Monday, 7 December 2015

सपना











एक आयोजन सफल हुआ कि आँखें फिर नई संजो लेती है

रवीन्द्रनाथ टैगोर जी ने सन् 1916 में पहली बार हाइकु की चर्चा किये थे
उस हिसाब से 2016 हाइकु शताब्दी वर्ष है
तो
क्यों न हम 100 हाइकुकार इक किताब में सहयोगाधार पर शामिल हो , विमोचन पर एकत्रित हो यादगार आयोजनोत्सव मनायें
जो शामिल होना चाहें
स्वागत है

Monday, 26 October 2015

अथ से इति - वर्ण स्तम्भ


शरद पूर्णिमा की ज्योत्स्ना और हमारी धवल इच्छा आपके सामने


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वर्ण पिरामिड लेखन की एक पुस्तक लाने की योजना है
51 प्रतिभागियों का
ये प्रयास है लोगों को जोड़ने की
अथ से इति -- वर्ण स्तम्भ पुस्तक में
 लाखों का 416 पेज का बुक
इच्छुक मुझसे फेसबुक पर जुड़ सकते हैं



Monday, 12 October 2015

अंत हो मरने के बाद के श्राद्ध का




आज अंतिम दिन पितृपक्ष का कल से नवरात्र शुरू

जान में जान हो
जाने में राह आसान हो
जान लें जाना कहाँ है
जाने से पहले

आत्मतृप्ति के बाद आत्मा तृप्ति की जरूरत नहीं होती

 तीन में कि तेरह में

एक बार चाची(पड़ोसन) से बातचीत के दौरान पता चला इसका सही सही अर्थ

चाची बताई कि 
मिथिला में बेटियां तीन दिन में अपने माता पिता का श्राद्ध करती हैं
और बेटे तेरह दिन में

मिथिला में बेटियों का कन्यादान तिल विहीन किया जाता है इसलिए तिल भर सम्बन्ध या यूँ कहें दायित्व निभाने की जिम्मेदारी मिल जाती है

वहीं छपरा जिला में बेटियां ना तीन में ना तेरह में होती हैं

लेकिन
बेटे बहुत लायक होते हैं तो बेटियां चैन से रहती हैं
~~

Wednesday, 7 October 2015

प्यासी जल में सीपी



~~
 प्यासी जल में सीपी

भूल जाओ पुरानी बातें ....... माफ़ कर दो सबको ..... माफ़ करने वाला महान होता है ...... सबके झुके सर देखो ..... बार बार बड़े भैया बोले जा रहे थे .....

बड़े भैया की बातें जैसे पुष्पा के कान सुन ही नहीं रहे थे .....
आयोजन था पुष्पा के 25 वें शादी की सालगिरह का ...... ससुराल की तरफ से सभी जुटे थे ...... सास ससुर देवर देवरानी ननद संग उनके बच्चे ..... मायके  से आने वाले केवल उसके बड़े भैया भाभी ही थे । बुलाना वो अपने पिता को भी चाहती थी लेकिन उसके पति ने बुलाने से इंकार कर दिया था क्यों कि ..............
नासूर बनी पुरानी बात , ख़ुशी के हर नई बात पर भारी पड़ जाती है न

सास को पुष्पा कभी पसंद नहीं आई ..... पसंद तो वो किसी को नहीं करती थी .... उन्हें केवल खुद से प्यार था और बेटों को अपने वश में रखने के लिए बहुओं के खिलाफ साजिश रचा करती थी ...... बेटे भी कान के कच्चे , माँ पर आँख बन्द कर विश्वास करते थे ..... बिना सफाई का मौका दिए , बिना कोई जबाब मांगे अपनी पत्नियों की धुलाई करते
पुष्पा तब तक सब सहती रही जब तक उसका बेटा समझने लायक नहीं हुआ

फिर धीरे धीरे विरोध जताना शुरू किया  लेकिन शादी का सालगिरह क्यों मनाये खुद को समझा नहीं पा रही थी

घर छोड़ चली गई होती तब जब बार बार निकाली गई थी तो..........

