Wednesday 10 November 2021

जहर की गाँठ

 रक्षाबंधन, 1976

"यों तो तुम चिकना घड़ा हो गयी हो! जरा बताना, यह कहाँ का न्याय है? एक भाई के मोक्ष के कारण अन्य सारे भाइयों की कलाई सूनी रह जाए। अक्सर ऐसा हो जाता है, हमारा जो खो गया उसके विलाप में जो हमारे पास है उसको हम अनदेखा करने लग जाते हैं।" अन्तर्देशीय पर छपे शब्दों को आँसू धुंधले कर रहे थे।

रक्षाबंधन, 1977

"जिस पर पाँच रुपया या दस रुपया टाँका गया हो वही राखी मेरे लिए मंगवाना..,"

"यह तो अन्याय है। आप अभी अध्येता हैं। जो रुपया नेग में देने के लिए मिलता है, उसे भी आप अपने पास रख लेते हैं और ऊपर से..,"

"सुग्गिया! गाँठ बाँधकर रख ले.. ! जब तू बड़ी होगी और तेरी शादी होगी तो मैं ही तुझे बुलाने भेजने की जिम्मेदारी मेरी होगी। मैं पिता के संग ही रहूँगा... तब सब गाँठ खुल जायेगा।"

रक्षाबन्धन, 1982

शादी के बाद की पहली राखी.. कहीं कोई सुगबुगाहट नहीं..! बहुत 

रक्षाबंधन, 1995

सुग्गिया और उसके कुछ भाई अब एक ही शहर में रहते हैं तो राखी में गुलजार रहता है।

रक्षाबंधन, 2015

सुग्गिया दूसरे राज्य में रहती है। ऐसा पहली बार हुआ है कि आज राखी के दिन ही सुग्गिया का जन्मदिन पड़ा। सुग्गिया सारे भाइयों को न्योता दिया गया था। सुग्गिया उल्लासित प्रतीक्षा करती रह गयी।

रक्षाबंधन, 2018

बहुत सालों पहले चिकना घड़ा कहने वाले सारे भाई सुग्गिया को अब पत्थर कहते हैं...। 

रक्षाबंधन, 2021

पौधे वृक्ष बनने के कगार पर पहुँच गए हैं। सुग्गिया पत्थर से मीठा स्त्रोता फूट गया है। थाली में अक्षत रोली राखी के खाली पैकेट और बुझे दीप संग पाँच-पाँच सौ के रुपये गवाही दे रहे हैं


12 comments:

  1. बहुत कुछ है ४५ साल के इस सफर में

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  2. जी नमस्ते ,
    आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल गुरुवार(११-११-२०२१) को
    'अंतर्ध्वनि'(चर्चा अंक-४२४५)
    पर भी होगी।
    आप भी सादर आमंत्रित है।
    सादर

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  3. सुंदर कहानी

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  4. सुन्दर रचना

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  5. बहुत ही भावनात्मक लघुकथा

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  6. हृदय स्पर्शी कथा।

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  7. वाह!सुंदर सृजन।

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  8. बहुत सुन्दर और मार्मिक कथा !

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  9. जाने वाले का मलाल दिल में जो हैं चनका अभिनंदन बुरा तो नहीं पर दुनिया मन से मलाल करे न करे दिखावे बहुत करती है और चाहती भी है...दिखावा नहीं तो हो गये पत्थरदिल।
    सारगर्भित लघुकथा।

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  10. प्रश्न उठ रहे हैं कि ऐसा क्या और क्यूंकर हुआ ?

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    1. उत्तर लेखन में ही है आदरणीया
      सादर

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आपको कैसा लगा ... यह तो आप ही बताएगें .... !!
आपके आलोचना की बेहद जरुरत है.... ! निसंकोच लिखिए.... !!

मानी पत्थर

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