Wednesday, 19 August 2026
राग की थाती
Sunday, 9 August 2026
सन्ध्या का आलोक
दिन अपनी अन्तिम देहरी पर ठिठका खड़ा था।
पार्क में पुराने नीम के नीचे बैठे लगभग पचहत्तर-सतहत्तर वर्षीय वृद्ध अपने घुटने सहला रहे थे। हर शाम उनका यह दर्द लौट आता था। तभी सामने वाली बेंच पर बैठने की कोशिश करती एक वृद्धा लड़खड़ा गईं। वृद्ध छड़ी के सहारे उठे। धीरे से उनके पास पहुँचे और पानी की बोतल बढ़ा दी।
“लीजिए… थोड़ा सुस्ता लीजिए।” वृद्ध ने कहा।
कुछ घूँट पानी पीकर वृद्धा ने म्लान मुस्कान ओढ़ ली।
“धन्यवाद…! अब तो लगता है, शरीर ही नहीं, मेरी ज़रूरत भी खत्म हो गई हैं।” वृद्धा ने कहा।
वृद्ध की नज़रें उनके पास रखे ऊन के उलझे लच्छों पर पड़ीं। उन्होंने उसे उठा लिया।
“ऐसा मत कहिए,” वे मुस्कराए, “उम्र काम नहीं छीनती, बस काम का ढँग बदल देती है। आप बुनिए…, उलझों को मैं सुलझा देता हूँ।”
वृद्धा की आँखों में हल्की-सी चमक उतर आई।
धागे सुलझते रहे और बातें भी। पता चला, उनका नाम सुमित्रा था। पास के वृद्धाश्रम में रहती थीं। वृद्ध का नाम रामनाथ था। उनकी पत्नी को गुज़रे कुछ वर्ष बीत चुके थे। उनकी सन्तान अपने कामों में इतना व्यस्त रहती थी कि उनका स्नेह-सम्मान भी अब मोबाइल की घंटियों में सिमट गया था। दोनों ने अपने-अपने दुःखों का ब्योरा नहीं दिया; शायद उसकी ज़रूरत भी नहीं थी। क्यों कि वे भविष्य की योजना बना रहे थे। आगे रामनाथ ऊन लाएँगे। फ़ौजियों-अनाथों के लिए स्वेटर तैयार होंगे। कुछ पीड़ाएँ शब्दों से नहीं, केवल उपस्थिति से पढ़ी जाती हैं।
नीम की पत्तियों से छनती साँझ धीरे-धीरे गहराने लगी।
रामनाथ ने सुलझा हुआ ऊन सुमित्रा की हथेलियों पर रख दिया। सुमित्रा जी की सलाइयाँ फिर चल पड़ीं।
घर लौटते समय फाटक तक पहुँचकर रामनाथ ने एक बार पीछे मुड़कर देखा।
नीम की छाँव में सुमित्रा जी चुपचाप बुन रही थीं। रामनाथ ने मुस्करा दिए। उनके घुटनों का दर्द वैसा ही था, पर कदम पहले से हल्के लग रहे थे।
Sunday, 26 July 2026
बोझ/कल्पना/मृगतृष्णा?
Wednesday, 22 July 2026
बदले ताले
“तुम्हें पता है, पिछले आपातकाल में सबसे ज़्यादा किस चीज़ की आवाज़ आती थी?” वाइन ग्लास बढ़ाते हुए प्रभाकर जी ने पूछा।
“मुझे ऐसी कोई भी चीज नापसन्द है जो मेरे दिमाग को भ्रमित करती है,” रोहन ने इंकार रूप में अपना हाथ और अनभिज्ञता स्वरूप सिर हिलाया।
“खामोशी की…। जब आधी रात को लोग उठाए जाते थे, तब पूरा मोहल्ला जागता था, मगर कोई खिड़की नहीं खुलती थी।” प्रभाकर जी ने कहा।
“अब तो लोग दोपहरी में उठाए जाते हैं और खिड़कियाँ खुली रहती हैं, प्रभाकर जी।” रोहन ने मुस्कराते हुए उत्तर दिया। उसने अपना लैपटॉप खोला। कई दिनों की मेहनत से तैयार की गई रिपोर्ट सामने थी। उसने प्रकाशित करने का बटन दबाया। कुछ पल तक स्क्रीन पर एक गोल निशान घूमता रहा। फिर सब कुछ सामान्य हो गया। बस उसकी रिपोर्ट कहीं दिखाई नहीं दे रही थी। कुछ ही देर में उसे एक-एक कर कई सन्देश आए। सोशल मीडिया की कुछ सुविधाएँ बन्द कर दी गई थीं। कुछ लोग, जो रोज़ उसकी फेसबुक पोस्ट पर बहस करते थे, अचानक जैसे उसे देख ही नहीं पा रहे थे। रोहन ने अनायास प्रभाकर जी की ओर देखा।
प्रभाकर जी ना तो मुस्कराए और ना कुछ कहा। धीरे से उठे, अलमारी खोली और वही पुरानी डायरी उसके हाथ में रख दी, जिसे वे बरसों पहले जेल से लौटते समय साथ लाए थे।
“जब सोशल मीडिया बोलना बन्द कर दें…” रोहन ने कहना चाहा।
“…तब इंसान एक-दूसरे को पढ़ना शुरू करते हैं।” प्रभाकर जी ने उसकी बात पूरी कर दी—
शाम ढल रही थी। चाय की दुकान पर लोग पहले की तरह बैठे थे। मौसम, महँगाई, क्रिकेट और राजनीति— इत्यादियों पर बातें हो रही थीं, लेकिन शिक्षा-चिकित्सा की बातें नहीं हो रही थी। रोहन ने डायरी खोली। पहला वाक्य “इतिहास दोहराया गया है” लिखने से पहले उसने एक बार चारों ओर देखा। शहर बिल्कुल सामान्य था।
Tuesday, 30 June 2026
आँखों की धुँध
सर्दियों की एक बेहद सर्द शाम थी। राघव एक आलीशान होटल में से अपनी कम्पनी की कामयाबी का जश्न मनाकर लौट रहा था। रास्ते में चौराहे पर बने भव्य मन्दिर, मस्जिद, गुरुद्वारे के बाहर रोशनी जगमगा रही थी। राघव ने गाड़ी रोकी, श्रद्धा से सिर झुकाया और बाहर बैठे कुछ आदतन माँगने वालों को नोट बाँट दिए। तभी उसकी नजरें कुछ दूरी पर, एक दीवार के सहारे बैठी एक बूढ़ी महिला पर पड़ी। कम्पकम्पाती ठंड में उसके पास ढंग का कोई ऊनी कपड़ा नहीं था। उसके पास ही एक छोटी लड़की फटी हुई कॉपियों को समेटे रो रही थी। राघव कौतूहलवश उनके पास गया।
"क्या हुआ माताजी? आप वहाँ कतार में क्यों नहीं बैठीं? वहाँ पैसे बँट रहे हैं," राघव ने पूछा।
बूढ़ी महिला ने स्वाभिमान से सिर उठाया और कहा, "बेटा, हम भिखारी नहीं हैं। मेरे बेटे-बहू दुर्घटना में चल बसे। मैं लोगों के घरों में झाड़ू-पोछा करके इस बच्ची को पढ़ा रही हूँ। आज मकान मालिक ने किराया न देने पर रात को ही बाहर निकाल दिया और बच्ची की स्कूल की फीस न भरने के कारण उसकी किताबें भी फेंक दी गईं। मुझे भीख नहीं, बस सिर छुपाने की जगह और मेरी बच्ची के लिए मदद चाहिए।"
राघव के चेहरे का भूगोल बदल गया। तभी वहाँ से एक साधारण से कपड़ों में एक सज्जन गुजरे, उन्होंने उस बूढ़ी महिला की बात सुन ली थी। उन्होंने तुरन्त आगे बढ़कर अपनी गर्म शॉल उस बुजुर्ग महिला के कंधों पर डाल दी। फिर बच्ची की कॉपियाँ उठाईं और कहा, "माताजी, मेरे घर के पास एक छोटा सा कमरा खाली है। आप वहाँ रह सकती हैं और मेरी पत्नी को घर के कामों में मदद कर सकती हैं। और रही बात इस बच्ची की पढ़ाई की, तो इसका दाखिला मैं कल अपने स्कूल में मुफ्त करवा दूँगा। पास के ही सरकारी स्कूल में मैं शिक्षक हूँ।”
शिक्षक ने राघव की दुविधा को भाँप लिया और बेहद शान्त स्वर में कहा, "धर्म शिक्षण है, जाति से शिक्षक हूँ तो मेरा सम्प्रदाय आस्था का विषय है, मन्दिर, मस्जिद, गुरुद्वारा, गिरजाघर श्रद्धा का और जरूरतमन्दों की मदद करना ही मेरे लिए पूजा है। तो दान हमेशा पात्र व्यक्ति को देना ही श्रेयस्कर समझता हूँ!”
“बड़े-बड़े नोट बाँटकर मैं खुद को बहुत बड़ा धर्मात्मा महसूस कर रहा था। आपका कर्म देखकर मेरी अपनी गलती का अहसास हो रहा है। मैंने जिन लोगों को रुपये दिया, रात में ही उसी रुपये से नशा करने वाले होंगे जबकि यहाँ एक स्वाभिमानी परिवार को सचमुच मदद की जरूरत थी।” राघव ने कहा।
“अब आपने सही समझा। सच्ची श्रद्धा पत्थरों की दीवारों तक सीमित नहीं होती, वह इंसानियत के रूप में भी धड़कती है।” शिक्षक ने कहा।
ग़ज़ल
मेरा फ़लक के सितारों से राब्ता है बहुत,
जो गिर गया वो नज़र से तो ख़ाब्ता है बहुत।
जो चल पड़े हैं तो मंज़िल को ढूँढ ही लेंगे,
मगर ये वक़्त की गर्दिश का रास्ता है बहुत।
उलझ गया है जो धागा उसे सुलगने दो,
कि अब ज़माने से अपना ही वास्ता है बहुत।
वो कायदे जो बनाए थे दिल की बस्ती ने,
उन्हीं उसूलों का दुनिया में वाब्ता है बहुत।
मेरा फ़लक के सितारों से राब्ता है बहुत,
जो गिर गया वो नज़र से तो ख़ाब्ता है बहुत।
चमकना सीख लिया जिसने मुश्किलों में 'विभा',
उसी चिराग़ का तूफ़ाँ से जाब्ता है बहुत
Friday, 26 June 2026
२६-०६-२०२६ : शून्योपरान्त या लंतरानी?
छोड़ चुकी हूँ
समस्याओं पर विचार रखना।
हर गाँठ को खोलने की ज़िद में
उँगलियाँ ही लहूलुहान होती थीं।
अब जो नहीं बदल सकता,
उसे समय के हवाले कर देती हूँ।
जो बदल सकता है,
उसे अपने साहस के।
दर्द जब ज्वार से भी ऊँचा उठता है,
लहरें शोर करना छोड़ देती हैं।
समुद्र सिर्फ़ गहरा हो जाता है।
दुःख का बिम्ब भाटा में नीचा बैठता है
लकड़ी जब पूरी जल जाती है,
लपटें नहीं बचतीं—
बस एक मुट्ठी राख
हवा के साथ चल देती है।
राख के बिम्ब के लिए वैतरणी मचल जाती है
बादल जब जी भर बरस लेते हैं,
आकाश रोता नहीं,
बस धुला-धुला-सा
चुप पड़ा रहता है।
वर्षा का बिम्ब सरस लेते हैं-
पेड़ जब अन्तिम पत्ता भी खो देता है,
हवा से शिकायत नहीं करता।
वह अगली ऋतु की प्रतीक्षा में
स्थिर खड़ा रहता है।
वृक्ष का बिम्ब अक्खो-मक्खो करता है!
नदी जब चट्टानों से लड़ते-लड़ते थक जाती है,
उन्हें तोड़ने की नहीं,
उनके बीच से रास्ता बनाने की
कला सीख लेती है।
नदी अपने बिम्ब को ढूँढते-ढूँढते पक जाती है
तेल जब आख़िरी बूँद तक पहुँचता है,
लौ काँपती नहीं,
एकदम स्थिर हो जाती है
बुझने से ठीक पहले।
दीपक का बिम्ब कोई नहीं खोजता है!
रेत ने कब का छोड़ दिया है
बादलों का हिसाब रखना।
उसे मालूम है—
हर बरसात उसकी नहीं होती।
मरुस्थल का बिम्ब कोई मरोड़ दिया है!
