“भैया ने मुझे तीन लाख रुपये कब दिए?”
“यह किसने कहा?”
“आपने छोटी भाभी से कहा है न?”
“चुग़लीखोर से मैंने सिर्फ़ इतना कहा था कि गृहप्रवेश पर एक लाख रुपये दिए थे।”
“अब आप उपहार में दिए गए रुपयों का हिसाब लेंगी?”
“मुझे हिसाब नहीं लेना! मैंने तो कई उदाहरण देकर सिर्फ़ इतना कहा था कि मुझे किसी बात की जानकारी ही नहीं होती। किसी फैसले में शामिल तक नहीं किया जाता।”
“जब आपको हिसाब ही चाहिए, तो सुनिए! माँ के मरने पर उनके लॉकर में नोटों की गड्डियाँ थीं। किसे क्या देना है, गहने बनवाकर रखे गए थे। अभी आप लोगों ने मेरी बहू को एक जैसे कानों के दो सेट दिए और भतीजे ने अंगूठी। ये सब किसके दिए हुए थे?”
“यानी आप अपने बड़े भाई पर आरोप लगा रहे हैं कि उन्होंने आप लोगों का हक़ मार लिया। और आप लोगों का हक़ मारना तथा मुझे पत्नी का हक़ न देना—आपकी नज़र में एक ही बात है?”
“माँ के श्राद्ध-भोज से लेकर पिताजी के इलाज और उनके श्राद्ध-भोज तक का खर्च किसने उठाया? बड़े भैया ही न!”
“आपके पिताजी की सेवा के लिए सेवक भी मासिक वेतन पर रखा गया था। उन्होंने परिवार के लिए जो किया, उसका हिसाब मैंने कब माँगा? वे पेंशनधारी हैं, खुद रोगग्रस्त हैं। उनकी फ़िज़ियोथेरेपी चलती है, मेरी दवाइयाँ हर महीने आती हैं और घर का खर्च अलग है। फिर भी अलग-अलग अवसरों पर कई बार बड़ी-बड़ी रकम देते रहे। मैंने कभी रोक नहीं लगाई। बस, घर के फैसलों में अपनी भागीदारी चाही थी।”
किसी की धमनी में रक्त प्रवाह नहीं हो रहा था- शंख फूँका जा चुका था-

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