Thursday, 13 December 2018

"आधे में अधूरा-पहला प्यार"


एक लंबे अर्से के बाद उषा और निशा का मिलन हुआ… नदियों का आपस में मिलना आसान है , लेकिन अलग-अलग शहरों में ब्याही एक गाँव की बेटियों का मिलना कहाँ हो पाता है.… अपने मायके से बुलावे और ससुराल से भेजे जाने के बीच तारतम्य बैठाने में समय गुजरता जाता है… मिलते ही उषा निशा के हाल-चाल पूछने के क्रम में वैवाहिक जीवन कैसा चल रहा है ? जानने की जिज्ञासा प्रकट करती है. निशा बताती है कि उसका वैवाहिक जीवन बेहद सुकून भरा है… पति , सास-ससुर सभी बेहद प्यार और सम्मान देते हैं
“और भानु”
“दिल में खुदा नाम कहाँ मिटता है!”
“अपने पति को कभी बताया?”
“मीरा की तरह जहर का प्याला पीने की साहस नहीं जुटा पाई!”
“भानु की तुलना कृष्ण से?”
“ना! ना! तुलना नहीं। ईश और मनु में क्या और कैसी तुलना! भानु को कहाँ जानकारी है मेरेे मनोभावों की।”
निशा ने जब से होश संभाला था ,तब से ही अपनी माँ की बातों से उसे पता चला था कि उसकी शादी , मामी के भतीजे भानु से होगी और तब से भानु नाम उसने दिमाग में बैठा लिया था और भानु की प्रतीक्षा करने लगी थी। लेकिन भानु और निशा का मिलना कभी हुआ है...?

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