Wednesday, 28 September 2022

यूटोपिया


"तू समूचे समाज से जुड़ा हुआ है जिसका एक अनिवार्य अंग मैं भी हूँ। तेरी अतिरिक्त स्वायत्तता के पैरोकार हमारी आपस में दुश्मनी साबित करके तुझको मुझसे दूर रखने में ही तेरी भलाई समझते समझाते हैं। जबकि तू मेरे आगे चलने वाली मशाल है।" राजनीत ने साहित्य से कहा।

"मशाल होते हुए भी तेरे में से भ्रष्टाचार वाले मैले पक्ष को दूर कहाँ कर पाती हूँ।" साहित्य ने कहा।

”तुझमें चाटुकारी वाली बातें दर्ज हो रही हैं। खेमेबाजी में गलत बातों को प्रोत्साहन मिल रहा है।" राजनीत ने कहा।

"ऐसी बात नहीं है।" साहित्य ने कहा।

"अगर ऐसी बात नहीं होती तो क्या कथा में 'पिता का पुत्री से रात्रि में कुत्ता के भौंकने का पूछना' प्रशंसा पा जाता?" राजनीत ने कहा।

3 comments:

  1. आपकी इस प्रस्तुति का लिंक 29.9.22 को चर्चा मंच पर चर्चा - 4567 के 8 लिंकों में शामिल किया गया है| आईएगा
    धन्यवाद
    दिलबाग

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  2. एक सार्थक संवाद द्वारा साहित्य जगत के बड़े सच को खूब उजागर किया है आपने

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आपको कैसा लगा ... यह तो आप ही बताएगें .... !!
आपके आलोचना की बेहद जरुरत है.... ! निसंकोच लिखिए.... !!

तपस्वी

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