“देख भैया! कितना बड़ा केला!” बुचिया ने आधा साफ़ केला उठाकर अपनी फटी फ्रॉक में छुपा लिया। उसके चेहरे पर वही चमक थी, जो किसी अमीर बच्चे के हाथ नया खिलौना आने पर होती है।
मंगरू मिट्टी में पड़े बताशे और भीगे चने बीन रहा था। दूसरों की पूजा का बचा हुआ प्रसाद, उनके कुछ अंश का भोजन था।
“अरे! हटो वहाँ से…! पूजा की जगह अपवित्र कर दी तुम लोगों ने!” उनके पीछे से तभी तेज आवाज गूँजी—
गाँव की मुखिया चाची अपनी भूली हुई चाँदी की थाली लेने लौटी थीं। बच्चों को देखकर उनका चेहरा तमतमा उठा।
बुचिया डरकर पीछे हट गई, पर मंगरू वहीं खड़ा रहा। उसके हाथ में मिट्टी का एक छोटा-सा दीया था, जिसमें थोड़ी-सी घी की परत और सिंदूर बचा था।
“इतनी मिठाई छोड़कर ये गन्दा दीया क्यों उठा रखा है?” चाची ने झुँझलाकर पूछा।
“माई ने कहा है, बरगद बाबा के पैर का सिन्दूर और घी लगा देंगे तो हमारे बाबू की भी साँस लम्बी हो जाएगी। भोर से भट्ठे पर खाँस रहे हैं…” मंगरू ने सहमे स्वर में कहा— वाक्य पूरा होते-होते उसकी आवाज भर्रा गई।
“आज मैंने अपने पति की लम्बी उम्र के लिए सोने का धागा चढ़ाया था, और इस बच्चे ने टूटी मिट्टी के दीये में अपने पिता की पूरी जिन्दगी समेट ली।” बुदबुदाती चाची के हाथ काँपने लगे और चाँदी की थाली अचानक बहुत डगमगाने लगी। कुछ क्षण तक वे निश्चल खड़ी रहीं। फिर चुपचाप थाली में बचे फल और लड्डू बुचिया के फ्रॉक में डाल दिए। बच्चे खिल उठे। वे दौड़ते हुए मुसहरी की ओर भाग गए। बरगद की छाँव अब भी वैसी ही थी-

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