“महोदया! पिछले पाँच वर्षों से इस कम्पनी में कार्यरत हूँ। एक बाहरवाले की शिकायत आई और आपने बिना पूछे मुझे निलम्बित कर दिया?” अमित की आवाज़ भारी थी।
“मुझे भी अफ़सोस है, लेकिन क्लाइंट बड़ा था अमित! आरोप गम्भीर लगाया था। कम्पनी की साख दाँव पर लग गई थी।” सीईओ रीमा मुखर्जी ने कहा।
“और मेरा नाम? क्या आपकी नज़रों में वह साख का हिस्सा नहीं था? क्या पेशेवर दुनिया में साधारण कर्मचारी के सम्मान की कोई देहरी नहीं होती है?” अमित की आवाज़ तल्ख़ भरी थी।
कुछ क्षण के लिए मौन का साम्राज्य छा गया।
“तुम जानते हो, समझ सकते हो! वह समय बतौर निजी लेने का नहीं था,” रीमा ने संयत स्वर में कहा।
“पर असर तो निजी तौर ही हुआ, न! जब तक जाँच पूरी हुई, मुझे ‘गुनहगार’ की तरह देखा गया। टीम की मीटिंग्स से बाहर रखा गया। किसी ने पूछा तक नहीं कि सच क्या है!”
रीमा की निगाहें झुक गईं। “जाँच में तुम निर्दोष पाए गए हो, क्लाइंट ने लिखित माफ़ी भेजी है।” उसने धीमी स्वर से कहा।
अमित हल्के से मुस्कुराया— “निर्दोष साबित होना और निर्दोष माना जाना—दो अलग बातें हैं, महोदया!” अमित की भौं टेढ़ी और नथुने फड़क रहे थे।
“तो क्या तुम जा रहे हो?” रीमा ने पूछा।
अमित ने गहरी साँस ली। “मैं भाग नहीं रहा। बस यह याद दिला रहा हूँ कि भरोसा भी कॉन्ट्रैक्ट का हिस्सा होना चाहिए। अगर कम्पनी अपने कर्मचारी पर पहला विश्वास नहीं रखेगी, तो बाहर की दुनिया क्यों रखेगी?” अमित ने कहा।
“यक़ीनन हमने जल्दबाज़ी की! कम्पनी की साख बचाने के चक्कर में हमने तुम्हारी साख पर सवाल लगा दिया।” रीमा ने लज्जित होते हुए कहा!
“अगर तुम रहो… तो मैं पूरी टीम के सामने अपनी गलती स्वीकार करूँगी। सार्वजनिक रूप से। विश्वास वापस लेने का अधिकार तुम्हारा है—पर उसे लौटाने की कोशिश मेरा कर्तव्य।” कुछ पल की खामोशी के बाद रीमा ने अनुरोध भरे स्वर में कहा!
अमित ने अपने सूटकेस को धीरे से सीधा कर दिया—पर बाहर की ओर खींचा नहीं, “मैं रहूँगा,” उसने कहा।
सही निर्णय
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