Wednesday, 25 February 2026

थाती का व्यास

पटना -२० फरवरी २०२६

भाई राजेन्द्र,

सस्नेहाशीष!

आशा करती हूँ, सपरिवार तुम सानन्द होगे। तुम जब पिछली बार पटना आए थे तब भी रामदीन को लेकर चिन्ताग्रस्त थे। रामदीन की झुर्रियों में धूप के धब्बे स्पष्ट दिख रहे थे लेकिन उसके आँखों में कोई पुराना उजाला अटका हुआ था। उसके एक हाथ में कपड़ों की पोटली थी—रंगहीन, थकी हुई, जैसे उसके लिए रोज़ी-रोटी की मजबूरी हो। दूसरे हाथ में वह एक अजीब-सा, बहुत बड़ा चित्तीदार गुब्बारा थामे था। गुब्बारा बहुत विशाल था। लग रहा था कि, वह रामदीन को सहारा दे रहा है, रामदीन उसे नहीं सहारा दे रहा है। गली से गुजरते लड़के ठिठककर हँस पड़े थे- “काका! बुढ़ापे में मेला लगाओगे क्या?”

रामदीन ने मुस्कुराकर सिर झुका लिया था। तुमने कहा था, “देखो न दीदी। उसकी मुस्कान में जवाब नहीं, बस धैर्य है! बच्चों को कौन समझा सकता है कि ऐसा ही यह गुब्बारा उसके बीमार पोते की जिद है,”

“हाँ, उसका पोता, जिसकी खाँसी रातों को दीवारों से टकराती रहती है। चिकित्सक ने दवाइयाँ दी है। पर बच्चे ने दादा से कहा था, -‘दादा, बड़ा वाला गुब्बारा लाना, आसमान जितना।’ मैंने कहा था और 

रामदीन बुदबुदा रहा था—“क्या आसमान खरीदा जा सकता है?”

तुम्हारा दुःख और बढ़ जाएगा यह जानकर कि उस समय रामदीन ने अपनी दो वक्त की रोटी में से भी कुछ कौर कम कर दिया था और उस त्याग की कीमत पर खरीदा जाता था ऐसा गुब्बारा—हवा से भरा, पर उसके लिए उम्मीद से भरी। तब रामदीन के हाथ में एक खुला आसमान का अवसर था। वह जानता था—गुब्बारा फूटेगा। हवा निकल जाएगी। शायद पोते की हँसी भी कुछ दिनों की मेहमान हो। पर उस क्षण, उसे विश्वास था जब वह छोटा-सा बच्चा इस बड़े गुब्बारे को देखकर खिल उठेगा, तब उसके कमरे में बीमारी नहीं, रंग भर जाएँगे। और वही सच हुआ-

जैसे आज परदेश से लौटे उसी पोते ने ठीक वैसा ही गुब्बारा रामदीन को थमाया था-

“कभी-कभी जिन्दगी में रोटी से भी ज्यादा जरूरी एक मुट्ठी हवा हो जाती है—जो किसी के फेफड़ों में नहीं, उसके दिल में भर दी जाए!” बुदबुदाता हुआ रामदीन ने गुब्बारे को थोड़ा कसकर थाम लिया।

जीजी सा को चरण स्पर्श और बिटिया सी भाभी अनीता से मेरी ओर से स्नेह और बच्चों को शुभाशीष कह देना!

पत्रोत्तर की प्रतीक्षा में

तुम्हारी दीदी माँ (नारियल)

सुझाव मिला

थाती का व्यास

                                                    जोधपुर 

                                                   २१-०२-२०२६

प्रिय मित्र सुनील,                                         

सप्रेम नमस्कार 

मैं यहाँ सपरिवार सकुशल हूँ। आशा है तुम भी सकुशल होगे। 

पिछले पत्र में तुमने मुझसे एक साहित्यिक पहेली पूछी थी, “हवा की क़ीमत क्या है?” मैंने बहुत सोचा कि क्या उत्तर दूँ। तभी कल ऐसा कुछ घटा कि पहेली का उत्तर स्वतः हो प्राप्त हो गया। मेरे घर के पीछे कच्ची बस्ती में एक रामदीन नामक निर्धन व्यक्ति रहता है। अक्सर मिलता है, तो राम-राम करता है। कल मैं घर लौट रहा था, तभी कड़ी धूप में रामदीन को देख कर चौंक उठा। 

