Sunday, 9 August 2026

सन्ध्या का आलोक

दिन अपनी अन्तिम देहरी पर ठिठका खड़ा था।

पार्क में पुराने नीम के नीचे बैठे लगभग पचहत्तर-सतहत्तर वर्षीय वृद्ध अपने घुटने सहला रहे थे। हर शाम उनका यह दर्द लौट आता था। तभी सामने वाली बेंच पर बैठने की कोशिश करती एक वृद्धा लड़खड़ा गईं। वृद्ध छड़ी के सहारे उठे। धीरे से उनके पास पहुँचे और पानी की बोतल बढ़ा दी।

“लीजिए… थोड़ा सुस्ता लीजिए।” वृद्ध ने कहा।

कुछ घूँट पानी पीकर वृद्धा ने म्लान मुस्कान ओढ़ ली।

“धन्यवाद…! अब तो लगता है, शरीर ही नहीं, मेरी ज़रूरत भी खत्म हो गई हैं।” वृद्धा ने कहा।

वृद्ध की नज़रें उनके पास रखे ऊन के उलझे लच्छों पर पड़ीं। उन्होंने उसे उठा लिया।

“ऐसा मत कहिए,” वे मुस्कराए, “उम्र काम नहीं छीनती, बस काम का ढँग बदल देती है। आप बुनिए…, उलझों को मैं सुलझा देता हूँ।”

वृद्धा की आँखों में हल्की-सी चमक उतर आई।

धागे सुलझते रहे और बातें भी। पता चला, उनका नाम सुमित्रा था। पास के वृद्धाश्रम में रहती थीं। वृद्ध का नाम रामनाथ था। उनकी पत्नी को गुज़रे कुछ वर्ष बीत चुके थे। उनकी सन्तान अपने कामों में इतना व्यस्त रहती थी कि उनका स्नेह-सम्मान भी अब मोबाइल की घंटियों में सिमट गया था। दोनों ने अपने-अपने दुःखों का ब्योरा नहीं दिया; शायद उसकी ज़रूरत भी नहीं थी। क्यों कि वे भविष्य की योजना बना रहे थे। आगे रामनाथ ऊन लाएँगे। फ़ौजियों-अनाथों के लिए स्वेटर तैयार होंगे। कुछ पीड़ाएँ शब्दों से नहीं, केवल उपस्थिति से पढ़ी जाती हैं।

नीम की पत्तियों से छनती साँझ धीरे-धीरे गहराने लगी।

रामनाथ ने सुलझा हुआ ऊन सुमित्रा की हथेलियों पर रख दिया। सुमित्रा जी की सलाइयाँ फिर चल पड़ीं।

घर लौटते समय फाटक तक पहुँचकर रामनाथ ने एक बार पीछे मुड़कर देखा।

नीम की छाँव में सुमित्रा जी चुपचाप बुन रही थीं। रामनाथ ने मुस्करा दिए। उनके घुटनों का दर्द वैसा ही था, पर कदम पहले से हल्के लग रहे थे।

सन्ध्या का आलोक

दिन अपनी अन्तिम देहरी पर ठिठका खड़ा था। पार्क में पुराने नीम के नीचे बैठे लगभग पचहत्तर-सतहत्तर वर्षीय वृद्ध अपने घुटने सहला रहे थे। हर शाम उ...