Wednesday, 25 March 2026

वर्ण पिरामिड : शीर्षक - रामनवमी

  1. स्त्र
  2. याग
  3. हे राम
  4. हरे रामा
  5. त्राण में न्यारा
  6. थके का सहारा 
  7. अनादि पर वारा

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  • हाँ!
  • दर्दी
  • मनोज्ञ
  • रामजस
  • मेरा मैं स्वयं
  • राम तत्व की लौ
  • मर्यादाओं की नदी

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  • ढला सूर
  • लम्बी सैर के संग—

  • प्रेमिल गीत
  • 🎶 
  • लुढ़के आँसू—
  • तारों पर सितारें
  • चमक रहे
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  • फौजी की चिट्ठी—
  • भोर तक में कौड़ा(अलाव)
  • बुझ ही गया
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  • कुनबा जुटा
  • चौके के झिर्री पर-
  • प्रेम दिवस
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  • संगनियों का
  • अनकहा सुलझा—
  • खिलीं सरसों
  • ^^^
  • मदनोत्सव—
  • नथ बन्द के संग
  • स्वप्न की कथा
  • ^^^
  • फूलचोर की
  • कुत्ता पर भौं टेढ़ी—
  • नूतन वर्ष
  • ^^^
  • क्रिशकिंकल—
  • कॉकटेल की गन्ध
  • कैब में फैली

Saturday, 21 March 2026

शिखर का पृष्ठ

“पिछले साल कई शल्य-चिकित्साओं से गुज़री हैं, देख लो, इनके पेट की क्या हालत हो गई है— छोटे-छोटे टीले जैसे उभर आए हैं…” बहू धीरे-धीरे सास की साड़ी का पल्लू सरकाकर निशान दिखला रही थी। सास की कराहने की आवाज़ में दर्द था, पर उनकी आँखों में एक अजीब-सी जिद भी थी। 

“जाने से पहले भी इनके कमर में दर्द था। चिकित्सक ने एमआरआई करवाने को कहा था, लेकिन इन्होंने कहा—पहले साहित्योत्सव से लौट आऊँ, फिर इलाज़ करवा लूँगी!”

“माँ! ये कोई समझदारी है? अपनी उम्र और हालत देखी हैं आपने?”कमरे में बैठे बेटे की आवाज़ अचानक बहुत ऊँची हो गई—

बेटे की बात पूरी भी नहीं हुई थी कि उसके पिता ने चश्मा उतारकर मेज़ पर रख दिया। उनकी आँखों में वर्षों का धैर्य और स्मृतियों की चिंगारी तैर रही थी।

“तुम्हारी माँ ने कुछ ग़लत नहीं किया…” वे धीरे, लेकिन ठहरकर बोले—

“तुम्हें याद है? जब इन्हें तेज़ बुख़ार होता था, तो यही सर पर पट्टी बाँधकर तुम्हारे लिए टिफ़िन बनाती थीं… खुद काँपती रहती थीं, पर तुम्हें भूखा नहीं जाने देती थीं।” बेटा का सर झुक गया।

“इतने सालों में न जाने कितनी बार अपने दर्द को किनारे रखकर इन्होंने घर, परिवार और तुम्हारी ज़रूरतों को चुना है, और आज अगर अपने शौक—अपने सपने—के लिए एक बार अपने ही कष्ट को पीछे कर दिया, तो तुम्हें यह ग़लत लग रहा है?” कमरे में घनघोर सन्नाटा उतर आया।

“इनकी उम्र अब कहाँ है कि हर बार ‘बाद में’ कहकर टालती रहें! स्त्रियों की भी कुछ इच्छाएँ होती हैं, जो इलाज़ से पहले पूरी हो जानी चाहिए।” पिता ने माँ की ओर देखा—

