Saturday, 6 July 2019

उलझन

गरिमा पाठक(रांची)
*गरिमा पाठक* :–शुभ प्रभात दोस्तों
हर दिन एक नये दिवस का इन्तज़ार

सबको   ही ...।
अपने अपने वक्त का इन्तज़ार है
हम जिन्दगी में हर वक्त यही तो सीखते रहते हैं
और जिन्दगी भर नहीं सीख पाते।
जन्म लेने के  पहले से लेकर
मृत्यु तक यही  तो किया है।

पहले जन्म लेने का इन्तज़ार
फिर बडे होने का ……...
बुढे होने का ……….
और  अन्ततः मृत्यु का इन्तज़ार..।

जन्म के समय हम कमजोर थे
और अन्त भी ऐसा ही होता  है
मन और तन दोनों ही
कमजोर होने लगता है।
तब सहारे की जरूरत होती है ।
हम  बुद्धिमान जीव सारा जीवन ही
बस इन्तज़ार में ही गवां देते है..।

सुबह में शाम का ……..
शाम को रात का…….
और  फिर से सुबह होने का ..।
बस यही तो चलता है सारा जीवन ।

क्या यही जीवन है ।
क्या हमने बस मरने केलिए जन्म लिया है??

*विभा रानी श्रीवास्तव* :- मरने का ना इंतजार है और सोचने का कि क्यों जन्म लिया है... अभी सुबह से रात तक यह सोचने में निकल जाता है कि समाज से जो ऋण लिया है उसका तो सूद ही नहीं चुके मूल कैसे चुका पाऊँगी... यही इसी पल तो है जिंदगी चूक हो रही है बड़ी-बड़ी..,

*गरिमा पाठक*:–विभा रानी श्रीवास्तव धन्यवाद मै तो सवालों के जवाब की तलाश में हूँ सिर्फ  आपने ही मुझे जवाब दिया...।वाह आह और बेहतरीन शब्दों से दिल खुश होता है लेकिन मन तो अशांत ही रह जाता है..।हम जब अशांत हो और जवाब नहीं समझ आऐ तो अपने बडो से या दोस्तों से समझने की कोशिश करते है मै भी वही टर रही हूँ ।आपके जवाब ने मुझे थोड़ी शान्ति दी है ...और अभी भी तलाश जारी है ..।
धन्यवाद दीदी
.आपको नमन...

मै क्यो आई हूँ दूनियाँ में ??

*विभा रानी श्रीवास्तव* :- माता-पिता के खुशी के पल प्रतिरूप होता है कोई बच्चा
परवरिश-संस्कार और वातावरण के आधार पर बच्चा अपना विचार बनाता बिगाड़ता रहता है
अपना कर्म अपने विचार पर तय करता है
आप क्यों आईं इस दुनिया में आपके अपने किये कर्म बतायेंगे आपको भी आपके समाज को भी

स्वार्थ में केवल स्व के लिए जी रही हैं और अपने खोल में लिपटी हैं या...,

*गरिमा पाठक* :–विभा रानी श्रीवास्तव ओह बहुत अच्छी बात कहा आपने ..।धन्यवाद

*विभा रानी श्रीवास्तव* :– 🤔आपके सवाल समाप्त हो गए...  लेकिन मेरा जबाब अकुलाहट में है लिख लूँ बात पूरी हो जानी चाहिए

हर पुरुष राम कृष्ण बुद्ध गाँधी मोदी नेहरू नहीं होता , अंगुलीमाल का दूसरा उदाहरण नहीं मिलता है
प्रत्येक स्त्री सीता अनसुइया मीरा राधा सरोजनी लक्ष्मी, लक्ष्मी बाई नहीं होती

विभा गरिमा भी कम महत्त्वपूर्ण नहीं अभी तो चल रही हैं...! सदा चलती रहेंगी।

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