Thursday, 25 June 2026
हाइकु और ग़ज़ल
अमराई में
तोता का कलरव—
युद्ध विराम
ढोल का शोर
भगोड़ा का बजाया—
युद्ध विराम
युद्ध विराम—
भगौड़ा का उकेरा
इन्द्रधनुष
नभ में छाए
पतंग व पतंगी—
युद्ध विराम
ग़ज़ल
कुछ नहीं वक़्त का ही तकाज़ा तो है,
ग़म पुराना सही दर्द ताज़ा तो है।
टूटकर बिखरे रिश्ते कई बार पर,
दिल में जुड़ने का कोई इजाज़ा तो है।
रात भर अश्क आँखों से बरसे मगर,
दूर होकर भी मेरा वो ख़्वाजा तो है।
ख़्वाब सारे बिखर कर हुए धूल भी,
आँख पर एक सपने का क़ब्ज़ा तो है।
वो न आएँ कभी, कोई शिकवा नहीं,
दिल का बाक़ी अभी वे ही राजा तो है।
लोग पढ़ते नहीं दिल के मजमून को,
मीर के लेख का यह नतीजा तो है।
ये अंधेरा भी छँट जाएगा देखना,
आस के आसमाँ में वो इक जा तो है
आज हर ओर है बेयक़ीनी, विभा,
कल सँवरने का अंदाज़ दूजा तो है।
Monday, 22 June 2026
गुलदस्ते में वट
पिता ने दिया काया तो उस काया को निरोग रखना योग की माया
पिता का साया धूप में शीतल छाँव बन जाता है,
जीवन का हर कठिन रास्ता सहज बन जाता है।
सदा स्मरण करते पिता के मौन तपस्या को,
जिससे घर का हर कोना उजियारा पाता है।
तन को बल, मन को शांति, प्राणों को नव प्रकाश,
सदा योग देता है जीवन को सुन्दर विश्वास।
बाहर जितनी दौड़-धूप है, भीतर उतनी ही ख़ामोशी,
स्वयं को खोजो, मिल जाएगा अपना ही आकाश।
वही संस्कृति चाहिए वहीं के वहीं आँगन के कुशल टिकाई में
सुख, शांति और सफलता की खोज में निकले हम,
दुनिया भर में उत्तर ढूँढ़ते रहे हरदम।
योग ने सिखाया—अपने भीतर उतरना सीखो,
पिता ने कहा—सत्य और श्रम का पथ चुनो।
फिर समझ में आया जीवन का यह रहस्य,
जिसे खोजते रहे हम यहाँ-वहाँ,
वही-वहीं था—पिता की सीख और अपने ही योग के बीच।
संयम, साहस, श्रम और सच्चाई,
ये सब आसान नहीं थे,
पिता की रोज़मर्रा की साधना थी।
योग ने जब मन के भीतर दीप जलाया,
पिता का चेहरा उसी उजाले में नज़र आया।
पिता ने उँगली थामकर चलना सिखाया है,
योग ने गिरकर भी सम्भलना सिखाया है।
योग तन को साधता है, पिता मन को गढ़ते हैं,
वही दोनों मिलकर जीवन को वहीं ऊँचाई देते हैं।
पिता ने कहा था—
जीत से पहले स्वयं पर विजय पाना,
योग ने वही बात
श्वासों की भाषा में दोहराई है।
एक ने जीवन का अनुशासन दिया,
एक ने मन का सन्तुलन दिया
वहीं दोनों मिलकर संस्कार को वही गहराई देते हैं।
Wednesday, 17 June 2026
मूल्यों का क़द
निखिल का पैतृक शहर विनाशकारी बाढ़ की चपेट में आ गया। बस्तियाँ डूब गईं, हाहाकार मच गया। राहत कार्य में जुटे थके-हारे निखिल ने जब पुस्तकालय का दरवाज़ा खोला, तो वह दंग रह गया।
पुस्तकालय की मेज़ें हट चुकी थीं। अलमारियों में किताबों की ओट से दवाइयाँ झाँक रही थीं। हॉल में बेघर परिवार आश्रय लिए हुए थे और शहर के युवा वहाँ सहमे बच्चों को सँभाल रहे थे।
वृद्ध पुस्तकाध्यक्ष ने आगे बढ़कर निखिल के कन्धे पर हाथ रखा और बोले, "बेटा! किताबें सिर्फ़ कागज़ का पुलिन्दा नहीं होतीं, वे समाज को संकट में एक-दूसरे के लिए खड़ा होना सिखलाती हैं।"
निखिल की आँखें शर्म से झुक गईं। उसने अपनी डायरी में लिखा, “पिछड़ा वह स्थान नहीं जहाँ आधुनिक सुविधाएँ कम हों, बल्कि वह है जहाँ मानवीय संवेदनाएँ और आपसी जुड़ाव ख़त्म हो जाए। यह शहर तो बहुत ही आगे है। जब मैं कुछ महीनों पहले यहाँ आया था तो इस जर्जर पुस्तकालय को देखकर महानगर से आए युवा अधिकारी के रूप में मैंने उपहास उड़ाया था, “आज के डिजिटल युग में भी यह कबाड़खाना चल रहा है! सचमुच, यह शहर कितना पिछड़ा है। वृद्ध पुस्तकाध्यक्ष ने सुना था पर अपनी सौम्य मुस्कान के साथ मौन रहे थे!”
ग़ज़ल
हर घड़ी अक्स को चमकाने की चाहत ही नहीं,
खुरदरा रहने की छूटेगी ये आदत ही नहीं
दाग़ से ही तो है इस चाँद में ऐसी रौनक़,
इस जहाँ में कहीं बेदाग़ फ़ज़ीलत ही नहीं।
हद से ज़्यादा जो सफ़ाई में लगे रहते हैं,
उनके चेहरों पे कोई सच्ची सी रंगत ही नहीं
कुछ खुरदरे से भी कोने हों ज़रूरी घर में,
हर तरफ़ सिर्फ़ नफ़ासत की ज़रूरत ही नहीं।
ये जो ठोकर है संभलने का सलीक़ा देती,
चिकने रोड़ों की मुझे कोई इबादत ही नहीं।
रास्ते का मुड़ा ही मोड़ हो हारा तो नहीं
इस सफ़र में मुझे राहों से शिकायत ही नहीं
अपनी अनगढ़ सी कला पर ही यक़ीं काफ़ी, 'विभा'
हर तरफ़ काँच के महलों की हिफ़ाज़त ही नहीं।
Sunday, 14 June 2026
ग़ज़ल
लफ़्ज़ वो अब तलक, तो बने ही नहीं
जो बयाँ कर सकें, हिय सुने ही नहीं।
रास्ते में जो थे, जाल नफ़रत के वो,
हम सफ़र में कभी, यूँ तने ही नहीं।
ग़म के जो ख़्वाब थे, वक़्त के रात-दिन,
जाने किस मोड़ पर, वो बुने ही नहीं।
ज़िन्दगी ने दिए, जितने ज़ख़्म-ओ-सितम,
दर्द वो हमने फिर, तो गिने ही नहीं!
लाख शिकवे रहे, इस ज़माने से पर,
दर्द के वो फ़साने, गुने ही नहीं।
दिल में ऐसा बसा, हिज्र का सिलसिला,
कोई मौसम खुशी का, मने ही नहीं।
राह-ए-उल्फ़त में जो, अश्क बिखरे 'विभा',
हम ने दामन में वो, फिर चुने ही नहीं।
ग़ज़ल 2
बात निकली तो कई राज़ भी फिर दिल से निकले,
दर्द के फूल भी कुछ अश्कों की महफ़िल से निकले।
जब अँधेरों ने कहा तो कई सीमा से निकले,
रास्ते तब ही नए एक नई मंज़िल से निकले।
हमने चाहा था कि ख़ामोश रहें जीवन भर यूँ
पर कई शब्द अचानक ही मेरे दिल से निकले।
वक़्त की धूप में रिश्तों की नमी जाती ही रही,
फिर भी कुछ ख़्वाब सलामत थे जो मुश्किल से निकले।
उसकी यादों का समंदर था बहुत ही गहरा मगर,
कुछ चमकते हुए मोती उसी साहिल से निकले
ज़िन्दगी भर जिसे थे अपना समझते रह गए हम,
वे भी इक रोज़ किसी और के आदिल से निकले।
घात निकली तो नज़र उनके कई रंग ही आए
कुछ हँसी के थे, 'विभा' तो वे ही कुछ छल से निकले
Tuesday, 9 June 2026
ब्याज का टापू
दिन की चुभती हुई धूप की जगह अब एक ठंडी, मखमली हवा ने ले ली थी। पेड़ों पर चहचहाहट तेज हो गई थी। हरीश बाबू ने अपनी किराने की दुकान का शटर आधा गिराया और गल्ले (कैश बॉक्स) के पास बैठ गए। गल्ले से नोटों की गड्डी निकाली। कुल मिलाकर पन्द्रह हजार चार सौ रुपये। हरीश बाबू के चेहरे पर एक संतोषजनक मुस्कान तैर गई। उनके लिए यही उनकी 'दिन की पूँजी' थी, जिससे उनका घर चलता था और बैंक बैलेंस बढ़ता था। वे दुकान पूरी तरह बंद करने ही वाले थे कि तभी एक कमजोर सी आवाज आई, "बाबूजी... कुछ खाने को दे दो। बड़ी भूख लगी है।"
हरीश बाबू ने पलटकर देखा। सामने एक बूढ़ी औरत खड़ी थी। फटे-पुराने कपड़े, चेहरे पर झुर्रियों का जाल और आँखों में बेबसी। हरीश बाबू का हाथ अनजाने में ही जेब के नोटों की तरफ गया, लेकिन फिर कुछ सोचकर उन्होंने नोट हाथ में ही दबाए रखा।
उन्होंने दुकान के अन्दर देखा। एक शेल्फ पर ताजे ब्रेड का पैकेट, जैम की शीशी और दही की थैली रखी थी। हरीश बाबू ने शटर थोड़ा ऊपर उठाया, अन्दर गए और ब्रेड-जैम और दही ले आए। उस सामान को उस बूढ़ी औरत के हाथों में थमा दिया।
बूढ़ी औरत ने काँपते हाथों से सामान थाम लिया। उसकी सूखी आँखों में अचानक चमक आ गई। "जुग-जुग जियो बाबू! भगवान तुम्हारी तिजोरी हमेशा भरी रखे।" उसने आसमान की तरफ हाथ उठाया और भरभराई आवाज में कहा।
उसकी आँखों से छलकते आँसू और चेहरे पर के उस सुकूँ को देखकर हरीश बाबू के चेहरे पर सन्तोष का गाढ़ापन छा गया। बूढ़ी औरत दुआएँ देती हुई आगे बढ़ गई।
हरीश बाबू ने दुकान का ताला लगाया और घर की तरफ चल दिए। रास्ते में उन्होंने जेब में हाथ डाला।
"आज समझ में आया... तिजोरी की पूँजी तो बस जेब का बोझ है, असली 'दिन की पूँजी' तो वे दुआएँ हैं जो आज कमा कर घर ले जा रहा हूँ।" मुस्कुराते हुए आसमान की तरफ देखा और बुदबुदाए।
अन्त की साँसें
बारूद के काले धुएं ने, वो नीला अम्बर निगल लिया,
इंसान के अंधी नफरत ने, हँसता हुआ चमन कुचल दिया।
जहाँ कभी थी नदियों की कल-कल, और पेड़ों की घनी छाँव,
वहाँ आज बस सन्नाटा है, मर गए शहर, उजड़ गए गाँव।
वो बम के गोले, वो मिसाइलें, वो बारूदी अन्धियारा,
जीत की खातिर इंसानों ने, अपनी ही साँसों को मारा।
जहरीली गैसों के तांडव ने, पत्तों का यौवन छिन लिया,
सूख गए सब बाग-बगीचे, पंछियों का जीवन छिन लिया।
जो शहर कभी था धड़कन जैसा, कंक्रीट का कंकाल हुआ,
नदियों का पानी तेजाब बना, हर कोना-कोना निवाला काल हुआ।
हवा हो गई इतनी कड़वी, फेफड़ों में अब अंगारे हैं,
हम जीत गए जो जंग मगर, खुद अपनी ही किस्मत हारे हैं।
पर देखो! उस मलबे के नीचे, काली राख को चीरकर,
एक नन्हा अंकुर उग आया, विपदा का सीना बींधकर।
वो चीख-चीख कर कह रहा, इंसानी इस नादानी से—
"ये धरती फिर सज सकती है, प्यार और बस पानी से।"
ग़ज़ल
नदी में जो दिखे वो चाँद बेकल है
मगर क्यों काँच के परदे में धूधल है।
धरा और चाँद की दूरी नहीं घटती,
उदासी में कटा जो वो ही इक पल है।
भटकता फिर रहा जो दिल वो है अक्खड़
मोहब्बत का कोई भी अब नहीं हल है।
दुआओं से बदल जाती है ये दुनिया
मुक़द्दर की लकीरें भी मुसज्जल है
हक़ीक़त की ज़मीं पर पैर हैं जलते
विभा ख़्वाबों का रिश्ता सिल्क मख़मल है।
Friday, 5 June 2026
अन्त की साँसें
