तपकर रिश्तों की अगन, सींचा सबका भाग
माँ का अनुपम त्याग है, जीवन उसका राग
मेघ गर्जन—
माँ की सिखलायी
धुन में नाचे
मृण शिल्प में
बोसा जुड़ रहा है—
मातृ दिवस
पहला तारा
माँ सिखला रही है
गाँठ खोलना
अन्तरराष्ट्रीय वृद्ध दिवस के अवसर पर, विशेष ज्ञान- परबचन का शौक नहीं है– अनुभवजन्य बाँटने का प्रयास है— “हम उलझे रहते हैं —ऐसा हुआ रहता तो ऐ...
वाह
ReplyDelete🙏आत्मीय आभार आपका🤝
ReplyDeleteक्या बात है दीदी! थोड़े शब्द पर ममता का असीम आकाश खुला है उनमें!
ReplyDeleteमाँ और संतति का नाता अटूट है! हम सब मांओं को ढेरों बधाई हमारे नाम के अतुल्य दिवस के लिए 🙏🙏
चित्र और रचना दोनों ही हृदय-विजयी हैं।
ReplyDeleteबहुत खूब,,,,, मां से ही सारा घर संसार है
ReplyDeleteसुंदर सृजन
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