Wednesday, 19 August 2026

राग की थाती

 

धुँध इतनी घनी थी कि बालकनी के पार सब कुछ सफेद रहस्य में डूब गया था। बच्ची देर तक उस अँधेरी खिड़की को देखती रही। फिर उसने अपने घर जाकर, अपनी गुल्लक तोड़ी और थोड़ा-सा तेल लेकर लौटी। दीपक जल गया। हवा ने टूटे तारों को छू लिया- धुँध में चित्र उभरने लगे।
मीनाक्षी के सामने पड़ी वायलिन के तार टूटे थे। हवा उन्हें छूती तो एक करुण-सी ध्वनि उठती—उस धुन का टुकड़ा, जिसे उसका पति पूरा किए बिना चला गया था। वह वायलिन ठीक नहीं करवाती थी। हर शाम खिड़की पर दीपक जलाती और उसी अधूरे राग के साथ बैठी रहती।
“दादी! आप रोज़ क्यों खिड़की पर दीपक जलाती हैं?” एक दिन पड़ोस की बच्ची ने पूछा।
“कोई लौटे और उसे रास्ता याद नहीं रहे तो उसकी मदद हो!” मीनाक्षी ने धुँध में देखते हुए कहा था।
आज शाम अँधेरी खिड़की थी। मीनाक्षी जा चुकी थी। वही अधूरा राग उठने लगा। बच्ची ने सड़क की ओर देखा—


6 comments:

  1. सुंदर रचना
    आभार
    सादर वंदन

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  2. बेहद मर्मस्पर्शी भावपूर्ण लघुकथा दी।
    सादर।
    ------
    जी नमस्ते,
    आपकी लिखी रचना शुक्रवार २१ अगस्त २०२६ के लिए साझा की गयी है
    पांच लिंकों का आनंद पर...
    आप भी सादर आमंत्रित हैं।
    सादर
    धन्यवाद।

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  3. मार्मिक लघुकथा

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आपको कैसा लगा ... यह तो आप ही बताएगें .... !!
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