Wednesday, 31 December 2025

लौटती राह

बरसात के बाद भीगी सड़क पर पेड़ों की परछाइयाँ काँप रही थीं, और अत्यधिक ठंड के एहसास से शाम सोने ही जा रही थी। आसमान से झरती कालिमा लिए नीली उदासी ज़मीन पर फैल रही थी, ठीक वैसी ही, जैसे राघव बाबू के मन की परछाई हो। वे बालकनी में अकेले बैठे थे। सामने खाली बेंच, बगल में ठंडी हो चुकी चाय और उनके भीतर कहीं जमता हुआ उनके घर का ही सन्नाटा। 

बाहर बहुत तेज हवा चल रही थी, और उनके भीतर—यादों की धूल, जो हर रात, थोड़ी-सी और जमती जा रही है। कभी यह उनका घर आवाज़ों से भरा रहता था—विमर्श-हँसी, चुहल-बहस, जल्दी-जल्दी फटते तकिया बिखरते बर्फ से रूई!

आज सब कुछ स्थिर था, जैसे समय ने ही उनकी साँस रोक ली हो। उनके तीन बच्चे दो बेटी और एक बेटा! लेकिन बेटा मानव आधुनिकता का शिकार! एक दिन वह विदेशी-परदेशी भीड़ में खो गया था—कहकर गया था कि “जल्दी लौटूँगा।”

पर कुछ विदाइयाँ लौटने के लिए नहीं होतीं, वे बस स्मृतियों में टिक जाती हैं—काँच की तरह, चुभती हुई। राघव बाबू को उसका जाना नहीं तोड़ सका, पर उसका बदल जाना भीतर ही भीतर उनके अन्दर कहीं दरार छोड़ रहा था! कभी जो बेटा उँगली पकड़कर चलना सीखता था, वही आज उँगलियाँ मोबाइल पर दौड़ती हैं—लेकिन जहाँ पिता का नाम ‘मिस्ड कॉल’ बनकर रह गया है।

“चाय ठंडी हो रही है, बाबूजी…” पड़ोसी लड़के की आवाज़ ने उन्हें वर्तमान में लौटाया।

उन्होंने हल्की मुस्कान ओढ़ ली—

“ठंडी चाय नहीं बेटा…। कुछ रिश्ते ठंडे पड़ जाते हैं, वही पी रहा हूँ। बिना गलती किए भी गलती ढूँढकर अच्छाई भूल जाना आसान है!”

रात गहराई। खिड़की से झाँकता आधा चाँद जैसे अधूरी बात कहकर रुक गया हो। माधव बाबू ने डायरी खोली और एक पंक्ति लिखी—

“घर इंसान के जाने से नहीं, उसके बदल जाने से सूना होता है।”

लेकिन उनकी डायरी बन्द होने के पहले उनका मोबाइल बजा-

“हैलो”

क्य्ययाऽ? सच में? मानव तुम लौट रहे हो…,” राघव बाबू की विस्फारित आँखें रक्तरंजित हो रही थीं।


Thursday, 18 December 2025

सीमांत के पहले

रात के बारह बज रहे थे। मोबाइल की नीली रोशनी में अदिति का चेहरा और भी चौकन्ना हुआ लग रहा था। स्क्रीन पर एक वीडियो चल रहा था—किसी लड़की का, आधा सच, आधी अफ़वाह। नीचे हज़ारों लाइक और सैकड़ों टिप्पणियाँ सैलाब लाने के प्रयास में भीड़ को उकसाती उमड़ रही थीं।

व्हाट्सएप्प ग्रुप में संदेश चमका—“सभी साझा करो, ट्रेंड में है। आपके भी फ़ॉलोअर्स बढ़ जाएँगे।”

अदिति की भी उँगली शेयर बटन पर ठिठक गई। वह बुदबुदा रही थी “यही तो सुनहला मौका है –पहचान बनने का, प्रमुखता से दिखने का। उसने वीडियो दोबारा चलाया। कटे-फटे दृश्य, भड़काऊ कैप्शन, और सच के नाम पर सिर्फ़ सनसनी दिख रहा था-

तभी पीछे से उसकी माँ की आवाज़ आई, “तुम! सोई नहीं अभी तक?”

“बस! एक पोस्ट डालकर सोने ही जा रही हूँ,” अदिति ने कहा।

माँ पास आकर खड़ी हो गईं। स्क्रीन पर नज़र पड़ी तो उन्होंने कुछ नहीं पूछा, बस इतना कहा—“हर रेखा ज़मीन पर नहीं खींची जाती, बेटी। कुछ उँगलियों के अधीन होती हैं।”

अदिति ने चौंककर माँ को देखा। “मतलब?”

