें।"

".....!" सुमन की चुप्पी 'कोई रहस्य है' उगल रही थी।

"आपके सिखाये कटाई और सिलाई और बैंक से आपके ही मदद से मिल गए कर्ज से सुमन ने अपना दूकान खोल ली थी...।"

कुछ वर्ष पहले मैं मुफ्त में कढ़ाई, सिलाई , स्टोन से ज्वेलरी बनाना सिखाया करती थी। उसी दौरान अपने कुछ सहेलियों के संग सुमन मेरे पास सीखने आया करती थी... ।

अचानक एक दिन वह मुझसे बोली कि "आँटी जी! मेरी शादी तय हो गयी है। कल से मैं नहीं आऊँगी।"

"शादी! तुम्हारी शादी.. अभी तो तुम सातवीं में पढ़ रही हो। कोई कैसे कर सकता है तुम्हारी शादी? 18 साल से कम उम्र की कन्या की शादी करना गलत है। सबको सज़ा हो जाएगी।"

"आँटी जी! इस राज्य में शराब बन्दी है..। मेरे गाँव में चलकर देखिए हर दूसरे घर में शराब बनता है।" सुमन ने कहा।

दूसरे दिन सुमन नहीं आयी। मैं उसकी सहेली के संग उसके घर जाकर उसके माता-पिता को समझाने की कोशिश की तो पता चला कि उसके दादा अपनी पोती की शादी करना चाहते हैं ।

मैं दादा को समझाने का प्रयास की कि "कच्ची उम्र में विवाह के कारण लड़कियों को हिंसा, दुर्व्यवहार और उत्पीड़न का अधिक सामना करना पड़ता है। लड़के और लड़कियों दोनों पर शारीरिक, बौद्धिक, मनोवैज्ञानिक और भावनात्मक प्रभाव पड़ता है...।

 वैदिक काल में बाल विवाह का कोई संकेत नहीं मिलता हैं... मध्यकाल के आते-आते जब भारत बाहरी आक्रमणों को झेल रहा था तब बेटियों को विदेशी शासक भोग की वस्तु समझकर अपहरण कर ले जाते तथा उनके साथ सम्बन्ध बना लेते थे... इसी दौर में रोटी-बेटी की कुप्रथा का प्रचलन हो गया..। छोटी उम्र में विवाह हो जाने के कारण दहेज भी कम देना पड़ता था... , आपके साथ तो ऐसी कोई समस्या नहीं। मेरी बात नहीं मानेंगे तो मैं केस दर्ज कर गवाह बनूँगी...।" उस समय शादी टल गयी... ।

"पिछले साल सुमन की शादी हुई और शादी के कुछ दिनों के बाद ही विधवा हो गयी। ससुराल से अपशगुनी बना बेदखल कर दी गयी..," सुमन की सहेली बता रही थी।

   मैं अमेरिका छः महीने के लिए गयी थी लेकिन वैश्विक युद्ध के कारण पटना वापिस आने में पन्द्रह महीने गुजर गए ...। यहाँ मेरी जिम्मेदारी प्रतीक्षा कर रही थी। मैं सुमन के साथ उसके घर गयी उसके माता-पिता से मिलने। इस बार दादा की जगह पिता अड़ियल लग रहे थे। मैं उनको समझाने का प्रयास किया कि, "विद्यासागर को ग़रीब और आम विधवाओं की व्यथाओं ने प्रभावित किया और उन्होंने इस कुरीति के खिलाफ़ जंग छेड़ दी। इसके लिए उन्होंने संस्कृत कॉलेज के अपने दफ़्तर में न जाने कितने दिन-रात बिना सोये निकाले ताकि वे शास्त्रों में विधवा-विवाह के समर्थन में कुछ ढूंढ सके।

आख़िरकार उन्हें ‘पराशर संहिता’ में वह तर्क मिला जो कहता था कि ‘विधवा-विवाह धर्मवैधानिक है’! इसी तर्क के आधार पर उन्होंने हिन्दू विधवा-पुनर्विवाह एक्ट की नींव रखी। 19 जुलाई 1856 को यह कानून पास हुआ और 7 दिसंबर 1856 को देश का पहला कानूनन और विधिवत विधवा-विवाह हुआ। कहा जाता है कि जिन भी विधवा लड़कियों की शादी वे करवाते थे, फेरों की साड़ी भी वही उपहार स्वरुप देते थे।

बताया जाता है कि शांतिपुर के साड़ी बुनकरों ने विद्यासागर के प्रति अपना सम्मान व्यक्त करने के लिए साड़ियों पर बंगाली में कविता बुनना शुरू किया था,

“बेचे थाको विद्यासागर चिरजीबी होए”

(जीते रहो विद्यासागर, चिरंजीवी हो! )

भले ही, इतिहास इस विधवा-पुनर्विवाह पर मौन रहा लेकिन यह शादी पूरे भारत की महिलाओं के उत्थान के लिए एक क्रांतिकारी कदम था। उन क्रांतिकारी कदम के पदचिन्हों पर आप अपने कदम बढ़ाएं और सुमन की पुर्नविवाह करने का प्रयास करें...।"

