Thursday, 12 March 2015

हाइकु


1
वीर हँसते
जिन्दगी ज्यूँ छेड़ती
भीरु रो लेते ।

2
वसंत शोर
रवि-स्वर्णाभा-होड़
पीले गुच्छों से।

3
असार स्वप्न
भस्म हुई उम्मीदें 
धुँआ जिन्दगी ।

4
दुःख व हंसी
जिंदगी की सौगातें
रूप सिक्के के ।

5
पद के मद
आंगन में दीवारें
घर कलह।

6
घर कलह
बरसे रिश्तों पर 
बेमौसम सा।

7
अँक हो तंग 
मिटे जलन जंग
स्नेह बौछारें ।

8
मेघों की टोली
लाये रंगीन डोली
महके बौर 

=

Tuesday, 24 February 2015

क्षणिकाएँ


 होली की ठिठोली
=
1

झूमो झनको
रंग पानी सा मिलकर
भूलें गिले होकर गीले
झगड़ना या झरना बन बहना
एक दूजे में झलको

2

स्वप्न का धनक निखरे
गैर बिराना मौन ना बचे
पुताई हर दिल हर चेहरे हो
प्यार खरीदार सारे बचे
चहक चहुँ ओर बिखरे

3

जर्द धरा चेहरे पे दर्द
किसने क्यूँ फैलाई
यादों की बुक्कल हटाओ
मलो रंग अबीर मलाई
हटे फिजाओं से सर्द

4

मन ना अश्लील करो
डूबा रंग पोखरे हलकान करो
सलहज भौजी ननद साली
हो जाती सब दिलदार भोली
व्यवहार हमेशा श्लील करो

5

कर गया चोरी दर्जी
सिल दी तंग चोली
बरजोरी की , ले रंग
दंग हमजोली
तोड़ डाले कांच से रिश्ते
बिना जाने उस की मर्जी 

===

Sunday, 15 February 2015

फागुनी प्यार

तीन महीनों से अलग अलग कई शहरों में ; अपनों के बीच
कई शादी समारोह में शामिल होने का मौका मिला ...
हर स्त्री -पुरुष को सजते संवरते देख अच्छा लगा .... 
सब जगह मैं अलग थलग सी लगती बिना सजे संवरे ..... कई लोगों ने टोका ..... मैं कल सोची ... कुछ मैं भी अभ्यास कर लूँ ,दो-तीन दिन बाद फिर एक शादी समारोह में शामिल होने जाना है ..... जैसे ही चेहरे पर कुछ लगाने का शुरू ही की कि ये पीछे से आकर पूछे क्या हो रहा है .....
मैं चुप ....
ये गहरी मुस्कान बिखरते हुए ..... चमेली है क्या 
प्यार का नमूना हजारो में से एक .....
हिन्द में प्यार जाहिर करने के लिए , ना दिन तारीख और ना समय तैय है …..
 हम तो प्रतिदिन प्रतिपल इजहारे इश्क में होते हैं

1

खड़का कुण्डा
हुआ ठूंठ बासंती
फागुनी थापी ।

2

बिंधे सौ तीर
बिन पी , मीन साध्वी
फागुनी पीर ।

3

बिखरी रोली
तरु बाँछें खिलती
फगुआ मस्ती।

4

शिकवा / सताया हेम
विरही-भृंग पीड़ा
कली सुनती।


तब शुरु शुरु कांटी थर्मल में रहने आये थे
कुछ भी खरीदना हो तो मुजफ्फरपुर जाना होता था ;पहली बार बाजार गए ,साडी ही खरीदने  उस बाजार में दोनों तरफ दुकानें और बीच की सडक गली जैसे हालात और भीड़ आदमी पर आदमी
साडी खरीद कर बाहर हम आये तो मैं भीड के चलते मोटरसाइकिल पर बैठने में देर कर दी पति महोदय को लगा होगा मैं बैठ चुकी वो नौ दो ग्यारह
भीड के शोर के कारण मेरी आवाज भी नहीं सुन पाये
अब मैं कैसे कहाँ जाऊँ बैचैन खडी सोच रही थी थोडी देर में मेरे देवर सामने से मोटरसाईकिल से गुजर गये मैं बाबु बाबु पुकारती रह गई तब किसी का नाम लेना अपराध था
पति महोदय देवर के घर गए आराम से नाश्ता किये जब चाय पीने लगे तो मेरी देवरानी पुछी दीदी क्यों नहीं आईं तो होश आया अरे तुम्हारी दीदी तो आई है
कहाँ हैं ? बाजार में तो नहीं छुट गई
तब हडबडाये घबडाये आये
मैं तो वहीं खडी थी जहाँ छोड गये थे


