Wednesday, 26 October 2022

दीपोत्सव : लघुकथा नाटिका


उच्च मध्यम परिवार के पात्र

सुबोध : पति/उम्र पैतालीस वर्ष

संध्या : पत्नी/उम्र बयालीस वर्ष

सुयश : पुत्र/उम्र सोलह वर्ष

सुनीता : सहायिका/उम्र पच्चीस वर्ष

समय : मध्याह्न काल 4 बजे...

स्थल : गृह की ड्योढ़ी पर बैठक

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"मैं बाजार हो आता हूँ। क्या लाना है उसकी सूची दे देना।" सुबोध ने कहा।

"आज धनतेरस है चाचा जी। एक झाड़ू लाना शुभ होगा।" सुनीता ने कहा।

"झाड़ू लाना क्यों शुभ होता होगा दीदी?" सुयश ने पूछा।

 "दीवाली की अतिरिक्त सफाई में पुराने झाड़ू खराब हो जाते होंगे तो नए लाने का विधान शुरू हुआ होगा। पुरानी पीढ़ी की मजबूरी नयी पीढ़ी की परम्परा हो जाना स्वाभाविक है।" संध्या ने कहा।

"धनतेरस पुस्तक मेला शुरू हुआ है। तुम कहो तो ऑन लाइन तुम्हारी पसंद की दो चार पुस्तक मंगवा लूँ?" सुबोध ने कहा।

"जी जरूर! मैं सोच रही थी कि बच्चों के अपनालय में एक पुस्तकालय खोल दूँ ?" संध्या ने कहा।

"उम्दा ख्याल है..! मैं अपने मित्रों और तुमलोग अपने-अपने मित्र मंडली में सबको उत्साहित किया जाएगा...!" सुबोध ने कहा।


दीपों का तुला
गुड़ियों की शादी में
माँ आँसू पोछे


Saturday, 8 October 2022

क्षिप्रिका

माता-पिता की खुशियों के उच्छल पर अंकुश लग ही नहीं रहा था। उन्हें अपनी इकलौती पुत्री के लिए मनचाहा भारतीय प्रशासनिक सेवक, घर-जमाई मिल गया था। बारात का स्वागत हो चुका था। वरमाला के बाद वर-वधू गाड़ी में बैठ चुके थे। शादी के लिए मंडप घर के छत पर बना था। लेकिन वर-बधू वाली गाड़ी घर की तरफ ना जाकर दूसरी तरफ मुड़ गयी। बेबस होकर सभी गाड़ियाँ वर-बधू वाली गाड़ी का अनुसरण करते हुए शहर से बाहर बने वृद्धाश्रम के सामने पहुँच गयीं।
वृद्धाश्रम के प्रांगण में मंडप सजा हुआ था और एक वृद्ध पीली धोती और सिल्क का नया कुर्ता पहने आगवानी में खड़े थे। बधू के माता-पिता भौंचक होकर पत्थर की मूर्ति सा जड़ खड़े थे।
"क्या आप अपने पिता को पहचान रहे हैं ? वर ने पूछा।
"यहाँ तुमलोगाें को आना था तो हमें पहले क्यों नहीं बताया? वधू की माता ने पूछा। उनकी जड़ता टूटी।
"दादा को आप वृद्धाश्रम में छोड़ने जा रहे हैं क्या आपने बताया था?" वर ने कहा।
"हुंह्ह्ह, बताया जाता! कैसे बताया जाता..! जब तक बुआ भारत में रहीं दादा उनके साथ ज्यादा रहते। मेरी हमउम्र फुफेरी बहन के साथ खुश रहते। मुझे तो दादा से बहुत दूर हॉस्टल में रखा जाता।" वधू ने कहा।
"सत्ता का उन्माद बिना महावत का रहा। क्या इनका स्थानांतरण कर दें?" वर ने पूछा।
"नहीं। गलतियों के इतिहास को दोहराया नहीं जाता है।" वधू ने कहा।

अँधेरे घर का उजाला

"किसे ढूँढ़ रहे हो?" शफ्फाक साड़ी धारण किए, सर पर आँचल को संभालती महिला ने बेहद मृदुल स्वर में पूछा। तम्बू के शहर में एक नौजवान के...