बुजुर्ग से बदला कभी नहीं लिया ......लेकिन सोचती रही बुढ़ापा तब दिखलाई नहीं दिया था क्यों

??

 http://atootbandhann.blogspot.in/2015/10/blog-post_39.html



दमाद बेटी को खुश रखे
बेटा श्रवण पूत बने
??
जिस घर में बेटी हो बेटा ना हो
बेटा भ्रूण की हत्या करें
??
जिस घर में बेटा हो , बेटी ना हो
बेटी भ्रूण की हत्या करें
??
अरे नहीं रे
छोटा परिवार सुखी परिवार
हम दो हमारे एक की रीत निभायें

पहली सन्तान जो हो वो रहे बस
सारा फसाद एक घर में दोनों होना ही है
दमाद घर जमाई बन बेटे का धर्म निभाये
बेटी माँ बाप का ज्यादा ख्याल रखती हैं न

श्रवण पूत अल्पायु था कुँवारा बेचारा

सारा टँटा बहुयें से ही तो है

झगड़ा - फसाद के जड़ को ही खत्म करते हैं
बहु के अस्तित्व को ही मिटा देते हैं

बेटे के माँ बाप काशी वास करें

ना रहेगा बांस ना बजेगी बाँसुरी
ननद भौजाई भी नहीं बचेगी

ह न त



4 सितम्बर 201

Saturday, 3 October 2015

बकबक



जले दीप को
गर्म चाय प्याली को
कौतुक में स्पर्श को
धैर्य स्व माँ को
डुबो दी ऊँगली को
सीख देने शिशु को

~~~

दो कदम पीछे हट कर ज्यूँ छलांग भरते हैं

तो

अविवेकी की पहचान क्रोधी

हाँ तो

मत ललकारो उन्हें , जिनके पास कुछ खोने के नहीं होता

नहीं तो

मूलमंत्र है सम्भाल कर रखो

मानोगे नहीं ....... जिद्दी हो ...... सैद्धांतिक तो बुजुर्गों के बकबक बुढ़ापे की निशानी है ...... प्रायोगिक ही व्यावहारिक होता है ...... ये कठकरेजि जानती है

महबूब भी बहुत जिद्दी था ....... उसे लाल चीज छूने की ज़िद थी ..... जलते लैम्प लालटेन का शीशा .... बिहार में बिजली की दुश्मनी बहुत पुरानी है .....

गर्म चाय की प्याली ..... दादी गोद में बैठाये रखती

लकड़ी गोहरा की अग्नि ...... तब गैस घर में नहीं आया था ..... घर में पेड़ पौधे व गाय रखने का फायदा था

उसके लपकने पर सब खुश होते ....... लेकिन मेरी जान अटकी रहती ...... एक दिन उसकी ऊँगली जला ही दी ..... तब सब मुझे कहने लगे ....... कठकरेजि

बुजुर्गों के पास ज्ञानी बुकची होती है ..... बकबक नहीं 


Friday, 25 September 2015

वर्ण पिरामिड



हम ख़ुद की जिम्मेदारी ईमानदारी से निभा लें तो वही बहुत है
बलि का मीट
बिना लहसुन प्याज का पकता
दशहरा में शोर क्यों नहीं मचता
हिन्दुओं-बात हिन्दुओं को पचता
1
स्व
सरी
निश्छल
स्थिर होती
सींचती जीव
डूबा देती नाव
ज्यूँ उबाल में आती
2
हो
नाव
मोहक
जलयान
धारा की सखी
क्षुधा पूर्ति साध्य
जीविका मल्लाह की

Monday, 21 September 2015

क़ाबिले तारीफ़

विभा दीदी पीछे में तारीफ करते हैं भाई साहब 😊😃उस दिन जब आप किचेन में थी तब आपकी काफी तारीफ कर रहे थे भाईसाहब 😊फिर आप को देख कर चुप हो गए 😊
कल लल्ली ने लिखा ...... पत्नी प्रोत्साहन दिवस था कल 
पीठ पीछे जो तारीफ़ होती हो ..... सामने भी कुछ यूँ तारीफ़ करते हैं

हमारे परिचित में जितनी औरतें हैं उनमें सबसे कम काम तुम करती हो 
कैसे ?
