Thursday, 2 May 2019

"सूखी नदी"



"बाबा! आप पीछे के सीट पर बैठ जाइए.. आबादी बढ़ गई सड़के सकरी गली की चौड़ी हो नहीं रही है, आगे पुल पर भीड़ में आपको चोट लग जायेगी ।" अपने बगल में बैठाए वृद्ध से ई-रिक्शा चालक ने कहा,जब पीछे से एक सवारी उतर गई। ई-रिक्शा चालक के हिस्से के पीछे में एक महिला और एक किशोर बैठे थे उसके आगे हिस्से में एक युवा सवारी बैठा था एक स्थान खाली था (चार सवारी के बैठने का स्थान होता ही है)
 खाली स्थान पर ज्यों ही वृद्ध बैठने लगे किशोर झटके से उस स्थान पर बैठ गया।
"अरे! क्या हुआ? स्थान क्यों बदल लिए?" दंग हो वृद्ध ने पूछा।
"उल्टा लग रहा था..!"
"पैदा तो इंसान उल्टा ही होता है.. पाँच-दस मिनट में हम इस ऑटो को छोड़ देंगे जैसे ही हमारी मंजिल आएगी... ना तो तुम और ना तो मैं स्थाई रूप से इस पर बैठे रहने वाले हैं.. लेकिन जिस तरह से तुम चौड़े स्थान को झपटने में उतावलपन दिखलाये हो उससे संस्कारों के प्रति सचेत नहीं दिख रहे हो.. देख लो जिस पुल पर से ऑटो गुजर रहा है उसके नीचे धूल उड़ रही है।" वृद्ध के आवाज में चिंता झलक रही थी...।

5 comments:

  1. सच ,युवापीढ़ी संस्कार खोती जा रही हैं ,आप कितनी सरलता से बड़ी बात को चंद पक्तियो में ही कह देती हैं ,सादर नमस्कार बिभा दी

    ReplyDelete
  2. आपकी इस पोस्ट को आज की बुलेटिन 2400वीं बुलेटिन - स्व. सत्यजीत रे जी 98वीं जयंती में शामिल किया गया है। कृपया एक बार आकर हमारा मान ज़रूर बढ़ाएं,,, सादर .... आभार।।

    ReplyDelete
  3. ऐसे दृश्य अक्सर देखने को मिलते हैं अब विभा दी.

    ReplyDelete

आपको कैसा लगा ... यह तो आप ही बताएगें .... !!
आपके आलोचना की बेहद जरुरत है.... ! निसंकोच लिखिए.... !!

चालाकी कि धूर्तता

लघुकथा लेखक द्वारा आयोजित 'हेलो फेसबुक लघुकथा' सम्मेलन का महत्त्वपूर्ण विषय 'काल दोष : कब तक?' था। आमंत्रित मुख्य अतिथि महोद...