Saturday, 26 July 2014

बात है



मिट्टी की काया
ढूँढें संघर्ष-वर्षा 
ओक में ओज। 



मिट्टी का दीया
जग को ओज दिया
ओक  आग से। 




कल की बात है 
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आलता लगाती सांझ तरुणी निकली
झिर्री से झाँकती तारों की टोली निकली
सूर्य सूर्यमुखी अपनी दिशा बदलते रहे 
रात रानी नशीली खिलखिलाती निकली 

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14 comments:

  1. सुन्दर रचनाओं का गुच्छ

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  2. बहुत ख़ूबसूरत प्रस्तुति...

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  3. फेसबुक पर पह्ले ही पढने को मिल जाता है!! फिर भी दुबारा पढना और भी आनन्द प्रदान करता है!!

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  4. वाह ... बहुत ही खूबसूरत ...

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  5. सुंदर प्रस्तुति , आप की ये रचना चर्चामंच के लिए चुनी गई है , सोमवार दिनांक - 28 . 7 . 2014 को आपकी रचना का लिंक चर्चामंच पर होगा , कृपया पधारें धन्यवाद !

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  6. बहुत बढ़िया

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  7. बहुत सुंदर रचना...

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  8. खुबसूरत अभिवयक्ति.....

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  9. खुबसूरत अभिवयक्ति..... कृपया हमारे ब्लॉग पर भी पधारें धन्यवाद !

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