माँ की आँखों में नमी तैर रही थी।

“हमें क्षमा कर दो माँ। हम नासमझ भूल कर रहे थे- माँ भी तो इंसान होती है। मन्दिर की माँ बनाना चाह रहे थे! अगली बार के साहित्योत्सव में हम भी साथ चलेंगे।”बेटा धीरे से माँ के पास आया, उनके कन्धे पर हाथ रखा और धीमे स्वर में कहा।

Tuesday, 17 March 2026

मिट्टियों पर रीझा दिल

विश्वविद्यालय के सभागार में चर्चा चल रही थी—विषय था “प्रवासी भारतीय और उनकी निष्ठा”। श्रोताओं के बीच बैठे लोग गम्भीर थे, जैसे हर शब्द किसी पुराने घाव को कुरेद रहा हो।

“फ़र्ज़ कीजिए, कभी ऐसा समय आए कि अमेरिका और भारत के रिश्ते बिगड़ जाएँ और अमेरिका भारत पर मिसाइल हमले करने लगे। तब अमेरिका में बसे भारतीय क्या चाहेंगे—अमेरिका की जीत और भारत की हार?” मंच से एक युवक ने सवाल उछाला। सभागार में खामोशी वापस लौटी लहरें सी उतर आई।

“क्रिकेट की तरह क्या वे वहाँ के नमक का हक़ अदा करेंगे? भले ही कोई मिसाइल उस गाँव पर गिरे जहाँ उनके अपने घरवाले रहते हों?” युवक ने आगे कहा।

पतझड़ में गिरे आखरी पत्ता सा सवाल हवा में तैरता रह गया। कुछ लोग असहज होकर कुर्सियाँ खिसकाने लगे।

तभी पीछे की पंक्ति से एक अधेड़ स्त्री उठीं। उसके चेहरे पर थकान नज़र आ रही थी, “उत्तर क्यों नहीं देना चाहेंगे?” उन्होंने स्थिर आवाज़ में कहा। सभागार का ध्यान उनकी ओर मुड़ गया।

“मेरा बेटा अमेरिका में रहता है। कई बार उसकी कुछ बातों से मुझे लगा कि वह अपनी जड़ों को भूल रहा है। मैं तो कई मंचों से उस पर देशद्रोह का आरोप लगाने की माँग तक कर चुकी हूँ।” उन्होंने धीमे-धीमे कहना शुरू किया— लोग चौंक गए।

“लेकिन…” उन्होंने हल्की मुस्कान के साथ जोड़ा—

“अमेरिका में जितने भारतीयों से मिली हूँ, वे भारत में रहने वाले बिहारी, बंगाली, राजस्थानी से ज़्यादा सिर्फ भारतीय लगे—कई बार तो उनसे बहुत ज़्यादा।” सभागार में सन्नाटा अमावस्या सा गहरा गया।

“वे वहाँ की मिट्टी में रहते हैं, पर उनकी धड़कनें अभी भी यहाँ की धूल से जुड़ी रहती हैं। वे भारत की हार कभी नहीं चाहेंगे।” थोड़ा रुककर उन्होंने युवक की ओर देखा—

“और जहाँ तक क्रिकेट की बात है… वह खेल है। खेलों में तो एक ही देश के दो दल भी होते हैं—अभ्यास के लिए, सीखने के लिए। वहाँ जीत-हार से दिल नहीं टूटते।”

उनकी आवाज़ हल्की काँप रही थी-

“पर युद्ध… युद्ध में तो दिल ही टूटते हैं। और जिनके दिल दो मिट्टियों के बीच धड़कते हों, वे किसी की हार नहीं—बस अपनों की सलामती चाहते हैं।”

सभागार में सुई/पिन भी गिरती तो लाउडस्पीकर पर शोर गूँज जाती-



०१ मई : लघुकथाकार श्री मधुदीप जयन्ती

पंचर की मरम्मत “कारखाने की घड़ियों की टिक-टिक मेरे सिर में हथौड़ों की तरह बज रही थी। मेरे पेडू का दर्द किसी तेज़ धार वाले चाकू की तरह उसे भी...