"सुमन के किस्मत में विवाह का सुख लिखा होता तो यह विधवा ही नहीं होती...," सुमन के माता-पिता एक ही बात तोता की तरह रट रहे थे...।

मैं भी ठान ली कि सुमन को मुरझाने नहीं देना है...और मैं भी लगातार तरह-तरह की दलीलें देती रही और किरण फूटने के साथ सुमन के पुर्नविवाह का निर्णय नया उजाला फैला गया।

पत्थर भले आखरी चोट से टूटता है... परन्तु पहली चोट कभी व्यर्थ नहीं जाती है...।

Friday, 6 August 2021

सहभागिता

विद्यालय से लौटी बिटिया को सजाने-सँवारने के लिए हरी चूड़ी, हरा रिबन, हरी बिन्दी, हरा फ्रॉक लेकर बैठी लक्ष्मी बार-बार अपनी मुनिया को पुकार रही थी। मुनिया होमवर्क करने में उलझी हुई बार-बार, "आई माँ! आई माँ!" कहती हुई आखिर में आ गयी। 

"यह समान कहाँ से आया माँ?" मुनिया ने कहा।

"आज मुझे मजदूरी ज्यादा देर की मिली मुनिया।" माँ लक्ष्मी ने कहा।

"मेरे पास किताब नहीं होने की वजह से मुझे कक्षा के बाहर धूप-बारिश में खड़ा रहना पड़ा माँ..! सियार के बियाह का आनन्द ली..!"

"आज के बाद कक्षा में केवल पढ़ाई करना मुनिया। ले मैं तेरा किताब लेकर आया हूँ।" मुनिया का पिता ने कहा।

Wednesday, 4 August 2021

बिना_वर्दी_का_योद्धा

"मुझे नहीं पता था कि मेरे घर में भी विभीषण पैदा हो गया है..," सलाखों के पीछे से गुर्राता हुआ पिता अपने बेटे का गर्दन पकड़े चिल्ला रहा था।

"बड़े निर्लज्ज पिता हो। जिस पुत्र पर गर्व होना चाहिए उसको तुम मार देना चाहते हो...," पिता के हाथों से पुत्र का गर्दन छुड़ाता हुआ पुलिसकर्मी ने कहा।

"क्या करता मैं .. आप माँ की विनती सुने नहीं उलटा उन्हें कमरे में कैद कर दिया और कांवड़ियों की टोली बनाकर जल उठाने चले गए।"

"सावन में जलाभिषेक करना हम हिन्दुओं का धर्म भी है और अधिकार भी।" पिता पुनः चिल्लाया।

"और इस वैश्विक युद्ध में समाज हित के लिए सरकार द्वारा बनाई गई नीति...? क्या सीमा पर लड़ रहे फौजी का ही दायित्व है...?" पुत्र ने कहा।

"तुम्हें और तुम्हारे साथियों को तो जो सजा होगी सो होगी..., तुम्हारे पोशाक बनाने वालों का बेड़ा गर्क हो गया।" पुलिसकर्मियों के ठहाके गूँजने लगे। □

Wednesday, 28 July 2021

प्रत्यापित अनुभव

उम्र के जिस पड़ाव (1960-2021) पर मैं हूँ और अब तक हुए समाज से भेंट के कारण , मुझे तीन पीढ़ियों को बेहद करीब से देखने का मौका मिला। तीन पीढ़ी यानि मेरी दादी की उम्र की महिलाओं में सास बहू का रिश्ता, मेरी माँ की उम्र की महिलाओं में सास बहू का रिश्ता, और मेरी उम्र की महिलाओं में सास बहू का रिश्ता..। अक्सर बिगड़ते रिश्ते और मूल्यह्रास होते सम्बन्ध का आधार बीच की कड़ी यानि माँ के पुत्र और पत्नी के पति में संतुलन ना बना पाने वाला पुरुष होता है।
बिहार हरियाणा राजस्थान जैसे राज्यों के ग्रामीण क्षेत्रों की ही बात नहीं है.. जहाँ आईएएस जैसा शिक्षित प्राणप्रिया से त्रस्त प्राणेश आत्महत्या कर लेते हों। धनाढ्य गृहों में गृहणी से भयभीत सास किसी कोने में आसरा पाने में असमर्थ हो जाती हो..। पत्नी के आत्महत्या कर लेने की धमकी से त्रसित पुत्र आँखेें चुराने में व्यस्त रह जाता हो...। आज के दौर में भी पढ़ा लिखा अशिक्षित मूढ़ अनेकानेक परिवार पाए जा रहे हैं..। हो सकता है महानगरों की तितलियाँ मेरी बातों से सहमत नहीं हों.. ।
किसी ने सच कहा है कि साहित्यकार भविष्यवक्ता होते हैं...। प्रेमचंद की *'गृहनीति'* को मैं तब पढ़ी थी जब मुझे पीढ़ी और बीच की कड़ी की समझ नहीं थी। आज भी सामयिक और सार्थक लेखन पा रही हूँ...।

क्यों केवल माँ की उलाहनों को सुनकर पुतर श्रवण कहलाये उसे पूरे ईमानदारी के साथ नायक की तरह..

