26-07-2026
2+6+0+7+2+0+2+6=25
2+5=7
प्रदर्शनी का आख़िरी दिन, आज सभागार के बीच में चित्रकार ने एक बड़ा-सा दर्पण रख दिया था- भीड़ उसके सामने जमा हो गई थी- कुछ लोग बाल सँवार रहे थे, कुछ अपने चेहरे पर मुस्कान चढ़ाने में लगे थे, कुछ अपने गर्दन का कोण बदलने में-
जबकि दीवारों पर सजे हर चित्र में चेहरा अलग था—किसी की आँखें बड़ी, किसी की नाक टेढ़ी, किसी की त्वचा साँवली, किसी के बाल बिखरे।
लोग चित्रों के सामने कम, एक-दूसरे के सामने ज़्यादा ठहर रहे थे।
“यह नाक ठीक कर दी होती…”
“रंग थोड़ा और साफ़ होता तो अच्छा लगता…”
“चेहरा इतना अलग क्यों बना दिया?”
चित्रकार ने मुस्कुराते हुए चुपचाप अपने सारे चित्र उतार लिए।
“क्या प्रदर्शनी ख़त्म हो गई?” एक दर्शक ने पूछा,
“नहीं… अब सबसे बड़ा चित्र सामने है। जिसमें बरसों से हर कोई, किसी और जैसा बनाने में लगा है।“ चित्रकार ने कहा।
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