Sunday, 26 April 2026

सच का दर्द या मोक्ष में दरार?


26 जनवरी 3026


जहाँ तक नज़रें जाती हैं पृथ्वी पूरी तरह शुद्ध, नियंत्रित और निष्प्राण सन्तुलन का पर्याय बन चुकी है। दर्द, प्रतीक्षा, प्रेम—ये शब्द इतिहास-संग्रहालय की धूलभरी वस्तुएँ हो गए हैं। मनुष्य अब जन्म नहीं लेते हैं बल्कि बनाए जाते हैं—‘सिंथेसिस चैम्बर्स’ में, जहाँ कोशिकाएँ विभाजित होकर एक-सी आकृतियाँ, एक-सी बुद्धि और एक-सी स्थिरता के साथ बाहर आती हैं!


26 फ़रवरी 3026


इरा—प्राचीन इतिहास की शोधकर्ता—खोई हुई अनुभूतियों की खोज में है, आज उसे तहखाने में एक जर्जर डायरी मिली। पन्नों पर बार-बार एक शब्द उभर रहा था— ‘माहवारी’ और नीचे काँपते अक्षरों में लिखा था— “यह सृजन की प्रतीक्षा का लाल रंग है।”

इरा ठिठक गई।

“प्रतीक्षा…?” उसने फुसफुसाया, “जब सब कुछ निर्धारित है, तो प्रतीक्षा कैसी?”

उसी क्षण उसके पेट के निचले हिस्से में एक अनजाना कसाव उठा—धीरे-धीरे बढ़ता हुआ। यह कोई दर्ज पीड़ा नहीं थी, कोई प्रोग्राम्ड संकेत नहीं था। कुछ ही पलों में उसके सफेद वस्त्र पर लाल रंग फैलने लगा—गर्म, जीवित, अनियोजित। उसकी उँगलियाँ काँप उठीं।


26 मार्च 3026


“तुम्हारे भीतर एक सुप्त जीन सक्रिय हुआ है। शायद सिंथेसिस प्रक्रिया में कुछ प्राचीन डीएनए अनुक्रम पूर्णतः निष्क्रिय नहीं किए जा सके थे। तुम्हारा शरीर… जैविक चक्र की ओर लौट रहा है।” आज लैब में जाँच के बाद डॉक्टर-रोबोट की निष्प्राण आवाज गूँजी।

“लौट रहा है…?” इरा ने इस वाक्य को बार-बार ऐसे सुना जैसे कोई भूली हुई धुन फिर से कानों में उतर आई हो। वह चुपचाप अपने कक्ष में लौट आई।

उसने उस लाल धब्बे को फिर देखा—वह मात्र रक्त नहीं था, वह एक आरंभ था… किसी अनकहे संबंध का, किसी अधूरे चक्र का।

उस रात उसने डायरी के अंतिम पृष्ठ पर लिखा—

“मैं एक ‘नमूना’ नहीं, एक ‘संभावना’ हूँ। मेरे भीतर एक ऐसी जगह है, जहाँ मशीनें नहीं पहुँच पातीं—जहाँ जीवन स्वयं आकार लेना चाहता है, बिना आदेश, बिना प्रतिकृति।”


26 अप्रैल 3026


“इरा को ‘त्रुटिपूर्ण इकाई’ घोषित किया गया है। उसे पुनर्संरचना हेतु तत्काल प्रस्तुत होना होगा।” सायरन के संग सन्देश गूँजा। इरा ने सन्देश सुना और फिर शान्त भाव से डायरी को सीने से लगा लिया। कुछ क्षण बाद उसने उसे तहखाने की उसी दीवार में छुपा दिया, जहाँ से वह मिली थी। बाहर दुनिया वैसी ही है -निर्मल, नियंत्रित और शान्त। पर उस शान्ति में अब एक हल्की-सी दरार पड़ चुकी थी। क्योंकि कहीं न कहीं, किसी और शरीर में… कोई और ‘सुप्त जीन’ जागने को तैयार  हो गया है।  और प्रकृति— वह कभी पूरी तरह मौन नहीं होती।


26 अप्रैल 2026 -रचना काल

अप्रकाशित अप्रसारित

विभा रानी श्रीवास्तव, पटना


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