बेटा -'ज़ब तुम समझने भी दो। जिस घर में घुड़कियों, गालियों और कटुताओं के सिवा और कुछ न मिले, उसे अपना घर कौन समझे ? घर तो वह है जहाँ स्नेह और प्यार मिले। कोई लड़की डोली से उतरते ही सास को
अपनी माँ नहीं समझ सकती। माँ तभी समझेगी, जब सास पहले उसके साथ माँ का-सा बर्ताव करे, बल्कि अपनी लड़की से ज्यादा प्रिय समझे।'
और
'तुम इस घर को जल्द छोड़नेवाली हो, उसे बहुत दिन रहना है। घर की हानि-लाभ की जितनी चिन्ता उसे हो सकती है, तुम्हें नहीं हो सकती।
समझदारी वाली बात का अनुकरण करना चाहिए

पत्नी के पल्लू को थामे या गले के लॉकेट में नग जड़ा मेहरमौउग/जोरू का गुलाम ना कहलाने के लिए...
पति -'नहीं-नहीं तुमने बिलकुल गलत समझा। अम्माँ के मिजाज में आज मैंने विस्मयकारी अन्तर देखा, बिलकुल अभूतपूर्व। आज वह जैसे अपनी कटुताओं पर लज्जित हो रही थीं। हाँ, प्रत्यक्ष रूप से नहीं, संकेत रूप से। अब तक वह तुमसे इसलिए नाराज रहती थीं कि तुम देर में उठती हो। अब शायद उन्हें यह चिन्ता हो रही है कि कहीं सबेरे उठने से तुम्हें ठण्ड न लग जाय। तुम्हारे लिए पानी गर्म करने को कह रही थीं !
नायक का अनुसरण करना चाहिए ...
कहानी में पढ़ा था कि किसी परिवार में सास-बहू के बीच झगड़े के कारण सदैव अशान्ति फैली रहती थी। एक बार दोनों के बीच की कड़ी का पुरुष किसी काम से दूसरे शहर जाता है और बहुत महीनों तक वापस नहीं लौटता है और ना अपनी ख़ैरियत की कोई खबर भेजता है। जब एक अचानक लौटता है और बिना कोई आहट किये घर के अन्दर की बात सुनने की कोशिश करता है तो उसे सास बहू की मधुर बातें सुनाई देती हैं और उसे लगता है कि उसकी अनुपस्थिति के कारण दोनों के बीच रिश्ते सुधर गए हैं तो वह उनलोगों से मिले बिना वापिस लौट जाता है..! यानि या तो वो सुलझाए या लोप हो जाये...!
कहने का तात्पर्य यह है कि सारी जिम्मेदारी बीच की कड़ी की है। 

कहने का तात्पर्य यह है कि सारी जिम्मेदारी बीच की कड़ी की है। सोने पर सुहागा हो जाये जो गृहधुरी स्वामिनी भार्या

स्त्री :- मुझे सास बनना ही नहीं है। लड़का अपने हाथ-पाँव का हो जाये, ब्याह करे और अपना घर सँभाले। मुझे बहू से क्या सरोकार ?'

पति -'तुम्हें यह अरमान बिलकुल नहीं है कि तुम्हारा लड़का योग्य हो,तुम्हारी बहू लक्ष्मी हो, और दोनों का जीवन सुख से कटे ? 

स्त्री -'क्या मैं माँ नहीं हूँ ?

पति -'माँ और सास में क्या कोई अन्तर है ?'

स्त्री -'उतना ही जितना जमीन और आसमान में है ! माँ प्यार करती है, सास शासन करती है। कितनी ही दयालु, सहनशील सतोगुणी स्त्री हो, सास बनते ही मानो ब्यायी हुई गाय हो जाती है। जिसे पुत्र से जितना ही

ज्यादा प्रेम है, वह बहू पर उतनी ही निर्दयता से शासन करती है। मुझे भी अपने ऊपर विश्वास नहीं है। अधिकार पाकर किसे मद नहीं हो जाता ?मैंने तय कर लिया है, सास बनूँगी ही नहीं। औरत की गुलामी सासों के बल पर कायम है। जिस दिन सासें न रहेंगी, औरत की गुलामी का अन्त हो जायगा।' विचार रखते हुए सहयोग करे...!

Friday, 16 July 2021

नियति को तैय करने दो वो तुम्हें कहाँ फिट करती है


साहित्यिक स्पंदन सितम्बर 2021 अंक धरोहर विशेषांक गुरु/बाबा आपको समर्पित करने की इच्छा बलवती हुई तो आपसे सम्बंधित संस्मरण, आलेख, आपकी लिखी रचनाओं की समीक्षा इत्यादि आमंत्रित की। आप जान लीजिये.. संस्था के मात्र दो पुरुष रचनाकारों ने श्रम किया तो हम इक्कीस महिला रचनाकारों ने प्रयास किया!

