Saturday, 2 March 2019

"बंदर बाँट"



"रे शाम्भा! पहना बाबू को बढ़ियाँ पोशाक.. इसे छोड़ने जाना है...।"
"तौबा!तौबा! क्या कहते हैं हुजूर.. , ना आपने हित साधने हेतु कोई शर्त रखी और ना उधर से कोई माफीनामा आया... तौबा!तौबा.. इसके बल पर हम बहुत कुछ मनवा सकते हैं... अभी आधे हिस्से के आधार पर कई हिस्से पा लेना है... तौबा! तौबा.. हमारी तो नाक ही कट कर रह जायेगी, अगर ऐसे इस नामुराद को वापस कर दिया गया.., तौबा! तौबा.. किसी साथी को ही..."
"मौके की नज़ाकत को तुम नहीं समझ रहे हो नामुराद... हम इसको दामाद की तरह वापस नहीं जाने दिए तो हम मिट जाएंगे... दुश्मन का हम कितना नष्ट कर सकते हैं ? उसके देश का एक चौथाई हिस्सा... उतने में ही हम नेस्तनाबूद हो जाएंगे... जिस देश के हम गुलाम रहें... आजादी के बाद भी उसीके मुंहताज हैं.. उसकी मध्यस्थता मान हम अपने वजूद को तो बचा लें..
"लेकिन..,"
"लेकिन वेकिन कुछ नहीं.. छोड़ना है तो छोड़ना है.. समझ! समझायेंगे स्थिति.. चींटी भी हाथी की हवा निकाल सकती है...।"

4 comments:

  1. बहुत खूब , चंद पक्तियों में ही सब कुछ कह दिया ,मज़ा आगया ,सादर नमन

    ReplyDelete
  2. नमस्ते,

    आपकी यह प्रस्तुति BLOG "पाँच लिंकों का आनंद"
    ( http://halchalwith5links.blogspot.in ) में
    गुरुवार 7 मार्च 2019 को प्रकाशनार्थ 1329 वें अंक में सम्मिलित की गयी है।

    प्रातः 4 बजे के उपरान्त प्रकाशित अंक अवलोकनार्थ उपलब्ध होगा।
    चर्चा में शामिल होने के लिए आप सादर आमंत्रित हैं, आइयेगा ज़रूर।
    सधन्यवाद।

    ReplyDelete
  3. उसकी मध्यस्थता मान हम अपने वजूद को तो बचा लें.......
    बहुत खूब...
    वाह!!!

    ReplyDelete
  4. मौका परस्ति पर सुंदर व्यंग।

    ReplyDelete

आपको कैसा लगा ... यह तो आप ही बताएगें .... !!
आपके आलोचना की बेहद जरुरत है.... ! निसंकोच लिखिए.... !!

तपस्वी

 तेरा वो वाला घर सवा - डेढ़ करोड़ में बेचा जा सकता है। चालीस - पैतालीस लाख में अन्य कोई फ्लैट खरीदकर उनमें उनलोगों को व्यवस्थित कर सकते हो औ...