Sunday, 24 April 2022

आतिशीलभ्य

 

"ये रे लखिया तू किस मिट्टी की बनी है? तुझे ना तो इस श्मशान बने जगह पर आने में डर लगा और ना मृतक को बटोरने में!"

"मेरा डर उसी समय भाग गया साहब जब युद्ध छिड़ा..।"

"तू इनका करेगी क्या?"

"मुझे भी अपना और अपने जैसों का पेट भरना और तन ढंकना है। मेरे पुस्तक में लिखा है कि वैज्ञानिकों ने शोध में पाया है कि इन्सान और जानवरों के टिशू को भी हीरे में बदला जा सकता है।"

"तू इतना क्यों मेहनत कर रही है। तू मेरी बात मान ले तो मैं तुझे अपने घर ले जा सकता हूँ। तेरा पेट भी भरेगा और तन पर भी रेशम चढ़ जाएगा।"

"मेरे तन का रंग ग्रेफाइट है जो क्रुसिबल बनाने में सहायक होता है साहब।और आपका मन..."

16 comments:

  1. मन सिलिका हो लिया है कमप्यूटर चिप्स बनते हैं सुपरफ़ास्ट

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  2. सारा खेल मन का ही तो है, तन और मन दोनों साफ़ हो तो फिर रोना काहे का हो जग में

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  3. यथार्थ पर गहरा दृष्टिकोण ।
    सराहनीय रचना ।

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  4. शुभकामनाओं के संग हार्दिक आभार आपका

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  5. मार्मिक लघुकथा दी.... मन को बिंधती।
    "मेरे तन का रंग ग्रेफाइट है जो क्रुसिबल बनाने में सहायक होता है साहब।और आपका मन...निशब्द हूँ इन दो वाक्यों पर...
    सादर

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  6. आपकी लिखी रचना  ब्लॉग "पांच लिंकों का आनन्द" मंगलवार 26 अप्रैल 2022 को साझा की गयी है....
    पाँच लिंकों का आनन्द पर
    आप भी आइएगा....धन्यवाद!

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  7. मन के जीते जीत है
    मन के हारे हार

    बहुत अर्थपूर्ण लघुकथा

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  8. हृदयस्पर्शी सृजन।

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  9. लाजवाब ! धारदार ! अभिनंदन ।

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  10. दिल को छूती बहुत ही सुंदर रचना।

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  11. This comment has been removed by a blog administrator.

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  12. भीतर तक चुभती हुई....

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  13. मार्मिक धारदार लघुकथा

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