Wednesday, 28 January 2026

वनवास की विरासत

मयंक की शादी का भव्य भोज कल रात में समाप्त हुआ था।रिसॉर्ट से मेहमानों की गाड़ियों की कतार धीरे-धीरे सड़क में विलीन हो रही थी। रिसॉर्ट के एक कोने में उसके पिता ज़मीन से टिके बैठे थे—फूट-फूटकर रोते हुए। अंशु, मयंक के ताऊ का बेटा—यह दृश्य देख रहा था। उसकी आँखें भी नम थीं, परन्तु उसके सीने में दबी कड़वाहट आँसुओं से भारी पड़ रही थी।

“मयंक जी, अपनी पत्नी के साथ कहाँ चले गए? चाचा जी, इतना क्यों रो रहे हैं?” अंशु की पत्नी ने बेहद संकोच से पूछा।

अंशु ने ठंडी साँस छोड़ी, “ये आँसू आज बेमानी हैं, इन दिनों बात-बात पर चाचा जी आजकल की बहुओं पर तीखा कटाक्ष कर रहे थे।”

“तो क्या हो गया? यह तो सामान्य सी बात है। पुरानी पीढ़ी नई पीढ़ी की!” अंशु की पत्नी ने कहा।

“तुम इनका इतिहास नहीं जानती हो! हर थोड़े दिनों के बाद यही चाचा जी मेरे ननिहाल चले जाया करते थे—मेरे नाना और बड़े मामा को बुला लाने के लिए। घर में ज़रा-सी तकरार होती और घर इजलास बन जाता। मेरी माँ को ऐसे निकल जाने का आदेश जारी किया जाता, जैसे वह उस घर का हिस्सा ही न हों।”

“अंशु भैया, आप उन्हें ही क्यों दोष दे रहे हैं? दादी भेजती थीं। मेरे पिता जी क्या करते? उनकी बात न मानकर क्या वे उस घर में रह सकते थे?” पास खड़ी मयंक की बड़ी बहन बोल पड़ी।

अंशु की आँखों में बरसों पुरानी टीस दामिनी बन उतर आई, “फर्ज़ और साज़िश के बीच एक बहुत बारीक रेखा होती है,” वह बोला। “दादी की आज्ञा के नाम पर मेरी माँ को बार-बार अपमानित किया गया। आज जब मयंक सक्षम है, अपना घर बसा सकता है, तो ये रो रहे हैं—क्योंकि अब किसी को बाहर भेजने का अधिकार नहीं बचा। काश! मेरे पिता भी मयंक जैसे होते।” चाचा का रोना और तेज़ हो गया। अंशु ने अपनी पत्नी की ओर देखा। उसकी आँखों में सवाल था, उत्तर की प्रतीक्षा थी। अंशु ने चुपचाप गाड़ी का दरवाज़ा खोला और धीमे, पर दृढ़ स्वर में कहा— “जिस घर में अपनों को बार-बार बाहर भेजने की परम्परा हो, वहाँ नया गृह-प्रवेश नहीं होता!”


Tuesday, 6 January 2026

स्वाद की मर्यादा

 शान्त, सजग और आत्मसम्मान से भरी मृदुला एक बड़ी विज्ञापन एजेंसी में क्रिएटिव हेड थी। नाम की तरह ही उसका स्वभाव भी बेहद मृदु था। —न उसकी आवाज ऊँची होती थी, न उसको चालाक राजनीति आती थी और न ही उसमें दूसरों को नीचा दिखलाकर आगे बढ़ने की आकांक्षाएँ ही थीं।इसलिए वह अपनी जगह पर सदैव स्थिर रहा करती थी—

“बेटी, जिस कॉर्पोरेट दुनिया में तुम कार्यरत हो, वहाँ के लोग एक-दूसरे को काट खाने को हमेशा तैयार रहते हैं। वह तेज बत्तीस दाँतों वालों की दुनिया है—और तुम उनके बीच एक अकेली जीभ जैसी हो। इतनी सिधाई से वहाँ कैसे टिक पाओगी?” उसके पिता अक्सर वीडियो कॉल पर उससे पूछ लेते थे।और मृदुला हर बार बस! एक विश्वास के साथ मुस्कुराकर गुनगुनाने लगती थी।

कुछ समय गुजरने के बाद एक दिन उसके कार्यालय में एक भारी संकट आ खड़ा हुआ। एजेंसी का एक बड़ा क्लाइंट मुकदमे की धमकी देने लगा। कारण था—एक पुराने सीनियर मैनेजर का अहंकार और बदतमीज़ी वाला व्यवहार, जिसके कारण वर्षों की मेहनत पर पानी फिरता नज़र आ रहा था। मीटिंग रूम में बैठे और अन्य सारे कड़क आवाज़ वाले अधिकारी—कभी धमकी देने लगते, कभी दबाव बनाने की कोशिश करने लगते। लेकिन जितना वेलोग बोलते जाते मामला उतना ही बिगड़ता जा रहा था। अंततः सभी की निगाहें मृदुला पर आकर टिक गईं।

बड़े धैर्य के साथ मृदुला आगे बढ़ी। उसने न तो अपनी ऊँची आवाज़ की, न तर्कों की तलवार चलाई। उसने बड़े धैर्य और ध्यान से क्लाइंट की पूरी बात सुनी—बिना टोके, बिना एजेंसी के बचाव के लिए। फिर बड़ी विनम्रता से एजेंसी की ही चूक को स्वीकार की, और उतनी ही विनम्रता और शान्ति से समाधान रखा। उसकी भाषा में न पछतावे की बनावट थी, न सफ़ाई का दिखावा—सिर्फ़ ईमानदारी और बस! ईमानदारी थी।उसकी कोमल वाणी ने वह कर दिखाया, जो कठोर अहंकार नहीं कर पा रहा था। क्लाइंट का क्रोध बहुत हद तक शान्त हो गया, और आहिस्ता-आहिस्ता बातचीत पटरी पर लौटने लगा  —और कुछ ही देर के बाद में पुनः अनुबंध (कॉन्ट्रैक्ट रिन्यू) तैयार हो गया।

उस शाम मृदुला ने अपने पिता को फोन किया और मुस्कराते हुए कहा,

“पापा, आज उन ‘दाँतों’ को समझ में आ गया कि चबाने का काम दाँत करते हैं, लेकिन स्वाद तो हमेशा जीभ ही बताती है। दाँत आपस में टकराकर टूट सकते हैं, पर जीभ सबको साथ लेकर चलती है। मैंने निभाना सीख लिया है—बिना कठोर बने।”

फोन के उस पार पिता कुछ क्षण चुप रहे। मानों उनकी चिन्ता अब गर्व में बदल चुकी हो!

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भरोसे की रणरीति

प्राणा  कम्पनी का सबसे बड़ा प्रोजेक्ट लॉन्च हो गया, लेकिन प्रतिस्पर्धी कंपनी ने अंतिम क्षणों में कानूनी दाँव खेल दिया। मीडिया, निवेशक, सबकी ...