आपको याद है पाँच साल पहले जब संस्था के स्थापना दिवस के दिन केवल महिलाओं की संस्था होने की घोषणा की थी तो आपने अपने अध्यक्षीय भाषण में कहा था कि क्या सृष्टि, सृजन, परिवार, समाज या देश एक लिंग से चल सकता है । क्या आप (तब हम पूरी तरह एक दूसरे से परिचित नहीं थे। हमारी भेंट हुए छः महीने गुजरे थे) गाड़ी एक चक्के से चलाना चाहती हैं ?

तब मैंने जबाब दिया था कि, "क्या करती मैं ? मैं अभियंताओं से परिचित हूँ, मेरे पति महोदय अभियंता हैं और उन्हें हाइकु का मजाक उड़ाने में बहुत आनन्द आता है। वे हाइकु के लिए अनुवादक रखने का सलाह देते हैं तो उनके मित्र भी उनका ही साथ देते हैं। वे तो संस्था सदस्यता से दूर ही भले।"

तो आपने कहा था कि "मैं हूँ न!"

"तो ठीक है । केवल महिलाओं की संस्था नहीं होगी।" मेरे इस घोषणा के बाद गुंजन जी भी अपने को शामिल करने के लिए कहा और सदैव सहायता करने के लिए तैयार रहे। एक समय में संस्था में पुरुष साहित्यकारों की सदस्यता ज्यादा रही । लेकिन... जब भी कोई कार्यक्रम होता महिला साहित्यकारों की ही उपस्थिति ज्यादा होती । बाहर से जो अतिथि साहित्यकार आते वे महिलाओं की ही संस्था मानते। अरे मानते क्या बाहर में चर्चा करते तो महिलाओं की ही संस्था कहते। एक नन्हीं बच्ची की तरह मैं आपके पास ठुनकते हुए शिकायत लेकर पहुँच जाती। आप हँसते हुए कहते "हवा में की गई बातों का पीछा नहीं करते..! जिस संस्था का मैं अभिभावक हूँ वह संस्था केवल महिलाओं की कैसे हो जाएगी? और विश्वास रखो जो जो मुझसे-तुमसे स्नेह रखते हैं , मुझपर-तुमपर विश्वास करते हैं एक दो भी जरूर होंगे जो समय पर तुम्हारे आजूबाजू खड़े मिलेंगे! तुम्हारे धैर्य का मैं सदैव कायल होता हूँ, मेरे सामने भी कमजोर मत पड़ा करो.. !"

आपसे जब भी फोन पर बात होती, हैल्लो कहने और प्रणाम आशीर्वाद के बाद आप मेरा हाल बाद में पूछते पहले संस्था के सभी पुरुष सदस्यों का हाल-चाल पूछते, अभिलाष, रवि, नसीम, राजेन्द्र, संजय सब कैसे हैं ? सब स्वस्थ है न? सबका सृजन खूब फले। तब महिलाओं की जानकारी लेते , अन्त में मेरी बारी आती। वैसे सारा सस्नेहाशीष मेरे हिस्से में ही आता। आप बाखूबी जानते थे, माँ को खुश करने के लिए उसके बच्चों को ज्यादा प्यार दुलार करना पड़ता है। आपकी बहन आपकी सदैव ऋणी है। मेरे इतना कहने पर , भाई बहन में ऋण नहीं चलता आपका कहना, हिसाब बराबर नहीं करता...

Tuesday, 13 July 2021

वीरमणि हेतु प्रतिकार

 "लगता है मेरे दिमाग का नस फट जाएगा। जब मुझसे पलटवार करना कठिन हो जाता है तो मेरी स्थिति ऐसी ही हो जाती है।"

"अरे ऐसा क्या हो गया जो तू इतने तनाव में है ! किसी ने कुछ कह दिया क्या। मुझे बताओ कि क्या बात हो गयी ?"

"आज दूसरी बार हमें कहा गया कि हमारे गुरु/अभिभावक/बाबा पंजाब के जड़ थे। वट बिहार को मिल गया।"

"इसमें गलत क्या कहा गया है ? सच्चाई को स्वीकार कर लेना सीख लें।"

"क्या हम इन्सानों के हाथ में कुछ हो पाता है..? सबकुछ वक्त और नियति तय करते हैं..। कहने वाले अपने को बहुत ऊँची चीज साबित करना चाह रहे हैं। यदि हम यह कहें कि उनका नसीब बिहार ले लाया। उस दौरान सभी बातों का सूक्ष्म निरीक्षण किया जाए तो सत्य विध्वंस दिखलायी देगा।"

 "अरे छोड़ो न ! जिसका दाना-पानी जहाँ का लिखा होता है..।"

गुरु/बाबा/अभिभावक का महाप्रयाण हुए तेरह दिन गुजर चुके थे। बेटे-बेटियाँ, शिष्य सभी पितृ-शोक से उबरने के लिए प्रयासरत थे। दो सत्र में शब्दांजली-कार्यक्रम रखा गया था। स्थानीय सशरीर उपस्थिति देने वाले थे तो अस्थानीय गूगल मिट से वर्चुअल। सभी अपने-अपने संस्मरण के संग उनकी ही लिखी रचनाओं का पाठकर श्रद्धांजली दे रहे थे। एक विभा ही थी जो दोनों सत्र में अपनी उपस्थिति निर्धारित की हुई थी। दोनों कार्यक्रमों में और रोती बेटियों को एक ही बात समझाने का प्रयास कर रही थी कि "बाबा/गुरु/अभिभावक कहीं नहीं गए हैं बाहर वालों समझों कि वे बिहार में हैं और बिहार वाले समझें कि वे दिल्ली में हैं। आज टेक्नोलॉजी के उन्नति होने से पल झपकते हम किसी से बात कर लेते हैं। किसी को वीडियो कॉल में देख लेते हैं। जब हमारी शादी हुई थी तो हफ्तों/महीनों एक पत्र की प्रतीक्षा में गुजर जाते थे तो चन्द शब्द पढ़ने को मिलते थे। हम उसी पुराने ज़माने को मान कर चलते हैं।

