Monday, 11 May 2026

माँ की प्रतिक्षाएँ

 


ना कोई गिला

दंश सहे की कला

प्रश्न माँ जबाब माँ

स्व सोती गीला

स्वेच्छा से स्वत्व त्याग

थाती धैर्य का मिला

माँ प्रतीक्षा करती है

द्वार पर टँगी घड़ी की तरह

हर लौटते क़दम की।

सिर्फ़ सन्तान के लौट आने की नहीं,

कभी अपने नाम से पुकारे जाने की भी।

सुबह की पहली रोटी के साथ

वह रख देती है

दिनभर की छोटी-छोटी आशाएँ—

बिना झुँझलाए कोई बात कर ले,

कोई उसके सिरदर्द को भी

समाचार समझे।

कोई पूछे—

“आज तुमने क्या खाया?”

जैसे वह बरसों पूछती रही है सबसे।

वह प्रतीक्षा करती है

कि बच्चे जब सफल हों

तो परिचय में सिर्फ़ पिता का नाम नहीं,

उसकी जागी रातें भी दिखाई दें।

रसोई से बाहर की एक सुबह का,

जहाँ चाय की भाप में

उसके अपने सपने भी उबलें थे!

बरसों पुराने सन्दूक में

उसने कुछ इच्छाएँ छिपा रखी हैं—

एक अधूरी यात्रा,

एक बिना टोके हुई नींद,

एक शाम

जब वह सिर्फ़ अपने लिए सज सके।

पुरानी अलमारी में तह किए

अपने अधूरे शौकों की—

कभी फिर से रंग उठाने की,

कभी किताबों में लौट जाने की।


माँ को प्रतीक्षा रहता है

उस फ़ोन का

जो केवल काम से न आया हो,

जिसमें कोई कहे—

“बस तुम्हारी आवाज़ सुननी थी।”


वह प्रतीक्षा करती है

कि घर के निर्णयों में

उसकी चुप्पी को सहमति न माना जाए।

कभी-कभी माँ को

अपने ही जन्मदिन की तारीख़

याद रखे जाने की प्रतीक्षा भी होती है।

वह चाहती है कि बुढ़ापे में

उसे बोझ नहीं, घर का इतिहास समझा जाए।

उसे प्रतीक्षा रहती है

कि घर में उसकी उपस्थिति

सिर्फ़ सुविधा की तरह नहीं,

एक सिद्धान्त की तरह महसूस की जाए।

माँ प्रतीक्षा करती है—

त्योहारों पर

सिर्फ़ पकवानों की तारीफ़ न हो,

उसकी थकान भी पढ़ी जाए

बच्चे सिर्फ कमाने वाले हाथ न बनें,

उसके काँपते हाथ भी थामने वाले बनें।

बिना किसी अपराधबोध के

उसे भी आराम मिल सके।

और इन सब के सबसे भीतर—

एक बहुत धीमी, बहुत निजी प्रतीक्षा—

कि जिस तरह उसने

सबको बिना शर्त अपनाया,

कभी कोई उसे भी उसी तरह थाम ले।

माँ की प्रतिक्षाएँ

बहुत ऊँची-ऊँची मीनारें नहीं होतीं—

होती हैं बस इतना कि

जिस घर को उसने जीवन दिया,

उस घर में उसका अपना एक कमरा,

अपना एक समय, और एक सम्मान

सभी की आँखों में बचा रहे। 


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