शान्त, सजग और आत्मसम्मान से भरी मृदुला एक बड़ी विज्ञापन एजेंसी में क्रिएटिव हेड थी। नाम की तरह ही उसका स्वभाव भी बेहद मृदु था। —न उसकी आवाज ऊँची होती थी, न उसको चालाक राजनीति आती थी और न ही उसमें दूसरों को नीचा दिखलाकर आगे बढ़ने की आकांक्षाएँ ही थीं।इसलिए वह अपनी जगह पर सदैव स्थिर रहा करती थी—
“बेटी, जिस कॉर्पोरेट दुनिया में तुम कार्यरत हो, वहाँ के लोग एक-दूसरे को काट खाने को हमेशा तैयार रहते हैं। वह तेज बत्तीस दाँतों वालों की दुनिया है—और तुम उनके बीच एक अकेली जीभ जैसी हो। इतनी सिधाई से वहाँ कैसे टिक पाओगी?” उसके पिता अक्सर वीडियो कॉल पर उससे पूछ लेते थे।और मृदुला हर बार बस! एक विश्वास के साथ मुस्कुराकर गुनगुनाने लगती थी।
कुछ समय गुजरने के बाद एक दिन उसके कार्यालय में एक भारी संकट आ खड़ा हुआ। एजेंसी का एक बड़ा क्लाइंट मुकदमे की धमकी देने लगा। कारण था—एक पुराने सीनियर मैनेजर का अहंकार और बदतमीज़ी वाला व्यवहार, जिसके कारण वर्षों की मेहनत पर पानी फिरता नज़र आ रहा था। मीटिंग रूम में बैठे और अन्य सारे कड़क आवाज़ वाले अधिकारी—कभी धमकी देने लगते, कभी दबाव बनाने की कोशिश करने लगते। लेकिन जितना वेलोग बोलते जाते मामला उतना ही बिगड़ता जा रहा था। अंततः सभी की निगाहें मृदुला पर आकर टिक गईं।
बड़े धैर्य के साथ मृदुला आगे बढ़ी। उसने न तो अपनी ऊँची आवाज़ की, न तर्कों की तलवार चलाई। उसने बड़े धैर्य और ध्यान से क्लाइंट की पूरी बात सुनी—बिना टोके, बिना एजेंसी के बचाव के लिए। फिर बड़ी विनम्रता से एजेंसी की ही चूक को स्वीकार की, और उतनी ही विनम्रता और शान्ति से समाधान रखा। उसकी भाषा में न पछतावे की बनावट थी, न सफ़ाई का दिखावा—सिर्फ़ ईमानदारी और बस! ईमानदारी थी।उसकी कोमल वाणी ने वह कर दिखाया, जो कठोर अहंकार नहीं कर पा रहा था। क्लाइंट का क्रोध बहुत हद तक शान्त हो गया, और आहिस्ता-आहिस्ता बातचीत पटरी पर लौटने लगा —और कुछ ही देर के बाद में पुनः अनुबंध (कॉन्ट्रैक्ट रिन्यू) तैयार हो गया।
उस शाम मृदुला ने अपने पिता को फोन किया और मुस्कराते हुए कहा,
“पापा, आज उन ‘दाँतों’ को समझ में आ गया कि चबाने का काम दाँत करते हैं, लेकिन स्वाद तो हमेशा जीभ ही बताती है। दाँत आपस में टकराकर टूट सकते हैं, पर जीभ सबको साथ लेकर चलती है। मैंने निभाना सीख लिया है—बिना कठोर बने।”
फोन के उस पार पिता कुछ क्षण चुप रहे। मानों उनकी चिन्ता अब गर्व में बदल चुकी हो!
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