कमलजीत ने अपने बख्तरबन्द सूट का हेलमेट उतारकर जहरीली हवा का सूचकांक देखा। रीडिंग लाल निशान से भी ऊपर थी। लगभग अट्ठाइस-तीस वर्ष पहले यह जगह ‘सपनों का शहर’ कहलाती थी—चौड़ी सड़कें, दोनों ओर अमलतास -गुलमोहर के वृक्ष और बीच से बहती एक शान्त नदी। वहीं आज यहाँ केवल कंक्रीट के काले कंकाल खड़े थे। नदी एसिड से भरे नाले में बदल चुकी थी और हवा में बारूद की गन्ध स्थायी रूप से घुल गई थी।
“सर, यहाँ हमें कुछ नहीं मिलेगा। यह पूरा इलाका ‘डेड ज़ोन’ घोषित हो चुका है,” युवा सैनिक कबीर ने सूखी धरती पर कदम रखते हुए कहा। उसके पैरों के नीचे मिट्टी राख बनकर उड़ने लगी। कमलजीत एक टूटे हुए फ्लाईओवर के नीचे बैठ गया। उसकी आँखों के सामने अतीत का वह भयावह दृश्य तैर उठा। दो महाशक्तियों के अहंकार ने जब युद्ध का रूप लिया, तब केवल इंसान ही नहीं मरे थे, प्रकृति भी लहूलुहान हो गई।रासायनिक हमलों और परमाणु विस्फोटों ने महीनों तक आसमान को काले धुएँ से ढके रखा। सूरज की रोशनी धरती तक न पहुँच सकी। जंगल, बाग-बगीचे और खेत कुछ ही दिनों में राख हो गए। पेड़ समाप्त हुए तो वर्षा रूठ गई, जलस्रोत सूख गए और जीवन का चक्र टूट गया। युद्ध ने कुछ महीनों में वह सब नष्ट कर दिया, जिसे प्रकृति ने करोड़ों वर्षों में सँवारा था।
“हम समझते रहे कि हम शहर क्या देश बचाने के लिए लड़ रहे हैं,” कमलजीत की आवाज़ भर्रा गई, “लेकिन हम यह भूल गए कि शहर इमारतों से नहीं, उसकी साँसों से बनता है। जब पर्यावरण ही नहीं बचा, तो शहर भी मर गया।”
कबीर की नज़र अचानक फ्लाईओवर की एक दरार पर पड़ी। मलबे और जहरीली मिट्टी के बीच एक नन्हा-सा हरा अंकुर सिर उठाए खड़ा था। कंक्रीट के उस मरुस्थल में वह जीवन की पहली दस्तक था।
“सर! देखिए!” कबीर उत्साह से चिल्लाया।
कमलजीत झुककर उस अंकुर को देखने लगे। उनकी आँखों में वर्षों बाद चमक लौटी। उन्होंने अपने वॉटर-पैक से कुछ बूँदें उसकी जड़ों में टपका दीं।
“इंसान के युद्ध ने शहर मिटा दिया, कबीर,” वे धीमे से बोले, “लेकिन प्रकृति हार मानना नहीं जानती। यदि हम अपनी बंदूकें हमेशा के लिए रख दें, तो यह खोया हुआ शहर फिर साँस लेना सीख सकता है।”
"हाँ! हाँ इस उजड़े हुए शहर में यही एक अकेला अंकुर है, पर इसके भीतर एक पूरे भविष्य का जंगल हरा हो रहा हैं।" अति उत्साहित कबीर सर ऊँचा कर हथेली जोड़े आकाश को आह्वान कर रहा था।
दोनों सैनिकों ने उस नन्हे पौधे को सलाम किया।
Thursday, 28 May 2026
सूत और साँसें
“देख भैया! कितना बड़ा केला!” बुचिया ने आधा साफ़ केला उठाकर अपनी फटी फ्रॉक में छुपा लिया। उसके चेहरे पर वही चमक थी, जो किसी अमीर बच्चे के हाथ नया खिलौना आने पर होती है।
मंगरू मिट्टी में पड़े बताशे और भीगे चने बीन रहा था। दूसरों की पूजा का बचा हुआ प्रसाद, उनके कुछ अंश का भोजन था।
“अरे! हटो वहाँ से…! पूजा की जगह अपवित्र कर दी तुम लोगों ने!” उनके पीछे से तभी तेज आवाज गूँजी—
गाँव की मुखिया चाची अपनी भूली हुई चाँदी की थाली लेने लौटी थीं। बच्चों को देखकर उनका चेहरा तमतमा उठा।
बुचिया डरकर पीछे हट गई, पर मंगरू वहीं खड़ा रहा। उसके हाथ में मिट्टी का एक छोटा-सा दीया था, जिसमें थोड़ी-सी घी की परत और सिंदूर बचा था।
“इतनी मिठाई छोड़कर ये गन्दा दीया क्यों उठा रखा है?” चाची ने झुँझलाकर पूछा।
“माई ने कहा है, बरगद बाबा के पैर का सिन्दूर और घी लगा देंगे तो हमारे बाबू की भी साँस लम्बी हो जाएगी। भोर से भट्ठे पर खाँस रहे हैं…” मंगरू ने सहमे स्वर में कहा— वाक्य पूरा होते-होते उसकी आवाज भर्रा गई।
“आज मैंने अपने पति की लम्बी उम्र के लिए सोने का धागा चढ़ाया था, और इस बच्चे ने टूटी मिट्टी के दीये में अपने पिता की पूरी जिन्दगी समेट ली।” बुदबुदाती चाची के हाथ काँपने लगे और चाँदी की थाली अचानक बहुत डगमगाने लगी। कुछ क्षण तक वे निश्चल खड़ी रहीं। फिर चुपचाप थाली में बचे फल और लड्डू बुचिया के फ्रॉक में डाल दिए। बच्चे खिल उठे। वे दौड़ते हुए मुसहरी की ओर भाग गए। बरगद की छाँव अब भी वैसी ही थी-
Monday, 25 May 2026
दीये में बची लौ
शहर के एक प्रसिद्ध महाविद्यालय में वार्षिक विज्ञान प्रदर्शनी चल रही थी। समर और उसके दोस्तों ने महीनों रात-दिन एक करके 'स्मार्ट विलेज' का एक बेहतरीन वर्किंग मॉडल तैयार किया था। पूरा महाविद्यालय उनकी तारीफ कर रहा था। शाम को जब नतीजों की घोषणा होने वाली थी, तब महाविद्यालय के ट्रस्टी के बेटे, रोहन, ने समर को अकेले में बुलाया। रोहन ने टेबल पर पैसों से भरा एक लिफाफा रखा और कहा, "समर, इस प्रोजेक्ट पर मुख्य नाम मेरा और मेरे दोस्तों का रहेगा। तुम बस बैकस्टेज रहना। इस पैसे से तुम अपनी पूरे साल की फीस भर सकते हो और वैसे भी, तुम्हें आगे इंटर्नशिप के लिए मेरी सिफारिश की ज़रूरत पड़ेगी ही।"
समर एक बेहद साधारण परिवार से था। उसके पिता ने उसकी पढ़ाई के लिए अपनी पुश्तैनी ज़मीन का एक हिस्सा बेच दिया था। रोहन की बात सुनकर समर के भीतर एक गहरा द्वंद्व छिड़ जाना स्वाभाविक हो गया! एक तरफ आर्थिक सुरक्षा और भविष्य का रास्ता था, तो दूसरी तरफ उसकी महीनों की मेहनत और उसका स्वाभिमान।
वह भारी कदमों से पुस्तकालय की तरफ चला गया। वहाँ दीवार पर महापुरुषों के सुविचार लिखे थे। अचानक उसकी नज़र एक पुरानी डायरी के पन्ने पर पड़ी, जिस पर किसी ने बड़े-बड़े अक्षरों में लिखा था :-
“आप अपने सम्मान की रक्षा नहीं करते हैं तो मर जाते हैं और मरी आत्मा से आप शव होते हैं-”
इन शब्दों ने समर के भीतर जैसे एक बिजली का करंट दौड़ा दिया। उसे अपने पिता का वह चेहरा याद आया, जिन्होंने तंगी में भी कभी किसी के सामने अपना सिर नहीं झुकाया था। “अगर आज मैंने अपने स्वाभिमान का सौदा कर लिया, तो मैं खुद की ही नज़रों में हमेशा के लिए गिर जाऊँगा! तब तो मैं केवल एक ज़िन्दा लाश बनकर रह जाऊँगा!” समर लगातार बुदबुदाने लगा।
नतीजों की घोषणा का समय हो गया था, मुख्य अतिथि माइक पर आए और बोले, "इस साल का बेस्ट प्रोजेक्ट अवॉर्ड जाता है—रोहन और उनकी टीम को!"
पूरा हॉल तालियों से गूँज उठा। रोहन स्टेज की तरफ बढ़ने लगा। तभी समर अपनी सीट से खड़ा हुआ और उसने ज़ोर से कहा, "रुकिए!"
हॉल में सन्नाटा छा गया।
"सर, यह प्रोजेक्ट रोहन का नहीं, मेरा और मेरी टीम का है। रोहन ने इसे पैसों के दम पर खरीदने की कोशिश की है। मेरे पास इस प्रोजेक्ट के कोडिंग लॉग्स, शुरुआती डिज़ाइन्स और हर एक स्टेज के वीडियो प्रूफ हैं, जो साबित कर देंगे कि इसे किसने बनाया है।" समर मंच पर गया और मुख्य अतिथि से सीधे मुखातिब होकर कहा।
"तुम जानते हो तुम किससे बात कर रहे हो? तुम्हारा करियर बर्बाद हो सकता है।" ट्रस्टी ने समर को डराने की कोशिश की।
"सर, करियर फिर बन सकता है, लेकिन बिका हुआ आत्मसम्मान कभी वापस नहीं आता।" समर ने मुस्कुराकर कहा,
समर के हौसले और पुख्ता सबूतों के आगे कॉलेज प्रशासन को झुकना पड़ा। जाँच हुई और अवॉर्ड समर की टीम को मिला।
रात को जब समर अपने हॉस्टल के कमरे में लौटा, तो बिजली कटी हुई थी। उसने मेज़ पर एक छोटा सा मोम का दीया जलाया। हवा के झोंकों के बीच भी वह दीया पूरी ताकत से जल रहा था। समर ने उस दीये की लौ को देखा और मुस्कुरा दिया— “आज मैंने अपने भविष्य की ही नहीं, बल्कि अपनी आत्मा की भी रक्षा की है।” समर बुदबुदाते हुए कहा। वह भी दीये में बची लौ की तरह, विपरीत परिस्थितियों में भी शान से प्रज्वलित हो रहा था।
Thursday, 21 May 2026
२१ मई -चाय दिवस
सन्धान
उधड़ रहे थे रिश्ते धीरे-धीरे,
जैसे पुरानी रज़ाई का कोना,
बातों के धागे टूट चुके थे,
और मौन ने घर भर में
शुरू कर दिया अँधेरा बोना!
तभी रसोई में
चाय ने धीमे से उबाल लिया।
केतली की भाप में
कुछ अनकहे दुख पिघले,
अदरक की खुशबू ने
थके हुए मन पर
माँ के हाथ-सा स्पर्श कमाल किया!
इस तेज़ भागती दुनिया में
जहाँ लोग
मोबाइल की स्क्रीन पर
अपनापन खोज रहे हैं,
वहाँ चाय आज भी
पुरानी सिलाई मशीन की तरह
घर-घर रिश्तों की
तुरपाई कर रही है।
कभी पिता की थकान में
चीनी बन घुल रही है,
कभी माँ की चिन्ता में
इलायची-सी महक रही है,
कभी दोस्तों के बीच
ठहाकों की भाप बन उड़ रही है,
तो कभी प्रेमियों के मौन में
एक कप की गरमी बन टिक रही है।
पद्य प्रबन्ध—
धूल की परतें
केतली पर
तप की लौ
लाल मखमली कुर्सियों पर,
सजी साड़ियों का एक समन्दर है,
पर कौन जानता है कि किस चेहरे के,
कितना गहरा द्वंद्व अन्दर है!
एक हाथ में बनारसी का आँचल है,
दूजे में मिट्टी का वो कुल्हड़ गर्म,
एक कलाई पर बँधी है आधुनिक घड़ी,
जो याद दिलाती है घर के नियम और धर्म।
मंच पर चल रहा है विमर्श बड़ा,
'सशक्तीकरण' के ऊँचे-ऊँचे नारों का,
पर यहाँ फुसफुसाहट में दर्ज है दर्द,
ज़िम्मेदारियों के अन्तहीन किनारों का।
ये सजना-धजना कोई शौक नहीं,
ये तो दुनिया के लिए एक ओट है,
मुस्कुराहटों के इस सघन वीराने में,
छिपी हर दिल पर कोई न कोई चोट है।
चाय की हर चुस्की के साथ यहाँ,
कोई अपनी थकान बिसरा रही है,
तो कोई अपनों की बंदिशों से सुस्ता
बस! चुपचाप तनिक पल चुरा रही है।
ये मिट्टी के कुल्हड़ गवाह हैं इस बात के,
कि हर औरत भीतर से कितना तपती है,
औरों की ज़िंदगी में ज़ायका भरने को,
वो ख़ुद को साँचों में कितना खपाती है।
Wednesday, 20 May 2026
शिकायतें और ग़ज़ल
मैं रेत हूँ—
हर बार
आँखों में किरकिरी
पैरों के नीचे ही क्यों आती हूँ?
