Tuesday, 30 June 2026

आँखों की धुँध

 सर्दियों की एक बेहद सर्द शाम थी। राघव एक आलीशान होटल में से अपनी कम्पनी की कामयाबी का जश्न मनाकर लौट रहा था। रास्ते में चौराहे पर बने भव्य मन्दिर, मस्जिद, गुरुद्वारे के बाहर रोशनी जगमगा रही थी। राघव ने गाड़ी रोकी, श्रद्धा से सिर झुकाया और बाहर बैठे कुछ आदतन माँगने वालों को नोट बाँट दिए। तभी उसकी नजरें कुछ दूरी पर, एक दीवार के सहारे बैठी एक बूढ़ी महिला पर पड़ी। कम्पकम्पाती ठंड में उसके पास ढंग का कोई ऊनी कपड़ा नहीं था। उसके पास ही एक छोटी लड़की फटी हुई कॉपियों को समेटे रो रही थी। राघव कौतूहलवश उनके पास गया।

"क्या हुआ माताजी? आप वहाँ कतार में क्यों नहीं बैठीं? वहाँ पैसे बँट रहे हैं," राघव ने पूछा।

बूढ़ी महिला ने स्वाभिमान से सिर उठाया और कहा, "बेटा, हम भिखारी नहीं हैं। मेरे बेटे-बहू दुर्घटना में चल बसे। मैं लोगों के घरों में झाड़ू-पोछा करके इस बच्ची को पढ़ा रही हूँ। आज मकान मालिक ने किराया न देने पर रात को ही बाहर निकाल दिया और बच्ची की स्कूल की फीस न भरने के कारण उसकी किताबें भी फेंक दी गईं। मुझे भीख नहीं, बस सिर छुपाने की जगह और मेरी बच्ची के लिए मदद चाहिए।"

राघव के चेहरे का भूगोल बदल गया। तभी वहाँ से एक साधारण से कपड़ों में एक सज्जन गुजरे, उन्होंने उस बूढ़ी महिला की बात सुन ली थी। उन्होंने तुरन्त आगे बढ़कर अपनी गर्म शॉल उस बुजुर्ग महिला के कंधों पर डाल दी। फिर बच्ची की कॉपियाँ उठाईं और कहा, "माताजी, मेरे घर के पास एक छोटा सा कमरा खाली है। आप वहाँ रह सकती हैं और मेरी पत्नी को घर के कामों में मदद कर सकती हैं। और रही बात इस बच्ची की पढ़ाई की, तो इसका दाखिला मैं कल अपने स्कूल में मुफ्त करवा दूँगा। पास के ही सरकारी स्कूल में मैं शिक्षक हूँ।”

शिक्षक ने राघव की दुविधा को भाँप लिया और बेहद शान्त स्वर में कहा, "धर्म शिक्षण है, जाति से शिक्षक हूँ तो मेरा सम्प्रदाय आस्था का विषय है, मन्दिर, मस्जिद, गुरुद्वारा, गिरजाघर श्रद्धा का और जरूरतमन्दों की मदद करना ही मेरे लिए पूजा है। तो दान हमेशा पात्र व्यक्ति को देना ही श्रेयस्कर समझता हूँ!”

“बड़े-बड़े नोट बाँटकर मैं खुद को बहुत बड़ा धर्मात्मा महसूस कर रहा था। आपका कर्म देखकर मेरी अपनी गलती का अहसास हो रहा है। मैंने जिन लोगों को रुपये दिया, रात में ही उसी रुपये से नशा करने वाले होंगे जबकि यहाँ एक स्वाभिमानी परिवार को सचमुच मदद की जरूरत थी।” राघव ने कहा।

“अब आपने सही समझा। सच्ची श्रद्धा पत्थरों की दीवारों तक सीमित नहीं होती, वह इंसानियत के रूप में भी धड़कती है।” शिक्षक ने कहा।


ग़ज़ल

मेरा फ़लक के सितारों से राब्ता है बहुत,

जो गिर गया वो नज़र से तो ख़ाब्ता है बहुत।

जो चल पड़े हैं तो मंज़िल को ढूँढ ही लेंगे,

मगर ये वक़्त की गर्दिश का रास्ता है बहुत।

उलझ गया है जो धागा उसे सुलगने दो,

कि अब ज़माने से अपना ही वास्ता है बहुत।

वो कायदे जो बनाए थे दिल की बस्ती ने,

उन्हीं उसूलों का दुनिया में वाब्ता  है बहुत।

मेरा फ़लक के सितारों से राब्ता है बहुत,

जो गिर गया वो नज़र से तो ख़ाब्ता है बहुत।


चमकना सीख लिया जिसने मुश्किलों में 'विभा',

उसी चिराग़ का तूफ़ाँ से जाब्ता है बहुत


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