कविता, ग़ज़ल, हाइकु, तांका, कहानियाँ, उपन्यास के साथ-साथ असंख्य लघुकथाओं के संग आलेख-समीक्षाओं में हमारे सारे प्रश्नों के हल मौजूद हैं। हमारी पीढ़ी तो उसमें ही डूबते-उतराते बाबा/गुरु/अभिभावक की उपस्थिति का अनुभव करते गुजर जाएगी। हमारा अनवरत पढ़ना-लिखना चलता रहे। इसके अलावा दूसरा कोई विकल्प नहीं। हमारे बाद की पीढ़ी जो चाहेगा वह भी पा लेगा। बस! सँजोना ही तो है।"

"आप भुलावे में हैं। आपलोगों के गुरु/बाबा सशरीर जा चुके हैं। आपलोग अब अपने लिखे पर उनसे सुझाव नहीं मांग सकते! उनसे कहा नहीं जा सकता कि आप हमारी त्रुटि बता दें। बाऊ जी जब तक थे आपलोगों ने श्रम कम किया।" बाबा/गुरु के पुत्तर जी ने कहा।

"थोड़ी देर पहले आपने ही कहा था, आपके विचार और बाऊ जी के विचार में बहुत समानता है।  लत्तर/बेल सी हम बेटियाँ हमें चिन्ता नहीं । उनकी पगड़ी आपके सिर पर.. ! मैं तो यही कह रही थी कि,"बाबा/गुरु कहीं गए नहीं हैं ! उनकी उपस्थिति को महसूस करना है।"


Monday, 12 July 2021

ज्ञान

 लाहौर में जन्मस्थली और पटना में कर्मस्थली बनाये हमारे गुरु/अभिभावक में अनुकरणीय बहुत से गुण हैं... –'जंग जीतने का जज़्बा, –'सब ईश की कृपा मान सहज स्वीकार कर लेना, –'लगातार पढ़ना और लिखना, 【और हाँ! लेखन कार्य करते समय रेडियो से गाने सुनना और टॉफी खाना, (एक बात बताऊँ टॉफी खाते हुए निश्छल शिशु लगते.. वैसी ही सरल मुस्कान चेहरे पर होती है)】, –'समय का पाबन्द होना –'महिलाओं का मन से आदर करना। रक्त से बने जो जिस सम्बन्ध में आती महिला उनको वो आदर मिलना स्वाभाविक है लेकिन रक्त से परे समाज में मिली जिन महिला से जो सम्बन्ध उनके दिल ने स्वीकार किया उसे उस रूप में ही वे स्वीकार करते हैं यानि जिसे शिष्या कहा तो सदैव शिष्या रही, जिसे बिटिया कहा वो एक पिता का प्यार ही पाया.. जिसे बहन कहा उसे कभी गलती से भी दोस्त नहीं कहा हालांकि बहन सच्ची मित्रता निभाई..., जिस महिला को दोस्त कहा , किसी भी दबाव में उसे बहन नहीं कहा।

पुरुषों की गलत बात पर तो थपड़ियाने-धकियाने में सोचते नहीं हैं । लेकिन किसी महिला से नाराज होते नहीं देखा गया। सबसे मज़ेदार बात तब होती है जब भाभी जी (गुरु जी की पत्नी) नाराज़ होती हैं और गुस्से में बोलना शुरू करती तो गुरु जी अपने शर्ट का किनारा पकड़कर फैला लेते हैं जैसे कुछ मांग रहे हों। भाभी जी अकेले बोलते-बोलते जब थक कर चुप हो जाती हैं तो शर्ट को झाड़कर हाथ झाड़ते हुए खिलखिलाने लगते हैं और भाभी जी गुस्सा तो दूर हो ही चुका था। माहौल ऐसा हो जाता है जैसे कुछ देर पहले कोई बात ही नहीं हुई हो गुस्सा दिलाने वाली।

एक बार मैं पूछी थी कि," आप इतनी देर चुप कैसे रह लेते हैं और शर्ट फैलाने का अर्थ क्या है ?"

"अगर मैं चुप नहीं रहूँ तो बहस में बात बिगड़ती जाएगी और रिश्ते में कड़वाहट के सिवा कुछ नहीं बचेगा। मेरी किसी गलती से उसे नाराज होने का पूरा हक है और वो किससे कहेगी..! और वो जो गुस्से में कहती है उसे मैं फैलाये अपने शर्ट में बटोरता जाता हूँ । जो समझने योग्य बात होती है उसे आत्मसात करता जाता हूँ और उस गलती को दोबारा नहीं दोहराने का प्रयास करता हूँ और जो अनर्थक विलाप होता है उसे झाड़ देता हूँ।

मुझे नए-नए सबक मिलते रहे...