कभी किसी ने
मेरे कणों में छिपी
टूटी हुई सदियों को पढ़ा है?
सबने मुझ पर
अपने-अपने महल बनाए,
फिर एक दिन
मुझे ही बिखरा हुआ
कहकर चले गए।
समन्दर रोज़
मुझसे मिलने आता है,
पर मेरी प्यास
कभी क्यों नहीं पूछता!
हवाएँ
अपनी मनमानी से
मुझे उड़ाती रहती हैं,
और लोग कहते हैं—
“रेत का कोई घर नहीं होता!”
मैंने तो
हर कदम के निशान सँभाले,
पर किसी ने
मेरी हथेली पर
अपना नाम स्थायी नहीं लिखा।
तपती धूप में
मैं जलती रही चुपचाप,
फिर भी
मरुभूमि का दोष
मेरे हिस्से ही आया।
मुट्ठी से फिसलती रेत की अजब कहानी
मुट्ठियों में कैद हुई,
तो फिसल जाने का इल्ज़ाम मिला,
बिखरी रही धरती पर,
तो बेवफ़ा कहलायी।
मैं रेत हूँ—
समय की सबसे पुरानी गवाह,
फिर भी
हर लहर
मुझे मिटा देने का दावा करती है।
मुझसे ही
(Hourglass) रेत घड़ी का आविष्कार हुआ था, जो सीधे तौर पर समय के बीतने को दर्शाती है।
रेत का गिला/रेत की शिकायतें क्या-क्या नहीं हो सकती हैं?
मैं मरुभूमि बनूँ तो अभिशाप, और तट बनूँ तो सौंदर्य— यह भेदभाव क्यों है?
कविताओं और शेरो-शायरी में मेरा उपयोग अक्सर 'बेबसी' और 'उदासी' को दर्शाने के लिए ही क्यों किया जाता है-
ग़ज़ल
हौसलों का नया एक थल देखिए,
मुश्किलें हो रहीं कैसे हल देखिए।
ठोकरों ने तराशा है इंसाँ को यूँ,
पत्थरों से निकलता महल देखिए।
वक्त चुपचाप चेहरों को पढ़ता रहा,
कौन अपना रहा, कौन छल देखिए।
आँखों में ख़्वाब कितने सजाए मगर,
जो हक़ीक़त में बदला वो पल देखिए।
आँधियों ने उड़ाने की कोशिश तो की,
है चमन का मगर आत्मबल देखिए।
रास्ते ही सिखाते हैं चलना यहाँ,
हमसफ़र बन के ही साथ चल देखिए।
अब 'विभा' को दिखाते हैं तारा यहाँ,
आसमानों में कोई भी दल देखिए।
Saturday, 16 May 2026
छाँव का स्थायित्व और अवहित्था
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बरगद के विशाल वृक्ष का तना लाल-सुनहरे धागों से भरता जा रहा था। पूजा की थालियों में दीपक टिमटिमा रहे थे और मंत्रों की धीमी ध्वनि हवा में घुल रही थी। नंदिनी भी महिलाओं की भीड़ में थी। उसके हाथ में पाँच रंगों वाला मौली था, परन्तु वह कभी बरगद को देखती कभी अपने हाथों में पकड़े मौली को निहारती। तीन महीने पहले ही उसकी शादी हुई थी।
“वट-सावित्री का व्रत पति की लम्बी उम्र और अटूट दाम्पत्य के लिए होता है।” दादी-नानी, मामी-मौसी, बुआ-चाची, माँ को कहते सुना था। सासू माँ ने भी तो वही दोहराया था।
“क्या सिर्फ पति की उम्र लम्बी होना ही शादी का रिश्ता बचा लेता है? फिर मेरे दादा और दादा ससुर जी ने दूसरी शादी कर परदेश-विदेश क्यों जाकर बस गए! दादी और दादी सासू माँ के किए व्रत से ससुर जी की लम्बी आयु है या उनकी दूसरी पत्नी के किए व्रत से?” नन्दनी बुदबुदाते हुए, चुपके से सामने बैठे आरव को देखा। वह मुस्कुरा रहा था, उसकी पूजा की टोकरी सम्भाल रहा था ताकि धागा उलझे नहीं।
“इतनी कसकर क्यों बाँध रही हो?” आरव ने हल्के से पूछा।
“ताकि रिश्ता कभी ढीला न पड़े।” नन्दनी ने मुस्कुराते हुए कहा।
“धागे से नहीं, साथ निभाने से रिश्ते बन्धे रहते हैं।” आरव ने धीरे से उसका हाथ थाम लिया!
“यह धागा सिर्फ पति की लम्बी उम्र का नहीं, बल्कि हमारे विश्वास, हमारा सम्मान और हमारे साथ के उस वचन का प्रतीक है, जिसे हर दिन निभाने का प्रयास हमें करना होगा।” बरगद के चारों ओर घूमते हुए नन्दनी बुदबुदा रही थी।
“हे वटवृक्ष, हमारे रिश्ते की जड़ें भी इतनी ही गहरी होने में साक्षी रहना कि समय की आँधियाँ भी इन्हें हिला न सकें।” आरव ने पेड़ को प्रणाम करते हुए कहा।
अवहित्था
सम्मान समारोह के लिए मंच सज चुका था। मंच पर पुरस्कार की घोषणा होने ही वाली थी। इस साल के 'सर्वश्रेष्ठ लेखक' के रूप में मीरा का नाम लगभग तय माना जा रहा था। मंच से लेकर सभागार में बैठे सभी लोग मीरा की तरफ देख रहे थे, और राघव की नजरें भी लगातार सामने की पंक्ति में बैठी अपनी पूर्व मित्र और सह-लेखिका मीरा पर टिकी थीं। कुछ साल पहले दोनों के रास्ते एक कड़वाहट के साथ अलग हो गए थे।
अचानक उद्घोषक ने माइक संभाला, "और इस वर्ष के सर्वश्रेष्ठ लेखक हैं... राघव!"
पूरा हॉल तालियों की गड़गड़ाहट से गूँज उठा। राघव मंच की ओर बढ़ने लगा। उसने अनजाने में ही मीरा की तरफ देख लिया, मीरा के चेहरे पर एक पल के लिए घोर निराशा और दुःख का भाव आया, उसकी आँखें नम हुईं—शायद वह अपनी हार या पुराने दिनों को याद कर बैठी थी।
लेकिन अगले ही पल, जैसे ही बगल में बैठी सहेली ने मीरा की तरफ देखा, मीरा ने अपनी आँखें मूंद लीं। उसने एक गहरी साँस ली, चेहरे पर दुनिया भर की कृत्रिम सहजता और एक बड़ी सी मुस्कान ओढ़ ली। वह खड़े होकर सबसे ज्यादा उत्साह से तालियाँ बजाने लगी, जैसे राघव की इस जीत से ज्यादा खुशी उसे जीवन में कभी मिली ही न हो।
राघव मंच पर था, पर उसकी नजरें मीरा के उन हाथों पर थीं जो ताली बजा रहे थे,। थोड़ी देर के बाद वह मंच से उतर गया और “मैं समझ रहा हूँ कि इन कंगन की खनक के पीछे तुमने अपने भीतर कितने बड़े तूफ़ान को दबाए बैठी हो! लेखन में तो अव्वल थी ही, अभिनय भी बाकमाल कर लेती हो!” मीरा के पास से गुजरते हुए राघव ने कहा।
Monday, 11 May 2026
माँ की प्रतिक्षाएँ
ना कोई गिला
दंश सहे की कला
प्रश्न माँ जबाब माँ
स्व सोती गीला
स्वेच्छा से स्वत्व त्याग
थाती धैर्य का मिला
माँ प्रतीक्षा करती है
द्वार पर टँगी घड़ी की तरह
हर लौटते क़दम की।
सिर्फ़ सन्तान के लौट आने की नहीं,
कभी अपने नाम से पुकारे जाने की भी।
सुबह की पहली रोटी के साथ
वह रख देती है
दिनभर की छोटी-छोटी आशाएँ—
बिना झुँझलाए कोई बात कर ले,
कोई उसके सिरदर्द को भी
समाचार समझे।
कोई पूछे—
“आज तुमने क्या खाया?”
जैसे वह बरसों पूछती रही है सबसे।
वह प्रतीक्षा करती है
कि बच्चे जब सफल हों
तो परिचय में सिर्फ़ पिता का नाम नहीं,
उसकी जागी रातें भी दिखाई दें।
रसोई से बाहर की एक सुबह का,
जहाँ चाय की भाप में
उसके अपने सपने भी उबलें थे!
बरसों पुराने सन्दूक में
उसने कुछ इच्छाएँ छिपा रखी हैं—
एक अधूरी यात्रा,
एक बिना टोके हुई नींद,
एक शाम
जब वह सिर्फ़ अपने लिए सज सके।
पुरानी अलमारी में तह किए
अपने अधूरे शौकों की—
कभी फिर से रंग उठाने की,
कभी किताबों में लौट जाने की।
माँ को प्रतीक्षा रहता है
उस फ़ोन का
जो केवल काम से न आया हो,
जिसमें कोई कहे—
“बस तुम्हारी आवाज़ सुननी थी।”
वह प्रतीक्षा करती है
कि घर के निर्णयों में
उसकी चुप्पी को सहमति न माना जाए।
कभी-कभी माँ को
अपने ही जन्मदिन की तारीख़
याद रखे जाने की प्रतीक्षा भी होती है।
वह चाहती है कि बुढ़ापे में
उसे बोझ नहीं, घर का इतिहास समझा जाए।
उसे प्रतीक्षा रहती है
कि घर में उसकी उपस्थिति
सिर्फ़ सुविधा की तरह नहीं,
एक सिद्धान्त की तरह महसूस की जाए।
माँ प्रतीक्षा करती है—
त्योहारों पर
सिर्फ़ पकवानों की तारीफ़ न हो,
उसकी थकान भी पढ़ी जाए
बच्चे सिर्फ कमाने वाले हाथ न बनें,
उसके काँपते हाथ भी थामने वाले बनें।
बिना किसी अपराधबोध के
उसे भी आराम मिल सके।
और इन सब के सबसे भीतर—
एक बहुत धीमी, बहुत निजी प्रतीक्षा—
कि जिस तरह उसने
सबको बिना शर्त अपनाया,
कभी कोई उसे भी उसी तरह थाम ले।
माँ की प्रतिक्षाएँ
बहुत ऊँची-ऊँची मीनारें नहीं होतीं—
होती हैं बस इतना कि
जिस घर को उसने जीवन दिया,
उस घर में उसका अपना एक कमरा,
अपना एक समय, और एक सम्मान
सभी की आँखों में बचा रहे।
Saturday, 9 May 2026
मातृ दिवस : आस की गूँज
तपकर रिश्तों की अगन, सींचा सबका भाग
माँ का अनुपम त्याग है, जीवन उसका राग
मेघ गर्जन—
माँ की सिखलायी
धुन में नाचे
मृण शिल्प में
बोसा जुड़ रहा है—
मातृ दिवस
पहला तारा
माँ सिखला रही है
गाँठ खोलना
Thursday, 30 April 2026
०१ मई : लघुकथाकार श्री मधुदीप जयन्ती
पंचर की मरम्मत
“कारखाने की घड़ियों की टिक-टिक मेरे सिर में हथौड़ों की तरह बज रही थी। मेरे पेडू का दर्द किसी तेज़ धार वाले चाकू की तरह उसे भीतर से काटता लग रहा था। मेरे माथे पर पसीने की बूँदें चमक रही थीं, जबकि मैं काँपते हाथों से सिलाई मशीन पर कपड़े की तह लगा रही थी। मैंने हिम्मत जुटाकर सुपरवाइजर के पास जाने का फैसला किया। ‘स्साब, साहब! बहुत तेज़ दर्द है... क्या मैं आज एक घंटे जल्दी जा सकती हूँ?’ मैंने सुपरवाइजर से पूछा।
“तुम लड़कियाँ काम पर क्यों आती हो? तुम पुरुष कर्मचारियों का ध्यान भटकाने ही तो आती हो!” सुपरवाइजर ने अपनी फाइल से नज़रें हटाईं और ज़हरीली मुस्कान के साथ पूरी फैक्ट्री के सामने चिल्लाकर कहा।
मैं सन्न रह गई। पूरी यूनिट में सन्नाटा छा गया। आस-पास काम कर रहे पुरुष सहकर्मियों की नज़रें मुझे चुभने लगीं। लज्जा और अपमान की एक लहर मेरे चेहरे पर दौड़ गई। मुझे मेरे दर्द से ज़्यादा गहरा घाव उन शब्दों ने दिया था।
“नहीं साहब, व्ववो बात नहीं है..." मेरी आवाज़ मेरे ही गले में ही फँस रही थी।”
"तो फिर चुपचाप काम करो। यहाँ नखरों के पैसे नहीं मिलते। अगर ज़्यादा तकलीफ है, तो कल से आने की ज़रूरत नहीं है। बिना वेतन की छुट्टी चाहिए या नौकरी? तय कर लो," डाँटते हुए सुपरवाइजर ने अपनी कुर्सी घुमा ली थी।
मैं वापस अपनी मशीन पर आकर बैठ गई। मैं जानती थी कि मेरे घर का चूल्हा इसी दिहाड़ी से जलता है। बीमार माँ की दवाइयाँ और छोटे भाई की फीस के बीच, मैं 'बिना वेतन की छुट्टी' का बोझ नहीं उठा सकती थी। जबकि मुझे दो दिनों की विशेष छुट्टी की विशेष ज़रूरत थी! मैंने अपनी मुट्ठियाँ भींचीं और दोबारा मशीन चलाने लगी। आँखों से टपका एक आँसू कपड़े के एक कोने पर गिरा और रंगीन धागों में समा गया। वह मशीन नहीं चल रही थी, बल्कि एक मजबूर लड़की का स्वाभिमान उन भारी पहियों के नीचे कुचला जा रहा था। कारखाने का शोर फिर से शुरू हो गया, लेकिन उन पत्थर की दीवारों के पीछे मेरी जैसी हज़ारों चीखें आज भी अनसुनी रह जाती इसलिए मैंने अदालत में जाने का कारण बनाया!” साक्षात्कार लेने आई पत्रकार रमा को एकता ने पूरी कथा सुना दी।
“आपने ऐसा क्या किया?”
