Saturday 22 June 2013

मैं स्तब्ध हूँ


सैलाब ,प्रलय ,प्रकृति आपदा या दैविक प्रकोप जो रहा हो ....
मैं मूक थी ....
मेरी लेखनी को शब्द नहीं मिल रहे थे ....

कल ये प्रसाद मेरे हांथों  में आया ....

मैं स्तब्ध हूँ ....
इस प्रसाद के लोभ में
आकांक्षा के प्रलोभन में
कितनों की बलि चढ़ गई  ....

मैं अब स्तब्ध हूँ
इस चाँदी के सिक्के को देख कर
जो भोले-भण्डारी
धतूर कनेल भांग से खुश हो जाते हैं
उनके प्रसाद में ..............



खुश कौन ज्यादा होगा
केदार नाथ या
चढ़ा प्रसाद पाने वाला ???




24 comments:

  1. बहुत मर्मस्पर्शी अभिव्यक्ति...

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  2. दुखद हादसा
    सरकार द्वारा
    विगत वर्षों
    प्रकृति से
    छेड़-छाड़
    को भुगता
    जन-मानस
    सरकार का
    क्या गया
    खोया तो
    अपनों को
    अपने ही ने
    कहते हैं अब
    स्वर्ग यहीं
    और नर्क भी
    यहीं.....
    यही तो है
    नारकीय यातना
    जो भोगा
    अपनों नें

    सादर

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  3. sach kaha didi....vaise bhi bhagwan tho bass bhakti say hi khush ho jate hain.....

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  4. ईश्वर भक्ति-भाव ही चाहते हैं ...वही तो आज लुप्त हो गया है ...!!क्या कहा जाये ...!!

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  5. दुर्भाग्य की प्रबलता सौभाग्य पर कई बार भारी पड़ती है .....

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  6. मर्मस्पर्शी अभिव्यक्ति...

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  7. उनके लिए भावनाओं से बढ़कर कुछ नहीं ..... जो अब हमारे विचारों में ही नहीं हैं

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  8. आपकी इस प्रविष्टी की चर्चा कल रविवार (23-06-2013) के चर्चा मंच -1285 पर लिंक की गई है कृपया पधारें. सूचनार्थ

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  9. आपकी यह रचना कल रविवार (23 -06-2013) को ब्लॉग प्रसारण पर लिंक की गई है कृपया पधारें.

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  10. क्या यह त्रासदी भोलानाथ की यह संकेत है कि"पापियों अब कभी यहाँ मत आना मैं यह स्थान छोड़कर जा रहा हूँ "?

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  11. ईश्वर तो मन में हैं. मन के एकांत की शान्ति में सबसे गहरा संपर्क बनता है उनके साथ. बहुत विचारणीय शब्द.

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  12. हम सभी स्तब्ध हैं , मौसम खुलने के बाद तस्वीरें और जिन्दा लौटे लोगों के अनुभवों ने रोंगटे खड़े कर दिए हैं !!

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  13. विचारणीय .....!!!

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  14. आकांक्षा का प्रलोभन कभी काल के गाल में भी ले जाता है.

    ह्र्दयविदारक. सोचने पर विवश करती प्रस्तुति.

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  15. मर्मस्पर्शी चिंतन ....

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  16. ढ़ोंगी-पाखंडी हिंदूवाद ही जिम्मेदार है इस त्रासदी के लिए। जैसी करनी वैसी भरनी जो मानवता को लाट मार कर पत्थर पूजने गए थे उनको प्रकृति ने सही लात मारी है।
    http://vijaimathur.blogspot.in/2013/06/blog-post_23.html

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  17. दुखभरी घटना, स्तब्ध सभी।

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  18. बहुत सुन्दर.सच कहा

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  19. ऐसे में खुश कोई कैसे रह सकता है ...
    मर्मस्पर्शी प्रस्तुति ..

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  20. gahan chintan .....shayad dono dukhi hi honge ....

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  21. सोचने पर विवश करती ......मर्मस्पर्शी प्रस्तुति

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  22. आस्था पे भी दिखावा हावी होता जा रहा है ...

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  23. सटीक और मार्मिक रचना |

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  24. हम सभी स्तब्ध हैं, और प्रकृति का प्रलय रूप देखकर व्याकुल भी ,.... अगर अब भी नहीं जागे हम अपनी प्रकृति की रक्षा के लिए तो शायद ऐसा निरंतर होगा।

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