विश्वविद्यालय के सभागार में चर्चा चल रही थी—विषय था “प्रवासी भारतीय और उनकी निष्ठा”। श्रोताओं के बीच बैठे लोग गम्भीर थे, जैसे हर शब्द किसी पुराने घाव को कुरेद रहा हो।
“फ़र्ज़ कीजिए, कभी ऐसा समय आए कि अमेरिका और भारत के रिश्ते बिगड़ जाएँ और अमेरिका भारत पर मिसाइल हमले करने लगे। तब अमेरिका में बसे भारतीय क्या चाहेंगे—अमेरिका की जीत और भारत की हार?” मंच से एक युवक ने सवाल उछाला। सभागार में खामोशी वापस लौटी लहरें सी उतर आई।
“क्रिकेट की तरह क्या वे वहाँ के नमक का हक़ अदा करेंगे? भले ही कोई मिसाइल उस गाँव पर गिरे जहाँ उनके अपने घरवाले रहते हों?” युवक ने आगे कहा।
पतझड़ में गिरे आखरी पत्ता सा सवाल हवा में तैरता रह गया। कुछ लोग असहज होकर कुर्सियाँ खिसकाने लगे।
तभी पीछे की पंक्ति से एक अधेड़ स्त्री उठीं। उसके चेहरे पर थकान नज़र आ रही थी, “उत्तर क्यों नहीं देना चाहेंगे?” उन्होंने स्थिर आवाज़ में कहा। सभागार का ध्यान उनकी ओर मुड़ गया।
“मेरा बेटा अमेरिका में रहता है। कई बार उसकी कुछ बातों से मुझे लगा कि वह अपनी जड़ों को भूल रहा है। मैं तो कई मंचों से उस पर देशद्रोह का आरोप लगाने की माँग तक कर चुकी हूँ।” उन्होंने धीमे-धीमे कहना शुरू किया— लोग चौंक गए।
“लेकिन…” उन्होंने हल्की मुस्कान के साथ जोड़ा—
“अमेरिका में जितने भारतीयों से मिली हूँ, वे भारत में रहने वाले बिहारी, बंगाली, राजस्थानी से ज़्यादा सिर्फ भारतीय लगे—कई बार तो उनसे बहुत ज़्यादा।” सभागार में सन्नाटा अमावस्या सा गहरा गया।
“वे वहाँ की मिट्टी में रहते हैं, पर उनकी धड़कनें अभी भी यहाँ की धूल से जुड़ी रहती हैं। वे भारत की हार कभी नहीं चाहेंगे।” थोड़ा रुककर उन्होंने युवक की ओर देखा—
“और जहाँ तक क्रिकेट की बात है… वह खेल है। खेलों में तो एक ही देश के दो दल भी होते हैं—अभ्यास के लिए, सीखने के लिए। वहाँ जीत-हार से दिल नहीं टूटते।”
उनकी आवाज़ हल्की काँप रही थी-
“पर युद्ध… युद्ध में तो दिल ही टूटते हैं। और जिनके दिल दो मिट्टियों के बीच धड़कते हों, वे किसी की हार नहीं—बस अपनों की सलामती चाहते हैं।”
सभागार में सुई/पिन भी गिरती तो लाउडस्पीकर पर शोर गूँज जाती-