Sunday, 11 August 2019

अनुत्तरित


दिवसाद्यन्त सवाल बेधता है
चुप्पी उकबुलाहट सालता है
तू तड़ाक तड़ाग करता नहीं
कोई निदान नहीं मिलता है
मिट्टी ज्यादा सहती है या चाक?
भट्टी में कलश को
होना चाहिए दर्प ज्यादा
रंग दिए जाने का प्रकल्प ज्यादा
नासूर मत पलने तो गहरा इतना
तम गहन होता दर्द सहरा इतना

परस्पर प्यार इश्क मोहब्बत विश्वास
सबमें का कोई-न-कोई आधा वर्ण
एहसास कराता है मुकम्मल नहीं है

क्या पहचान लेना इतना आसान है
हर पल तो सब बदल जाता है
बदल जाती है इच्छाएं परिस्थति बदलते
तब तक साथ कौन निभाता है
जब तक स्वार्थ नहीं सधता है
बस सोच में अटकता है

9 comments:

  1. जी नमस्ते,
    आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल सोमवार (12-08-2019) को "बने ये दुनिया सबसे प्यारी " (चर्चा अंक- 3425) पर भी होगी।

    --
    चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट अक्सर नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
    जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
    आप भी सादर आमंत्रित है
    ….
    अनीता सैनी

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  2. जी नमस्ते,
    आपकी लिखी रचना शुक्रवार १ जुलाई २०२२ के लिए साझा की गयी है
    पांच लिंकों का आनंद पर...
    आप भी सादर आमंत्रित हैं।
    सादर
    धन्यवाद।

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  3. परस्पर प्यार इश्क मोहब्बत विश्वास
    सबमें का कोई-न-कोई आधा वर्ण
    एहसास कराता है मुकम्मल नहीं है
    सटीक अभिव्यक्ति ।

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  4. वाह , क्या बात कही है कि आधा वर्ण कभी मुक्कमल नहीं होने देता प्यार , इश्क़ या मुहब्बत की परिभाषा को । बहुत खूब ।

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  5. This comment has been removed by the author.

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  6. क्या पहचान लेना इतना आसान है
    हर पल तो सब बदल जाता है
    बदल जाती है इच्छाएं परिस्थति बदलते

    सही कहा, बहुत ही सुन्दर सृजन आदरणीया दी,🙏

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  7. परस्पर प्यार इश्क मोहब्बत विश्वास
    सबमें का कोई-न-कोई आधा वर्ण
    एहसास कराता है मुकम्मल नहीं है
    बहुत सटीक एवं लाजवाब
    वाह!!!

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