Sunday, 14 June 2026

ग़ज़ल

लफ़्ज़ वो अब तलक, तो बने ही नहीं

जो बयाँ कर सकें, हिय सुने ही नहीं।

रास्ते में जो थे, जाल नफ़रत के वो,

हम सफ़र में कभी, यूँ तने ही नहीं।

ग़म के जो ख़्वाब थे, वक़्त के रात-दिन,

जाने किस मोड़ पर, वो बुने ही नहीं।

ज़िन्दगी ने दिए, जितने ज़ख़्म-ओ-सितम,

दर्द वो हमने फिर, तो गिने ही नहीं!

लाख शिकवे रहे, इस ज़माने से पर,

दर्द के वो फ़साने, गुने ही नहीं।

दिल में ऐसा बसा, हिज्र का सिलसिला,

कोई मौसम खुशी का, मने ही नहीं।

राह-ए-उल्फ़त में जो, अश्क बिखरे 'विभा',

हम ने दामन में वो, फिर चुने ही नहीं।


ग़ज़ल 2

बात निकली तो कई राज़ भी फिर दिल से निकले,

दर्द के फूल भी कुछ अश्कों की महफ़िल से निकले।

जब अँधेरों ने कहा तो कई सीमा से निकले,

रास्ते तब ही नए एक नई मंज़िल से निकले।

हमने चाहा था कि ख़ामोश रहें जीवन भर यूँ

पर कई शब्द अचानक ही मेरे दिल से निकले।

वक़्त की धूप में रिश्तों की नमी जाती ही रही,

फिर भी कुछ ख़्वाब सलामत थे जो मुश्किल से निकले।

उसकी यादों का समंदर था बहुत ही गहरा मगर,

कुछ चमकते हुए मोती उसी साहिल से निकले

ज़िन्दगी भर जिसे थे अपना समझते रह गए हम,

वे भी इक रोज़ किसी और के आदिल से निकले।

घात निकली तो नज़र उनके कई रंग ही आए 

कुछ हँसी के थे,  'विभा' तो वे ही कुछ छल से निकले



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ग़ज़ल

लफ़्ज़ वो अब तलक, तो बने ही नहीं जो बयाँ कर सकें, हिय सुने ही नहीं। रास्ते में जो थे, जाल नफ़रत के वो, हम सफ़र में कभी, यूँ तने ही नहीं। ग़म...