Saturday, 27 August 2022

छिपा रूस्तम

 

मेरे देवर का बेटा तीन दिन से दुर्घटनाग्रस्त होकर गहन चिकित्सा विभाग में भर्ती था। आज लगभग साढ़े चार बजे हम पुनः गहन चिकित्सा विभाग के सामने उपस्थित थे लेकिन हमें अनुमति नहीं मिली शीशे के पार देखने की। वहाँ पर अफरातफरी मची हुई थी। एक बुजुर्ग लाये गए थे जो जहर खा लिए थे। अब खा लिए थे या खिला दिया गया था.. यह हमें पता नहीं चल पाया क्योंकि हमने किसी से पूछताछ नहीं किया। बुजुर्ग को देखकर एक महिला बोली कि, "मेरे घर के गेंहूँ में कीड़ा लग रहा था उसमें दवा डालने के लिए खरीदने गयी तो मुझे दवा नहीं मिली। लौटकर दो पुरुषों को लेकर गयी तब भी दवा नहीं मिली। इन्हें जहर कहाँ से और कैसे मिल गयी?"

"इतने बुजुर्ग को मिल जाना कोई आश्चर्य की बात नहीं है। आश्चर्य की बात है इनके साथ आये सभी युवा इनके गाँव के हैं। इनमें से कोई बुजुर्ग के घर का अपना नहीं है।" परिचारिका ने कहा।

थोड़ी देर में बुजुर्ग के घर से लोग आ गए।

"यह दस हजार रुपया रख लीजिए, पुलिस को सूचना नहीं दीजिएगा..," बुजुर्ग के घर से आये युवक ने कहा।

"मुझे रुपया देने की आवश्यकता नहीं। मैं परिस्थिति समझ रहा हूँ। आपलोग निश्चिंत रहिए मैं पुलिस को नहीं बुला रहा हूँ।" अस्पताल प्रबंधक और चिकित्सक ने एक स्वर में कहा।

"गहन चिकित्सा विभाग में ऐसे लोगों को नहीं रखना चाहिए जिनके शरीर से जहर निकालना हो अन्य रोगियों को परेशानी होती है। जल्दी से हटाइये।" गहन चिकित्सा विभाग में भर्ती अन्य रोगियों के रिश्तेदार आपत्ति जताने में शोर मचा रहे थे।

"आपलोग शान्ति बनाये रखें। बुजुर्ग की मौत अस्पताल आने के पहले ही हो चुकी थी। यहाँ जहर निकालने की प्रक्रिया नहीं की गयी हैं।" गहन चिकित्सा विभाग के पहरेदार ने कहा।

"फिर साढ़े आठ हजार किस बात की ली गयी है?" भीड़ में से किसी ने फुसफुसाया।

6 comments:

  1. सादर नमस्कार ,

    आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल रविवार (28-8-22} को साथ नहीं है कुछ भी जाना" (चर्चा अंक 4535) पर भी होगी। आप भी सादर आमंत्रित है,आपकी उपस्थिति मंच की शोभा बढ़ायेगी।
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    कामिनी सिन्हा

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  2. ऐसा होता आया है।

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  3. मार्मिक यथार्थ

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  4. यथार्थ से रूबरू कराती प्रस्तुति। बहुत बढ़िया।

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तपस्वी

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