“मशीन के हैंडिल से पहले सुपरवाइजर के सर पर पीछे से वार कर दिया। फिर तो गार्ड के आने तक में अनेक महिलाएँ भी सहयोगी हो गई थीं। सुपरवाइजर के सर पर बँधा पट्टी और हाथ-पैर पर चढ़ा प्लास्टर मेरी बातों की गवाही दे सकता था!”
“क़ानून के शरण में जाने के लिए क़ानून को अपने हाथों में लेना क्या ज़रूरी था?”
“-सुविधा और अधिकार के बीच बस एक ‘कानून’ का ही तो फासला होता है। हाँ! मुझे सुपरवाइजर को फोड़ना नहीं चाहिए था। लेकिन बिना प्रमाण के क़ानून अपना काम नहीं करता है! दया झुककर माँगी जाती है और अधिकार—सीधे खड़े होकर ही लिया जा सकता है। आपने बाहर अदालत की पंक्तियाँ (कारखाने के गेट पर एक नया नोटिस चिपका था)
“औरत की नौकरी-औरत की कमाई सिर्फ पैसों की नहीं होती... कभी-कभी उसे अपना आत्मसम्मान भी कमाना पड़ता है। महिला कर्मचारियों को उनके सुविधानुसार हर महीने दो दिनों का ‘विशेष अवकाश’ मिलेगा। पढ़ी होगी!”
रमा ने कुछ देर तक अपने डायरी में भी लिखी उन पंक्तियों को देखा—
उसके आँखों में न आँसू थे, न गुस्सा—बस एक गहरी समझ थी।
“कागज़ पर लिखे शब्द तब तक खोखले हैं, जब तक उनके पीछे कानून की स्याही और अधिकार की मुहर न हो। मैंने ने जब इसे पढ़ा था तो बरसों से दबा मेरा भी विशेष दर्द जैसे पहली बार शब्द बनकर बाहर आया हुआ लगा।” बाहर आकर रमा बुदबुदा रही होती है। पत्रकारिता शुरू करने के पहले एक कारखाना में दस सालों तक रमा ने भी बहुत कुछ सहा था— आज उसके नासूर पर दवा लगी थी।
Sunday, 26 April 2026
मोक्ष में दरार या प्रलय में सेन्ध?
26 जनवरी 3026
जहाँ तक नज़रें जाती हैं पृथ्वी पूरी तरह शुद्ध, नियंत्रित और निष्प्राण सन्तुलन का पर्याय बन चुकी है। दर्द, प्रतीक्षा, प्रेम—ये शब्द इतिहास-संग्रहालय की धूलभरी वस्तुएँ हो गए हैं। मनुष्य अब जन्म नहीं लेते हैं बल्कि बनाए जाते हैं—‘सिंथेसिस चैम्बर्स’ में, जहाँ कोशिकाएँ विभाजित होकर एक-सी आकृतियाँ, एक-सी बुद्धि और एक-सी स्थिरता के साथ बाहर आती हैं!
26 फ़रवरी 3026
इरा—प्राचीन इतिहास की शोधकर्ता—खोई हुई अनुभूतियों की खोज में है, आज उसे तहखाने में एक जर्जर डायरी मिली। पन्नों पर बार-बार एक शब्द उभर रहा था— ‘माहवारी’ और नीचे काँपते अक्षरों में लिखा था— “यह सृजन की प्रतीक्षा का लाल रंग है।”
इरा ठिठक गई।
“प्रतीक्षा…?” उसने फुसफुसाया, “जब सब कुछ निर्धारित है, तो प्रतीक्षा कैसी?”
उसी क्षण उसके पेट के निचले हिस्से में एक अनजाना कसाव उठा—धीरे-धीरे बढ़ता हुआ। यह कोई दर्ज पीड़ा नहीं थी, कोई प्रोग्राम्ड संकेत नहीं था। कुछ ही पलों में उसके सफेद वस्त्र पर लाल रंग फैलने लगा—गर्म, जीवित, अनियोजित। उसकी उँगलियाँ काँप उठीं।
26 मार्च 3026
“तुम्हारे भीतर एक सुप्त जीन सक्रिय हुआ है। शायद सिंथेसिस प्रक्रिया में कुछ प्राचीन डीएनए अनुक्रम पूर्णतः निष्क्रिय नहीं किए जा सके थे। तुम्हारा शरीर… जैविक चक्र की ओर लौट रहा है।” आज लैब में जाँच के बाद डॉक्टर-रोबोट की निष्प्राण आवाज गूँजी।
“लौट रहा है…?” इरा ने इस वाक्य को बार-बार ऐसे सुना जैसे कोई भूली हुई धुन फिर से कानों में उतर आई हो। वह चुपचाप अपने कक्ष में लौट आई।
उसने उस लाल धब्बे को फिर देखा—वह मात्र रक्त नहीं था, वह एक आरंभ था… किसी अनकहे संबंध का, किसी अधूरे चक्र का।
उस रात उसने डायरी के अंतिम पृष्ठ पर लिखा—
“मैं एक ‘नमूना’ नहीं, एक ‘संभावना’ हूँ। मेरे भीतर एक ऐसी जगह है, जहाँ मशीनें नहीं पहुँच पातीं—जहाँ जीवन स्वयं आकार लेना चाहता है, बिना आदेश, बिना प्रतिकृति।”
26 अप्रैल 3026
“इरा को ‘त्रुटिपूर्ण इकाई’ घोषित किया गया है। उसे पुनर्संरचना हेतु तत्काल प्रस्तुत होना होगा।” सायरन के संग सन्देश गूँजा। इरा ने सन्देश सुना और फिर शान्त भाव से डायरी को सीने से लगा लिया। कुछ क्षण बाद उसने उसे तहखाने की उसी दीवार में छुपा दिया, जहाँ से वह मिली थी। बाहर दुनिया वैसी ही है -निर्मल, नियंत्रित और शान्त। पर उस शान्ति में अब एक हल्की-सी दरार पड़ चुकी थी। क्योंकि कहीं न कहीं, किसी और शरीर में… कोई और ‘सुप्त जीन’ जागने को तैयार हो गया है। और प्रकृति— वह कभी पूरी तरह मौन नहीं होती।
26 अप्रैल 2026 -रचना काल
Friday, 17 April 2026
17 अप्रैल -अन्तरराष्ट्रीय हाइकु दिवस
युद्धान्तहीन—
पृष्ठों के युद्धपोत
बाड़ के पास
##
ख़िंज़ाँ की शाम—
ग्रहण में ही रहा
आह या वाह
##
तुम और मैं
ना/क्यों ‘हम' नहीं रहे—
ख़िज़ाँ की शाम
##
भिन्नार्चा स्थल
शरणार्थी शिविर—
युद्धान्तहीन
##
स्मृति पट्टिका—
आँसू से भींगे पाँव
पत्ती कुचले
##
छड़ी कोर से
इंद्रायुध छू लेना
झाग बौछारें—
शमी का फूल
पुनः ताल में तैरे—
पृथ्वी दिवस
Wednesday, 15 April 2026
बन्धनों का बसन्त
लघुकथा 1️⃣
“तुम्हें तितली बनना है! तुम कब तितली बन जाओगी ?” कमरे की खिड़की पर रखे गमले में एक हरी-सी इल्ली कई दिनों से चुपचाप पड़ी थी। राधिका रोज़ उसे देखती और पूछती। घर के भीतर उसकी अपनी दुनिया भी कुछ वैसी ही थी—नियमों के धागों में लिपटी, उम्मीदों के खोल में बन्द।
“अच्छी लड़कियाँ ज़्यादा उड़ान नहीं भरतीं, बस! अपने घर की होकर रह जाती हैं…। सभी कन्याओं का तितली बनना ठीक नहीं होता है।” उसकी माँ की आवाज़ रोज़ गूँजती रहती। राधिका मुस्कुरा देती है, पर उसकी आँखें खिड़की के उस कोने में टिक जाती हैं, जहाँ इल्ली अब कोकून बन चुकी थी। एक सुबह, हल्की धूप के साथ कोकून फटा। रंगों से भरी एक तितली बाहर आई—धीरे-धीरे पंख फैलाए, फिर एक झटके में उड़ गई। राधिका ने गहरी साँस ली।
“देखा? तितली बनकर उड़ गई न? अब कहीं मसल दी जाएगी!” उसके पीछे से माँ ने कहा।
“हाँ माँ… वह तितली बन गई।” राधिका ने खिड़की से बाहर झाँकते हुए कहा—
थोड़ी देर रुकी, फिर धीमे से पूछा-
“और मैं…! मेरे लिए माँ तुम कब कहोगी, बनना तितली!?”
