Saturday, 11 October 2014

मुक्तक




सभी को असीम शुभ कामनायें

शशि मुखरा  / बदली घेर गई / भार्या दहके
डाह के अंधे / शाप भूला ना होगा / धैर्य डहके
सुन के धौंस / छिपा जो मनुहारी / बना वो तोषी
सजा करवा / अचल हो सुहाग / आस चहके

====

1 comment:

आपको कैसा लगा ... यह तो आप ही बताएगें .... !!
आपके आलोचना की बेहद जरुरत है.... ! निसंकोच लिखिए.... !!

सूत और साँसें

जेठ की दुपहरी उतरान पर थी। गाँव के पुराने बरगद के नीचे बिछा वट-सावित्री का उत्सव अभी-अभी समाप्त हुआ था। सुहागिनें अपने-अपने पतियों की दीर्घा...