Monday, 21 October 2019

धोखा

किसी ने किसी के
कहे पर विश्वास किया
उस किसी के कहे पर
अन्य किसी ने विश्वास किया
और
उन तिगड़ी की बातों पर
अन्य कई लोग
पथगामनी बने

किसी बच्चे ने
ताश के बावन पतों को
एक पे एक सजा कर
ऊँचा और ऊँचा सजा दिया
और एक हल्के से स्पर्श से
ढह गया
 विश्वास का गलत निकलना
वही ढहाया गया ताश के पत्ते

विध्वंस है
आँखें कुछ कहती हैं
निभाये कर्म कुछ कहते हैं
जुबान से कही बातें
सार्थक जब नहीं होती है

छल लेना ज्यादा आसान
या छला जाना ..

ना जाने कब तक
सुल्तान बाबा भारती
खड़क सिंह के किस्से
पढ़े कहे सुने जाते रहेंगे


11 comments:

  1. आपकी लिखी रचना "सांध्य दैनिक मुखरित मौन में" आज सोमवार 21 अक्टूबर 2019 को साझा की गई है......... "सांध्य दैनिक मुखरित मौन में" पर आप भी आइएगा....धन्यवाद!

    ReplyDelete
    Replies
    1. सस्नेहाशीष व असीम शुभकामनाओं के संग हार्दिक आभार छोटी बहना

      Delete
  2. विश्वास में से ही धोखा बाहर निकल के आता है, कोई अनजान या बाहरी व्यक्ति एकदम आकर धोखा दे जाय, यह बहुत कम देखा जाता है
    बहुत सुन्दर रचना
    शुभ-दीपावली!

    ReplyDelete
  3. सुंदर गहन अर्थों से सजी अभिव्यक्ति दी।
    -----
    मन का विश्वास जब दरकता है
    भावों के दरिया में दर्द बहता है

    ReplyDelete
  4. आँखे मूँद के जब किसी पर विश्वास किया जाए ओर वो ही धोखा दे दे तो दिन में तारे दिखा देता है

    सुन्दर रचना

    ReplyDelete
  5. विश्वास के धागे पर आए बार कांच का कॉट लगाना पड़ता तब जाकर वो पक्का रह पाता है वरना तो इससे कमजोर धागा कोई है 'इच नहीं।
    अच्छी रचना।

    ReplyDelete
  6. कहानी ,कहने-सुनने भर की चीज़ है शंका वहाँ भी रह जाती है.

    ReplyDelete
  7. प्रशंसनीय

    ReplyDelete
  8. बहुत ही संजीदा लेखन

    ReplyDelete
  9. आपकी लिखी रचना "सांध्य दैनिक मुखरित मौन में" आज बुधवार 01 जनवरी 2020 को साझा की गई है...... "सांध्य दैनिक मुखरित मौन में" पर आप भी आइएगा....धन्यवाद!

    ReplyDelete

आपको कैसा लगा ... यह तो आप ही बताएगें .... !!
आपके आलोचना की बेहद जरुरत है.... ! निसंकोच लिखिए.... !!

अभिविन्यास

 "अद्धभुत, अप्रतिम रचना। नपे तुले शब्दों में सामयिक लाजवाब रचना। दशकों पहले लिखी यह आज भी प्रासंगिक है। परिस्थितियाँ आज भी ऐसी ही हैं। ...