“जा, बन जा तितली! -वायुयान चालक बनने की तैयारी कर ले!” माँ ने कहा
“देखना माँ! मेरे पंखों के रंग किसी अन्य की हथेलियों में नहीं दिखेंगे!” उस दिन पहली बार, राधिका ने खिड़की बन्द नहीं की।
लघुकथा 2️⃣
“ऐसी रहस्यमयी दुनिया जिसमें सेवा-निवृत्त पदाधिकारी गुम हो जाता है और वर्षों बाद पता चलता है कि वह किसी दूसरी औरत के साथ नई ज़िन्दगी बसा ली! उसी दुनिया में साठ साल का शिक्षक, अट्ठाइस साल की शिक्षिका से शादी कर लेता है—यह समय किस काल से गुजर रहा है?” पूछते हुए सीमा की आवाज़ में खिंचाव था।
“तुम्हें आज इस फिसलने वाले काल की बेचैनी क्यों है?” राघव ने चाय का कप रखते हुए पूछा।
“बेचैनी?” सीमा हँसी, पर हँसी में कड़वाहट थी— “जाके पाँव न फटी बिवाई, वह क्या जाने पीर पराई!” व्यंग्य की धार तीखी थी।
“अगर तुम सच में इस पीर से गुजर रही हो, तो कहो… यूँ पहेलियों में बात करोगी तो कोई नहीं समझेगा।” पहले राघव कुछ पल चुप रहा, फिर पूछा।
सीमा ने खिड़की के बाहर देखा। सामने स्कूल का प्रांगण था। एक कोने में बासठ साल के सेवानिवृत्त गुरुजी खड़े थे—सफेद बाल, हल्की मुस्कान। उनके पास एक नई शिक्षिका थी—हँसती, कुछ कहती हुई।
“आइए प्रिय। आज तो आप सच में तितली लग रही हैं।” गुरुजी ने सहजता से उसे पुकारा।
“देखा? यही है आज का फिसलपट्टी का काल। उम्र, मर्यादा, संबंध—सब घुल गया है जैसे।” सीमा का चेहरा कस गया था।
“या फिर हम देखने का नज़रिया खो चुके हैं। क्या पता… दोनों ने अपने जीवनसाथी खोए हैं, दोनों अकेले हैं! एक-दूसरे की खाली जगह को भरने का प्रयास कर रहे हों। हर रिश्ता छल नहीं होता, सीमा।” राघव ने धीरे से कहा।
सीमा मौन साधे रही। उसके चेहरे का ज्यामिति विभिन्न आकार दर्शा रहा था।
“तितली बनना हमेशा देह का ही नहीं होता है, कई बार यह मन का खोल तोड़ने का साहस भी होता है।” राघव ने आगे कहा— शायद वे ‘तितली बनना’ नहीं, ‘बनना तितली’ सीख रहे हैं—देर से ही सही।”
सीमा की आँखें फिर उस दृश्य पर टिक गईं। गुरुजी और वह शिक्षिका अब साथ-साथ चल रहे थे—धीमे, मगर सन्तुलित कदमों से। सीमा ने पहली बार उनके चेहरे पढ़ने की कोशिश की—वहाँ कोई उछाल नहीं था, बस एक थकी हुई शान्ति थी… जैसे दो टूटे पंखों ने मिलकर उड़ना सीख लिया हो।
“शायद… हर उड़ान उच्छृंखल नहीं होती।”-उसने धीमे से कहा।
“और प्रत्येक तितली बनने की कहानी, एक जैसी भी नहीं होती।” राघव ने मुस्कुराते हुए कहा।
Friday, 3 April 2026
मैग्मा की रसीद
“आज का साहित्य चरित्रहीनों का होता जा रहा है।” वार्षिकोत्सव की साहित्यिक गोष्ठी अपने अन्तिम पायदान पर थी। मंच पर बैठे वरिष्ठ साहित्यकारों के बीच हो रही परिचर्चा में बहस छिड़ी हुई थी— और नीचे बैठी साहित्यिक श्रोताओं की भीड़ में मेधा चुपचाप सब सुन रही थी। अभी-अभी उसे अपने लिखे उपन्यास के लिए प्रतिष्ठित साहित्य पुरस्कार मिला था। लेकिन बधाइयों से ज्यादा उसके कानों में फुसफुसाहटें पड़ रही थीं—
“समझ रहे हो न, कैसे मिला होगा पुरस्कार…”
“अकेली औरत इतनी जल्दी ऐसे कहाँ पहुँचती है…”
“आजकल स्त्रियाँ खुद अपने चरित्र का पतन कर रही हैं, तभी समाज बिगड़ रहा है।” मंच पर बैठे एक वरिष्ठ कवि ने उदाहरण देते हुए कहा— मेधा का साथ उसके धैर्य ने छोड़ दिया। वह उठी और बिना बुलाए ही मंच की ओर बढ़ गई। हॉल में सन्नाटा छा गया। “क्या मैं कुछ कह सकती हूँ?” उसने माइक थामते हुए पूछा।
“चारित्रिक पतन सिर्फ़ स्त्रियों के लिए ही क्यों कहा जाता है? अगर कोई स्त्री वैश्या बनती है, तो क्या पुरुष सहभागी नहीं होता? जो स्त्री को मैला कहकर खुद को साफ़ घोषित कर देते हैं, वे आखिर किस आईने में खुद को देखते हैं?” अनुमति की प्रतीक्षा किए बिना ही वह बोल भी पड़ी— भीड़ में हलचल हुई। मंच पर बैठे चेहरे असहज हो उठे।
“गाँव में भीड़ द्वारा स्त्रियाँ प्रताड़ित की जाती हैं, तो उसके चरित्र को मोहरा बनाया जाता है, कार्यालय में किसी स्त्री को पदोन्नति मिल जाए, तो उसकी मेहनत नहीं, उसके चरित्र पर सवाल उठते हैं। और हद तो यह है कि साहित्य—जो समाज को दिशा देने वाला कहलाता है—वहाँ भी इस सोच से अछूते मनुष्य नहीं हैं।” मेधा ने आगे कहा— अब उसकी आवाज़ और गम्भीर हो गई थी—
“दोष अगर है, तो आईने का नहीं, देखने वाली नज़रों का है। लेकिन यहाँ तो आधा आईना ही धुंधला कर दिया जाता है… ताकि धब्बे सिर्फ़ स्त्री के चेहरे पर दिखें।” सभागार कुछ पल के लिए बिल्कुल शान्त हो गया। फिर पीछे की पंक्ति से एक महिला खड़ी हुई और उसने ताली बजाई। उसके बाद दूसरी, फिर तीसरी… देखते ही देखते पूरा हॉल तालियों से गूँज ज उठा। मंच पर बैठे वही वरिष्ठ कवि धीरे से अपना चेहरा झुका चुके थे। शायद पहली बार उन्हें एहसास हुआ था— कि चरित्र का दर्पण किसी एक लिंग का नहीं होता।
मेधा के मन में उठे तूफ़ान और उसके द्वारा की गई बेबाक बात ने सभा को स्तब्ध कर दिया था। उस शाम, जब वह स्मृति-चिह्न लेकर घर लौट रही थी, उसने एक पुराने, जर्जर काठ के पुल पर रुकना चाहा।
शाम गहरा रही थी, और वातावरण में धुंध सी छा गई थी। मेधा पुल के किनारे, काठ के जंगले पर टेक लगाकर बैठ गई। वह हताश और अकेली महसूस कर रही थी। चारों ओर सूखी पत्तियों का ढेर था, जो उसके मन की सूखी उम्मीदों की तरह बिखरा था। पुल के परे, पेड़-पौधों से भरी धुंधली और उदास दुनिया दिख रही थी। अचानक, उसकी नज़र दूर, धुंध में उड़ते हुए पक्षियों पर पड़ी। वे काली, परछाइयों की तरह लग रहे थे, एक समूह में, मुक्त और निर्भीक। वे उस धुंध को चीरते हुए, किसी अनदेखी दिशा में उड़ रहे थे। मेधा ने उन्हें देखते हुए एक गहरी साँस ली। "मैं भी तो इन पक्षियों की तरह हूँ। पितृसत्तात्मक धुंध को चीर कर, अपनी स्वतंत्र पहचान और अपनी योग्यता के आधार पर आगे बढ़ रही हूँ। सभा में मैंने जो बात रखी, वह बिलकुल सही थी। अपनी मेहनत और प्रतिभा के लिए सम्मान की मांग ही तो रखी थी।" बुदबुदाते हुए उसने अपनी स्मृति-चिह्न को ध्यान से देखा, जो अब उसके हाथ में एक मशाल की तरह लग रही थी।
Wednesday, 1 April 2026
रेवड़ी की जवाबदेही
डायरी लेखन
सोमवार, ५ जून २०२३
"भाइयों! सरकार ने इस साल हर किसान को 'स्वर्ण-फसल’ किट मुफ्त देने का फैसला किया है। जो कि आपके पसीने का सम्मान है।" आज गाँव के चौपाल पर एक सरकारी जीप आकर जैसे रुकी सरपंच गजानन ने ऊँची आवाज में जुटे हुए किसानों की भीड़ को सम्बोधित करते हुए कहा।
"देख सोमनाथ, अपनी तो किस्मत चमक पड़ी! इस किट की वजह से, अब न तो बीज के पैसे देने हैं, न खाद के और न छिड़काव वाली दवा के। बिजली-पानी भी मुफ्त की व्यवस्था पहले से ही हो रखी है। हमारे तो मौजे ही मौजे हो गए। इस बार तो हमारा बचा हुआ पैसा हमारे मौज-मस्ती में उड़ पाएगा।" भीड़ में खड़े दीनू ने अपने बगल में खड़े सोमनाथ को कोहनी मारते हुए कहा।
"दीनू भाई, यह मुफ्त की चीज नहीं है, यह एक कर्ज है जो हमें अपनी धरती को ही चुकाना पड़ेगा।” सोमनाथ ने बड़े ही शान्त भाव से किट थामते हुए कहा।
मंगलवार, ११ जुलाई २०२३
आज अपने खेत के किनारे लगे नीम के पेड़ के नीचे लेटा दीनू बीड़ी फूँक रहा था और सोमनाथ पसीने से तर-बतर होकर अपने खेत में निराई कर रहा था।
"अरे सोमनाथ! क्यों जान सूखा रहा है? सभी चीजें तो मुफ्त के हैं। थोड़ा-बहुत भी उग गया अपने वारे-न्यारे हैं, और नहीं भी उगे तो अपना क्या जा रहा है? जेब से तो एक धेला नहीं लगा।" दीनू ने उपहास उड़ाते हुए कहा।
"यही तो तुम्हारी भूल है दीनू। जब सरकार हमें कुछ मुफ्त में देती है, तो हमारी जवाबदेही दोगुनी हो जाती है। वह किट किसी और के हक के भी हो सकते थे जो हमें मिले हैं। अगर मैंने इससे सोना नहीं उगाया, तो मैं उस भूखे पेट का गुनहगार हूँ जिसे यह मिल सकता था।"सोमनाथ ने निराई करते हुए ही कहा।
“अरे छोड़ो! ये किताबी बातें हैं। हम पात्र थे, इसलिए हमें मुफ्त में मिली हैं। चादर से चेहरा ढँको और सो जाओ।" मुँह फेरते हुए दीनू ने कहा।
शुक्रवार, ६ अक्टूबर २०२३
आज गाँव में कृषि अधिकारी मुआयने के लिए आए। दीनू के खेत में पीली और बीमार फसल खड़ी थी। उसने खाद का डिब्बा आधे दाम में शहर में बेच दिया था और खेतों में पानी देने के बजाय ताश खेलने में वक्त बिता रहा था! "साहब, बीज ही खराब थे! सरकार से हमें धोखा मिला।" जब अधिकारी ने दीनू से उसकी फसल के बारे में पूछा, तो दीनू रोते-रोते हुए कहने लगा।
उसे लेकर अधिकारी सोमनाथ के खेत पर गए। उसकी फसल ऐसी थी कि देखकर सभी की आँखें चौंधिया रही थी। सोमनाथ ने न केवल उन बीजों का सही उपयोग किया था बल्कि समय से पानी-दवा का छिड़काव किया था और अपनी मेहनत से मिट्टी को ऐसा तैयार किया था कि फसल से पैदावार उम्मीद से दुगनी होने वाली थी।
"दीनू! बीज खराब नहीं थे, तुम्हारी नीयत खराब थी।" कृषि अधिकारी ने सबके सामने कहा।
"साहब। गरीब, मूर्ख आदमी हूँ, एक मौका और दे दो।" कहते हुए दीनू ने कृषि अधिकारी के पाँव पकड़ लिया।
"नहीं दीनू भाई! जवाबदेही का मतलब सिर्फ हिसाब देना नहीं होता है बल्कि उस भरोसे को कायम रखना भी होता है जो व्यवस्था ने हम पर किया होता है। तुमने 'रेवड़ी' को 'खैरात' समझा, जबकि वह 'पूँजी' थी। हम अपाहिज नहीं थे कि सरकार ने हमें बैसाखी थी, बल्कि उसने हमें पंख दिए थे।" सोमनाथ ने आगे बढ़कर दीनू को उठाते हुए कहा।
"तदबीर से ही तक़दीर बदली जा सकती है!” एक तरफ़ अधिकारी अपने डायरी में नोट लिख रहा था और दूसरी तरफ़ दीनू खाली हाथ अपने घर लौट रहा था।
Wednesday, 25 March 2026
वर्ण पिरामिड : शीर्षक - रामनवमी
- स्त्र
- याग
- हे राम
- हरे रामा
- त्राण में न्यारा
- थके का सहारा
- अनादि पर वारा
>>>>><<<<<
- हाँ!
- दर्दी
- मनोज्ञ
- रामजस
- मेरा मैं स्वयं
- राम तत्व की लौ
- मर्यादाओं की नदी
^^^
- ढला सूरज
- लम्बी सैर के संग—
- प्रेमिल गीत
- 🎶
- लुढ़के आँसू—
- तारों पर सितारें
- चमक रहे
- ^^^
- फौजी की चिट्ठी—
- भोर तक में कौड़ा(अलाव)
- बुझ ही गया
- ^^^
- कुनबा जुटा
- चौके के झिर्री पर-
- प्रेम दिवस
- ^^^
- संगनियों का
- अनकहा सुलझा—
- खिलीं सरसों
- ^^^
- मदनोत्सव—
- नथ बन्द के संग
- स्वप्न की कथा
- ^^^
- फूलचोर की
- कुत्ता पर भौं टेढ़ी—
- नूतन वर्ष
- ^^^
- क्रिशकिंकल—
- कॉकटेल की गन्ध
- कैब में फैली
Saturday, 21 March 2026
शिखर का पृष्ठ
“पिछले साल कई शल्य-चिकित्साओं से गुज़री हैं, देख लो, इनके पेट की क्या हालत हो गई है— छोटे-छोटे टीले जैसे उभर आए हैं…” बहू धीरे-धीरे सास की साड़ी का पल्लू सरकाकर निशान दिखला रही थी। सास की कराहने की आवाज़ में दर्द था, पर उनकी आँखों में एक अजीब-सी जिद भी थी।
“जाने से पहले भी इनके कमर में दर्द था। चिकित्सक ने एमआरआई करवाने को कहा था, लेकिन इन्होंने कहा—पहले साहित्योत्सव से लौट आऊँ, फिर इलाज़ करवा लूँगी!”
