Sunday, 26 July 2026

बोझ/कल्पना/मृगतृष्णा?


26-07-2026
2+6+0+7+2+0+2+6=25
2+5=7

प्रदर्शनी का आख़िरी दिन, आज सभागार के बीच में चित्रकार ने एक बड़ा-सा दर्पण रख दिया था- भीड़ उसके सामने जमा हो गई थी- कुछ लोग बाल सँवार रहे थे, कुछ अपने चेहरे पर मुस्कान चढ़ाने में लगे थे, कुछ अपने गर्दन का कोण बदलने में-

जबकि दीवारों पर सजे हर चित्र में चेहरा अलग था—किसी की आँखें बड़ी, किसी की नाक टेढ़ी, किसी की त्वचा साँवली, किसी के बाल बिखरे। 

लोग चित्रों के सामने कम, एक-दूसरे के सामने ज़्यादा ठहर रहे थे।

“यह नाक ठीक कर दी होती…”
“रंग थोड़ा और साफ़ होता तो अच्छा लगता…”
“चेहरा इतना अलग क्यों बना दिया?”
चित्रकार ने मुस्कुराते हुए चुपचाप अपने सारे चित्र उतार लिए।
“क्या प्रदर्शनी ख़त्म हो गई?” एक दर्शक ने पूछा,

“नहीं… अब सबसे बड़ा चित्र सामने है। जिसमें बरसों से हर कोई, किसी और जैसा बनाने में लगा है।“ चित्रकार ने कहा।

02.

पलटा दुश्मन (ज़हर का अमृत बनना /पुरानी कुल्हाड़ी गाड़ देना)

राष्ट्रीय शतरंज प्रतियोगिता का फ़ाइनल था। ग्रैंडमास्टर रुद्रप्रताप की अगली चाल प्रतिद्वन्द्वी नीरव को ‘मात’ देने वाली थी। पूरा सभागार उसकी जीत की प्रतीक्षा कर रहा था। तभी पीछे से किसी स्त्री के रुँधे स्वर ने सन्नाटा चीर दिया—

“डॉक्टर ने कहा है, ऑपरेशन अगले महीने तक नहीं हुआ तो मेरा बेटा…”

आयोजकों ने उन्हें बाहर ले जाना चाहा, परन्तु तबतक उनके शब्द रुद्रप्रताप तक पहुँच चुके थे। उसने पहली बार सामने बैठे नीरव को गौर से देखा। पीला चेहरा, काँपते हाथ और धँसी हुई आँखें… वह तो हार से नहीं, अपनी बीमारी से लड़ रहा था। टूर्नामेंट की इनामी राशि ही उसकी आख़िरी उम्मीद होगी। रुद्रप्रताप ने बिसात पर नज़र डाली। उसकी उँगलियाँ वज़ीर तक गईं… फिर लौट आईं। अगले ही क्षण उसने ऐसी चाल चली कि उसकी पूरी बाज़ी बिखर गई। कुछ ही मिनटों बाद उसने अपना राजा लिटा दिया।

“आई रिज़ाइन।”

पुरस्कार वितरण के बाद नीरव दौड़ता हुआ उसके पास पहुँचा।

“सर… आपने क्यों जानबूझकर हार मान ली ?”

“बेटा, शतरंज में राजा बचाना पड़ता है… आज पहली बार लगा, बिसात के बाहर एक ज़िन्दगी बचाना ज़्यादा ज़रूरी है।आज मैंने राजा को हरा कर मौत की एक चाल टाल दी।”रुद्रप्रताप ने मुस्कराते हुए कहा।

Wednesday, 22 July 2026

बदले ताले

“तुम्हें पता है, पिछले आपातकाल में सबसे ज़्यादा किस चीज़ की आवाज़ आती थी?” वाइन ग्लास बढ़ाते हुए प्रभाकर जी ने पूछा।

“मुझे ऐसी कोई भी चीज नापसन्द है जो मेरे दिमाग को भ्रमित करती है,” रोहन ने इंकार रूप में अपना हाथ और अनभिज्ञता स्वरूप सिर हिलाया।

“खामोशी की…। जब आधी रात को लोग उठाए जाते थे, तब पूरा मोहल्ला जागता था, मगर कोई खिड़की नहीं खुलती थी।” प्रभाकर जी ने कहा।

“अब तो लोग दोपहरी में उठाए जाते हैं और खिड़कियाँ खुली रहती हैं, प्रभाकर जी।” रोहन ने मुस्कराते हुए उत्तर दिया। उसने अपना लैपटॉप खोला। कई दिनों की मेहनत से तैयार की गई रिपोर्ट सामने थी। उसने प्रकाशित करने का बटन दबाया। कुछ पल तक स्क्रीन पर एक गोल निशान घूमता रहा। फिर सब कुछ सामान्य हो गया। बस उसकी रिपोर्ट कहीं दिखाई नहीं दे रही थी। कुछ ही देर में उसे एक-एक कर कई सन्देश आए। सोशल मीडिया की कुछ सुविधाएँ बन्द कर दी गई थीं। कुछ लोग, जो रोज़ उसकी फेसबुक पोस्ट पर बहस करते थे, अचानक जैसे उसे देख ही नहीं पा रहे थे। रोहन ने अनायास प्रभाकर जी की ओर देखा।

प्रभाकर जी ना तो मुस्कराए और ना कुछ कहा। धीरे से उठे, अलमारी खोली और वही पुरानी डायरी उसके हाथ में रख दी, जिसे वे बरसों पहले जेल से लौटते समय साथ लाए थे।

“जब सोशल मीडिया बोलना बन्द कर दें…” रोहन ने कहना चाहा।

“…तब इंसान एक-दूसरे को पढ़ना शुरू करते हैं।” प्रभाकर जी ने उसकी बात पूरी कर दी—

शाम ढल रही थी। चाय की दुकान पर लोग पहले की तरह बैठे थे। मौसम, महँगाई, क्रिकेट और राजनीति— इत्यादियों पर बातें हो रही थीं, लेकिन शिक्षा-चिकित्सा की बातें नहीं हो रही थी। रोहन ने डायरी खोली। पहला वाक्य “इतिहास दोहराया गया है” लिखने से पहले उसने एक बार चारों ओर देखा। शहर बिल्कुल सामान्य था।

२६ अगस्त २०२६

आज ना तो संयुक्त परिवार है और ना सासू जी के नुकीले दाँत बचे हैं- बेटियाँ ससुराल में नहीं रह रही -बेटों का रूप बदला है… समाज में अभी अनेक ऐसे...