Friday, 9 July 2021

दीर्घकालव्यापी को नमन

 लगता है प्रलय करीब ही है?" कल्पना ने कहा।

"तुम्हें कैसे आभास हो रहा है?" विभा ने कहा।

"जिधर देखो उधर ही हाहाकार मचा हुआ है, साहित्य जगत हो, चिकित्सा जगत, फ़िल्म जगत..," कल्पना ने कहा।

"तुम यूसुफ खान साहब के बारे में बात कर रही हो न? वे तो बेहद शारीरिक कष्ट में थे।" विभा ने पूछा।

"लोग सवाल कर रहे उन्हें दफनाया जाएगा कि जलाया जाएगा?"

"कुछ देर की प्रतीक्षा नहीं होती न लोगों से...! वक्त पर सभी सवाल हल हो जाते हैं। उपयुक्त समय पर उपयुक्त सवाल ना हो तो तमाचा खाने के लिए तैयार रहना पड़ता है।"

"आज बाबा को भी गए बारह दिन हो गए!" कल्पना ने कहा।

"कुछ लोगों को शिकायत है कि बाबा उन्हें अपने फेसबुक सूची में जोड़ने में देरी किये या जोड़े ही नहीं..! बाबा तो अपने फेसबुक टाइमलाइन पर केवल तस्वीर पोस्ट किया करते थे.. और उनका पोस्ट पब्लिक हुआ करता था...,"

"अरे हाँ! इस पर तो मेरा ध्यान ही नहीं गया। नाहक मैं उस बन्दे को समझाने चली गयी।"

"नासमझ को समझाया जा सकता है। अति समझदार से उलझ अपना समय नष्ट करना है।

प्रत्येक जीव प्रायः तीन प्रकार की तृष्णाओं से घिरा होता है, जैसे :- वित्तेषणा, पुत्रेष्णा, लोकेषणा।

वित्तेषणा, पुत्रेष्णा की बात छोड़ो ...लोकेषणा का अर्थ होता है प्रसिद्धि। जब मनुष्य के पार पर्याप्त धन-संपदा आ जाती है और उसे कुछ भी पाना शेष नहीं होता है साथ ही पुत्र-पौत्र से भी घर आनंदित होता है तब उसे तीसरे प्रकार की तृष्णा अर्थात लोकेषणा से ग्रसित होने की इच्छा जगती है। जब धन संपदा और पुत्र पौत्र से घर संपन्न हो जाता है तब उसे प्रसिद्धि की इच्छा होने लगती है कि कैसे भी हो लोग उसे जाने। इसके लिए वह अनेक प्रकार के यत्न करता है क़ि कैसे भी हो उसका समाज में मान सम्मान बढ़े। फिर वह किसी के थोड़े से सम्मान से भी गर्व का अनुभव करता है और कोई ज़रा से कुछ गलत बोल दे तो अपना घोर अपमान समझता है। और जिन्हें किसी से बिना मतलब शिकायत होती है न वे लोकेषणा से ग्रसित होते हैं..!"


चित्त का छूट जाना

 

आँखों की नमी

या चश्मे पर धुन्ध !

रौप्य जयंती

लघुकथा के कार्यशाला में कॉपी का निरीक्षण करते हुए कथा पर शंका जाहिर किया तो लेखक झट से कह गया, –"यह सत्य घटना है मेरे सामने घटी है,"

"तो लेखन पूराकर अखबार के कार्यालय में भेज देते, इसमें तुम्हारी मेहनत कहाँ है ? सत्य एक का होता है। थोड़ी कल्पना का सहारा लेकर..."

""चलो मान लेते हैं आपकी बात 'सत्य मत लिखो'... सत्य कथा अखबार के लिए होती है..., 'यथार्थ' सबकी बात लिखेंगे...,"

"बहुत बढ़िया ! तुम्हारा श्रम तुम्हें बहुत आगे एक ऊँचाई पर लेकर जाएगा।"

"क्या करेंगे ऐसी ऊँचाई का ! जिसमें खुद के अनुभव के भावाभिव्यक्ति की गुंजाइश नहीं। मानो बरगद के नीचे घोलघेरे में जलहीन।"

"कहने की क्या चाहत है ?"

"गुटबन्दी के शिकार होने का अनुभव एकल का सत्य होता है..,"


Thursday, 1 July 2021

"प्रतिशोध"

"उठो और देखो इतनी भोर में कौन आ गया?" दरवाजे पर पड़ रहे थपथपाने की आवाज से जगी माँ ने गिन्नी से कहा।

दरवाजे में जंजीर को फँसाये हुए ही खोलते हुए गिन्नी ने पूछा , "कौन हैं?"

