Monday, 21 June 2021

चिन्तन

 

पता नहीं

पारस लोहा को सोना बनाता


 कि नहीं बनाता, लेकिन 

कभी किसी को 

कोई ऐसा मिल जाता है

जिसके सम्पर्क में 

आने से बदलाव हो जाता है

बस कोई सन्त किसी डाकू से पूछे

'मैं ठहर गया तुम कब ठहरोगे?'

नरपिशाच के काल में

वैसे सन्त और वैसे डाकू

कहाँ से ढूँढ़कर लाओगे..!

5 comments:

  1. सादर नमस्कार ,

    आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल .मंगलवार (22 -6-21) को "योग हमारी सभ्यता, योग हमारी रीत"(चर्चा अंक- 4103) पर भी होगी।
    आप भी सादर आमंत्रित है,आपकी उपस्थिति मंच की शोभा बढ़ायेगी।
    --
    कामिनी सिन्हा

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  2. नर भी और पिशाच भी
    सन्त है ना ।

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  3. बहुत बढियां

    ReplyDelete

आपको कैसा लगा ... यह तो आप ही बताएगें .... !!
आपके आलोचना की बेहद जरुरत है.... ! निसंकोच लिखिए.... !!

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