देखो ! सुबह शाम टहलने जाती हो खुद के लिए तो सब्जी दूध घर का सामान ले आती हो ...... काम ना तुम्हारा टहलना हुआ और समान ले आई तो कितने तनाव से बची ..... खुद के लाये समान में नुक्ताचीनी कर नहीं सकती हो ...... ना सवाल कि क्या पकायें

रोटी कन्ट्रोल सब्जी पकाती हो ...... कम खाने से मोटापा नहीं होता तो ...... ना bp ना सुगर ..... ना कोई सेवा का मौका ..... ना डॉ का दौड़ धूप तुम्हें करना पड़ता है

ना रोज कपड़ा धोती हो ना रोज आयरन करती हो ..... दो जोड़ी कपड़े तो निकलते हैं ..... एक दिन बीच कर वाशिंग मशीन चलाती हो ..... एक दिन बीच कर आयरन करती हो
आयरन करने से रोटी पकाने से तुम्हारा ही फायदा है .... मुफ़्त का कसरत कलाई का होता है

बर्तन खुद धोती हो कि दाई का किचकिच कौन सुने .... ना आई तो बर्तनों का अम्बार देख कौन कुफ्त होये ...... यहां भी फायदा तुम्हारा ......

आज चाय में ऐसा क्या पड़ गया 
क्यों क्या हुआ ?
गलती से शायद ! अच्छा बन गया


है न काबिले तारीफ़ ; तारीफ़ करने का अंदाज , दिल बाग़ बाग़ करता ...... झुँझलाने का हक़ नहीं पत्नियों का 😘

Friday, 11 September 2015

हिंदी हर बोली में होती



शादी के बाद ...... मेरे पापा की लिखी चिट्ठी ...... मुझे लिखी , पढ़ने को मिली(शादी के पहले हमेशा साथ रहने की वजह) .... चिट्ठी की ख़ासियत ये होती थी कि ..... कभी वे भोजपुरी से शुरुआत करते तो ..... मध्य आते आते हिंदी में लेखन हो जाता था या ..... कभी हिंदी से शुरुआत करते तो मध्य आते आते भोजपुरी में लेखन हो जाता था ..... बेसब्री से इंतजार रहता था उनकी चिट्ठियों का .... तब मोबाइल नहीं था .... लैंड लाइन भी तो नहीं था ....... 
~~~~~~~~~~~ मेरे माइके में हम सभी घर में भोजपुरी में बात करते थे ...... सहरसा में जबतक हमारा परिवार रहा ; घर के बाहर मैथली का बोलबाला था , सबसे मैथली में बात करना पड़ा ...... बहुत ही मीठी बोली है *मैथली* ....... जब पापा सहरसा से सीवान आ गए तो घर बाहर केवल भोजपुरी का सम्राज्य हो गया ....
 आरा छपरा घर बा कवना बात के डर बा
 शादी के बाद रक्सौल आये तो घर बाहर भोजपुरी का ही राज्य था लेकिन केवल मेरे पति को मुझसे हिंदी में बात करना पसंद था ..... फिर राहुल का जब जन्म हुआ तो राहुल से सब हिंदी में ही बात करने लगे ..... इनकी नौकरी में बिहार (तब झारखंड बना नहीं था) में कई जगहों पर रहने का मौका मिला ..... भोजपुरी+मगही+ मैथली+आदिवासी+हिंदी+उर्दू = खिचड़ी मजेदार लज्जतदार मेरी भाषा

1
शब्दों की खान
हिंदी उर्दू बहनें
भाषायें जान
2
हिंदी समृद्धी
हर धारा मिलती
माँ कहलाती



Tuesday, 8 September 2015

दंश ~ कालिख संघ मुख



कलियाँ खिली
ब्याही सुता हो जाती
स्व समर्पित

एक ब्याहता स्वयं समर्पण करती है .....
बलात्कृत तो कली कुचली जाती है ...... खिलती नहीं

 परिवार में लड़की अगर सुरक्षित नहीं तो परिवार की जरूरत ही नहीं

हम फिर इतिहास दोहराएंगे बहुत जल्द

आज ही फेसबुक पर जानकारी मिली कि किसी लड़की ने अपने साथ हुए ...... उसके घर के ही किसी सदस्य के हैवानियत के कारण ...... आत्महत्या कर ली ......