दरवाजे पर खड़े व्यक्ति को देखकर तेजी से दरवाजा खोलते तेज आवाज में रो पड़ी गिन्नी । गिन्नी को पकड़कर घर के अन्दर आते हुए गिन्नी की माँ पर नज़र पड़ी जो दरवाजे के करीब आ चुकी थीं और पुनः -पुनः पूछ रही थीं, "कौन आया है गिन्नी, तुम क्यों रो रही हो?"

"मैं हूँ..!" उसके स्पर्श से माँ लड़खड़ा गयी और मेज को थामते हुए स्पर्श करते हाथ को बड़ी तेजी से झटक दिया, "अब क्या लेने आये हो?"

"पिता के अनन्त यात्रा में सहयोग करने और तुम्हें अम्मा!"

”तुम्हारे पिता तुम्हें देखने, तुम्हारी आवाज को सुनने का तरसते हुए चले गए। तुम फोन नहीं उठाते थे। इतने सालों में हम कहाँ रहें, कैसे रहे, यह जानना तो बहुत दूर की बात रही।"

”मेरे पिता मुझे मिले प्राकृतिक रूप में तब तक अपनाने के लिए तैयार नहीं हुए थे जब तक मैं समाज में जंग लड़ रहा था..। जीत के बाद विजय-तिलक लगाने पहुँचना भी क्या पहुँचना? मुझे पालने वाली किन्नर माँ मुझे भी किन्नर कार्यक्रम में शामिल रखती तो?"

निरुत्तर माँ आगुन्तक को अँकवार में भर ली।

Monday, 21 June 2021

चिन्तन

 

पता नहीं

पारस लोहा को सोना बनाता


 कि नहीं बनाता, लेकिन 

कभी किसी को 

कोई ऐसा मिल जाता है

जिसके सम्पर्क में 

आने से बदलाव हो जाता है

बस कोई सन्त किसी डाकू से पूछे

'मैं ठहर गया तुम कब ठहरोगे?'

नरपिशाच के काल में

वैसे सन्त और वैसे डाकू

कहाँ से ढूँढ़कर लाओगे..!

Wednesday, 16 June 2021

"आपदा का अवसर"

 

जब बहुत तेज चिल्लाने की इच्छा होती है

कल्पना लोक में शुतुरमुर्ग हो जाती हूँ

कबीर की बातें, 'भाँति-भाँति के लोग..'

आज के काल में चरितार्थ हो गयी

एक दलाल से भेंट हो गयी..

अनन्त यात्रा के यात्री से

चिकित्सीय सुविधा दिलवाने के बदले

पैसों की मांग रखना, गिद्ध भी शर्माते होंगे

बेहद कटु लिखना चाहती हूँ पर

शब्दों पर भरोसा नहीं होता कि किसे आहत करेगा या किसे आनन्दित

तो क्या करें...

"दीदी! क्या आप डैडी की बीमारी का पोस्ट फेसबुक के किसी समूह में बनाई हैं , जिसमें सम्पर्क सूत्र में मेरा फोन नम्बर दी हैं ?"

"हाँ! कई.. व्हाट्सएप्प समूह और अनेक समाजसेवी को निजी तौर पर भी.. तुम डैडी के पास हो... क्यों क्या हुआ?"

"फेसबुक समूह से किसी का फोन आया। विस्तार से जानकारी लेने के बाद उनसे एक अन्य का फोन नम्बर मिला बात करने के लिए... जब मैं उनको फोन की तो उन्होंने मुझे दलाल को पैसा देने का इंतज़ाम करने के लिए कहा है...।"

 "तुम क्यों नहीं बोली जिसके पास दलाल को देने के लिए पैसा होता तो वो दिल्ली एम्स में इलाज के लिए गुहार क्यों लगाता .. वो मुम्बई नहीं चला जाता..!"

"मेरे पति बाद में बोले कि फोन को रिकॉर्ड कर लेना चाहिए था।"

"उससे क्या हो जाता...! जो दलाल ही है तो सम्बंधित सभी के तोंद को भरे रखता होगा और वैसों के मुँह पर जाबी केवल खाते वक्त के लिए थोड़ी न होता है...।"

हाइकु लेखन पैशन होना चाहिए

लेकिन ज्ञान के लिए अध्ययन जरूरी है

01.पहली भेंट–

प्रिया भाल से आये

कॉफी की गन्ध

02. दोनों से सजे

चापड़ा की दूकान–

पहली वर्षा

Monday, 14 June 2021

चिन्तन

 भोजन के मेज, भोजन पकाने का स्लैब

गुड़-चीनी आटे-चावल के डिब्बे पर लगे

चींटियों से त्रस्त होकर

लक्ष्मण-रेखा खिंचती ,सोचती रही,

सताते हुए वक्त से शिकायत कर लूँ !