“माँ! ये कोई समझदारी है? अपनी उम्र और हालत देखी हैं आपने?”कमरे में बैठे बेटे की आवाज़ अचानक बहुत ऊँची हो गई—
बेटे की बात पूरी भी नहीं हुई थी कि उसके पिता ने चश्मा उतारकर मेज़ पर रख दिया। उनकी आँखों में वर्षों का धैर्य और स्मृतियों की चिंगारी तैर रही थी।
“तुम्हारी माँ ने कुछ ग़लत नहीं किया…” वे धीरे, लेकिन ठहरकर बोले—
“तुम्हें याद है? जब इन्हें तेज़ बुख़ार होता था, तो यही सर पर पट्टी बाँधकर तुम्हारे लिए टिफ़िन बनाती थीं… खुद काँपती रहती थीं, पर तुम्हें भूखा नहीं जाने देती थीं।” बेटा का सर झुक गया।
“इतने सालों में न जाने कितनी बार अपने दर्द को किनारे रखकर इन्होंने घर, परिवार और तुम्हारी ज़रूरतों को चुना है, और आज अगर अपने शौक—अपने सपने—के लिए एक बार अपने ही कष्ट को पीछे कर दिया, तो तुम्हें यह ग़लत लग रहा है?” कमरे में घनघोर सन्नाटा उतर आया।
“इनकी उम्र अब कहाँ है कि हर बार ‘बाद में’ कहकर टालती रहें! स्त्रियों की भी कुछ इच्छाएँ होती हैं, जो इलाज़ से पहले पूरी हो जानी चाहिए।” पिता ने माँ की ओर देखा—
माँ की आँखों में नमी तैर रही थी।
“हमें क्षमा कर दो माँ। हम नासमझ भूल कर रहे थे- माँ भी तो इंसान होती है। मन्दिर की माँ बनाना चाह रहे थे! अगली बार के साहित्योत्सव में हम भी साथ चलेंगे।”बेटा धीरे से माँ के पास आया, उनके कन्धे पर हाथ रखा और धीमे स्वर में कहा।
Tuesday, 17 March 2026
मिट्टियों पर रीझा दिल
विश्वविद्यालय के सभागार में चर्चा चल रही थी—विषय था “प्रवासी भारतीय और उनकी निष्ठा”। श्रोताओं के बीच बैठे लोग गम्भीर थे, जैसे हर शब्द किसी पुराने घाव को कुरेद रहा हो।
“फ़र्ज़ कीजिए, कभी ऐसा समय आए कि अमेरिका और भारत के रिश्ते बिगड़ जाएँ और अमेरिका भारत पर मिसाइल हमले करने लगे। तब अमेरिका में बसे भारतीय क्या चाहेंगे—अमेरिका की जीत और भारत की हार?” मंच से एक युवक ने सवाल उछाला। सभागार में खामोशी वापस लौटी लहरें सी उतर आई।
“क्रिकेट की तरह क्या वे वहाँ के नमक का हक़ अदा करेंगे? भले ही कोई मिसाइल उस गाँव पर गिरे जहाँ उनके अपने घरवाले रहते हों?” युवक ने आगे कहा।
पतझड़ में गिरे आखरी पत्ता सा सवाल हवा में तैरता रह गया। कुछ लोग असहज होकर कुर्सियाँ खिसकाने लगे।
तभी पीछे की पंक्ति से एक अधेड़ स्त्री उठीं। उसके चेहरे पर थकान नज़र आ रही थी, “उत्तर क्यों नहीं देना चाहेंगे?” उन्होंने स्थिर आवाज़ में कहा। सभागार का ध्यान उनकी ओर मुड़ गया।
“मेरा बेटा अमेरिका में रहता है। कई बार उसकी कुछ बातों से मुझे लगा कि वह अपनी जड़ों को भूल रहा है। मैं तो कई मंचों से उस पर देशद्रोह का आरोप लगाने की माँग तक कर चुकी हूँ।” उन्होंने धीमे-धीमे कहना शुरू किया— लोग चौंक गए।
“लेकिन…” उन्होंने हल्की मुस्कान के साथ जोड़ा—
“अमेरिका में जितने भारतीयों से मिली हूँ, वे भारत में रहने वाले बिहारी, बंगाली, राजस्थानी से ज़्यादा सिर्फ भारतीय लगे—कई बार तो उनसे बहुत ज़्यादा।” सभागार में सन्नाटा अमावस्या सा गहरा गया।
“वे वहाँ की मिट्टी में रहते हैं, पर उनकी धड़कनें अभी भी यहाँ की धूल से जुड़ी रहती हैं। वे भारत की हार कभी नहीं चाहेंगे।” थोड़ा रुककर उन्होंने युवक की ओर देखा—
“और जहाँ तक क्रिकेट की बात है… वह खेल है। खेलों में तो एक ही देश के दो दल भी होते हैं—अभ्यास के लिए, सीखने के लिए। वहाँ जीत-हार से दिल नहीं टूटते।”
उनकी आवाज़ हल्की काँप रही थी-
“पर युद्ध… युद्ध में तो दिल ही टूटते हैं। और जिनके दिल दो मिट्टियों के बीच धड़कते हों, वे किसी की हार नहीं—बस अपनों की सलामती चाहते हैं।”
सभागार में सुई/पिन भी गिरती तो लाउडस्पीकर पर शोर गूँज जाती-
Wednesday, 25 February 2026
थाती का व्यास
पटना -२० फरवरी २०२६
भाई राजेन्द्र,
सस्नेहाशीष!
आशा करती हूँ, सपरिवार तुम सानन्द होगे। तुम जब पिछली बार पटना आए थे तब भी रामदीन को लेकर चिन्ताग्रस्त थे। रामदीन की झुर्रियों में धूप के धब्बे स्पष्ट दिख रहे थे लेकिन उसके आँखों में कोई पुराना उजाला अटका हुआ था। उसके एक हाथ में कपड़ों की पोटली थी—रंगहीन, थकी हुई, जैसे उसके लिए रोज़ी-रोटी की मजबूरी हो। दूसरे हाथ में वह एक अजीब-सा, बहुत बड़ा चित्तीदार गुब्बारा थामे था। गुब्बारा बहुत विशाल था। लग रहा था कि, वह रामदीन को सहारा दे रहा है, रामदीन उसे नहीं सहारा दे रहा है। गली से गुजरते लड़के ठिठककर हँस पड़े थे- “काका! बुढ़ापे में मेला लगाओगे क्या?”
रामदीन ने मुस्कुराकर सिर झुका लिया था। तुमने कहा था, “देखो न दीदी। उसकी मुस्कान में जवाब नहीं, बस धैर्य है! बच्चों को कौन समझा सकता है कि ऐसा ही यह गुब्बारा उसके बीमार पोते की जिद है,”
“हाँ, उसका पोता, जिसकी खाँसी रातों को दीवारों से टकराती रहती है। चिकित्सक ने दवाइयाँ दी है। पर बच्चे ने दादा से कहा था, -‘दादा, बड़ा वाला गुब्बारा लाना, आसमान जितना।’ मैंने कहा था और
रामदीन बुदबुदा रहा था—“क्या आसमान खरीदा जा सकता है?”
तुम्हारा दुःख और बढ़ जाएगा यह जानकर कि उस समय रामदीन ने अपनी दो वक्त की रोटी में से भी कुछ कौर कम कर दिया था और उस त्याग की कीमत पर खरीदा जाता था ऐसा गुब्बारा—हवा से भरा, पर उसके लिए उम्मीद से भरी। तब रामदीन के हाथ में एक खुला आसमान का अवसर था। वह जानता था—गुब्बारा फूटेगा। हवा निकल जाएगी। शायद पोते की हँसी भी कुछ दिनों की मेहमान हो। पर उस क्षण, उसे विश्वास था जब वह छोटा-सा बच्चा इस बड़े गुब्बारे को देखकर खिल उठेगा, तब उसके कमरे में बीमारी नहीं, रंग भर जाएँगे। और वही सच हुआ-
जैसे आज परदेश से लौटे उसी पोते ने ठीक वैसा ही गुब्बारा रामदीन को थमाया था-
“कभी-कभी जिन्दगी में रोटी से भी ज्यादा जरूरी एक मुट्ठी हवा हो जाती है—जो किसी के फेफड़ों में नहीं, उसके दिल में भर दी जाए!” बुदबुदाता हुआ रामदीन ने गुब्बारे को थोड़ा कसकर थाम लिया।
जीजी सा को चरण स्पर्श और बिटिया सी भाभी अनीता से मेरी ओर से स्नेह और बच्चों को शुभाशीष कह देना!
पत्रोत्तर की प्रतीक्षा में
तुम्हारी दीदी माँ (नारियल)
सुझाव मिला
थाती का व्यास
जोधपुर
२१-०२-२०२६
प्रिय मित्र सुनील,
सप्रेम नमस्कार
मैं यहाँ सपरिवार सकुशल हूँ। आशा है तुम भी सकुशल होगे।
पिछले पत्र में तुमने मुझसे एक साहित्यिक पहेली पूछी थी, “हवा की क़ीमत क्या है?” मैंने बहुत सोचा कि क्या उत्तर दूँ। तभी कल ऐसा कुछ घटा कि पहेली का उत्तर स्वतः हो प्राप्त हो गया। मेरे घर के पीछे कच्ची बस्ती में एक रामदीन नामक निर्धन व्यक्ति रहता है। अक्सर मिलता है, तो राम-राम करता है। कल मैं घर लौट रहा था, तभी कड़ी धूप में रामदीन को देख कर चौंक उठा।
रामदीन की झुर्रियों में धूप के धब्बे स्पष्ट दिख रहे थे लेकिन उसके आँखों में कोई पुराना उजाला अटका हुआ था। एक हाथ में कपड़ों की पोटली थी—रंगहीन, थकी हुई, जैसे रोज़ी-रोटी की मजबूरी हो। दूसरे हाथ में वह एक अजीब-सा, बहुत बड़ा चित्तीदार गुब्बारा थामे था। गुब्बारा बहुत विशाल था। लग रहा था कि, वह रामदीन को सहारा दे रहा है, रामदीन उसे नहीं सहारा दे रहा है। गली से गुजरते लड़के ठिठककर हँस पड़े—
“काका! बुढ़ापे में मेला लगाओगे क्या?”
मैंने भी मुस्कुराकर उसे प्रश्नवाचक दृष्टि से देखा।
रामदीन ने मुस्कुराकर सिर झुका लिया। उसकी मुस्कान में जवाब नहीं, बस धैर्य था। उसने क्लांत स्वर में कहा, “अब क्या बताऊँ साहब? ऐसा ही गुब्बारा मेरे बीमार पोते की जिद है। मेरा पोता महकू जिसकी खाँसी रातों को दीवारों से टकराती रहती है। चिकित्सक ने दवाइयाँ दी, पर बच्चे ने कहा था—“दादा, बड़ा वाला गुब्बारा लाना, आसमान जितना! अब आप ही बताइये,क्या आसमान खरीदा जा सकता है?”
मेरी आँखें भर आईं।
रामदीन बोलता रहा, “मैंने अपनी दो वक्त की रोटी में से भी कुछ कौर कम कर दिए। उसी त्याग की कीमत पर आज खरीदा है यह गुब्बारा—हवा से भरा, लेकिन मेरे लिए उम्मीद से भरपूर। मेरे हाथ में सारा आसमान है न साहब?”
मैं मुस्कुरा दिया, “लेकिन रामदीन गुब्बारा फूटेगा। हवा निकल जाएगी। फिर क्या होगा?”
रामदीन की आँखों से गंगा-जमुना बह निकली, “साहब, बीमारी-हारी का तो क्या भरोसा? लेकिन उस क्षण, जब मेरा छोटा-सा महकू इस बड़े गुब्बारे को देखकर खिल उठेगा, तब उसके कमरे में बीमारी नहीं, रंग भर जाएँगे।
कभी-कभी जिन्दगी में रोटी से भी ज्यादा जरूरी एक मुट्ठी हवा हो जाती है—जो किसी के फेफड़ों में नहीं, उसके दिल में भर दी जाए!” कहते हुए रामदीन ने गुब्बारे को थोड़ा कसकर थाम लिया।
क्या बताऊँ सुनील,मेरी क्या हालत हुई। जितने पैसे जेब में थे, रामदीन को महकू के इलाज के लिए दे कर बड़ी मुश्किल से अपने आँसू रोकता, मैं घर चला आया। घर पहुँचते ही तेरी पहेली याद आई। आशा है, उत्तर मिल गया होगा।
घर में सभी का ध्यान रखना। उर्मिला भाभी को मेरा नमस्कार कहना। सौम्य और सुयश को मेरा आशीर्वाद।
पत्रोत्तर की प्रतीक्षा में,
तुम्हारा मित्र,
राजेन्द्र
Monday, 23 February 2026
संवाद का व्यास
“महोदया! पिछले पाँच वर्षों से इस कम्पनी में कार्यरत हूँ। एक बाहरवाले की शिकायत आई और आपने बिना पूछे मुझे निलम्बित कर दिया?” अमित की आवाज़ भारी थी।
“मुझे भी अफ़सोस है, लेकिन क्लाइंट बड़ा था अमित! आरोप गम्भीर लगाया था। कम्पनी की साख दाँव पर लग गई थी।” सीईओ रीमा मुखर्जी ने कहा।
“और मेरा नाम? क्या आपकी नज़रों में वह साख का हिस्सा नहीं था? क्या पेशेवर दुनिया में साधारण कर्मचारी के सम्मान की कोई देहरी नहीं होती है?” अमित की आवाज़ तल्ख़ भरी थी।
कुछ क्षण के लिए मौन का साम्राज्य छा गया।
“तुम जानते हो, समझ सकते हो! वह समय बतौर निजी लेने का नहीं था,” रीमा ने संयत स्वर में कहा।
“पर असर तो निजी तौर ही हुआ, न! जब तक जाँच पूरी हुई, मुझे ‘गुनहगार’ की तरह देखा गया। टीम की मीटिंग्स से बाहर रखा गया। किसी ने पूछा तक नहीं कि सच क्या है!”