Tuesday, 1 September 2015

उड़ेगी बिटिया




नीतू भतीजी , डॉ बिटिया महक , प्रीती दक्ष , स्वाति , मोनिका 
संग
बहुत सी बिटिया 
रब ने दिलाई
कोखजाई एक भी नहीं
ना इनमें से किसी से 
मेरा गर्भनाल रिश्ता है
लेकिन जो रिश्ता है
उसके लिए गर्भ का
होना न होना मायने नहीं रखता है
हम एक दूसरे के आंसू 
शायद ना पोछ पायें
लेकिन आंसू दिखलाने में
कमजोर महसूस नहीं करते हैं
खुशियाँ बांटने के लिए भी
बच्चों की तरह उछलते हैं .......

आप सोच रहे होंगे , आपको बता बोर क्यों कर रही हूँ ......

बेटिया वो ही नहीं होती , जिसे हम जन्म देते हैं ....
तब तो प्यारा तोता पिंजरा में हो गया
सिंधु कुँए में कैद हो गया
सोच का दायरा बढ़ना चाहिए

बेटा जोरू का गुलाम 
समझा नहीं जाना चाहिए
दमाद बेटी को खुश रखता है
आप खुश होती हैं न

 बेटा को ही प्यार करने से , यशोदा को नहीं जाना जाता



Friday, 28 August 2015

भाई बहनें ऐसे भी होते हैं


1
तू
सोचे
व्यापार
जेब तौले
बोझ बन्धन
रक्षा का सूता
अभागी बहना
फिर तू न कहना
बन्द होते आँखें मैया
मुख क्यों नहीं मोड़े भैया
~~
हो
मूढ़
कहता
सूता बंध
पोंका मोह का
पोहना अंह का
चौमासा है निरभ्र
दुर्गति रिश्ता का करे
~~
2

कहते सुनते शर्म भी शर्मसार हो
लिखते भी जीवट जी बेहाल हो

उच्च जाति , धनाढ्य , शिक्षित , कुलीन की परिभाषा की धज्जियाँ उड़ाती कथा है .... बहू , पत्नी , भाभी को तो छोड़ें ....... एक स्त्री को .... मरणासन्न या यूँ कहें मरा ही समझ कर.... परिवार घर से दूर ..... सड़क पर फेक चले गए ..... वो स्त्री कैसे होश में आई ; अरे ऐसी स्त्रियों की साँसें बड़ी बेशर्म जीवट होती है , कैसे अपनों के पास पहुँची , या यूँ कहें कैसे पहुँचाई गई ..... कैसे वर्षों मानसिक पीड़ा से गुजरी ..... कैसे फिर सम्भली ... कैसे अपने पैरों पर खड़ी हो कर अकेले जीवन यापन कर रही है अभी भी ..... ये जानने से ज्यादा जरूरी हैं ; ये जानना कि वो मरणासन्न स्थिति में पहुँची कैसे , कारण था सगे भाई बहन में नाजायज सम्बन्ध और घर को चाहिए था केवल एक वारिस ..... जो संजोग से पैदा भी हुआ बेटा ..... 

भाई बहनें ऎसे भी होते हैं



सन्ध्या का आलोक

दिन अपनी अन्तिम देहरी पर ठिठका खड़ा था। पार्क में पुराने नीम के नीचे बैठे लगभग पचहत्तर-सतहत्तर वर्षीय वृद्ध अपने घुटने सहला रहे थे। हर शाम उ...