“पोस्ट करने से पहले एक सीमा को परख लेना,” माँ ने पुनः कहा कि “इससे किसी की इज़्ज़त, सच या ज़िन्दगी आहत तो नहीं होगी? वरना भीड़ के साथ चलते-चलते हम वही बन जाते हैं, जिससे डरना चाहिए।”

उँगली काँपी। शेयर के बजाय उसने डिलीट दबा दिया। मोबाइल की स्क्रीन काली हो गई।

Tuesday, 9 December 2025

हठीला भँवर

हठीला भँवर  


थप्पड़ का सन्नाटा

रंगमंच के पीछे बने छोटे-से ‘तैयारी कक्ष’ में  बैठे आदित्य ने उत्तेजनापूर्ण स्वर में कहा, “हद हो गई यह तो। अंतराल के दौरान कार्यक्रम ठहर-सा गया था और उसी ठहराव को तोड़ने के लिए इन हम लोगों ने आधे घंटे में इतना बढ़िया पौराणिक प्रसंग तैयार कर मंच पर प्रस्तुत कर दिया, लेकिन जैसी आशा थी, वैसा तो कुछ हुआ नहीं। न तालियों की गड़गड़ाहट और न दर्शकों का उत्साह!”

विक्रम ने निराश स्वर में कहा, “हमने तो जैसे सूने में प्राण फूँक दिए! इतनी मुश्किल से तैयारी की, और मजाल है कि कोई एक बार भी बोले कि अच्छा किया! और तो और, अध्यक्ष महोदया तो कुछ बोलतीं कम से कम।”

आदित्य ने होंठों पर हल्की व्यंग्य-रेखा खिंची, “आदरणीया नीरा वाजपेयी को तुम जानते ही हो। तुझे पता है न वजह? आदरणीया को देवी-देवता, धर्म-वर्म पर प्रस्तुति पसंद नहीं। एक तो करेला, उस पर नीम चढ़ा सा है!  हम इतने आधुनिक हो गए हैं तथा साथ में विदेशी भी हो गए हैं! बस! यहीं उनके समझ से गड़बड़ हो गई।”

तभी दरवाज़े की कुंडी खड़की। कमरे में नीरा बाजपेयी कदम रख चुकी थीं— चेहरा कठोर, आँखें तपती हुई, और चाल में अनुशासन की तीखी गूँज। विक्रम के भीतर कहीं आशा थी कि अब जाकर सराहना सुनने को मिलेगी। पर उनकी आवाज़ तो मानो बर्फ पर पड़ी चोट-सी थी।

“यह क्या किया तुम लोगों ने?” उनके शब्द धारदार थे,

“संस्था की मर्यादा भी कोई चीज़ होती है। मंच पर जो प्रस्तुत किया गया है, वह हमारी संस्था के नियमों के पूर्णतः विपरीत है। मुझे पूर्व सूचना होती, तो मैं कभी अनुमति नहीं देती!”

विक्रम हतप्रभ रह गया! “आदरणीया हमने तो बस खाली समय भरने के लिए- भक्ति-भाव से—”

“बस!” नीरा ने फाइल मेज पर पटक दी। वह आवाज़ कमरे की हवा को चीरती चली गई।

“यह मेरा व्यक्तिगत मत नहीं है,” वे बोलीं, “संस्था की नीति है—कला को निष्पक्ष रखना। यहाँ न धर्म चलेगा, न राजनीति। तुम लोगों ने अच्छी नीयत से किया होगा, पर नीयत कभी नियम से बड़ी नहीं होती। मंच एक पवित्र स्थान है, और उसकी शालीनता उसकी सबसे पहली शर्त।”

कमरा अचानक बहुत छोटा लगने लगा था। पसीने की गंध के बीच अब खामोशी और अपराधबोध की परतें भी घुल चुकी थीं। विक्रम बुदबुदा रहा था- “कला का काम केवल प्रस्तुति देना नहीं, बल्कि उसके सीमित दायरे को समझना भी है। मंच की गरिमा, उसके नियम, उसकी तटस्थता— अगर इनसे बाहर कदम उठा लिया जाए, तो प्रस्तुति कला नहीं, अराजकता बन जाती है।”

स्वाद की मर्यादा

 शान्त, सजग और आत्मसम्मान से भरी मृदुला एक बड़ी विज्ञापन एजेंसी में क्रिएटिव हेड थी। नाम की तरह ही उसका स्वभाव भी बेहद मृदु था। —न उसकी आवाज...