रीमा की निगाहें झुक गईं। “जाँच में तुम निर्दोष पाए गए हो, क्लाइंट ने लिखित माफ़ी भेजी है।” उसने धीमी स्वर से कहा।
अमित हल्के से मुस्कुराया— “निर्दोष साबित होना और निर्दोष माना जाना—दो अलग बातें हैं, महोदया!” अमित की भौं टेढ़ी और नथुने फड़क रहे थे।
“तो क्या तुम जा रहे हो?” रीमा ने पूछा।
अमित ने गहरी साँस ली। “मैं भाग नहीं रहा। बस यह याद दिला रहा हूँ कि भरोसा भी कॉन्ट्रैक्ट का हिस्सा होना चाहिए। अगर कम्पनी अपने कर्मचारी पर पहला विश्वास नहीं रखेगी, तो बाहर की दुनिया क्यों रखेगी?” अमित ने कहा।
“यक़ीनन हमने जल्दबाज़ी की! कम्पनी की साख बचाने के चक्कर में हमने तुम्हारी साख पर सवाल लगा दिया।” रीमा ने लज्जित होते हुए कहा!
“अगर तुम रहो… तो मैं पूरी टीम के सामने अपनी गलती स्वीकार करूँगी। सार्वजनिक रूप से। विश्वास वापस लेने का अधिकार तुम्हारा है—पर उसे लौटाने की कोशिश मेरा कर्तव्य।” कुछ पल की खामोशी के बाद रीमा ने अनुरोध भरे स्वर में कहा!
अमित ने अपने सूटकेस को धीरे से सीधा कर दिया—पर बाहर की ओर खींचा नहीं, “मैं रहूँगा,” उसने कहा।
Sunday, 22 February 2026
भरोसे की रणरीति
प्राणा कम्पनी का सबसे बड़ा प्रोजेक्ट लॉन्च हो गया, लेकिन प्रतिस्पर्धी कंपनी ने अंतिम क्षणों में कानूनी दाँव खेल दिया। मीडिया, निवेशक, सबकी निगाहें विभा पर टिक गईं।अंदरूनी जानकारी बाहर जाने की आशंका थी। उसी समय समीर आगे आया। उसने वह ईमेल ट्रेल, वह गोपनीय प्रस्ताव और प्रतिस्पर्धी कम्पनी की चालों के सबूत बोर्ड के सामने रख दिया, जिन्हें उसने समय रहते रिकॉर्ड कर लिया था।
“सर,” उसकी आवाज़ काँपी, “एक बार मैंने गलती की थी। इस बार खुद को खोना नहीं चाहता था।”
कानूनी टीम सक्रिय हुई। मामला पलट गया। प्रोजेक्ट बच गया।
“शायद… इस बार साँप ने डसा नहीं।” मीटिंग खत्म होने के बाद विभा ने धीरे से चांद्री के पास आकर कहा।
चांद्री ने मेज़ पर रखे पत्थर को देखा और कहा—
“साँप को पालना जोखिम है। पर हर जोखिम मूर्खता नहीं होता। कुछ जोखिम नेतृत्व की परीक्षा होते हैं।”
खिड़की के बाहर शहर की रोशनियाँ चमक रही थीं, विभा उन रौशनियों में कंपनी की आपात बैठक को देख रही थी। उसके नज़रों में माहौल में व्याप्त तनाव की महीन परत तैर रही थी।
ऑपरेशंस हेड चांद्री ने फाइल टेबल पर पटक दी—
“सर, आप सच में समीर को प्रोजेक्ट हेड बना रहे हैं? वही समीर, जिसने पिछले साल गोपनीय डेटा लीक किया था? वह कंपनी छोड़कर प्रतिस्पर्धी फर्म से मिला हुआ था। यह सीधा जोखिम है।”
सीईओ विभा ने कुर्सी पर पीछे सिर टिका लिया। उसके सामने मेज़ पर एक छोटा-सा पेपरवेट रखा था—काला, साधारण-सा पत्थर। वह उसे उँगलियों से घुमाने लगी, “हाँ, वही समीर,” उसने विवेकपूर्ण शान्त स्वर में कहा।
“महोदया! यह व्यापार है, आश्रम नहीं। साँप को आस्तीन में रखेंगी तो डसेगा ही।” खिसियानी चांद्री ने कहा।
विभा हल्के से मुस्कुरा रही थी—
“हो सकता है। लेकिन हर गलती स्थायी चरित्र नहीं होती, कुछ लोग परिस्थितियों से हारते हैं, कुछ अवसर मिलने पर बदलते भी हैं। अगर हम किसी को सुधार का अवसर ही न दें, तो फिर नेतृत्व का अर्थ क्या रह जाएगा?” कमरे में सन्नाटा छा गया। निर्णय हो चुका था। और भीतर, विश्वास ने एक बार फिर अपना व्यास बढ़ा लिया था।
Wednesday, 28 January 2026
वनवास की विरासत
मयंक की शादी का भव्य भोज कल रात में समाप्त हुआ था।रिसॉर्ट से मेहमानों की गाड़ियों की कतार धीरे-धीरे सड़क में विलीन हो रही थी। रिसॉर्ट के एक कोने में उसके पिता ज़मीन से टिके बैठे थे—फूट-फूटकर रोते हुए। अंशु, मयंक के ताऊ का बेटा—यह दृश्य देख रहा था। उसकी आँखें भी नम थीं, परन्तु उसके सीने में दबी कड़वाहट आँसुओं से भारी पड़ रही थी।
“मयंक जी, अपनी पत्नी के साथ कहाँ चले गए? चाचा जी, इतना क्यों रो रहे हैं?” अंशु की पत्नी ने बेहद संकोच से पूछा।
अंशु ने ठंडी साँस छोड़ी, “ये आँसू आज बेमानी हैं, इन दिनों बात-बात पर चाचा जी आजकल की बहुओं पर तीखा कटाक्ष कर रहे थे।”
“तो क्या हो गया? यह तो सामान्य सी बात है। पुरानी पीढ़ी नई पीढ़ी की!” अंशु की पत्नी ने कहा।
“तुम इनका इतिहास नहीं जानती हो! हर थोड़े दिनों के बाद यही चाचा जी मेरे ननिहाल चले जाया करते थे—मेरे नाना और बड़े मामा को बुला लाने के लिए। घर में ज़रा-सी तकरार होती और घर इजलास बन जाता। मेरी माँ को ऐसे निकल जाने का आदेश जारी किया जाता, जैसे वह उस घर का हिस्सा ही न हों।”
“अंशु भैया, आप उन्हें ही क्यों दोष दे रहे हैं? दादी भेजती थीं। मेरे पिता जी क्या करते? उनकी बात न मानकर क्या वे उस घर में रह सकते थे?” पास खड़ी मयंक की बड़ी बहन बोल पड़ी।
अंशु की आँखों में बरसों पुरानी टीस दामिनी बन उतर आई, “फर्ज़ और साज़िश के बीच एक बहुत बारीक रेखा होती है,” वह बोला। “दादी की आज्ञा के नाम पर मेरी माँ को बार-बार अपमानित किया गया। आज जब मयंक सक्षम है, अपना घर बसा सकता है, तो ये रो रहे हैं—क्योंकि अब किसी को बाहर भेजने का अधिकार नहीं बचा। काश! मेरे पिता भी मयंक जैसे होते।” चाचा का रोना और तेज़ हो गया। अंशु ने अपनी पत्नी की ओर देखा। उसकी आँखों में सवाल था, उत्तर की प्रतीक्षा थी। अंशु ने चुपचाप गाड़ी का दरवाज़ा खोला और धीमे, पर दृढ़ स्वर में कहा— “जिस घर में अपनों को बार-बार बाहर भेजने की परम्परा हो, वहाँ नया गृह-प्रवेश नहीं होता!”
Tuesday, 6 January 2026
स्वाद की मर्यादा
शान्त, सजग और आत्मसम्मान से भरी मृदुला एक बड़ी विज्ञापन एजेंसी में क्रिएटिव हेड थी। नाम की तरह ही उसका स्वभाव भी बेहद मृदु था। —न उसकी आवाज ऊँची होती थी, न उसको चालाक राजनीति आती थी और न ही उसमें दूसरों को नीचा दिखलाकर आगे बढ़ने की आकांक्षाएँ ही थीं।इसलिए वह अपनी जगह पर सदैव स्थिर रहा करती थी—
“बेटी, जिस कॉर्पोरेट दुनिया में तुम कार्यरत हो, वहाँ के लोग एक-दूसरे को काट खाने को हमेशा तैयार रहते हैं। वह तेज बत्तीस दाँतों वालों की दुनिया है—और तुम उनके बीच एक अकेली जीभ जैसी हो। इतनी सिधाई से वहाँ कैसे टिक पाओगी?” उसके पिता अक्सर वीडियो कॉल पर उससे पूछ लेते थे।और मृदुला हर बार बस! एक विश्वास के साथ मुस्कुराकर गुनगुनाने लगती थी।
कुछ समय गुजरने के बाद एक दिन उसके कार्यालय में एक भारी संकट आ खड़ा हुआ। एजेंसी का एक बड़ा क्लाइंट मुकदमे की धमकी देने लगा। कारण था—एक पुराने सीनियर मैनेजर का अहंकार और बदतमीज़ी वाला व्यवहार, जिसके कारण वर्षों की मेहनत पर पानी फिरता नज़र आ रहा था। मीटिंग रूम में बैठे और अन्य सारे कड़क आवाज़ वाले अधिकारी—कभी धमकी देने लगते, कभी दबाव बनाने की कोशिश करने लगते। लेकिन जितना वेलोग बोलते जाते मामला उतना ही बिगड़ता जा रहा था। अंततः सभी की निगाहें मृदुला पर आकर टिक गईं।
बड़े धैर्य के साथ मृदुला आगे बढ़ी। उसने न तो अपनी ऊँची आवाज़ की, न तर्कों की तलवार चलाई। उसने बड़े धैर्य और ध्यान से क्लाइंट की पूरी बात सुनी—बिना टोके, बिना एजेंसी के बचाव के लिए। फिर बड़ी विनम्रता से एजेंसी की ही चूक को स्वीकार की, और उतनी ही विनम्रता और शान्ति से समाधान रखा। उसकी भाषा में न पछतावे की बनावट थी, न सफ़ाई का दिखावा—सिर्फ़ ईमानदारी और बस! ईमानदारी थी।उसकी कोमल वाणी ने वह कर दिखाया, जो कठोर अहंकार नहीं कर पा रहा था। क्लाइंट का क्रोध बहुत हद तक शान्त हो गया, और आहिस्ता-आहिस्ता बातचीत पटरी पर लौटने लगा —और कुछ ही देर के बाद में पुनः अनुबंध (कॉन्ट्रैक्ट रिन्यू) तैयार हो गया।
उस शाम मृदुला ने अपने पिता को फोन किया और मुस्कराते हुए कहा,
“पापा, आज उन ‘दाँतों’ को समझ में आ गया कि चबाने का काम दाँत करते हैं, लेकिन स्वाद तो हमेशा जीभ ही बताती है। दाँत आपस में टकराकर टूट सकते हैं, पर जीभ सबको साथ लेकर चलती है। मैंने निभाना सीख लिया है—बिना कठोर बने।”
फोन के उस पार पिता कुछ क्षण चुप रहे। मानों उनकी चिन्ता अब गर्व में बदल चुकी हो!
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राग की थाती
धुँध इतनी घनी थी कि बालकनी के पार सब कुछ सफेद रहस्य में डूब गया था। बच्ची देर तक उस अँधेरी खिड़की को देखती रही। फिर उसने अपने घर जाकर, अपन...
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Interesting and Amazing World thank U .... मुझसे बेहतर मुझे , कौन जान सका है …। मेरे बारे कौन , क्या कहता है क्या फर्...
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(1) पीली चुनर ओढ़े हठी धरणी मधुऋतु में ************* (2) षट रागिनी कुहू लगे मन पे कुसुमागम ************* (3) किंशुक छाया वशीभूत अचल...







