Saturday, 24 August 2019

"मोक्ष"


"कितनी शान्ति दिख रही है दादी के चेहरे पर...?" दादी को चीर निंद्रा में देख मनु ने अपने चचेरे भाई रवि से कहा।
"हाँ! भैया हाँ! कल रात ही उनके मायके से चाचा लेकर आये.. और अभी भोरे-भोरे ई..,"
          कई दिनों से मनु की दादी जिनकी उम्र लगभग सौ साल से ऊपर की हो गई थी और उन्हें अब केवल अपने बचपन की कुछ बातें याद रह गई थी ने रट लगा रखी थी कि उन्हें खेतों में अपने पिता-भाई के लिए खाना भेजना है... अच्छी बारिश होने के कारण आज-कल खेतों में बिजड़ा डाला जा रहा है। अतः घर आकर खाने की फुर्सत नहीं मिलती किसी को.. सात बहनों और चार भाइयों में सबसे बड़ी होने के नाते घर-चौके की जिम्मेदारी उन पर रही होगी...।
    उनको लगातार रटते हुए देखकर मनु के पिता अपने ममेरे भाई के लड़के को खबर करते हैं कि एक बार आकर अपनी बुआ दादी को लेकर जाएं क्यों कि यहाँ से किसी के साथ जाने के लिए तैयार नहीं हो रही हैं। भाई का पोता आता है और अपनी बुआ दादी को अपने गाँव ले जाकर घुमाकर वापस फिर पहुँचा देता है..., साथ-साथ मनु के पिता रहते हैं..।

5 comments:

  1. आपकी लिखी रचना "सांध्य दैनिक मुखरित मौन में" आज रविवार 25 अगस्त 2019 को साझा की गई है......... "सांध्य दैनिक मुखरित मौन में" पर आप भी आइएगा....धन्यवाद!

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  2. गहरी प्रस्तुति ।

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  3. वाह! अद्भुत। इच्छापूर्ति होना जरूरी है।

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  4. नारी का मन मरते दम तक मटके की गलियों में गी विच्ग्र्ता रहता है | मार्मिक सृजन | दिवंगत के चेहरे की शांति उसकी इच्छापूर्ति की द्योतक है | सादर

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अभिविन्यास

 "अद्धभुत, अप्रतिम रचना। नपे तुले शब्दों में सामयिक लाजवाब रचना। दशकों पहले लिखी यह आज भी प्रासंगिक है। परिस्थितियाँ आज भी ऐसी ही हैं। ...