Saturday, 21 March 2026

शिखर का पृष्ठ

“पिछले साल कई शल्य-चिकित्साओं से गुज़री हैं, देख लो, इनके पेट की क्या हालत हो गई है— छोटे-छोटे टीले जैसे उभर आए हैं…” बहू धीरे-धीरे सास की साड़ी का पल्लू सरकाकर निशान दिखला रही थी। सास की कराहने की आवाज़ में दर्द था, पर उनकी आँखों में एक अजीब-सी जिद भी थी। 

“जाने से पहले भी इनके कमर में दर्द था। चिकित्सक ने एमआरआई करवाने को कहा था, लेकिन इन्होंने कहा—पहले साहित्योत्सव से लौट आऊँ, फिर इलाज़ करवा लूँगी!”

“माँ! ये कोई समझदारी है? अपनी उम्र और हालत देखी हैं आपने?”कमरे में बैठे बेटे की आवाज़ अचानक बहुत ऊँची हो गई—

बेटे की बात पूरी भी नहीं हुई थी कि उसके पिता ने चश्मा उतारकर मेज़ पर रख दिया। उनकी आँखों में वर्षों का धैर्य और स्मृतियों की चिंगारी तैर रही थी।

“तुम्हारी माँ ने कुछ ग़लत नहीं किया…” वे धीरे, लेकिन ठहरकर बोले—

“तुम्हें याद है? जब इन्हें तेज़ बुख़ार होता था, तो यही सर पर पट्टी बाँधकर तुम्हारे लिए टिफ़िन बनाती थीं… खुद काँपती रहती थीं, पर तुम्हें भूखा नहीं जाने देती थीं।” बेटा का सर झुक गया।

“इतने सालों में न जाने कितनी बार अपने दर्द को किनारे रखकर इन्होंने घर, परिवार और तुम्हारी ज़रूरतों को चुना है, और आज अगर अपने शौक—अपने सपने—के लिए एक बार अपने ही कष्ट को पीछे कर दिया, तो तुम्हें यह ग़लत लग रहा है?” कमरे में घनघोर सन्नाटा उतर आया।

“इनकी उम्र अब कहाँ है कि हर बार ‘बाद में’ कहकर टालती रहें! स्त्रियों की भी कुछ इच्छाएँ होती हैं, जो इलाज़ से पहले पूरी हो जानी चाहिए।” पिता ने माँ की ओर देखा—

माँ की आँखों में नमी तैर रही थी।

“हमें क्षमा कर दो माँ। हम नासमझ भूल कर रहे थे- माँ भी तो इंसान होती है। मन्दिर की माँ बनाना चाह रहे थे! अगली बार के साहित्योत्सव में हम भी साथ चलेंगे।”बेटा धीरे से माँ के पास आया, उनके कन्धे पर हाथ रखा और धीमे स्वर में कहा।

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