अन्तरराष्ट्रीय वृद्ध दिवस के अवसर पर, विशेष ज्ञान- परबचन का शौक नहीं है– अनुभवजन्य बाँटने का प्रयास है—
“हम उलझे रहते हैं —ऐसा हुआ रहता तो ऐसा नहीं होता-”
होनी को कब रोका जा सका है—
माता-पिता के लिए अस्वस्थता के समय अपनी सन्तान का स्पर्श और चेहरा देखना सबसे बड़ी औषधि होती है; यदि सम्भव हो, तो आना ही चाहिए। लेकिन सिर्फ 'देखने आना' कर्तव्य का प्रमाण पत्र नहीं है। कर्तव्य एक निरन्तर बहने वाली निष्ठा है—जो सिर्फ हाजिरी में नहीं, माता-पिता के प्रति जिम्मेदारी, समर्पण और आत्मिक जुड़ाव में झलकती है—
आलोक के बाबूजी पिछले दस दिनों से आईसीयू में थे। फेफड़ों में संक्रमण था और साँसें ऑक्सीजन के सहारे चल रही थीं।
“आलोक अब तक नहीं आया?”
“बाप की ऐसी हालत हो और इकलौता बेटा सात समन्दर पार बैठा रहे!”
घर-अस्पताल के बरामदे में बैठे रिश्तेदारों और पड़ोसियों के बीच रोज़ अनेक सवाल तैरता रहता—
अन्दर आलोक की माँ चुपचाप बैठी रहती थीं। आँखों में चिन्ता थी, पर बेटे के लिए कोई शिकायत नहीं।
आलोक कई बार कह चुका था, “माँ-बाबूजी, आप दोनों मेरे पास आकर रहिए। यहाँ इलाज की सुविधा भी अच्छी है।”
लेकिन बाबूजी हर बार हँसकर टाल देते—“अपना घर छोड़कर परदेस में नहीं रह पाएँगे बेटा। तू अपनी दुनिया बसा, हम अपनी जड़ों के साथ ठीक हैं।”
तभी माँ का फोन बजा। स्क्रीन पर आलोक का थका हुआ चेहरा था।
“माँ, डॉक्टर मुखर्जी से अभी बात हुई है। संक्रमण कुछ कम हुआ है। दवाओं की व्यवस्था हो गई है। अस्पताल के डायरेक्टर से भी बात कर ली है। नर्सिंग का भी इन्तजाम कर दिया है।”
कुछ क्षण वह चुप रहा फिर कहा- “माँ… मैं आ जाऊँ?”
“नहीं बेटा। तू चिकित्सकों से बात करता रह। यहाँ तेरे बाबूजी का इलाज ठीक चल रहा है। तू वहाँ से जो कर सकता है, करता रह।” माँ की आँखें भर आईं।
“चाची, आलोक भैया कब आ रहे हैं? मोहल्ले वाले भी पूछ रहे हैं। आखिर बेटा बाप को देखने तो आए!” फोन कटते ही बाहर से रमेश की आवाज आई—
माँ धीरे से बाहर आईं।
बरामदे में वही लोग बैठे थे, जो पिछले दस दिनों से रोज़ बाबूजी को ‘देखने’ आते थे—दो घड़ी बैठते, चाय पीते और लौट जाते। अस्पताल की दवा, डॉक्टर या किसी जरूरी काम की जिम्मेदारी किसी ने नहीं उठाई थी।
“आलोक दूर जरूर है, रमेश… बाबूजी से दूर नहीं।” माँ ने सबकी ओर देखा और शान्त स्वर में बोलीं—
बरामदा एकाएक शान्त हो गया। बरामदे में बैठे लोगों की निगाहें झुक गईं।
कितनी गहरी बात कह गयी दी आप।
ReplyDeleteबेहद भावपूर्ण लघुकथा दी।
कर्तव्य की असली कसौटी केवल शारीरिक उपस्थिति नहीं, बल्कि सच्ची जिम्मेदारी, समर्पण और मानसिक निष्ठा होती है। सांकेतिक उपस्थिति से कहीं अधिक मूल्यवान वह व्यावहारिक समर्पण और जिम्मेदारी है, जो जरूरत के समय ढाल बनकर खड़ी होती है।
पर दी ऐसे समझदार मां-पापा सबके नहीं होते शायद...
सस्नेह प्रणाम दी
सादर।
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जी नमस्ते,
आपकी लिखी रचना शुक्रवार २ अक्टूबर २०२६ के लिए साझा की गयी है
पांच लिंकों का आनंद पर...
आप भी सादर आमंत्रित हैं।
सादर
धन्यवाद।
आत्मीय आभार आपका
Delete“आलोक दूर जरूर है, रमेश… बाबूजी से दूर नहीं।”
ReplyDeleteबेहतरीन काव्य
वंदन
वाह! बेहतरीन सृजन !
ReplyDeleteसुंदर भावपूर्ण
ReplyDeleteसही है, जो दिल के क़रीब है वही क़रीब है
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