Tuesday, 8 July 2014

हाइकु



रोती दीवारे 
परित्यक्त है घर
छीजते रंग

या

रोती है भीति 
दीवट सूना पडा 
छीजते रंग।





हो ना दमन
स्वप्नों पे पोते मसि 
क्रोध अगन। 
=====
छिपा तरङ्गी 
अन्नत के अन्दर
शांत समुन्द्र। 





आस से भरे 
रौशनी का शहर
नभ व तारे। 
======
पक के गढ़ा 
हिय शीतल करे 
धरा का कण। 




चट से फूटे
जीवन बुलबुला 
चुलबुला है। 


चुलबुला है
आत्मा कुलबुलाये
आवाजाही है। 



9 comments:

  1. आपकी हाइकू मुग्ध करती है दीदी! कम शब्दों में जीवन दर्शन छिपाए!

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  2. आपकी इस रचना का लिंक कल दिनांक - ११ . ७ . २०१४ को I.A.S.I.H पोस्ट्स न्यूज़ पर होगा , कृपया पधारें धन्यवाद !

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    1. आभारी हूँ .... बहुत बहुत धन्यवाद आपका
      स्नेहाशीष

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  3. हाइकू छोटा होता है पर बात बड़ी कहता है !

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  4. बहुत सुन्दर सारगर्भित हायकू..

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आपको कैसा लगा ... यह तो आप ही बताएगें .... !!
आपके आलोचना की बेहद जरुरत है.... ! निसंकोच लिखिए.... !!

“नगर के कोलाहल से दूर-बहुत दूर आकर, आपको कैसा लग रहा है?” “उन्नत पहाड़, चहुँओर फैली हरियाली, स्वच्छ हवा, उदासी, ऊब को छीजने के प्रयास में है...