रामदीन की झुर्रियों में धूप के धब्बे स्पष्ट दिख रहे थे लेकिन उसके आँखों में कोई पुराना उजाला अटका हुआ था। एक हाथ में कपड़ों की पोटली थी—रंगहीन, थकी हुई, जैसे रोज़ी-रोटी की मजबूरी हो। दूसरे हाथ में वह एक अजीब-सा, बहुत बड़ा चित्तीदार गुब्बारा थामे था। गुब्बारा बहुत विशाल था। लग रहा था कि, वह रामदीन को सहारा दे रहा है, रामदीन उसे नहीं सहारा दे रहा है। गली से गुजरते लड़के ठिठककर हँस पड़े—

“काका! बुढ़ापे में मेला लगाओगे क्या?”

मैंने भी मुस्कुराकर उसे प्रश्नवाचक दृष्टि से देखा। 

रामदीन ने मुस्कुराकर सिर झुका लिया। उसकी मुस्कान में जवाब नहीं, बस धैर्य था। उसने क्लांत स्वर में कहा, “अब क्या बताऊँ साहब? ऐसा ही गुब्बारा मेरे बीमार पोते की जिद है। मेरा पोता महकू जिसकी खाँसी रातों को दीवारों से टकराती रहती है। चिकित्सक ने दवाइयाँ दी, पर बच्चे ने कहा था—“दादा, बड़ा वाला गुब्बारा लाना, आसमान जितना! अब आप ही बताइये,क्या आसमान खरीदा जा सकता है?”

मेरी आँखें भर आईं। 

रामदीन बोलता रहा, “मैंने  अपनी दो वक्त की रोटी में से भी कुछ कौर कम कर दिए। उसी  त्याग की कीमत पर आज खरीदा है यह  गुब्बारा—हवा से भरा, लेकिन मेरे  लिए उम्मीद से भरपूर। मेरे हाथ में सारा आसमान है न साहब?”

मैं मुस्कुरा दिया, “लेकिन रामदीन गुब्बारा फूटेगा। हवा निकल जाएगी। फिर क्या होगा?” 

रामदीन की आँखों से गंगा-जमुना बह निकली, “साहब, बीमारी-हारी का तो क्या भरोसा? लेकिन  उस क्षण, जब मेरा छोटा-सा महकू इस बड़े गुब्बारे को देखकर खिल उठेगा, तब उसके कमरे में बीमारी नहीं, रंग भर जाएँगे।

कभी-कभी जिन्दगी में रोटी से भी ज्यादा जरूरी एक मुट्ठी हवा हो जाती है—जो किसी के फेफड़ों में नहीं, उसके दिल में भर दी जाए!” कहते हुए  रामदीन ने गुब्बारे को थोड़ा कसकर थाम लिया।

क्या बताऊँ सुनील,मेरी क्या हालत हुई। जितने पैसे जेब में थे, रामदीन को महकू के इलाज के लिए दे कर बड़ी मुश्किल से अपने आँसू रोकता, मैं घर चला आया। घर पहुँचते ही तेरी पहेली याद आई। आशा है, उत्तर मिल गया होगा। 

घर में सभी का ध्यान रखना। उर्मिला भाभी को मेरा नमस्कार कहना। सौम्य और सुयश को मेरा आशीर्वाद। 

पत्रोत्तर की प्रतीक्षा में, 

तुम्हारा मित्र, 

राजेन्द्र

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थाती का व्यास

पटना -२० फरवरी २०२६ भाई राजेन्द्र, सस्नेहाशीष! आशा करती हूँ, सपरिवार तुम सानन्द होगे। तुम जब पिछली बार पटना आए थे तब भी रामदीन को लेकर चिन्त...