Monday, 17 January 2022

शब्दांजलि

कथाकार- उपन्यासकार- लघुकथाकार- संपादक - प्रकाशक -गुरु सखा मधुदीप जी

मधु और दीप को परिभाषित करने के लिए मधुदीप जी से जुड़े लोगों के अनुभव को सुनने- पढ़ने से आसान हो जाएगा। मधुदीप जी के स्वभाव में माधुर्य था तो उनका लघुकथा के प्रति समर्पण, लघुकथा के लिए किया कार्य सदैव दीपक रहेगा व सूर्य ही रहेगा। 

ना भूतों ना भविष्यति

बलराम अग्रवाल, दिल्ली के अनुसार :- शुरू में सम्भवतः सन् 1976 से सन् 1988 तक, उसके बाद सन् 2013 से मृत्युपर्यन्त। बाद की पारी उन्होंने धुआंधार खेली, हरियाणवी वीरू की तरह। लघुकथा पर 33 खण्डों के प्रकाशन का रिकॉर्ड भले ही कोई तोड़ दे, लेकिन उसके आविष्कर्ता के रूप में तो मधुदीप ही जाने जाते रहेंगे।

लगभग चालीस पुस्तकों को सम्पादित/प्रकाशित करने वाले ,अखिल भारतीय प्रगतिशील लघुकथा मंच के 29 वाँ (5 नवम्बर 2017) लघुकथा सम्मेलन में मधुदीप जी से मेरी पहली भेंट हुई थी। उस मंच से भी उनका 'लघुकथा' को अंग्रेजी में भी 'लघुकथा' कहा जाए क्योंकि ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी, लंदन में डॉ. इला ओलेरिया शर्मा द्वारा प्रस्तुत शोध प्रबंध 'द लघुकथा ए हिस्टोरिकल एंड लिटरेरी एनालायसिस ऑफ ए मॉर्डन हिन्दी पोजजेनर' (he Laghukatha , A Historical and Literary Analysis of a modern Hindi Prose Genre') में उन्होंने लघुकथा को storiette न लिखकर 'लघुकथा' (Laghukatha) ही लिखा है। कहना उनका लघुकथा से प्रीति परिभाषित करता रहा।

मैसेंजर में मधुदीप जी से पहली वार्ता 2 फरवरी 2017 को हुई। उन्होंने लिखा कि "पुष्करणा जी आपकी जो लघुकथा भेज देंगे उसे मैं ले लूँगा।" 'नयी सदी की धमक' नामक पुस्तक उनके सम्पादन में आ रही थी और डाक से भेजी मेरी रचना उन्हें पसन्द नहीं आयी थी। लघुकथा गुरु डॉ. सतीशराज पुष्करणा जी के वे मित्र। तब से हमारे बीच जो भी बातें होनी होती गुरु पुष्करणा जी मध्यस्थ होते।

एक दिन भाई पुष्करणा जी का फोन आया कि, "मधुदीप तुमसे बहुत गुस्सा हैं।"

"क्यों क्या हुआ, ऐसा मैंने क्या किया?"

"तुम फेसबुक पर नए लघुकथाकार की लिखी लघुकथा के शीर्षक अपने पसन्द के अनुसार लिखी हो। उनका कहना है कि क्या तुम वरिष्ठ लघुकथाकारों को नहीं पढ़ा?"

"वर्त्तमान में अत्यधिक विचारणीय है क्या लोकप्रियता सृजक के सृजन की स्तरीयता का मानक हो सकती है...!

आपकी लगभग सत्रह सौ लघुकथा है सबकी सब पसन्द नहीं की जा सकती।"

गुरु पुष्करणा जी अक्सर कहते "दिल्ली जाती हो उनसे भेंट कर लिया करो। दो तीन बार ऐसा हुआ कि उन्होंने कहा,"मैं उनके पास रहूँगा तुम आ जाना।"

मेरे पास नहीं जाने के कई बहाने होते क्योंकि मधुदीप जी मुझे कड़क लगते। और मैं ठहरी अपने आप में खड़ूस अकड़ू।

दिसम्बर 2019 में मैं कैलिफोर्निया चली गई। अक्टूबर 2020 में गुरु पुष्करणा जी स्थाई रूप से पटना छोड़ दिये। उनका स्वास्थ्य ठीक नहीं रहने लगा। मार्च 2020 से महामारी का ताण्डव शुरू हो गया।

मधुदीप जी पड़ाव पड़ताल का 32 वाँ 33 वाँ खण्ड की योजना बना रहे थे उन्होंने मुझे मैसेंजर सन्देश दिया कि "आप लघुकथा भेजें"

"कैसे भेजूँ आप बिना डाक से लघुकथा लेते नहीं और मैं कैलिफोर्निया में हूँ तो डाक से भेज नहीं सकती।"

"भारत में तुम्हारा कोई अपना नहीं?"

"आप हैं न!"

"मुझे मेल कर दो!"

मेरे मेल किये अनेक लघुकथाओं में से आखिरकार एक लघुकथा उन्हें पसन्द आ गयी।

और उस दौरान पता चला चट्टानों के नीचे मीठे जल का स्रोता होता है।

अफसोस इस बात का है कि भाई पुष्करणा जी के संग भाई मधुदीप जी से मिलने नहीं जा सकी। लेकिन भेंट के पन्द्रह दिनों के बाद दोनों भाइयों का मिलन हुआ तो मेरी चर्चा जरूर चली होगी कि विभा मिलने आई थी।

6 comments:

  1. सादर नमस्कार ,

    आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल मंगलवार (18-1-22) को "दीप तुम कब तक जलोगे ?" (चर्चा अंक 4313)पर भी होगी।
    आप भी सादर आमंत्रित है..आप की उपस्थिति मंच की शोभा बढ़ायेगी .
    --
    कामिनी सिन्हा

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  2. हृदयस्पर्शी संस्मरण.

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  3. भावपूर्ण शब्दांजलि ।

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  4. हृदय स्पर्शी संस्मरण

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  5. बहुत ही भावपूर्ण सृजन।
    सादर नमन।

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