Friday, 13 June 2014
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ग़ज़ल
लफ़्ज़ वो अब तलक, तो बने ही नहीं जो बयाँ कर सकें, हिय सुने ही नहीं। रास्ते में जो थे, जाल नफ़रत के वो, हम सफ़र में कभी, यूँ तने ही नहीं। ग़म...
लफ़्ज़ वो अब तलक, तो बने ही नहीं जो बयाँ कर सकें, हिय सुने ही नहीं। रास्ते में जो थे, जाल नफ़रत के वो, हम सफ़र में कभी, यूँ तने ही नहीं। ग़म...
बहुत अच्छा लगा.
ReplyDeleteबहुत खूब !!
ReplyDeleteब्लॉग बुलेटिन की आज की बुलेटिन फादर्स डे मे आपकी पोस्ट को भी शामिल किया गया है ... सादर आभार !
ReplyDeleteबहुत सुन्दर चित्र और भाव ....
ReplyDeleteसुन्दर भावो के साथ सुन्दर चित्र..
ReplyDeleteबहुत सुन्दर दी और आपका चित्र तो बहुत ही बढ़िया लगा |
ReplyDeleteबहुत सुन्दर ...........नमस्ते दी
ReplyDeleteबहुत सुन्दर भाव और चित्र के साथ अभिव्यक्ति .... !!
ReplyDeletesach me apke shabdo me jaadu hai....
ReplyDeleteसुंदर ।
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