पंचर की मरम्मत
“कारखाने की घड़ियों की टिक-टिक मेरे सिर में हथौड़ों की तरह बज रही थी। मेरे पेडू का दर्द किसी तेज़ धार वाले चाकू की तरह उसे भीतर से काटता लग रहा था। मेरे माथे पर पसीने की बूँदें चमक रही थीं, जबकि मैं काँपते हाथों से सिलाई मशीन पर कपड़े की तह लगा रही थी। मैंने हिम्मत जुटाकर सुपरवाइजर के पास जाने का फैसला किया। ‘स्साब, साहब! बहुत तेज़ दर्द है... क्या मैं आज एक घंटे जल्दी जा सकती हूँ?’ मैंने सुपरवाइजर से पूछा।
“तुम लड़कियाँ काम पर क्यों आती हो? तुम पुरुष कर्मचारियों का ध्यान भटकाने ही तो आती हो!” सुपरवाइजर ने अपनी फाइल से नज़रें हटाईं और ज़हरीली मुस्कान के साथ पूरी फैक्ट्री के सामने चिल्लाकर कहा।
मैं सन्न रह गई। पूरी यूनिट में सन्नाटा छा गया। आस-पास काम कर रहे पुरुष सहकर्मियों की नज़रें मुझे चुभने लगीं। लज्जा और अपमान की एक लहर मेरे चेहरे पर दौड़ गई। मुझे मेरे दर्द से ज़्यादा गहरा घाव उन शब्दों ने दिया था।
“नहीं साहब, व्ववो बात नहीं है..." मेरी आवाज़ मेरे ही गले में ही फँस रही थी।”
"तो फिर चुपचाप काम करो। यहाँ नखरों के पैसे नहीं मिलते। अगर ज़्यादा तकलीफ है, तो कल से आने की ज़रूरत नहीं है। बिना वेतन की छुट्टी चाहिए या नौकरी? तय कर लो," डाँटते हुए सुपरवाइजर ने अपनी कुर्सी घुमा ली थी।
मैं वापस अपनी मशीन पर आकर बैठ गई। मैं जानती थी कि मेरे घर का चूल्हा इसी दिहाड़ी से जलता है। बीमार माँ की दवाइयाँ और छोटे भाई की फीस के बीच, मैं 'बिना वेतन की छुट्टी' का बोझ नहीं उठा सकती थी। जबकि मुझे दो दिनों की विशेष छुट्टी की विशेष ज़रूरत थी! मैंने अपनी मुट्ठियाँ भींचीं और दोबारा मशीन चलाने लगी। आँखों से टपका एक आँसू कपड़े के एक कोने पर गिरा और रंगीन धागों में समा गया। वह मशीन नहीं चल रही थी, बल्कि एक मजबूर लड़की का स्वाभिमान उन भारी पहियों के नीचे कुचला जा रहा था। कारखाने का शोर फिर से शुरू हो गया, लेकिन उन पत्थर की दीवारों के पीछे मेरी जैसी हज़ारों चीखें आज भी अनसुनी रह जाती इसलिए मैंने अदालत में जाने का कारण बनाया!” साक्षात्कार लेने आई पत्रकार रमा को एकता ने पूरी कथा सुना दी।
“आपने ऐसा क्या किया?”
“मशीन के हैंडिल से पहले सुपरवाइजर के सर पर पीछे से वार कर दिया। फिर तो गार्ड के आने तक में अनेक महिलाएँ भी सहयोगी हो गई थीं। सुपरवाइजर के सर पर बँधा पट्टी और हाथ-पैर पर चढ़ा प्लास्टर मेरी बातों की गवाही दे सकता था!”
“क़ानून के शरण में जाने के लिए क़ानून को अपने हाथों में लेना क्या ज़रूरी था?”
“-सुविधा और अधिकार के बीच बस एक ‘कानून’ का ही तो फासला होता है। हाँ! मुझे सुपरवाइजर को फोड़ना नहीं चाहिए था। लेकिन बिना प्रमाण के क़ानून अपना काम नहीं करता है! दया झुककर माँगी जाती है और अधिकार—सीधे खड़े होकर ही लिया जा सकता है। आपने बाहर अदालत की पंक्तियाँ (कारखाने के गेट पर एक नया नोटिस चिपका था)
“औरत की नौकरी-औरत की कमाई सिर्फ पैसों की नहीं होती... कभी-कभी उसे अपना आत्मसम्मान भी कमाना पड़ता है। महिला कर्मचारियों को उनके सुविधानुसार हर महीने दो दिनों का ‘विशेष अवकाश’ मिलेगा। पढ़ी होगी!”
रमा ने कुछ देर तक अपने डायरी में भी लिखी उन पंक्तियों को देखा—
उसके आँखों में न आँसू थे, न गुस्सा—बस एक गहरी समझ थी।
“कागज़ पर लिखे शब्द तब तक खोखले हैं, जब तक उनके पीछे कानून की स्याही और अधिकार की मुहर न हो। मैंने ने जब इसे पढ़ा था तो बरसों से दबा मेरा भी विशेष दर्द जैसे पहली बार शब्द बनकर बाहर आया हुआ लगा।” बाहर आकर रमा बुदबुदा रही होती है। पत्रकारिता शुरू करने के पहले एक कारखाना में दस सालों तक रमा ने भी बहुत कुछ सहा था— आज उसके नासूर पर दवा लगी थी।
बहुत सुंदर
ReplyDeleteWelcome to blog new post
मजदूरों को शुभकामनाएं | शायद स्त्रीलिंग और पुल्लिंग दोनों के साथ मजदूर प्रयोग कर सकते होंगे ?
ReplyDeleteबहुत अच्छी कहानी
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ReplyDeleteआपकी लिखी रचना ब्लॉग "पांच लिंकों का आनन्द" बुधवार 6 मई 2026 को साझा की गयी है......... पाँच लिंकों का आनन्द पर आप भी आइएगा....धन्यवाद!
आत्मीय आभार आपका
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