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देवनागरी में लिखें

Sunday, 26 January 2020

कोरी बातें


मुझे मेरे बचपन में देशप्रेम बहुत समझ में नहीं आता था। आजाद देश में पैदा हुई थी और सारे नाज नखरे आसानी से पूरे हो जाते थे। लेकिन झंडोतोलन हमेशा से पसंदीदा रहा। स्वतंत्रता दिवस के पच्चीसवें वर्षगांठ पर पूरे शहर को सजाया गया था। तब हम सहरसा में रहते थे। दर्जनों मोमबत्ती , सैकड़ों दीप लेकर रात में विद्यालय पहुँचना और पूरे विद्यालय को जगमग करने में सहयोगी बनना आज भी याद है और पुनः उस पल को जी लेने की इच्छा बनी हुई है।
खुद की अंग्रेजी की गाड़ी राम भरोसे खींच जाती थी। लेकिन दूसरों का बोलना चुम्बकीय (अरूण/माया/महबूब फर्राटे से बोलते हैं तो सम्मोहित होती हूँ पर चुप्प ही रहती हूँ) असर करता था।
      बिहार का पड़ोसी देश नेपाल होने से विदेश यात्रा का सुख बचपन से मिलता रहा। लेकिन सात समुन्द्रों को पार कर विदेश यात्रा की अलग बात होती होगी। कल्पना करना जारी रहा। विदेश में रहने वाले भारतीय भारत के मुद्दों पर बात करते तो उनका सम्मान बहुत रहता।
    सारे सुख में रहकर दुख की बात करना कैसा लगता है अब अनुभव कर रही हूँ... जाके फटे ना बिवाई...

6 comments:

  1. आपकी लिखी रचना "सांध्य दैनिक मुखरित मौन में" आज रविवार 26 जनवरी 2020 को साझा की गई है...... "सांध्य दैनिक मुखरित मौन में" पर आप भी आइएगा....धन्यवाद!

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  2. जी नमस्ते,
    आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा सोमवार (27-01-2020) को 'धुएँ के बादल' (चर्चा अंक- 3593) पर भी होगी।
    आप भी सादर आमंत्रित हैं।
    ****
    रवीन्द्र सिंह यादव

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  3. सारे सुख में रहकर दुख की बात करना कैसा लगता है अब अनुभव कर रही हूँ... जाके फटे ना बिवाई...
    बहुत सटीक...
    वाह!!!

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  4. चंद शब्दों में बहुत बड़ी सिख ,सादर नमस्कार दी

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