Wednesday, 17 December 2014

काश



काश तुममें
काश्मीर की
चाहत ना होती
माँ गोद छिना
बच्चों का घर जख्मी
भू अंक मिला
तुमने क्या पाया
जेहाद व जे हाल
तमन्ना तुम्हारी थी
=
मैं बीएड में पढ़ रही थी तब 
एक कहने सुनने की कक्षा चल रही थी .... 
पूरे कक्षा में हम तीन चार थे जो थोड़े ज्यादा ही गर्म मिजाज के थे। …। 
जिसमें एक लड़का मुसलमान था। .... उसने सुनाया ......
पत्थर पूजन हरि मिले
तो मैं पूजूं पहाड़
या भली चक्की
पीस खाए संसार
= मैं उबल पड़ी और थोड़े जोर से ही चिल्ला बैठी .....
कंकड़ पत्थर चुन के
मुल्ला दिए मस्जिद बना
ता पर चढ़ के मौला बांग दे
बहरा हुआ क्या खुदा
= बहुत वर्षों तक लगता रहा कि बचकानी हरकत थी .....
सबकी घूरती निगाह हमेशा पीछा करती रही ....
आज तो सच में बहरा लगा ख़ुदा
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Wednesday, 26 November 2014

ये ……… यूँ ही .....


एक मुक्तक

प्यार का बदला मिले सम्मान कम से कम हक़ तो होता है
मृत सम्वेदनाओं वाले पले आस्तीन में सांप शक तो होता है
अदब-तहज़ीब को भूल कर खुद को ख़ुदा से ऊपर समझे
हाय से ना डरने वाला जेब से नही दिल से रंक तो होता है

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एक क्षणिका

 मौत का आभास नहीं मुझे
लेकिन
जिन्दगी में युद्ध नही
जीने के लिए तो
जीने में मज़ा नही
उबना नही चाहते
बिना समय मारे
मरना नही चाहते।

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ताँका 

1
बेदर्दी शीत
विग्रही गिरी हारे
व्याकुल होता 
विकंपन झेलता
ओढ़े हिम की घुग्घी।

फिरोजा होती
प्रीत बरसाती स्त्री
शीत की सरि
ड्योढ़ी सजी ममता
अंक नाश समेटे।

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Tuesday, 18 November 2014

ओस



1
कांच की मोती
किरणें फोड़ देती
पत्ते लटकी।
===
2
कांच भी साक्ष्य
स्वप्न दुर्वाक्षि टंगा
नभ के आँसू।
===
3
क्यूँ पहचाने
अपने व पराये
स्व दर्द पाये।
===
4
जीवी का रोला
वल्ली खिली कलासी
पंक में पद्म ।

रोला = घमासान युद्ध
कलासी = दो पत्थर या दो लकड़ी के जोड़ के बीच का स्थान
===
5
हिम का झब्बा
काढ़े शीत कशीदा
भू शादी जोड़ा।

रेशम ,कलाबत्तू के तारों का गुच्छा = झब्बा 
silk and silver or gold thread twisted together

===
6
भय से पीला
सूर्य-तल्खी है झेले
नीलाभ सिन्धु ।
===
7
चिप्पी ज्यूँ जोड़े
उधेड़ ही जायेंगे
दिया जो धोखा ।

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एतकाद मेहनत पर हो जाता है
वक्ती - मुसीबत हल हो जाता है
हो जाता है खुद पर अगर भरोसा
पसोपेश मुश्तबहा दूर हो जाता है 

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Tuesday, 11 November 2014

चोका



विषय - सूखे गीले का गिला 

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घटा घरनी 
सूखे गीले का गिला 
कान उमेठूँ
मनुहार सुनोगे 
जाल विछाये
मनोहर दृश्य हो 
भ्रम फैलाये
श्वेत श्याम बादल 
साथ धमके 
बरसे न बरसे
दे उलझन 
दुविधा में सताए
काम बढाये
आँख मिचौली खेले 
घर बाहर 
दौड़ती गृहलक्ष्मी 
वस्त्र सुखाती 
माथापच्ची करती
रेस लगाती 
पल दुरुपयोग
क्रोध बढ़ाये 
स्वयं की आपबीती
भयावहता
मेघ पर बरसे 
दे उलाहना 
नौटंकी तुझे सूझे 
परे तू हट 
बरसो या घिसको
समझूँ तुझे 
ना उलझाओ मुझे
धनक दिखा
काम है निपटाने
सीलन है हटाने 