थमना होगा थमने योग्य समय

कहाँ से चुराकर लाऊँ।

संयुक्त परिवार में कई जोड़ी हाथ होते थे

कई जोड़ी कान भी होते थे

विरोध से उपजे आग को

एक अकेला मुँह ही ज्वालामुखी बनाने में

महारथ हासिल किए रहता था।

दाँत-जीभ को सहारा बनाये मुँह

मुँह का खाता रहता,

लम्बी-लम्बी हांकता रहता..।

अन्न फल से संतुष्ट कहती

मिट्टी भी हितकारी हो।

सपरिवार हम सबके लिए

हर पल मंगलकारी हो।

Saturday, 12 June 2021

तड़प

 आज मॉनसून की पहली बौछार से याद आया

मैं जिस शहर में हूँ

उसने बरगद को जड़ सहित उखाड़ फेका है।

पक्षियों को बसेरा देते-देते

नौ दल, चचान जुंडी, तेंदू , बड, पीपल, इमली, सिंदूर, माकड तेंदू, अमरबेल को शिरोधार्य करने वाला।

मनौती का धागा, चुनरी, घण्टी, ताला

अनेकानेक सहेजने वाला,

टहनियों में लटकाये भीड़ बया के नीड़ वाला।

नीड़ से ज्ञान लिया होगा रिश्तों के धागों ने उलझ जाना!

अक्षय वट के क्षरण के उत्तरदायित्व का

 स्पष्ट कारण का नहीं हो पाना।

मुक्तिप्रद तीर्थ गया में अंतिम पिंड का

प्रत्यक्षदर्शी गयावट ही है...!

Friday, 11 June 2021

वक्त

 कवि को कल्पना के पहले,

गृहणियों को थकान के बाद,

सृजक को बीच-बीच में और

मुझे कभी नहीं चाहिए..'चाय'

आज शाम में भी चकित होता सवाल गूँजा

कैसे रह लेती हो बिना चाय की चुस्की?

कुछ दिनों में समझने लगोगे जब

सुबह की चाय मिलनी भी बन्द हो जाएगी।

चेन स्मोकर सी आदत थी

एक प्याली रख ही रहे होते थे तो

दूसरी की मांग रख देते।

रविवार को केतली चढ़ी ही रहती थी।

पैरवी लगाने वाले, तथाकथित मित्रता निभाने दिखते थे..

 ओहदा पद आजीवन नहीं रहता..

Thursday, 10 June 2021

पर्यावरण

 


ज्येष्ठ माह की अमावस्या तिथि को वट सावित्री व्रत करने की परंपरा होती है... इस दिन शादीशुदा महिलाएं पति की लंबी उम्र के लिए व्रत रखती हैं और वट के पेड़ की पूजा भी करती हैं. इस व्रत का महत्व करवा चौथ जैसा ही है...

आज ज्येष्ठ की अमावस्या है..  आज के दिन वट सावित्री की पूजा में बरगद को पंखे से हवा दी जाती है.. पर्यावरण रक्षा हेतु बरगद को बचाने का मुहिम माना जाना जा सकता है ज्येष्ठ में सबसे ज्यादा गर्मी होने की वजह से मुझे ऐसा लगा

बेना की हवा

बरगद को मिले–

ज्येष्ठ की अमा

या

बेना को देख

पति का मुस्कुराना–

वट सावित्री

दिल यक़ीन करना चाहता है

सावित्री सत्यवान के प्रेम को।

किसी ने कहा स्त्रियों के हिस्से ही

क्यों आया सारे तप त्याग व्रत साधना।

धुरी-नींव को जो मजबूती चाहिए

वो स्त्रीलिंग होने के आधार में है।

वैसों के समझ में कहाँ है यह मान लेना।

दिमाग पर्यावरण बचाओ का समर्थक हो रहा

पूजा के ध्येय से तोड़ी टहनी पर

चीखने का जी करता है।

Wednesday, 9 June 2021

प्राप्त ज्ञान

अपनी शादी के बाद पापा की लिखी चिट्ठियों को पाने का सौभाग्य मिला। जन्म से शादी तक साथ ही रहना हुआ था हमारा। लगभग छः महीने मैं अपने दादा-दादी के संग रही थी जब मैं कक्षा तीन में पढ़ती थी। उस दौरान मुझे सम्बोधित करते हुए कोई पत्र आया हो यह मेरे स्मरण में नहीं है।

चिट्ठियों में कभी भोजपुरी से शुरुआत की गयी होती तो मध्य से हिन्दी में बातें लिखी होती और कभी हिन्दी से शुरुआत की गयी होती तो मध्य से भोजपुरी में बातें लिखी होती... ।

कौतूहल और बेसब्री से उनके लिखे पत्र की मैं प्रतीक्षारत रहती। उनसे ही मैंने जाना

सिखाये उषा-प्रत्युषा का संगी,

सितारें और ज्योत्स्ना का संगी,

फूलों का राजा कांटों का संगी,

जुगनू संग-साथ बाती का संगी।

सहायक होता है पुष्टिदग्धयत्न,

जिज्ञासा का है प्रतिफलातिप्रश्न।

ठान ले ना तू तिनका व गुरुघ्न

निशा में भोर का कर आवाह्न।

सुख-दुःख की कथा गुथता चल,

मन में ॐ की माला फेरता चल,

क्या तेरा-मेरा गीता बाँटता चल,

तू भी समय के साथ बहता चल।

कोढ़

कई दिनों पहले से अनेक स्थलों पर बड़े-बड़े इश्तेहार लग गए... 'नए युग को सलामी : खूँटे की नीलामी' तय तिथि और निर्धारित स्थल पर भीड़ उमड़ प...