Friday, 20 December 2019

मुक्तक

यादोहन होता रहता है जब तक हम कमजोर होते हैं
01.
बेहतर पाने के दौड़ में शामिल होते हैं,
परेशानियों-झंझटों के भीड़ में खोते हैं,
अपनी शिकायतें दुश्वारियों का क्यों करें-
लुटा-मिटा त्याज्य जी अनगुत्ते सोते हैं।
02.
कीमत तो चुकानी थी हद पार करने की,
जिंदगी मीठी कड़वे घूँट पी दर्द सहने की,
बहुत मिले दिल चेहरे से खूबसूरत न था–
आदत बनी प्रेम के गैरहाजिर में रहने की।

6 comments:

  1. वाह दी बहुत बढ़िया मुक्तक।शानदार।

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  2. "जिंदगी मीठी कड़वे घूँट पी दर्द सहने की"

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  3. सस्नेहाशीष व असीम शुभकामनाओं के संग हार्दिक आभार छोटी बहना

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  4. वाह!!!
    लाजवाब मुक्तक।

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  5. सुंदर प्रस्तुति।

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  6. आप बेहतर बनने की दौड़ में खो जाने वाली इंसानी हालत को बहुत ईमानदारी से रखते हो। आप शिकायत नहीं, स्वीकार करने की बात करते हो। कड़वे घूँट और मीठी ज़िंदगी का विरोधाभास बिल्कुल असली लगता है।

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