Friday, 26 June 2026

२६-०६-२०२६ : शून्योपरान्त या लंतरानी?

छोड़ चुकी हूँ

समस्याओं पर विचार रखना।

हर गाँठ को खोलने की ज़िद में

उँगलियाँ ही लहूलुहान होती थीं।


अब जो नहीं बदल सकता,

उसे समय के हवाले कर देती हूँ।

जो बदल सकता है,

उसे अपने साहस के।


दर्द जब ज्वार से भी ऊँचा उठता है,

लहरें शोर करना छोड़ देती हैं।

समुद्र सिर्फ़ गहरा हो जाता है।

दुःख का बिम्ब भाटा में नीचा बैठता है


लकड़ी जब पूरी जल जाती है,

लपटें नहीं बचतीं—

बस एक मुट्ठी राख

हवा के साथ चल देती है।

राख के बिम्ब के लिए वैतरणी मचल जाती है


बादल जब जी भर बरस लेते हैं,

आकाश रोता नहीं,

बस धुला-धुला-सा

चुप पड़ा रहता है।

वर्षा का बिम्ब सरस लेते हैं-


पेड़ जब अन्तिम पत्ता भी खो देता है,

हवा से शिकायत नहीं करता।

वह अगली ऋतु की प्रतीक्षा में

स्थिर खड़ा रहता है।

वृक्ष का बिम्ब अक्खो-मक्खो करता है!


नदी जब चट्टानों से लड़ते-लड़ते थक जाती है,

उन्हें तोड़ने की नहीं,

उनके बीच से रास्ता बनाने की

कला सीख लेती है।

नदी अपने बिम्ब को ढूँढते-ढूँढते पक जाती है


तेल जब आख़िरी बूँद तक पहुँचता है,

लौ काँपती नहीं,

एकदम स्थिर हो जाती है

बुझने से ठीक पहले।

दीपक का बिम्ब कोई नहीं खोजता है!


रेत ने कब का छोड़ दिया है

बादलों का हिसाब रखना।

उसे मालूम है—

हर बरसात उसकी नहीं होती।

मरुस्थल का बिम्ब कोई मरोड़ दिया है!

5 comments:

  1. क्या बात है दी वाह्ह
    जीवन के अनुभवों की सच्ची झांकी प्रस्तुत करती
    लाज़वाब क्षणिकाएं लिखी है आपने।
    सादर।
    -----
    नमस्ते,
    आपकी लिखी रचना मंगलवार ३० जून २०२६ के लिए साझा की गयी है
    पांच लिंकों का आनंद पर...
    आप भी सादर आमंत्रित हैं।
    सादर
    धन्यवाद।

    ReplyDelete

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