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Saturday, 8 November 2014

शीत आगमन





1
ठूँठ का मैत्री
वल्लरी का सहारा
मर के जीया।

2
शीत में सरि
प्रीत बरसाती स्त्री
फिरोजा लगे।

3
गरीब खुशियाँ
बारम्बार जलाओ
बुझे दीप को।

4
क्षुधा साधन
ढूंढें गौ संग श्वान
मिलते शिशु।

5
आस बुनती
संस्कार सहेजती
सर्वानन्दी स्त्री।

सर्वानन्दी  = जिसको सभी विषयों में आनंद हो 

6
स्त्री की त्रासदी
स्नेह की आलिंजर
प्रीत की प्यासी।

आलिंजर =  मिटटी का चौड़े मुंह का बर्तन = बड़ा घड़ा


Wednesday, 5 November 2014

शीत आगमन




1
साँझ ले आई 
नभ- भेजा सिंधौरा
भू मांग भरी।

2
झटकी बाल
नहाई निशा ज्यूँ ही 
ओस छिटके।

3
पीड़ा मिटती
पाते ही स्नेही-स्पर्श
ओस उम्र सी ।

4
बिज्जु की लड़ी
रजतमय सजी 
नभ की ड्योढ़ी।

5
सुख के तारे
लूता-जाल से घिरे 
तम के तले।

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शीत ढिठाई 
स्वर्ण चोरी कर ले
सहमा रवि 
दहकता अंगार
हिम को रास्ता दे दे।

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लूक सहमे
सूर्य-तन में लीन
शीत का धौंस
ठिठुरी या गुलाबी
मानिनी भू रहती।

*मानिनी =गर्भवती

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चटके रिश्ते
सर्द हवा मिलते
छल – धुंध से
दिल की आग बुझी
बर्फ जमती जाती।

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Wednesday, 22 October 2014

अँधेरा दूसरे घर में है



आज फिर मेरा दिल दहल गया 
और 
उस ॐ शक्ति पर एक सवाल उठ गया मेरे मन में…. 
जहाँ मैं रहती हूँ ....  BTPS के main गेट के सामने चकिया हॉल्ट है .... 
१७ - १८ साल का एक लड़का दिवाली-छठ की छुट्टी में कहीं बाहर से घर आ रहा था 
ठीक गाँव के सामने गाडी धीमी होती देख ,उतावला-पन घर जल्दी पहुँचने की 
ट्रेन से उतरने के क्रम में 6  इंच छोटा हो गया .... ठीक केवल गर्दन कटी 

किसी के घर का दीप बुझ गया 
अँधेरा दूसरे घर में है 

छ महीने से लेकर ……………………………………… जिस उम्र की स्त्री हो 

दहेज कोढ़ हो 

दीपावली हमें जरूर मनानी चाहिए 

हम तो जरूर मनायेंगे 
हम तो शुतुरमुर्ग हैं 

=
नभ भौचक्का
तारे उदास लगे 
दीप जो हँसे।

=
बत्ती की सख्ती
अमा हेकड़ी भूली
अंधेर मिटा।

=
दीप मंसना
तिमिर नष्ट करे
संघ ना सीखे।
=
डरे ना दीप
हथेलियों की छाया
हवा जो चले।
जैसे 
डरे ना बेटी 
पिता कर की छाया
आतंक साया।

=
मिटे न तम
भरा छल का तेल 
बाती बेदम।

=
रागी वैरागी भिक्षुणी तीनों होती है न स्त्री 

जीते जी .... जीते 
पर्स ... हर्ष .... संघर्ष 
...... नारी के जिम्मे।

=
वक्ती गुफ्तगू 
दूर हो मुश्तवहा(संदेह)
घुन्ना से अच्छी।

=
दीन के घर 
तम गुल्लक फूटे
ज्योति बिखरे।

=
मन के अंधे 
ज्ञान-दीप से डरे

अंह में फसे।

=
त्याग के भय
लक्ष्मी के पग पड़े
सासू के ड्योढ़ी
तब दीवाली जमे
घर आँगन सजे।

=
जग का तम
समेटे पेंदी तले 
दीप की आली
तारों से होड़ लेता

भास सूर्य का देता।

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Sunday, 12 October 2014

हाइकु




दीया व बाती
दम्पति का जीवन 
धागा व मोती। 



लौ की लहक 
सीखा दे चहकना
जो ना बहके। 



अमा के घर 
रमा बनी पहुना 
द्युत जमके। 

या

अमा के घर 
पद्मा बनी पहुना 
द्युति दमके। 


संघर्ष धारा
धीर प्लवग पार
जीवन सारा।


मनु पा जाते
स्वर्ण मृग सा लोभ 
जग से छल।


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२६ अगस्त २०२६

आज ना तो संयुक्त परिवार है और ना सासू जी के नुकीले दाँत बचे हैं- बेटियाँ ससुराल में नहीं रह रही -बेटों का रूप बदला है… समाज में अभी अनेक ऐसे...