Tuesday, 5 October 2021

पचहत्तर वीं जयन्ती के महोत्सव के अवसर पर



बदबू'

डॉ. सतीशराज पुष्करणा

"क्या बात है? ... आजकल दिखाई नहीं देते हो?"

"क्या बताऊँ यार! बहन के लिए लड़का ढूँढ़ने में ही आजकल परेशान कभी यहाँ तो कभी वहाँ। बस! दौड़-धूप में ही समय को नाप रहा हूँ।"

"भई ! लड़कों की ऐसी क्या कमी है?"

"कमी तो नहीं किन्तु सुरसा की तरह बढ़ता दान-दहेज... बस, यही चिंता खाये जा रही है।"

"अगर यह बात है तो तुम अपने को परेशानियों से आजाद ही समझो।"

"क्या!... क्या मतलब?"

"हाँ! तुम मेरे अनुज पर विचार कर सकते हो। वह पढ़ा-लिखा, सुन्दर स्वस्थ और होनहार युवक है। फिर नौकरी भी अच्छी है। तुम्हें दहेज वगैरा कुछ भी नहीं देना पड़ेगा। और हमारी दोस्ती भी रिश्ते में बदल जाएगी।"

"क्या बकते हो तुम!... अरे कभी यह तो सोचा होता... कहाँ हम उच्च जाति के और कहाँ तुम!... दोस्ती का हरगिज यह अर्थ तो नहीं कि तुम हमारी इज्जत से ही खेलने लगो।"

"तुम तो बुरा मान गए। मैं तो तुम्हारे विचारों के अनुरूप ही बात कर रहा था जिन्हें तुम अपने साहित्य के माध्यम से व्यक्त करते रहे हो।"

अचानक उसका चेहरा फक्क हो गया और जल्दी ही वह फिर सम्भल भी गया।

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समीक्षा

विभा रानी श्रीवास्तव, पटना

यार कहने कहलाने में कोई परेशानी नहीं! गहरी मित्रता तो है लेकिन रिश्तेदारी में नाक का सवाल आ जाता है..। मानवीय मूल्य और मनःस्थिति दोनों में ही मानव के व्यवहार को प्रेरित करने की क्षमता होती है। यों तो सामान्यतया मूल्य मनःस्थिति को उत्पन्न करती है। परन्तु कभी-कभी विशिष्ट परिस्थिति में मनःस्थिति मूल्य का निर्धारण करती है। जिस मानव के हृदय में ईश्वरीय गुण (ह्यूमैनीटी, वैल्यूज़) है, वो ही बड़े होने का सम्मान भी पाने लगता है। लेखक के लेखन में वो झलकता है जो

दरिया हो या पहाड़ हो टकराना चाहिए 

जब तक न साँस टूटे जिए जाना चाहिए 

~निदा फ़ाज़ली

के शेर से हमें जानने को मिला।

  समाज में फैला कोढ़ का दाग बना दहेज प्रथा, जीव-सम्पदा को नष्ट करता प्रदूषण का विषैला जहर सा जाति भेद... कर्म के आधार पर बंटा, मानव को मानव से बड़ा-छोटा के वर्ग में बाँटता और सबसे ज्यादा खतरनाक साहित्यकार का लेखन और व्यवहार में दिखलाई देता उसका दो-चित्तापन। 

       लेखक के द्वारा बूँद में सिंधु को समो दिया गया है .. प्रयोगशीलता के रूप सफल तीन-तीन मुद्दों को जो आज पूरे भुवन में सड़ान्ध फैलाये हुए है, बिना किसी भूमिका के सहारे सिर्फ कथोपकथन शैली में चुस्तदुरुस्त नपे तुले शब्दों में सांचे में ढली मूर्ति सृजन में से ना तो एक शब्द भी अलग किया जा सकता था और ना एक शब्द अतिरिक्त जोड़े जाने की गुंजाइश दिखलाई पड़ी। सुष्ठु तथा कालोचित लेखन का सटीक उदाहरण।

   –जी हाँ मैं बात कर रही हूँ डॉ. सतीशराज पुष्करणा द्वारा लिखित बदबू सटीक शीर्षक वाली लघुकथा की। जब हमारी आत्मा मर जाती है तो हमें किसी बदबू का अनुभव नहीं होता है। वरना हम एक बदबूदार काल में हिस्सेदार बन मरे पड़े नहीं होते।

 नेता भ्रष्ट, बदबूदार हैं । अभिनेता अंडरवर्ल्ड से मिलकर बदबूदार हैं। ऊँच पदाधिकारी से लेकर जो भी रिश्वतखोरी करते, बदबूदार हैं। दुकानदार मिलावट कर बदबूदार हैं। हम और आप झूठ बोलते हैं , दूसरों का हक़ मारते हैं , अनैतिक काम करते हैं -- क्या हम सभी बदबूदार नहीं  हैं? जब यह सारा काल बदबूदार है, यह समाज बदबूदार है ,  ऐसे में यदि हमको-आपको अब भी बदबू नहीं आ रही है तो क्या यह स्वाभाविक है?

   लेखक जैसा सभी को नाक मिल जाए तो बड़ी आसानी हो जाती! सबकी नज़रिया बदल जाती और हमारे आसपास की दुनिया अपने आप बदलने लगती वरना बखिया उधेड़ कर रखा जाता।

वैसे सामान्यतया मानव स्वभाव है कि वो वैसा ही व्यवहार करेगा कि लोगो की नज़रों में उसे बड़प्पन का सम्मान मिलता रहे चाहे हाथी का दाँत ही सही।

कथानक शिल्प में शीर्षक का उल्लेख ना होना और शीर्षक से लेखन को शीर्ष स्थान मिलता देखकर मैं बेहद रोमांचित हो जाती हूँ।

2 comments:

  1. बदबू आती है और धीरे धीरे सब बदबू में समा जाता है और हम शुरू हो जाते हैं खुशबू लिखना :)

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