Thursday 2 February 2017

मुक्तक



उबलते जज्बात पर चुप्पी ख़ामोशी नहीं होती
गमों के जड़ता से सराबोर मदहोशी नहीं होती
तन के दुःख प्रारब्ध मान मकड़जाल में उलझा
खुन्नस में बयां चिंता-ए-हुनर सरगोशी नहीं होती

<><>

वर्ण पिरामिड 

तो 
वैसा
स कर्म
सोच जैसा
गर्व गुरुता
दंभ से दासता
इंसान स्व भोगता
<><>
स्व
भान
सज्ञान
राष्ट्रगान
अव्यवधान
गणतंत्र मान
वीडियोग्राफी भू की




3 comments:

  1. आपकी लिखी रचना "पांच लिंकों का आनन्द में" शुक्रवार 03 फरवरी 2017 को लिंक की गई है.... http://halchalwith5links.blogspot.in पर आप भी आइएगा....धन्यवाद!

    ReplyDelete
  2. मुक्‍तक और वर्ण पिरामिड दोनों ही सुन्‍दर और सार्थक

    ReplyDelete

आपको कैसा लगा ... यह तो आप ही बताएगें .... !!
आपके आलोचना की बेहद जरुरत है.... ! निसंकोच लिखिए.... !!

लड्डू : फूटना मन का!

जॉर्ज बर्नाड शॉ ने कहा है, “दुनिया में दो ही तरह के दु:ख हैं —एक तुम जो चाहो वह न मिले और दूसरा तुम जो चाहो वह मिल जाए!” हमलोग कामख्या मन्दि...